रक्षा- बंधन : उत्सव एक, रूप अनेक

भारतीय संस्कृति-परंपरा में अनेक उत्सव मनाये जाते हैं। सभी उत्सवों के पीछे एक निहित भावना होती है और उसमें एक सामाजिक कारण छिपा होता है। अनेक उत्सवों-त्यौंहारो में भाई-बहन के स्नेह का पर्व है- रक्षा-बंधन। रक्षा बंधन का पवित्र पर्व कब से प्रारम्भ हुआ, इसका निर्धारण करना नितांत कठिन है, किन्तु इसके पीछे निहित भावना के प्रमाण हमारे शास्त्रों में प्राचीन काल से ही चली आ रही परंपरा में मिलते हैं। पौराणिक कथा के अनुसार भगवान विष्णु के वामनावतार ने राज बलि को रक्षा-सूत्र बांधा था और उसके उपरांत पाताल लोक में जाने का आदेश भेजा था। आज भी हम जिस मंत्र को पढ़ते हुए रक्षा-सूत्र बांधते हैं उसमें इस कथा का वर्णन होता है-

‘‘येन बद्धो बली राजा, दानवेन्द्रो महाबल:।
तेन त्वामनुबद्धामि, रक्षे मा चल मा चल॥’’

(यह वही रक्षा-सूत्र है, जिसमें महाबली राक्षस राज बलि बांधे गये थे, वही आपको भी बांध रहे हैं। रक्षा-सूत्र, तुम चल-विचल मत हो, प्रतिष्ठित बने रहो।)

प्राचीन काम में संत, ऋषि, मुनि, श्रावण से कार्तिक तक चार महीनों के वर्षा काल में भ्रमण नहीं करते थे। इस अवधि में वे एक ही स्थान पर निवास करते हुए प्रवचन-यज्ञादि किया करते थे। यज्ञ में सम्मिलित होने वाले व्यक्ति के हाथ में चिन्ह के रूप में यज्ञ-सूत्र बांध दिया जाता था। यही यज्ञ-सूत्र आगे चलकर रक्षा-सूत्र के रूप में प्रयुक्त किया जाने लगा। रक्षा-सूत्र का अर्थ है रक्षा की व्यवस्था, जिस व्यक्ति को रक्षा-सूत्र बांधा जाता है, उसकी सुरक्षा की भावना ही रक्षा-सूत्र में निहित होती है। इसी रक्षा-सूत्र की भावना कालांतर में ‘रक्षा-बंधन’ का लक्ष्य निर्धारण करने में निहित हुई।

महाभारत की एक कथा के अनुसार एक समय देवताओं का राक्षसों में भयंकर युद्ध हुआ, लंबे समय तक चले युद्ध में देवता गण पराजित होने लगे। यह आशंका जन्म लेने लगी कि राक्षस देवताओं से इन्द्रासन और इन्द्र लो छीन लेंगे, तब भयभीत इंद्राणी देवताओं के गुरु बृहस्पति के पास पहुंची और इस समस्या का समाधान पूछा। गुरु बृहस्पति ने समाधान बताया कि श्रावण की पूर्णमासी को इन्द्राणी, इन्द्र को तिलक लगाए और उनकी दाहिनी भुजा पर वेदज्ञ ऋषियों के द्वारा अभिमंत्रित रक्षा-सूत्र बांध दे। इन्द्राणी ने ऐसा ही किया, इससे इन्द्र को असाधारण शक्ति प्राप्त हुई और देवता गण युद्ध में विजयी हुए।

रक्षा-बंधन का पावन पर्व श्रावण शुक्ल पूर्णिमा को मनाया जाता है। श्रावण में आयोजित होने के कारण ‘श्रावणी’ भी कहते हैं। दक्षिण भारत में ‘नारली पूर्णिमा’, महाराष्ट्र में ‘श्रावणी पूर्णिमा, बंगाल एवं बिहार में ‘गुरु पूर्णिमा’ तथा नेपाल में ‘जनै पूणै’ या ‘जनेऊ पूर्णिमा’ कहते हैं। लगभग पूरे उत्तर भारत में इसका आयोजन ‘रक्षा-बंधन’ के रूप में किया जाता है। परंपरा के अनुसार रक्षा-बंधन में अक्षद, सरसों, स्वर्ण, कपास या रेशम का सूत्र, वस्त्र सम्मिलित है। इस दिन अपराह्र में रक्षा-सूत्र का पूजन करने और उसके उपरांत रक्षा-बंधन का विधान है।

रक्षा-बंधन में मूलत: दो भावनाएं काम करती हैं। एक, जिस व्यक्ति को रक्षा-सूत्र बांधा जाता है, उसकी रक्षा की कामना और दूसरा रक्षा बांधने वाले की उसके प्रति स्नेह भावना। इस तरह रक्षा-बंधन सचमुच स्नेह, अपनत्व, शांति और रक्षा का बंधन है। इसमें ‘‘सर्वे भवन्तु सुखिन:, सर्वे सन्तु निरामय:’’ वाली भारतीय संस्कृति पूर्णत: मुखरित होती है। मध्यकाल तक इसका निहितार्थ बदलने लग, इसका दोहरा अर्थ माना जाने लगा। प्रथम, जिस व्यक्ति को रक्षा बांधा जाए उसकी कल्याण कामना और दूसरे रक्षा-सूत्र बांधने या भेजने वाले की सहायता, इसके पीछे सोलहवां शताब्दी की एक घटना की भूमिका प्रमुख थी।
कर्णवती चित्तौड़ की महारानी थी। गुजरात के बादशाह बहादूर शाह ने चित्तौड़ पर आक्रमण कर दिया और किले का घेरा डालकर पड़ गया, उसकी विशाल सेना से टक्कर लेना चित्तौड़ के लिए संभव नहीं था, ऐसी स्थिति में महारानी कर्णवती ने सहायता के लिए मुगल बादशाह हुमायूं के पास राखी भेजी। हुमायूं ने कर्णवती की राखी का पूरा सम्मान किया और कर्णवती को बहन मानकर उनकी सहायता के लिए चितौड़ पहुंच गया। इस घटना के बाद रक्षा-बंधन बन्धुत्व एवं सौहार्द्र का प्रतीक बन गया।

