सब मिलकर एकसाथ कोरोना से लड़ाई लड़ें- डॉ. राजेंद्र धर्मेजा

वैश्विक महामारी कोरोना वायरस के खिलाफ तकरीबन 6 महीनों से पूरा भारत लड़ाई लड़ रहा है। डॉ. राजेंद्र धर्मेजा भी  इस महामारी से मुकाबला करने के लिए लोगों को जागरूक करने का काम कर रहे हैं। उनसे कोरोना, उसकी चिकित्सा, जरूरी एहतियात और टीके आदि के बारे में हुई बातचीत के अंश यहां प्रस्तुत हैं-

     कोरोना का जो इंफेक्शन चैन है, इसे ब्रेक करने के लिए बाकी देशों की तरह भारत में भी लॉकडाउन किया गया। इस लॉकडाउन के क्या फायदे हैं?

भारत में लॉकडाउन मार्च के आखिरी हफ्ते में लागू किया गया। उस दौरान भारत की जो परिस्थिति थी वो हमारे लिए बेहद तैयारी की थी। मैं आपको बता दूं उस समय हमारे पास एक लेबोरेटरी थी। आज की तारीख में हमारे पास 16 से ज्यादा लेबोरेटरी उपलब्ध हैं। पहले दिन में 20-50 टेस्ट होते थे, अब हम दिन में 11 लाख से आसपास टेस्ट करते हैं। कोरोना से लड़ने के लिए हमने इतना बड़ा नेटवर्क लेबोरेटरी का खड़ा किया है यह प्राइवेट और गवर्नमेंट सेक्टर में भी इंस्ट्रक्चर की दृष्टि से बहुत बड़ा सकारत्मक बदलाव है। लॉकडाउन में सबसे बड़ा योगदान यहीं रहा कि हमने अपने आपको इस महामारी से लड़ने के लिए तैयार किया। हम इस वायरस से लड़ने के लिए चाहे वह आईसीयू के बेड हो, चाहे वह कोविड-19 हॉस्पिटल हो, कोविड-19 केयर सेंटर हो, कोविड हेल्थ सेंटर हो या फिर हमारे ट्रीटमेंट के प्रोटोकॉल बने हैं या गाइड लाइन बनी हैं जो कि टेस्टिंग की गाइड लाइन तो लॉकडाउन के दौरान की उपलब्धि है। मुझे लगता है लॉकडाउन में हमने यह बहुत बड़ी उपलब्धि हासिल की है।

     भारत की जनसंख्या के मुकाबले लेबोरेटरी बहुत कम है। उस बारे में आपको क्या लगता है?

अगर आप कोविड-19 नंबर टेस्ट की बात करेंगे तो हम रोजाना 11 लाख के आसपास कोरोना टेस्ट कर रहे है। तकरीबन हम 6 करोड़ टेस्ट कर चुके हैं। 130 करोड़ की जनता के लिए हमें और भी लेबोरेटरी की जरूरत है। लेकिन जो थकज के मापदंड हैं उनका यह मानना है कि जब आप टेस्टिंग करते हैं, टेस्टिंग में पॉजिटिविटी का रेट 5% से कम होना चाहिए। इस मापदंड के हिसाब से हम उस ओर बढ़ रहे हैं। हमारा पॉजिटिविटी का रेट 8% पर है। मैं यह भी मानता हूं कि निश्चित नंबर भी मायने रखते हैं क्योंकि जितने ज्यादा नंबर बढ़ेंगे मौत भी निश्चित नंबर से बढ़ेगी। आज की तारीख में कोरोना वायरस से मरने वालों की संख्या हम 1000 -1200 के आसपास देख रहे हैं। लेकिन पॉजिटिविटी का रेट 5% तक लाने के लिए हमें और टेस्ट की जरूरत है। हम उस दिशा में काम कर रहे हैं। जिस दिन पॉजिटिविटी का रेट 5% तक आ जाएगा, तब हम कह सकते हैं कि हम पर्याप्त मात्रा में टेस्टिंग कर रहे हैं। पहले हमें लगता था बेड और वेंटिलेटर की ज्यादा जरूरत पड़ेगी लेकिन मार्च से लेकर सितंबर तक की बात करें तो इस दौरान कोरोना वायरस के बारे में हमने यह जाना है कि यह इतना ज्यादा क्रिटिकल नहीं है। इतनी वेंटिलेटर की जरूरत नहीं पड़ रही है जितनी हमने अनुमान लगाया था। अभी भी हम कुछ जगह पर देख रहे हैं कि बेड और वेंटिलेटर पर्याप्त मात्रा में है।

