शिवाजी का सुराज-शासन प्रबंधन का दीपस्तंभ

भारत का इतिहास गवाह है कि जब-जब भारत पर विपत्तियां आई हैं या भारत का जन-मन टूटने के कगार पर पहुंचा या उसका अस्तित्व और पहचान दांव पर लगी और ऐसा लगने लगा कि अब इस देश को नष्ट होने से कोई नहीं बचा सकता, तब-तब कोई न कोई ऐसा चमत्कार हुआ अथवा कहा जाए कि चेतना का ऐसा ज्वार उठता रहा, जिसके फलस्वरूप भारत अपने पूरे ऐश्वर्य और वैभव के साथ पुन: उठ खड़ा हुआ है। यही कारण है कि आज भी विश्व भारत की उस सनातन जीवन मूल्यों की शक्ति का लोहा मानता है, जो उसके रक्त में है और कवि इकबाल की वह पंक्तियां याद आने लगती हैं-

यूनान मिस्त्र रोमी सब मिट गए जहां से।
अब तक मगर है, बाकी नामो निशां हमारा
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी।
सदियों रहा है दुश्मन दौरे जहां हमारा॥

इस देश की सत्य सनातन परंपरा का यह प्रताप रहा है कि अनेकानेक सांस्कृतिक, सामाजिक तथा सैनिक आक्रमणों के बावजूद भारत अब तक बचा रहा है और यह विश्वास भी है कि अपनी संस्कृति की संजीवनी शक्ति के बल पर वह बचा भी रहेगा। यदि हम इतिहास के झरोखे में झांक कर देखें कि भारत के राष्ट्र जीवन में कई ऐसे मुकाम आए, जब यह सुनिश्चित सा लगने लगा कि अब यह देश और समाज नहीं बचेगा और सब कुछ समाप्त हो जाएगा, लेकिन तभी कुछ ऐसा हुआ कि किसी महापुरुष ने जन्म लेकर समाज को अपने व्यक्तित्व और कृतित्व से अनुप्रमाणित करके उसे अपने मूल प्रकृति से पुन: जोड़ दिया। छत्रपति शिवाजी महाराज ऐसे ही महापुरुष थे, जिन्होंने मुगलों के अत्याचारी और आतंकी शासन के समय आम जनता में न केवल स्वराज और सुराज की अदम्य इच्छा को जागृत किया बल्कि उसको प्राप्त करने के लिए उनमें शक्ति और संगठन का निर्माण भी किया।

अभी हाल ही में प्रभात प्रकाशन, दिल्ली ने शिवाजी महाराज पर एक शिवाजी-सुराज के नामक पुस्तक का प्रकाशन किया है, जिसके लेखक हैं राज्यसभा सांसद श्री अनिल माधव दवे। भारत के लोक व शिष्ट परंपरा के अध्येता श्री दवे ने हिंदी में लिखी इस पुस्तक में छत्रपति शिवाजी महाराज के व्यक्तित्व के उस पहलू को उजागर किया है, जो शिवाजी को एक श्रेष्ठ और सफल शासक के रूप में स्थापित करता है। शासक को आम आदमी के विकास और विश्वास के साथ सही मायनों में किस प्रकार से जुड़ कर प्रशासन चलाना चाहिए और छत्रपति शिवाजी ने किस प्रकार इसको अपने नेतृत्व की कुशलता से सिद्ध किया है, यह पुस्तक लोक प्रबंधन की उसी अवधारणा का दस्तावेज है।