एक अन्य प्राचीन कथा के अनुसार यूनान के शासक सिकंदर ने भारत-वर्ष पर आक्रमण कर दिया। सिकंदर एवं सम्राट पुरु के बीच भयंकर युद्ध चल रहा था। यूनानी सेना कमजोर पड़ने लगी, उसकी पराजय की संभावना बढ़ने लगी। विश्व विजय पर निकले सिकंदर का प्राण संकट में देखकर भारतीय संस्कृति की जानकार एक यूनानी महिला ने सम्राट पुरु के पास इस आशय से राखी भेजी कि वे उसे अपनी बहन मानें तथा सिकंदर के प्राणों की रक्षा करेंं, इसके उपरांत राखी के सम्मान की रक्षा करते हुए सम्राट पुरु ने अनेक बार अवसर मिलने पर भी सिकंदर के प्राण नहीं लिए।

रक्षा-बंधन का पर्व संपूर्ण भारत मेंें मनाया जाता है। निहितार्थ एक होते हुए भी अलग-अलग क्षेत्रों में इसका स्वरूप भिन्न-भिन्न है। उत्तर भारत में रक्षा-बंधन भाई और बहन के स्नेह के प्रतीक के रूप में मानाया जाता है। इस दिन बहन अपने भाई को राखी बांधती है और मिष्ठान खिलाती है, इसके बदले वह परंपरानुसार भाई से रक्षा का आश्वासन प्राप्त करती है। दक्षिण भारत में इस दिन कुलीन वर्ग के व्यक्ति निराहार रहकर गायत्री मंत्र का जाप करते हैंं और उसके बाद ब्राह्मणों के हाथों से नया यज्ञोपवीत धारण करते हैं। संध्या काल में तरह-तरह के पकवान, मिष्ठान्न एवं स्वादिष्ट आहार ग्रहण करके अपना व्रत पूर्ण करते हैं। रात्रि में संगीत, नृत्य और नाटक का आयोजन किया जाता है, जिसमें सभी समुदायों एवं वर्गों के लोग भाग लेते हैं। बंगाल व बिहार में रक्षा-बंधन को राखी-बंधन के अतिरिक्त गुरु पूर्णिमा के रूप में भी मनाया जाता है। इस दिन को वहां गुरु के प्रति अपने ऊपर ऋण को स्मरण रखने का दिन माना जाता है। इस दिन गुरु को अपने घर में सम्मान के साथ बुलाकर उनका सत्कार किया जाता है और भोजन कराया जाता है। चूंकि प्राचीन काल में शिक्षा-दीक्षा प्रदान करने का कार्य ब्राह्मणों द्वारा किया जाता था, इसलिए आज भी उनको विशेष सम्मान दिया जाता है। गुजरात एवं महाराष्ट्र में भी यह उत्सव रक्षा-बंधन के रूप में ही मनाया जाता है। स्त्रियां अपने भाई को टीका लगाकर उनके हाथ में राखी बांधते हुए उनके प्रति मंगल कामना करती हैं। नेपाल में इस दिन यज्ञोपवीत की बड़ी प्रशंसा की गयी है। जनेऊ में तीन सूत्र होते हैं, जो देव ऋण, ऋषि ऋण तथा पितृ ऋण के सूचक हैं। प्रत्येक सूत्र में भी तीन-तीन सूत्र होते हैं, जो तीन गुण-सात्विक, राजसिक, तामसिक, तीन तत्त्व-आत्मा, जीव, ब्रह्म, तीन आश्रम- ब्रह्मचर्य, गृहस्थ एवं वानप्रस्थ के परिचायक हैं।

बांधी जाने वाली राखी कई प्रकार एवं स्वरूप वाली होती है। प्रारंभ में यह कपास एवं रेशम के धागों द्वारा सादगी लिए हुए बनायी जाती थी, किन्तु सामाजिक परिवर्तन के साथ ही आज कल सजावटी एवं कलायुक्त राखियों का प्रचलन बढ़ता जा रहा है। त्यौहारों एवं उत्सवों का भी व्यवसायीकरण किया जाने लगा है। अनेक प्रकार की रत्न

जड़ित एवं स्वर्ण रजत धागे से निर्मित राखियों का चलन बढ़ रहा है। वैश्वीकरण के कारण यह त्यौहार भी भारत-वर्ष से बाहर निकलकर विश्व के देशों में मनाया जाने लगा है। समाज के परिवर्तन के साथ पूर्व ही राखी का रूप भव्य एवं सुन्दर होता जा रहा है किन्तु उसमें निहित सर्व कल्याण की भावना और अपनी संस्कृति के प्रति लगाव इस उत्सव के मूल्यों को सुरक्षित रखे हुए हैं।
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