   बात अगर कोरोना टेस्टिंग की आंकड़ों की करें तो लगातार इस पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं। इस बारे में आप क्या कहेंगे?

मैं नहीं मानता कि कहीं पर भी टेस्ट में धांधली हो सकती है। मुझे लगता है हम जो गोल्ड स्टैंडर्ड टेस्ट आरटीपीसीआर बोलते है, 70% जो है सेंसिटिविटी रखता है। मुझे नहीं लगता उसमें किसी तरह की धांधली हो सकती है। हो सकता है पहले समय में कोरोना टेस्ट जल्दी कर लिया है या फिर उपयुक्त समय में टेस्ट नहीं किया है तो नेगेटिव आ सकता है। यह बहुत जरूरी है कि किस वक्त आपको टेस्ट करना चाहिए या नहीं, किस स्थिति में आपको टेस्ट करना चाहिए। सरकार की ओर से यह बार-बार गाइड लाइन जारी की गई है कि लोगों में जागरूकता होनी बहुत जरूरी है कि नेगेटिव टेस्ट का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि धांधली है और पॉजिटिव टेस्ट का मतलब यह नहीं है कि जानबूझकर ऐसा किया जा रहा है। यह सबकुछ समय पर निर्भर करता है। हमें पता है कि 14 दिन इन्क्यूबेशन पीरियड है। 5-4 दिन हमें लक्षण दिखाई देते हैं। वह समय होता है 5 से 6 दिन का जिसमें आपका कोरोना टेस्ट पॉजिटिव आएगा।

   भारत में रिकवरी रेट अच्छा होने के पीछे क्या तर्क है? भारतीयों की रोग-प्रतिरोधक क्षमता अच्छी है या कोई और बात है?

भारत का रिकवरी रेट 77% या 78% है। आज की बात करें तो 51 लाख से ज्यादा केस सामने आ चुके हैं, जिसमें 40 लाख के आप पास मरीज ठीक हो कर घर जा चुके हैं। भारत का रिकवरी रेट अच्छा है इसमें कोई दो राय नहीं है। आधिकारिक सरकारी आंकड़ों के जरिए अनुमान होता है कि 80% लोगों को ठीक होना ही है। यह एक प्राकृतिक है। सारी दुनिया में हमने देखा है। लोग ठीक हो रहे हैैं और हमारे यहां पर भी धीरे-धीरे नंबर बढ़ रहे हैं। इसके पीछे दो कारण हैं। एक तो पिछले 6 महीनों में हमने जिस बीमारी के लिए जो ट्रीटमेंट, प्रोटोकॉल और गाइड लाइन्स बनाई हैं, वह बहुत ज्यादा कारगर हो रहे हैं। इस महामारी से ज्यादा लोगों की जान बच रही है। भारत की जनसंख्या की बात करें तो, वह युवा है। युवा पीढ़ी इस वायरस के चपेट में कम आ रही है। दूसरा यह भी है कि हमारे देश में बीसीजी वैक्सीनेशन से दूसरे वायरस से प्रोटेक्शन मिलता है। तीसरी बात यह भी है कि हमारी जागरूकता और संसाधन इस बात पर भी लगे हुए हैं कि ज्यादा से ज्यादा लोगों को इससे बचाया जा सके और हमारे प्रयास भी हैं कि जिन्हें जरूरत है उन्हें जल्द से जल्द अस्पताल पहुंचाया जाए। जिन्हें होम आइसोलेशन की जरूरत है उन्हें होम आइसोलेशन में रखा जाए। मरीज को उपयुक्त पर्याप्त सही समय पर चिकित्सा सहायता मिले, जिससे उनकी जान बचाई जा सकें। यह पूरी रणनीति का एक हिस्सा है। दूसरा हिस्सा जो है वह यह है कि कोरोना का इन्फेक्शन फैलने से बचाया जाए। जो ज्येष्ठ सदस्य हो, डायबिटीज़ पेशेंट हो, ब्लड प्रेशर की तकलीफ़ हो, ऐसे लोगों के लिए खतरा ज्यादा है। ऐसे लोगों को सही समय पर उपयुक्त मेडिकल सेवा मिलना जरूरी है। यह भी एक प्राथमिकता है सरकार की, जिसमें हम लगे हुए हैं। मैं आपको बता दूं कि काफी हद तक हम इसमें सफल रहे हैं।

