बच्चा यदि पढणे में कमजोर हो

बालक अगर गतिमंद हो, तो उसका ख्याल कर अध्ययन की दिशा निश्चित करना आवश्यक होता है। स्वतंत्र रूप से अध्ययन कैसे करवाएँ, इसे लेकर माता-पिता का, अध्यापकों का मार्गदर्शन करने से लाभ हो सकता है। लेकिन मतिमंदत्व अगर हो, तो फिर उनके लिए होने वाले स्वतंत्र विद्यालय में नाम दर्ज करने से प्रगति हो सकती है। विशेष रूप से सौम्य मतिमंद बालक अच्छी प्रगति कर सकते हैं। आत्मविश्वास धारण करते जीवन जीने पात्र बनने में बाधा होती है, वह पालकों द्वारा इसका स्वीकार होने की। कई बार अच्छी तरह समझाने-बुझाने पर भी-उस विद्यालय के बालक विचित्र दिखाई देते हैं, मेरा बच्चा और अधिक मतिमंद बेनगा आदि अज्ञात भय मन में धारण करते हुए सामान्य विद्यालय में ही उसे रखने की जिद करते हैं और आखिर चलकर (स्व. प्रतिष्ठा की धुन में) बच्चे को हानि पहुँचाते हैं।

अर्णव के माँ-बाप उसे लेकर मुझ से मिलने आये थे। वह पाँचवी कक्षा में पढ़ रहा था। बड़ा ही प्यारा बच्चा! बिल्कुल शांत बैठा था। कुछ सहमा-सहमा सा लग रहा था। अंदर आया, तबसे गर्दन झुकाकर ही बैठा था।

‘‘क्या हुआ है अर्णव को?’’ मैंने पूछा।

‘‘अर्णव! कहो तो और कितने किले फतह किये? आखिर तुम भी क्या कहोगे? कहने लायक है, भी क्या अब?’’ अर्णव की माँ की तोप लगातार गरजने-बरसने लगी।

‘‘अब, जरा सब्र करते, शांति से भी तो कुछ कहोगे? आप अर्णव को साथ लेकर किसलिए आये हैं?’’

‘‘आखिर शांत रहूँ भी कैसे, डॉक्टर? अर्णव की पढ़ाई में से इतनी सारी ‘प्रगति’ (प्रगति पुस्तक में से लाल रेखाएँ दिखाते) इसने ही तो मुझे परेशान कर दिया है। कृपया, उसे इसमें से बाहर तो निकालिए !’’ ऐसा कहते वह तो रोने सी हो गई । तब अर्णव के पिता जी ने उसे शांत किया और खुद कहने लगे, ‘‘वैसे खास कुछ नहीं, डॉक्टर साहब, राई का पर्बत जो करती है। परेशानी हुई है अर्णव की पढ़ाई को लेकर। तभी तो शांति से आप जैसे विशेषज्ञ से सलाह लेकर आगे बढ़ने की सोच कर ही तो यहां आये हैं।
हमारा अर्णव पहले पढ़ाई में सही रास्ते पर था, यह सभी विषयों में अच्छे अंक पाता था। सभी विषयों में अच्छी प्रगति थी उसकी, दूसरी कक्षा तक। पर तीसरे कक्षा से गाड़ी धीमे-धीमे फिसलने लगी।

80-85 अंक पाने वाला 70 तक आ पहुँचा। पिछले साल 60 तक आया और अब तो तीन विषयों में पहली छमाही परीक्षा अनुत्तीर्ण। इसलिए परेशानी थी। जन्म के बाद भी सही ढ़ंग से विकास हो रहा था। उसका गर्दन सँवारना, रेंगना, बैठना, चलना, बोलना सभी कुछ सही समय पर ही हुआ। दूसरी कोई बड़ी बीमारी भी पास फटकी नहीं। मामूली जुकाम, बुखार के अलावा कुछ भी नहीं। अब यह कुछ अनोखा ही समस्या हमारे सामने आ खड़ी हुई है। क्या करें, कुछ समझ न रहे पार रहे हम, डॉक्टर! तभी तो आप से मिलने आये हैं। कृपया हमारी मदद कीजिएँगा!’’

‘‘अब देखिए! पढ़ाई में पिछड़ने के तीन विशेष कारण होते हैं। पहले बुद्धि साधारण बुद्धंयक से कम होना, अध्ययन क्षमता कम होना अथवा भावनिक संतुलन में कुछ खराबी होना, ऐसे तीन प्रकार के प्रमुख कारण होते हैं। आपके अर्णव के संबंध में उनमें से कौन सा मुख्य कारण है, इसकी हम खोज करेंगे, जिससे चिकित्सा की दिश तय करना आसान होगा।’’

डॉक्टर साहब के कहने के अनुसार अब अर्णव के बारे में अधिक जानकारी संकलित की जाएगी, अथवा उसका कुछ मानसिक-बौद्धिक जांच की जाएगी, उससे समस्या का मुख्य कारण पता चलेगा और अगली चिकित्सा की दिशा तय करना आसान होगा।’’

हमसे मिलने वाले 10 में से लगभग 6-7 बच्चों की यह समस्या होती है कि वह लड़के- लड़की की पढ़ाई में कहीं पिछड़ रहे हेैं, उससे उसके मामले में पूरी जानकारी प्राप्त करते बौद्धिक-मानसिक जांचकर उपर्युक्त तीन कारणों के संदर्भ में खोज की जाती है और उस अलग-अलग कारण के अनुसार आगामी चिकित्सा की दिशा तय की जाती है।

