आखिर बढ़ते दुराचार के लिए कौन है दोषी?

 

दुराचार के आरोपी के खिलाफ कठोर कानून क्यों नहीं?

दुराचार (Rape) सुनने में तो बाकी शब्दों की तरह यह भी एक शब्द है लेकिन जिसकी जिंदगी में इसका दखल होता है उसकी जिंदगी पूरी तरह से ही उजड़ जाती है। यह एक बहुत ही बड़ा अपराध है लेकिन तमाम कानून पास होने के बाद भी यह पूरी दुनिया में अब भी हो रहा है। दुराचार की कुछ घटनाएँ मीडिया के माध्यम से लोगों के सामने आती है जबकि कुछ घटनाएँ किसी कमरे तक ही सीमित रह जाती है। देश में बहुत सरकारें आयी और गयी हर किसी के शासनकाल में यह घटना भी हुई लेकिन इसका विरोध सिर्फ टीवी डीबेट में नजर आया और फिर हालात जस के तस हो गये। किसी भी सरकार ने  दुराचार के खिलाफ कोई ऐसा ठोस कानून नहीं तैयार किया जिससे इस पर रोक लग सके या फिर किसी ने मन इस बात का डर पैदा किया जा सके कि वह कुकर्म जैसी घिनौनी हरकत करने से पहले सौ बार सोचे। 
 
हर 15 मिनट में हो रहा एक कुकर्म!
2018 की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में करीब हर 15 मिनट में किसी महिला के साथ दुराचार की घटना होती है जबकि राज्य के अनुसार यह ग्राफ कम और ज्यादा भी होता है। सन 2018 के रिपोर्ट के मुताबिक एक साल में 33356 महिलाओ और बच्चियों के साथ कुकर्म हुआ था जिसमें सिर्फ मध्य प्रदेश में 5 हजार से अधिक केस दर्ज किये गये थे जबकि दूसरे नंबर पर राजस्थान (4335) और तीसरे नंबर पर उत्तर प्रदेश (3946) था। भारत में यह घिनौना काम काफी समय से दर्ज किया जा रहा है कुछ केस में दोषियों को फांसी भी हुई है लेकिन बावजूद इसके दोषी इससे कुछ सीख नही रहे है और यह घटना निरंतर होती दिख रही है। 
 
केस में देर से फैसला भी एक वजह
भारत में दुराचार की बढ़ती घटनाओं के लिए सज़ा का देरी से ऐलान भी एक बड़ा कारण है। इस तरह का मामला कोर्ट में जाने के बाद उस पर फैसला आने में देरी हो जाती है क्योंकि पुलिस द्वारा केस से जुड़े सबूत जुटाने और उसे कोर्ट में पेश करने में समय लगता है इसके अलावा और भी कई कानूनी दांव-पेंच होते है जिससे केस की सुनवाई में देरी होती है। कई मामलों में जब तक फैसला आता है तब तक पीड़ित या आरोपी या फिर दोनों की ही मौत हो चुकी होती है। कई बार केस को लेकर पीड़ित इतना परेशान हो जाता है कि वह कोर्ट के बाहर ही आरोपी से समझौता करने को मजबूर होता है क्योंकि ऐसा देखा गया है कि ज्यादातर मामलों में पीड़ित महिला या लड़की गरीब और कमजोर परिवार से होती है ऐसे में उसका हर दिन कोर्ट के चक्कर लगाना और वकीलों की मोटी फीस भरना करीब करीब मुश्किल होता है जिससे पीड़ित परिवार समझौता करने को मजबूर होता है। 
 
कुकर्म पर भी राजनीति करती है कुछ पार्टियाँ
देश में दुराचार की कुछ ऐसी भी घटनाएँ हुई है जिस पर न्यूज़ चैनलों ने भी खूब सुर्खियाँ बटोरी, देश के बड़े बड़े नेताओं ने भी बयान दिया और कहा कि देश में अब यह रुकना चाहिए लेकिन उनका यह बयान भी सिर्फ राजनीति तक ही सीमित रह गया। देश की राजनीतिक पार्टियाँ और नेता आज भी ऐसी  घटनाओं पर राजनीति करते है सिर्फ दिखावे के लिए विरोध प्रदर्शन करते है और मीडिया में आकर बयानबाज़ी करते है जबकि उनकी ही पार्टी सत्ता में होती है तब इसके खिलाफ कोई भी कठोर कानून नहीं बना पाते। हाल ही में हाथरस केस को लेकर फिर से राजनीति शुरु हो गयी है तमाम पार्टियों के नेता बयानबाज़ी कर रहे है लेकिन यह सब तब शुरु हुआ जब यह खबर मीडिया के द्वारा बाहर आयी जबकि हाथरस की घटना 14 सितंबर की है जब एक 20 साल की बच्ची के साथ कुछ लोगों ने दुराचार किया लेकिन तब तक किसी भी नेता ने उस पीड़िता बच्ची की खबर नही ली थी। 
 
सरकार के साथ समाज भी दोषी!
ऐसी घिनौनी घटना के बाद अक्सर लोग सरकार को दोषी ठहराते है और सरकार के खिलाफ नारेबाज़ी होती है लेकिन क्या यह सच कि ऐसी घटनाओं के लिए सिर्फ सरकार ही जिम्मेदार है? क्या समाज, परिवार और लोग जिम्मेदार नही है। किसी भी घटना के लिए दोषी सिर्फ सरकारें नहीं होती, बल्कि वह समाज भी होता है जहां ऐसी प्रवृति लोगों के मन में जन्म लेती है। वह परिवार भी जिम्मेदार होता है जिसके घर का सदस्य ऐसी घटनाओं को अंजाम देता है। हर परिवार का यह कर्तव्य होता है कि वह अपने बच्चों पर अंकुश लगाए और समाज में महिलाओं की इज़्ज़त करना सिखाए। जब तक हर इंसान शिक्षित और समझदार नहीं होगा तब तक ऐसी घटनाएं पूरी तरह से बंद नहीं होगी। हालांकि सरकार को भी इस तरह के अपराध के लिए कठोर से कठोर कानून बनाना चाहिए जिससे लोगों में इसका डर पैदा हो।     

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