     सोशल मीडिया पर पिछले काफी समय से एक खबर तेजी से फैल रही है कि किसी एक ब्लड ग्रुप के जरिए यह वायरस ज्यादा संक्रमण फैलाता है। आप इस बारे में क्या कहेंगे?

मैं नहीं मानता हूं कि इसमें कोई विभेद है, हालांकि दो-तीन अध्ययन ऐसे आए हैं कि ’ओ’ ब्लड ग्रुप में कम है, ’ए’ और ’बी’ में ज्यादा है लेकिन इसके पीछे बहुत बड़ा प्रमाण नहीं है और मैं खुद भी यह नहीं मानता। हालांकि साइंस से अभी दो प्रश्नों के उत्तर नहीं मिले हैं। आपने देखा होगा कि एक ही परिवार में रहने वाले 10 में से 3 लोग कोरोना पॉजिटिव पाए गए और बाकी 7 पर असर नहीं हुआ है। इसके पीछे ऐसे कौन से कारण हैं कि एकसाथ रहते हुए कोई कोरोना पॉजिटिव पाया जाता है और बाकी को इंफेक्शन नहीं होता। विज्ञान के पास इस सवाल का भी जवाब नहीं है कि जिन लोगों को इंफेक्शन हुआ, इनमें से कुछ लोग बहुत गंभीर और कुछ लोगों में मामूली भी हैं। उसके पीछे का क्या कारण है? ब्लड ग्रुप वाली यह जो खबर है महज एक अफ़वाह है लेकिन यह जरूर सही है कुछ लोगों में इस वायरस के लक्षण कम हैं और कुछ लोगों में ज्यादा।

     आप काफी सालों से मेडिकल प्रोफेशनल में हैं लेकिन अभी भी आप कह रहे हैं कि आप सीख रहे हैं। इस नई बीमारी ने आपको क्या-क्या चीजें सिखाई हैं?

देखिए यह महामारी सबके लिए नई है। इसको पहले नोवेल कोरोना वायरस नाम दिया गया था। थकज ने उसे नोटिफाई कर जनवरी में इमरजेंसी घोषित कर नोवेल कोरोना वायरस नाम दिया। इस वायरस के बारे में शुरुआत में कुछ नहीं पता था कि इसमें किस तरह के लक्षण हो सकते हैं? लेकिन समय के साथ इस वायरस के बारे में कई जानकारियां मिलती गईं। अभी पता चला है कि इस वायरस में न्यूरोलॉजिकल लक्षण हैं। कुछ लोगों को स्ट्रोक हुआ, कुछ लोगों की सूंघने की शक्ति चली गई, कुछ लोगों के मुंह में कड़वाहट या फिर कसैलापन महसूस हुआ। धीरे-धीरे ये सारी चीजें सामने आने लगीं। फरवरी से सितंबर तक के दौरान लक्षणों के बारे में पता चला। इसके पब्लिकेशन के बारे में पता चला। ट्रीटमेंट कैसे की जाए इसके बारे में पता चला है। कोविड-19 को लेकर अभी तक दो ट्रीटमेंट कंफर्म हैं। इसके अलावा भी इस पर रिसर्च जारी है।

     आगामी नवंबर माह में बड़ी संख्या में कोरोना संक्रमित मरीजों की संख्या बढ़ने वाली है, ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है। इस बारे में आपकी क्या राय है?