व्यक्ति का बुद्धयांक 90-110 के बीच अगर हो, तो वह उच्च स्तर की बुद्धिमत्ता होती है, उसके ऊपर (110-140) बुद्धयांक हो, तो वह उच्च स्तर की बुद्धिमत्ता तथा 140 के ऊपर का बुद्धयांक अगर हो, तो वह अति उच्च बुद्धिमत्ता मानते उस बालक को ‘वरदान प्राप्त बालक’ कहा जाता है। बुद्धयांक के 90 से 70 के बीच का होने से वह बालक गति’ माना जाता है। हाँ! कभी-कभी भावनिक, दूसरें न्यूरॉलॉजिकल/मस्तिष्क के विकार आदि के परिणामस्वरूप भी 80-90 मध्य बुद्धयांक हो सकता है।
70 से कम बुद्धयांक होने से बालक मतिमंद माना जाता है। उसमें भी 50 तक सौम्य मतिमंद, 35 तक मध्य, 20 तक तीव्र, 20 से भी कम हो तो ‘अति तीव्र मतिमंदत्व’ कहा जाता है। कई बार गतिमंदत्व, सौम्य मतिमंदत्व शुरू शुरू में समझ में ही नहीं होता। ऊपरी कक्षाओं में पहुँचने पर उसका लिहाज हो सकता है, फिर वह भी बुद्धयांक परीक्षण किये जाने पर ही। बालक अगर गतिमंद हो, तो उसका ख्याल कर अध्ययन की दिशा निश्चित करना आवश्यक होता है। स्वतंत्र रूप से अध्ययन कैसे करवाएँ, इसे लेकर पालकों का, अध्यायकों का मार्गदर्शन करने से लाभ हो सकता है, लेकिन मतिमंदत्व अगर हो, तो फिर उनके लिए होने वाले स्वतंत्र विद्यालय में नाम दर्ज करने से प्रगति हो सकती है। विशेष रूप से सौम्य मतिमंद बालक अच्छी प्रगति कर सकते हैं। आत्मविश्वास धारण करते जीवन जीने पात्र बनने में बाधा होती है, वह माता-पिता द्वारा इसका स्वीकार होने की। कई बार अच्छी तरह समझाने-बुझाने पर भी उस विद्यालय के बालक विचित्र दिखाई देते हैं, मेरा बच्चा और अधिक मतिमंद बेनगा आदि अज्ञात भय मन में धारण करके सामान्य विद्यालय में ही उसे रखने की जिद करते हैं आगे चलकर (स्वयं प्रतिष्ठा की धुन में) बच्चे को ही हानि पहुँचाते हैं।

इसका दूसरा बिंदू हमने देखा, सो अध्ययन अक्षमता का। अध्ययन अक्षमता अथवा में बुद्धयांक साधारण (90-110) अथवा उससे कुछ ऊँचा (110-140) हो सकता है, उसकी सुनने की, देखने की क्षमत आमतौर पर संतोषजनक होती है। मस्तिष्क की अन्य कोई भी बीमारी नहीं होती। ऐसा होने पर भी वह बालक पिछड़ता जाता है। बुद्धयांक यदि सामान्य या अधिक हो, तो भी उसके जो दो अंग होते हैं, उनमें अतिरिक्त कमी देखी जाती हैं। सामान्यत: कुछ कमी तो होती ही है, लेकिन सामान्य से भी अगर हो, तो अध्ययन अक्षमता की संभाव्यता अधिक होती है, ऐसा अगर हो, तो आगे चलकर उसकी अतिरिक्त जांच मुंबई के नायर अस्पताल का मानसिक रोगी विभाग तथा सायन के लोकमान्य तिलक अस्पताल का बाल रोग विभाग इन दो केंद्रों में ही होते हैं। अध्ययन अक्षमता के चार मुख्य प्रकार होते हैं। वाचन, पाठन, लेखन, गणिती अक्षमता तथा भाव लेखन/स्व लेखन अक्षमता इनमें से जिस प्रकार की अक्षमता होगी, उसने अनुरूप बालक को दिया, तो आहिस्ता-आहिस्ता अच्छी प्रगति हो सकती हैं। थॉमस एडिसन, अल्बर्ट आईनस्टाइन जैसे महान शास्त्रज्ञों में भी अध्ययन अक्षमता थी, यह ध्यान देने लायक तथ्य है। इसका आशय यही है

कि अपने बच्चे की परेशानी का सही आकलन करते उसकी उस दृष्टि से आवश्यक सहायता अगर की तो हम ‘एडिसन’ निर्माण कर सकते हैं, इसे समझ लेना जरूरी है। तीसरी समस्या होती है भावनिक एवं बर्ताव संबंधी समस्या। परिवार का तथा विद्यालय का वायुमंडल, बच्चे का स्वभाव आदि के परिणामस्वरूप बच्चों को छोटी उम्र में भी चिंता, निराशाग्रस्त कर सकती है। साथ ही उन्हें अति चंचलता जैसी अन्य बर्ताव संबंधी समस्या अगर हो, तो इन सभी का बच्चों की पढ़ाई पर असर होता है, क्योंकि उन्हें तनाव होता है।

बच्चों के मन में तनाव हो, तो वे बोल नहीं पाते, कह नहीं पाते, उससे मनो शारीरिक समस्या, पढ़ाई में पिछड़ना आदि लक्षणों से यह प्रकट होता है।

पढ़ाई में पिछड़ने के कारण हमने देखे। फिर भी उनको स्वीकार कर आग बढ़ना महत्त्वपूर्ण होता है, इस बात को भी माता- पिता को ‘स्वीकार’करना भी बहुत महत्त्वपूर्ण है, इस दृष्टि से ‘गीताई में’वर्णित यह उक्ति बहुत महत्वपूर्ण है-
‘हानि-लाभ, हार-जीत सुख दु:खे करी सम।’
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