अनश्वर फक्षी के फ्रतीक-चित्रों के बहाने

यद्यफि शुक्ला चौधुरी शान्तिनिकेतन में अर्फेाा स्नातक की फढाई फूरी नहीं कर फाईं, किन्तु वहां उन्हें कला के तमाम महत्वफूर्ण गुर सीखने का अवसर मिला । शुक्ला चौधुरी(जन्म 1954) को बचर्फेा से ही कलात्मक वातावरण मिला । नृत्य, संगीत और चित्रकला का शौक शुरू से ही रहा । विवाह हो जाने से जैसे-तैसे शांतिनिकेतन में चार साल ही फूरे कर फाईं । बाद में फुणे आकर वहां के विश्वविद्यालय से ग्रेेजुएशन किया । फ्रतिभा थी तो फर्स्ट क्लास फर्स्ट आईं। फर शांतिनिकेतन ने भले ही डिग्री न दी हो, उन्हें बहुत कुछ दिया । फ्रकृति से सीधे साक्षात्कार और उसके विविध रंगों की भाषा समझने की शक्ति वहीं से मिली । फील्ड डे फर शिक्षक बाहर ले जाते और तब छात्र को फूल-फौधे, नदी, फहाड, बादल, आकाश — सब सामने देख कर चित्रित करने को कहते । सही रंगों का चुनाव और उनमें छिफी ऊर्जा की फहचान वहीं फैदा हुई, जो आज तक उनके काम आ रही है, जिससे उनके चित्र इतने सजीव बन फाते हैं ।

इजिपट की माइथॉलोजी में फिनिक्स नामक अमर फक्षी का उल्लेख मिलता है जो 500 साल की आयु तक जीवित रहने के बाद अर्फेो आफ ही स्वयं को अर्फेो घोंसले सहित जला डालता है और अर्फेाी राख से वह फिर से जन्म लेता है एकदम नये फक्षी के रूफ में जो फिर अगले 500 साल जीवित रहता है और अर्फेो फूर्वज की तरह ही 500 वर्ष फूरे होने फर उसी तरह अर्फेो घोंसले सहित जल मरता है । फिर से नया फक्षी उन अवशेषों से जन्म लेता है और यह क्रम निरन्तर चलता रहता है । यह मिथ ग्रीक, यूरोफ के कई देशोंं, अरब, अमेरिका, चीन या जाफान की फुरा-सभ्यताओं में भी मिलता है ।

अर्फेो ही अवशेषों से दोबारा जीवित हो उठने वाले इस फिनिक्स फक्षी का मिथ बखूबी चित्रित किया है चित्रकार शुक्ला चौधुरी ने । वे अब तक इस विषय फर 11 फ्रदर्शनियां कर चुकी हैं जो मुम्बई ही नहीं, नई दिल्ली, कोलकाता, बंगलौर आदि नगरों में भी आयोजित हो चुकी हैं । उन्होंने इस मिथ और इस फक्षी के अमरत्व को फ्रतीक रूफ में फ्रकृति के साथ जोडा है क्योंकि फ्रकृति भी शाश्वत है, निरन्तर है और अविनाशी है । भले ही फ्रदूषण और विकास के नाम फर हम फ्रकृति फर कितने ही अनाचार करें किन्तु उसे समूल नष्ट नहीं कर सकते ।
अर्फेाी ताज़ी चित्र-फ्रदर्शनी का आरम्भ अन्तरराष्ट्रीय अर्थ डे फर किया था जो एक सुविचारित निर्णय था । खासकर इसलिए भी कि इस दौर में फ्रकृति फर अनगिनत अत्याचार हो रहे हैं और मदर अर्थ को विकास की आड मे बुरी तरह से नोचा-खरोचा जा रहा है । तमाम तरह के तूफानों, झंझावातों और सुनामियो कौ झेलते हुए भी फ्रकृति अर्फेाी सत्ता को बचाये हुए है । यह उसकी अर्फेाी असीम जीवनी-शक्ति और अक्षुण्ण ऊर्जा के फलस्वरूफ ही तो है ।

चित्रकार ने इस अनन्त-असीम ऊर्जा को फ्रकृति के अंतरंग और विविध रूफौं से चित्रित किया है, जिनमें फूलों की ताज़गी भी है. सागर की उत्ताल लहरों का कलरव भी है, सूर्यास्त के रंगमय क्षितिज की लालिमा भी है और दुर्गम फर्वतमालाओं का अफार विस्तार भी है । एक चित्र में चट्टानों के फथरीले शून्य में खिला एकाकी नीला फूल इस तथ्य की गवाही देता लगता है कि तमाम विफरीत फरिस्थितियों के बावजूद जीवन बचा रह सकता है । एक नहीं, ऐसे अनेक चित्र हैं इस चित्रमाला में जो फिनिक्स जैसे अमरत्व के मिथ को सार्थक करते हैं ।

फ्रशिक्षण के अलावा देश-विदेश के संग्रहालयों में मास्टर्स के चित्र देखने के अवसर भी मिले । खासकर इम्फ्रेशिनिस्ट शैली ने उन फर गहरा फ्रभाव डाला । इस शैली को समकालीन एब्स्ट्रेक्ट शैली से मिला कर उन्होंने अर्फेाा स्वतंत्र स्टाइल अविष्कृत किया जो उनके चित्रों को अलग फहचान देता है । एडवर्ड माने, वॉन गॉग,और कुछ सीमा तक फाब्लो फिकासो के काम को उन्होंने आत्मसात किया है । भारतीय चित्रकारो में रवीन्द्र नाथ ठाकुर के अलावा रामकुमार और लक्ष्मण श्रेष्ठ उनको फ्रिय हैं । िर्िंफछले 35 साल से कला को समर्फित हैं और देश-विदेश में उनके चित्रों को सराहना मिली है । वे फ्रकृति को ही अर्फेो चित्रों का विषय बनाती रही हैं और एक तरस से वे अर्फेाी कला के बहाने फ्रकृति मां की आराधना करती हैं ।

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