नवंबर माह में इसलिए कोरोना संक्रमित मरीजों की संख्या बढ़ने वाली है क्योंकि सर्दी का मौसम शुरू होगा। आपको याद होगा कि 1918 में स्पेनिश फ्लू आया था, वह ज्यादा घातक था और इससे कई मौतें हुई थीं। अब जब मौसम सर्दी की ओर बढ़ रहा है, इस समय कई लोगों को सर्दी खांसी जैसी परेशानी होती है, तो पब्लिक हेल्थ सेक्टर को लगता है शायद नवंबर में कोरोना होने का जोखिम ज्यादा रहेगा। दूसरी बात मैं यह भी मानता हूं कि पिछले 6 महीने से लोग घर में बैठे हैं, यह लोग भी घर से बाहर निकलना चाहते हैं। ऐसे में यह लोग स्वयं का ध्यान नहीं रखते जबकि इस समय हमें अपने आपका और ध्यान रखना चाहिए। और ज्यादा अलर्ट रहने की आवश्यकता है। धीरे-धीरे हमारी इकोनॉमी पटरी पर आने की कोशिश कर रही है। लोगों का आवागमन बढ़ रहा है। जब आवाजाही पाबंदी खत्म होती है तो लोगों को अवसर मिलता है कि वे घर से बाहर निकल सकते हैं। इस छूट के अलावा लोगों की ज़िम्मेदारी बनती है कि वे अपने आप को सुरक्षित रखें और सरकार द्वारा जारी सभी नियमों का पालन करें।

     लॉकडाउन से अनलॉक की प्रक्रिया में लोगों का कर्तव्य एवं दायित्व अधिक बढ़ गया है. इस पूरी प्रक्रिया में जन भागीदारी को आप कैसे सुनिश्चित करेंगे?

यह बहुत अहम सवाल है। मैं ‘हिंदी विवेक’ के माध्यम से लोगों से आवाहन करना चाहता हूं कि हम सबकी ज़िम्मेदारी बनती है कोरोना के खिलाफ लड़ने के लिए। आप सड़क से निकलते हैं, आप गाड़ी ड्राइव करते हैं, सीट बेल्ट की तरह आपको मास्क भी लगाना है। आप जब सड़क पर गाड़ी चलाते हैं उस समय सीट बेल्ट आप अपनी सुरक्षा के लिए लगाते हैं। इस दौरान आप दूसरी गाड़ी से सड़क पर अंतर बनाकर चलाते हैं। इसी तरह आपको सोशल डिस्टेंसिंग और फिजिकल डिस्टेंसिंग बनाकर रखना है। हम सड़क पर इसलिए भी दो गाड़ियों में अंतर रखते हैं क्योंकि दूसरे की जान बची रहे और अपनी भी जान सुरक्षित रहे। यही हमारे जीवन का सिद्धांत होना चाहिए। जब भी आप घर से बाहर निकले अपनी सुरक्षा के लिए मास्क पहने और दूसरो की प्रोटेक्शन के लिए भी मास्क पहने। मास्क का मूल सिद्धांत शुरू से साइंस में कहां है- ‘आई प्रोटेक्ट यू, यू प्रोटेक्ट मी’। अगर मैं कोरोना से संक्रमित हूं तो दूसरों को संक्रमित ना करें इसलिए हम मास्क पहनते हैं। 70-75% मास्क हमारी भी सुरक्षा करता है। बाहर के कीटाणु हमारे अंदर ना जाए। इसी तत्व को अपनाते हुए घर से बाहर निकलते समय मास्क पहने, सोशल डिस्टेंसिंग मेंटेन करें और हैंड सैनिटाइजर यूज करें ताकि आप भी सुरक्षित रहे और बाकी लोग भी सुरक्षित रहे। डॉक्टर, सरकार, शोधकर्ता ये सारे लोग अपना काम कर रहे हैं लेकिन हमारा योगदान भी बहुत महत्वपूर्ण है। हमें गाइडलाइन दी गई है, सरकार द्वारा कुछ नियम बताए गए हैं उसका पालन करें और इसे अपना कर्तव्य समझे। मैं हमेशा कहता हूं ‘दिस इज द सिटीजन मोमेंट नाउ’।

    मास्क पहनना, सोशल डिस्टेंसिंग रखना और हैंड सैनिटाइजर का उपयोग करना आपने यह तीनों बातें कही है। यह किस तरह से वर्क करती है और कैसे लोगों को बचाने के लिए सहायक है?