छत्रपति शिवाजी महाराज का अवतरण भारत के इतिहास में उस समय हुआ, जब औरंगजेब का शासन चरमोत्कर्ष पर था। भारत का लोक तथा आम जनता हताशा तथा निराशा से मुगल शासन की कृपा पर निर्भर था, ऐसे समय में छत्रपति शिवाजी ने लोगों में हिन्दू अस्मिता तथा स्वराज की अवधारणा का बीजारोपण करके हिंदू पद पादशाही की स्थापना की और भारतीय इतिहास में एक नए युग का प्रारंभ किया। शिवाजी महाराज ने अपनी मां जीजाबाई, पिता शाह जी तथा गुरु दादा कोंडदेव से प्राप्त शिक्षा और स्वाभिमान के मंत्र को किस प्रकार से आम जनता में प्रचारित और प्रसारित किया, इसका आज के संदर्भ में बड़ा ही रोचक वर्णन पुस्तक में किया गया है। जो पाठक को सुशासन के संबंध में एक नई दृष्टि प्रदान करता है। लेखक ने शिवाजी को एक ऐसे शलाका पुरुष के रूप में चित्रित किया है, जिसने  तत्कालीन परिस्थितियों में समाज की नब्ज पहचान कर आम जनता को संगठित किया और उसे स्वराज तथा स्वतंत्रता की प्राप्ति के लिए निरंतर संघर्ष करने और आवश्यकता पड़ने पर अपना सर्वस्व न्यौछार करने के लिए तैयार किया था। इस पूरी संघर्ष गाथा का बहुत ही सजीव चित्रण पुस्तक में हुआ है। लगभग 225 पृष्ठों की यह पुस्तक प्रबंधन तथा लोक प्रशासन के विद्यार्थियों के लिए एक संदर्भ ग्रंथ है। अपनी पुस्तक में लेखक ने शिवाजी के प्रशासकीय गुणों का क्रमवार वर्णन किया है और यह भी बताया है कि शिवाजी द्वारा किए गए कार्यों का इतिहासकारों तथा लोक प्रशासन के विशेषज्ञों ने किस प्रकार आकलन किया। उदाहरण के लिए लेखक ने पुस्तक के दूसरे अध्याय ‘आकलन’ में ब्रिटेन के मिलिट्री सेक्रेटरी फिलिप की शिवाजी के बारे में यह टिप्पणी कि, ‘अगर छत्रपति शिवाजी पांच-छ: साल और जिंदा होते तो हम अंग्रेज भारत पर शासन नहीं कर सकते थे’ बहुत मायने रखती है। श्रेष्ठ नायक भविष्य का आकलन किस प्रकार से करता है, इसके उत्कृष्ट उदाहरण के रूप में छत्रपति शिवाजी को लेखक ने बड़ी ही खूबी से अपनी पुस्तक में शब्दांकित किया है।

दवे जी ने शिवाजी के कर्तव्य उनके नेतृत्व की कुशलता तथा उनके सफल नायक बनने को चार सिद्धांतों की कसौटी पर कसा है- लेखक का मानना है कि श्रेष्ठ नेता या नायक वही होता है जो देश, काल- परिस्थिति के आधार पर अपने पास उपलब्ध मानव संसाधनों का सही प्रकार से उपयोग करता है और उसका नेतृत्व करता है। लेखक के अनुसार सफल नायक बनने के लिए चार बातें महत्वपूर्ण है- आरंभ, आकलन, आस्था तथा अभय। लेखक ने विभिन्न ऐतिहासिक दस्तावेजों का हवाला देकर यह सिद्ध किया है कि छत्रपति शिवाजी महाराज ने उद्देश्य की पूर्ति के लिए तत्कालीन देश, काल परिस्थिति के अनुसार पहले भविष्य का आकलन किया और बाद में स्वराज की प्राप्ति के लिए उन्होंने समाज में आत्मविश्वास तथा आस्था का निर्माण किया। इस प्रकार जनता को भयमुक्त या अभय प्रदान कर उन्होंने समाज में उत्साह का संचार करते हुए अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए प्रतिबद्ध लोगों की जो विशाल सेना तैयार की उससे वे इतिहास में आने वाली पीढ़ियों के लिए एक उदाहरण के रूप में याद किए जाएंगे। विश्व इतिहास में शिवाजी महाराज केवल एक योग्य शासक तथा कुशल प्रशासक के रूप में ही नहीं, बल्कि वे सुशासन, सुराज के पर्याय के रूप में भी जाने गए है।

