जम्मू-कश्मीर में सेना पर पत्थर चलाने वालों की आप बीती

 

पथराव के बाद मिली जेल की राह

जन सुरक्षा अधिनियम (PSA) के तहत 11 माह जेल में बिता चुके इश्फाक ने बताया कि मैं जब भी पकड़ा गया तब परिवार के अलावा मेरी मदद के लिए दूसरा कोई नहीं आया। जिन लोगों के कहने पर मैने पत्थर चलाए, आजादी और जिहाद के नारे लगाए वह सभी ने मुझसे किनारा कर लिया। सबसे बुरा समय वह था जब में जेल में बंद था और घर पर मां बिमार थी, जिसके बाद पिता जी को जमानत के लिए अपनी जमीन बेचनी पड़ी थी। आजादी का पाठ पढ़ाने वालों के पास मदद के लिए गया था लेकिन उन्होने दुत्कार दिया। मैने देखा कि मेरी तरह ही कई और लड़के परेशानी के आलम में घूम रहे थे। सभी बेरोज़गारी के मारे हुए थे। थानों के चक्कर काट रहे थे। मेरी भी हालत खराब थी, पिता जी भी काम पर जाने में असमर्थ थे। मैं जहां भी नौकरी के लिए जाता वहां से खाली लौटना पड़ता। मुझे नौकरी कौन देगा?
 
निजी स्वार्थ के लिए करवाते थे पथराव 
इश्फाक अहमद की कहानी यह बयां करती है कि घाटी में आजादी और जिहाद के नारे लगवाने वालों के लिए निजी एजेंडा अधिक महत्तवपूर्ण है। अपना स्वार्थ साधने के लिए घाटी के लिए युवाओ को बरगलाना और स्वार्थ सिद्धी हुई है और एजेंडा पुरा हुआ तो फिर किनारा कर लिया। इश्फाक ने कहा कि कैसी आजादी और कैसा जिहाद? कुछ लोगों ने अपना निजी स्वार्थ साधने के लिए हम जैसे युवकों के हाथों में पत्थर थमा दिया और जब एजेंडा पूरा हो गया फिर हमसे किनारा कर लिया।
मैं खुश हूं कि मैं सच को जान पाया और फरेबी एजेंटों से मुझे आजादी मिल गई। वैसे यह केवल एक इश्फाक अहमद का दर्द नहीं है बल्कि हर कश्मीरी युवा की कहानी है। घाटी में संकट से घिरे 26 वर्षीय इश्फाक अहमद और उन जैसे कई लोगों के लिए सेना मददगार बनी और सम्मान से जीने की राह दिखाई। आज यह युवा रोजगार पाकर परिवार के जीने का सहारा बन रहे हैं।
 
सेना ने दिखाई जीने की राह
उत्तरी कश्मीर के कुपवाड़ा जिले का लालोब निवासी इश्फाक बताता है कि मैं कभी इन फरेबी नारों में फस कर मरने को निकलता था यही कारण है कि  पत्थरबाजी, आगजनी, हिंसक प्रदर्शन और राष्ट्र विरोधी गतिविधियों में शामिल होने के आरोपों में मेरे खिलाफ 11 एफआईआर दर्ज है जो सुरक्षा एजेंसियों और पुलिस के लिए सिरदर्द था लेकिन अचानक से एक दिन सेना के अधिकारी से मिला, उनसे अपना दर्द बतां किया जिसके बाद उन्होने कहा कि देखते हैं। फिर जानकारी मिली कि अगस्त में कुपवाड़ा में सेना की 28 आरआर में रोजगार मेला आयोजित किया है।

 

इलाके के कई पढ़े-लिखे और हुनरमंद नौजवान भी शामिल हुए। पिता के कहने पर मैं भी मेले में पहुंचा, पहले डर रहा था कि यहां फौजी अफसर मुझे देखेंगे तो क्या कहेंगे, मैं कभी उन पर पथराव करता था लेकिन मेले में गया जहां एक कंपनी के अधिकारियों से बातचीत हुई और मुझे नौकरी भी मिल गयी। आज मैं बेकार नहीं हूं, मेरे साथ नौ और लड़कों को रोजगार मेले में नौकरी मिली है।
 
‘मेरे बेटे को तबाही में धकेला’
इश्फाक के पिता अब्दुल रशीद बट ने बताया कि कश्मीर में कुछ लोगों की स्वास्थ्य पूर्ण सियासत ने मेरे बेटे को तबाही की तरफ धकेल दिया था। पूरा परिवार मुश्किल में फंसा था। इश्फाक को हीरो बताने वाले लोग मुसीबत में हमारा साथ छोड़ कर चले गये। भला हो उस फौज का जिसने मेरे बेटे की जिंदगी सवार दी। इश्फाक के पिता ने बताया कि हमारे इलाके में एक फौजी अफसर ने एक दिन यूं ही मुझसे पूछ लिया कि इश्फाक कश्मीर की दुश्मन ताकतों के लिए नारे ही लगाएगा या कुछ सही भी करेगा? जिसके बाद मैंने उस सेना के अफसर से बात की और इश्फाक को सेना में जाने के लिए कहा, आज कर्नल साहब की बदौलत मेरा बेटा इज्जत की रोटी कमा रहा है।
सेना के अधिकारी कर्नल महाजन ने बताया कि हमने यहां लोगों से बातचीत की और यह पता लगाया कि सबसे ज्यादा जरूरतमंद कौन है और वह कौन सा काम कर सकते है? इसके आधार पर हमने रोजगार मेले का आयोजन किया। मैंने खुद इश्फाक से कई बार बातचीत की तो मुझे महसूस हुआ कि वह सही मायनों में एक गुमराह युवक है जो गलत लोगों की संगत में आकर भटका हुआ है।

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