कोरोना वायरस से बचने के लिए ये जो तीनों सावधानियां हैं, साइंस के रिसर्च से सामने आया है। 50 सालों में धीरे-धीरे कर हमने जो सीखा है उस बेस पर यह सामने आया है। देखा गया है कि 1980 में बच्चों में महामारी आई थी। जब महामारी की जांच हुई तब पता लगा कि यह क्लास रूम से फैला, जहां पर बच्चों की आपस की दूरी 3 फुट से कम थी। इसके बाद पता चला कि उन बच्चों ने जब कैंटीन में खाना खाया तब सोशल डिस्टेंसिंग बनाकर नहीं रखा और यह बाकी बच्चों में फैली। इसके बाद 1980 में लागू किया गया कि 3 फुट का फिजिकल डिस्टेंसिंग प्रसार को रोकने के लिए बहुत जरूरी है बच्चों में। 2002 तक यह सिलसिला चलता रहा। इसके बाद एपिडेमिक वायरस का फिर से पता लगा। हांगकांग फ्लाइट में एक पैसेंजर था, वह संक्रमित था, जब वह फ्लाइट में बैठा और उतरा, उसके आसपास 6 फीट की दूरी पर जो बैठे थे, वे सभी लोग संक्रमित हो गए थे। इसके बाद पता लगा कि सोशल डिस्टेंसिंग 3 फीट नहीं बल्कि 6 फीट की होनी चाहिए। इसी एपिडेमिक के दौरान जनवरी के आखिर में यूएस में एक व्यक्ति संक्रमित था। उस एक व्यक्ति ने 52 में से 32 लोगों को संक्रमित किया था। उसमें से एक की मौत भी हुई। इसके बाद जब इस पर रिसर्च हुआ तब साइंस ने बताया, सोशल डिस्टेंसिंग का मापदंड क्या है। ऐसे ही यूएस मिलिट्री में प्रयोग हुआ, उन्होंने तीन जवान लिए, एक को जोर-जोर से खांसने को कहा, दूसरे को छींकने को कहा और तीसरे को कफ निकालने को कहा। इसके बाद 6 फीट और 20 फीट माइक्रोबायोलॉजी रखा जोकि वायरस को ग्रो करती है। इन 3 जवानों में से जो जवान जोर-जोर से छींक रहा था, उसका वायरस बहुत दूर तक गया और बाकी दो जवानों का वायरस कम दूर तक गया। यह एक्सपेरिमेंट करने के बाद पता चला कि जब हम जोर से बोलते हैं या फिर छींकते हैं, उसमें ज्यादा संभावना होती है कि हमारे अंदर का वायरस दूर तक जाए। सोशल डिस्टेंसिंग के अलावा मास्क पर भी कई एक्सपेरिमेंट किए गए। टू लेयर मास्क जो सिंपल फिल्ट्रेशन पर काम करता है। सर्जिकल मास्क है जिसमें इलेक्ट्रिसिटी चार्ज होता है जो वायरस को ट्रैप करता है। एन95 मास्क के अंदर इलेक्ट्रिसिटी चार्ज भी होता है और वायरस का जो साइज है उसे ट्रैप कर लेता है। हेल्थ केयर, डॉक्टर या जो हॉस्पिटल में काम करते हैं उनके लिए एडवाइज दी जाती है कि वह एन95 मास्क का इस्तेमाल करें और जो बाकी आम नागरिक है वह डबल लेयर मास्क लगाए। इन सभी चीजों पर साइंस  है। ऐसे ही हैंड सैनिटाइजर पर भी एक्सपेरिमेंट किए गए। यह पाया गया है कि अगर आप हाथ को बार-बार साबुन और पानी से धोते हैं तो संक्रमण होने का खतरा बेहद कम हो जाता है और आप बीमार नहीं पड़ते। जिससे डॉक्टर के पास जाने की आपको जरूरत ही नहीं होती है। इस समय मैं सिर्फ कोविड-19 की बात नहीं कर रहा हूं। उससे भी इस बात की जानकारी मिली है कि पूरे दिन में अगर आप नियमित हाथ धोएंगे तो आपकी सेहत अच्छी रहेगी और कोई वायरस आपको छू भी नहीं पाएगा। मास्क, सोशल डिस्टेंसिंग और हैंड सैनिटाइजर इन तीनों चीजों के पीछे साइंस है। हम यह बार-बार कहते हैं कि यह तीनों चीजें कॉन्बिनेशन में रहनी चाहिए। अगर आप इन तीनों चीजों का अच्छी तरह से ख्याल रखेंगे तो 95% आप सुरक्षित रहेंगे और आपको संक्रमण नहीं होगा।