लेखक का मानना है कि छत्रपति शिवाजी ने अपने 36 वर्ष के सार्वजनिक जीवन में साढ़े छ: वर्ष तो युद्ध, लड़ाई तथा संघर्षों में बिताए, किन्तु शेष तीस वर्ष की अवधि उन्होंने स्वराज का ऐसा शासन तंत्र खड़ा करने में लगाया जो उनके जाने के बाद भी उसी भाव से चलता रहा। इस कार्य में उन्होंने एक दिन भी प्रमाद, भोग, मनोरंजन या विलासिता में नहीं बिताया। देश का प्रशासक कैसा होना चाहिए। यह कोई शिवाजी के वैयक्तिक आचरण और व्यवहार से सीखे। आजकल राजनीतिक तथा सामाजिक जीवन में कार्यरत नेताओं द्वारा शिवाजी महाराज के नाम से अनेक प्रकार के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, किन्तु क्या वर्तमान में एक भी कोई ऐसा उदाहरण मिल सकता है, जो शिवाजी के आचरण और चरित्र के शतांश का भी अनुगमन करता हो।

इस पुस्तक में लेखक ने छत्रपति के आमात्य रहे रामचंद्र पंत द्वारा अनेक विषयों पर लिखे गये आज्ञा-पत्रों को भी समाहित किया है। लेखक का मानना है कि श्री रामचंद्र पंत अपनी प्रशासकीय दायित्व को पूरा करने एवं शासकीय विचार-विमर्श के दौरान शिवाजी के जो भी विचार सुनते थे, उसे वे प्रशासनिक कार्यान्वयन की दृष्टि से लिख लेते थे और उन्हें आज्ञापत्रों के रूप में शासन में जारी करते थे, ऐसे लगभग 20 आज्ञा पत्र जिनका संबंध-प्रशासक के स्वानुशासन, सेना की रिश्तेदारों से सावधानी, राजकोष सेवा-सरकार विदेशी व्यापारियों के प्रति नीति, पर्यावरण, व्यापारियों का महत्व आदि अनेक विषयों से है, को शामिल किया गया है।

लेखक ने अपनी इस कालजयी पुस्तक में छत्रपति शिवाजी के व्यक्तित्व के उस पहलू को उजागर किया है, जिसकी आज के शासकों-प्रकाशकों तथा प्रबंधकों को जानने की सबसे बड़ी आवश्यकता है। लेखक का मानना है कि ‘शिवाजी एक व्यक्ति नहीं विचार हैं, वे एक कार्यशैली हैं, वे इस देश की सनातन संस्कृति के उदघोषक हैं, जो देश के विभिन्न भागों में अलग-अलग शताब्दियों में हुए अन्य राष्ट्र नायकों की तरह सदैव प्रेरणा देते रहते हैं।’

सरल, सुबोध तथा सरस शैली में लिखी यह पुस्तक वास्तव में अप्रतिम है। लेखक ने एक ऐतिहासिक महापुरुष के विराट व्यक्तित्व और कर्तृत्व का ऐसा भावपूर्ण शब्द चित्रण किया है, जो बड़ी मुश्किल से पढ़ने को मिलता है, तभी मराठा इतिहास के विश्वकोष और ‘जाणता राजा’ के निर्माता सुप्रसिद्ध विचारक और चिंतक श्री बाबा साहब पुरंदरे ने इसके प्राक्कथन में लिखा ‘भारत की जनता विशेषकर हमारे राजनीतिक नेताओं की यदि यह इच्छा हो कि भारत का स्वराज्य सुराज में बदले तो उन्हें श्री अनिल माधव दवे की इस पुस्तक को अवश्य पढ़ना चाहिए। यदि इसकी थोड़ी बहुत समझदारी भी हममें अवतरित हो जाए तो इस भारत का रूप बदल जाएगा।’
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