     कोरोना की प्रभावी वैक्सीन कब तक बाजार में उपलब्ध हो पाएगी?

मैं आपको कहना चाहूंगा कि आप लोगों से सामाजिक रूप से जुड़े हुए हैं, लेकिन शारारिक दूरी बनाए रखना बेहद जरूरी है। जरूरत हो तो ही घर से बाहर निकले, जरूरत ना हो तो घर में रहे। आप सोशल मीडिया के जरिए दोस्तों से या परिवार से जुड़े रहे। घर में बैठे हुए नई चीजें सीखें, स्किल को अपडेट करें। कोरोना के कारण एजुकेशन भी ऑनलाइन मिल रहा है। इस खाली समय का पूरा फायदा उठाए और पॉजिटिव सोचे। बात अगर कोरोना वैक्सीन की बात करें तो, देश में ही नहीं बल्कि विदेश में भी कई वैक्सीन कैंडिडेट पर ट्रायल चल रहा है। 200 के आसपास कैंडिडेट वैक्सीन है। 5 वैक्सीन ऐसी हैं जिस पर ट्रायल चल रहा है। 3 तो ऐसी हैं जो फेज 3 में है। मेरा यह मानना है कि वैक्सीन आने में समय लगेगा। अगले साल की शुरुआत या मध्य में वैक्सीन आ सकती है। उससे बड़ा सवाल यह भी है कि वैक्सीन आएगी तो क्या सब लोगों को मिल पाएगी, क्योंकि पूरी दुनिया में 7 मिलियन की जनसंख्या है और भारत 130 करोड़ की आबादी वाला देश है। जिस देश में यह वैक्सीन बन रही है क्या वो भारत को देगा? या फिर पहले अपने देश के लिए रखेगा। भारत के पास एडवांटेज है कि यह वैक्सीन प्रोडक्शन का हब है लेकिन ‘हिंदी विवेक’ के माध्यम से मैं कहना चाहता हूं कि वैक्सीन जब आएगी तब आएगी, जब मिलेगी तब मिलेगी लेकिन आज के समय में हमारे पास जो सोशल वैक्सीन है, जो हमारे कंट्रोल में हैं तो सर्वप्रथम हम मास्क पहनेंगे, सोशल डिस्टेंसिंग रखेंगे और हैंड सैनिटाइजर करेंगे। 90% से 95% इफेक्टिव रहेंगी, आप को कोरोना संक्रमण से बचाने के लिए।

     कोरोना महामारी के बाद दुनिया भर में परिवर्तन देखने को मिलेगा तो चिकित्सा शास्त्र में आपको किस तरह का परिवर्तन देखने को मिल रहा है?

कोरोना काल में आपने देखा होगा कि एजुकेशन से लेकर सब कुछ ऑनलाइन हो गया है। कोरोना से पहले देश और विदेश में बड़ी-बड़ी कॉन्फ्रेंसिंग होती थी। अब सब कॉन्फ्रेंसिंग कैंसिल हो गई है। अब वर्चुअल कॉन्फ्रेंसिंग शुरू हो गई है। हाल ही में हमने मेलबर्न से मिलकर कॉन्फ्रेंसिंग आयोजित की थी। वह बहुत कामयाब रही। मुझे अच्छा लगा विदेश में कॉन्फ्रेंसिंग में शामिल होने के लिए ज्यादा पैसे खर्च नहीं करने होंगे। पहले हमें कॉन्फ्रेंसिंग के लिए विदेश जाना पड़ता था। वहां पर जाने का खर्चा, रहने का खर्चा, खाने का खर्चा हमें करना पड़ता था लेकिन अब इसकी जरूरत नहीं है। आप आराम से उन स्पीकर्स को देख सकते हैं और सुन सकते हैं। इसको रिकॉर्ड कर दोबारा देख सकते हैं। कोरोना काल के दौरान यह बहुत आसान हो गया है। मैं मानता हूं कि मेडिकल एजुकेशन में बहुत फर्क पड़ा है, इस समय ऑनलाइन चीजें ज्यादा चल रही हैं। दूसरा जो फर्क है वह हमारी प्रैक्टिस पर पड़ा है। हम हमारे पेशेंट को सलाह देते हैं कि बहुत ज्यादा जरूरत ना हो तो हॉस्पिटल में ना आए और टेलीमेडिसिन का इस्तेमाल करें। कोरोना काल में मेडिकल प्रैक्टिस में बहुत बड़ा बदलाव आ रहा है और भी बहुत बड़ा आएगा। टेलीमेडिसिन पहले से ही हमारे देश में था लेकिन कोरोना के कारण इसका इस्तेमाल और बढ़ गया। सरकार द्वारा भी कोरोना काल में टेलीमेडिसिन को ज्यादा बढ़ावा दिया जा रहा है। हमें भी अच्छा लग रहा है कि हमारे डॉक्टर एक कमरे में बैठकर लोगों को सलाह दे रहे हैं। हम पेशेंट को जानकारी दे रहे हैं व्हाट्सएप के जरिए और दवाइयों की डिटेल भेज रहे हैं।

     ‘हिंदी विवेक’ के पाठकों को आप क्या सलाह देंगे?

हमें एक साथ मिलकर कोरोना वायरस से दो-दो हाथ करना है और यह किसी एक की ज़िम्मेदारी नहीं है। हम केवल सरकार और पब्लिक हेल्थ केयर सेंटर पर सारी जिम्मेदारी नहीं छोड़ सकते। हम सबको मिलकर इस महामारी के खिलाफ लड़ना है। मैं यह कहना चाहता हूं एक तो माइक्रो लेवल है और दूसरा मैक्रो लेवल है। माइक्रो लेवल पर हम व्यक्तिगत तरीके से काम कर रहे हैं तो वहीं मैक्रो लेवल पर बड़ी-बड़ी संस्थाएं, सरकार काम कर रही है। जैसे आरडब्ल्यू है, वेलफेयर एसोसिएशन हैं। ऐसे लोग भी कोरोना काल में बड़ा काम करते दिखाई दे रहे हैं। अपने आसपास, अपनी बिल्डिंग में, अपने एरिया में जागरूकता पैदा करें, सावधानी रखें। प्रत्येक व्यक्ति को तब तक घर या कार्यालय के अंदर नहीं आने दें जब तक उसका तापमान चेक ना हो, उनको सैनिटाइज करें, मास्क पहनना अनिवार्य करें। उस लेवल पर भी हमें काम करना है। सभी लोगों को जरूरी एहतियात बरतने के लिए प्रेरित करना चाहिए। मैं ‘हिंदी विवेक’ के माध्यम से लोगों को अपील करुंगा कि सरकार, संस्थाएं और डॉक्टर के साथ मिलकर इस महामारी के खिलाफ लड़ाई में अपना महत्वपूर्ण योगदान दें।

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