बाला साहेब ठाकरे दूरदर्शी, संघर्षशील नेता

नयी और पुरानी पीढ़ी में अन्तर हमेशा रहता आया है। किन्तु कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जो सदैव युवा बने रहते हैं। उनकी बढ़ती आयु उन्हें वृद्ध नहीं बना सकती। उन्हें उम्र छिपाने के लिए झूठ नहीं बोलना पड़ता। ऐसे व्यक्ति इतिहास में सबके स्नेही बनें रहते हैं। महाराष्ट्र में पिछले तीस वर्षों से पूछे जाने वाले प्रश्न के उत्तर में कोई बदलाव नहीं आया है। वह प्रश्न है- तुम्हारे सबसे प्रिय नेता कौन हैं। इस प्रश्न के उत्तर निर्विवाद रूप से बालासाहेब ठाकरे ही हैं।

नयी और पुरानी पीढ़ी के बीच की दूरी को समाप्त करने, अन्याय के विरुद्ध लड़ने, अहंकार पर प्रहार करने, हिन्दुत्व को बढ़ावा देने, पक्ष, जाति, धर्म, प्रान्त की दीवार तोड़ने और कलाकारों का सम्मान करने वाले बाला साहब ठाकरे वैचारिक रूप से भी लोगों के मन पर राज्य कर रहे थे। तरुण पीढ़ी के लिए वे सार्वकालिक नेता बने हुए थे।

राजनीति के विषय में अधिक जानकारी न होते हुए भी नयी पीढ़ी के मन में बाला साहब के लिए खूब आकर्षण था। देश के तरुणों में बाला साहब को किसी राजनीतिक दल के नेता अथवा किसी प्रभावशाली संगठन के संस्थापक के नाते स्वीकार नहीं किया, बल्कि उन्हें अन्याय के विरुद्ध एक नेतृत्व के रूप में अपनाया। सत्ता सामने होते हुए भी और सत्ता के सर्वोच्च पद को प्राप्त करने का अवसर मिलने पर भी उन्होंने उसे महत्व नहीं दिया। ऐसा करके उन्होंनें तरुणों को देशभक्ति और त्याग का सन्देश दिया।

शिवसेना प्रमुख बाला साहब ठाकरे एक अष्ट पहलू वाले व्यक्तित्व न होकर हिन्दुओं के मन में अधिकार और स्वाभिमान जगाने वाले एक विचार थे। खेल से लेकर राजनीति तक, समाज कार्य से लेकर आर्थिक कार्याकलाप तक, चित्रकला से लेकर नाटक-सिनेमा तक, साहित्य से संस्कृति तक, मराठी से हिन्दी तक कोई भी ऐसा क्षेत्र नहीं था जिसका स्पर्श उन्होंने न किया हो। शुरुआत के समय में बाला साहब व्यंग्यचित्र के माध्यम से सामाजिक विषयों पर भाष्य करते थे। लोगों के मन को छूने वाले और उन्हें रुचिकर लाने वाले व्यंग्यचित्र बनाकर वे खूब लोकप्रिय हुए। उनके व्यंग्यचित्र लोगों के मन में केवल हास्य ही नहीं उत्पन्न करते थे, अपितु सत्य परिस्थिति से उनका साक्षात्कार भी कराते थे। किन्तु उनके ध्यान में यह आया कि केवल व्यंग्यचित्र बनाने से ही समाज की समस्याओं को दूर नहीं किया जा सकता है। महाराष्ट्र हर क्षेत्र में आगे जा रहा है, किन्तु मराठी व्यक्ति क्यों पीछे जा रहा है, यह प्रश्न सबके सामने रखते हुए उन्होंने सन् 1966 में शिवसेना की स्थापना की। मराठियों ने उन्हें दिल खोलकर समर्थन दिया। शिवसेना ने मराठियों को रोजगार, स्वाभिमान और अधिकार के लिए लड़ने की हिम्मत दी।

एक व्यक्ति अपने स्वयं के कर्तृत्व से राजनीति द्वारा समाज परिवर्तन का इतना प्रचंड कार्य कर सकता है, यह उन्होंने दिखा दिया। ‘दरियादिल’ का वास्तविक अर्थ है- ‘बाला साहब’। उन्होंने अपने निकट रहने वालों को खूब ऊँचा उठाया और अपने शिवसैनिकों का हमेशा मान रखा।

उथल-पुथल और विचारों को गड्ड-मड्ड करने वाले अनेक प्रकार के शब्द जंजालों में से पहले मराठियों को और फिर सभी हिन्दुओं को बाला साहब ने बाहर निकाला। हिन्दुत्व की उनकी व्याख्या बहुतों ने स्वीकार किया। तरुणों को उनकी व्याख्या खूब मन भायी। वे हिन्दुत्व की नयी व्याख्या के सूत्रधार थे। कश्मीर से कन्याकुमारी तक फैले देश में रहने वाले सभी नागरिकों और इस भूमि में उत्पन्न होने वाले अन्न को खाने वाले सभी व्यक्तियों को अपनी मातृभूमि के प्रति एकनिष्ठ रहना चाहिए। वे हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई कोई भी हों, जिन्हें इस देश से प्रेम नहीं है, उन्हें भारत से बाहर चले जाना चाहिए। इस देश के नागरिक को राष्ट्रध्वज तथा राष्ट्रगीत के प्रति अभिमान होना चाहिए। इस देश में रहते हुए, यहाँ का अन्न खाते हुए भी विदेश का गुणगान कोई करे, यह असहनीय होगा।

किसी भी देश में तर्क और बुद्धिवाला कोई भी व्यक्ति बाला साहब की देशप्रेम की इस व्याख्या से असहमत नहीं हो सकता है। उन्होंने राष्ट्रभक्ति की अपनी इस भावना को अनेक अवसरों पर प्रकट भी किया।

शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे विगत् 50 वर्षों तक अपनी व्यवस्था से दूर रहने वाले अकेले हिन्दुस्तानी थे। उनका जातिकर्म जो भी हो, किन्तु ‘‘स्वतन्त्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और हम उसे लेकर रहेंगे’’ यह कहने वाले लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक और ऐसे ही स्वातन्त्र्यवीर सावरकर उनके ध्येय व्यक्तित्व थे। पिछले दो दशक से आसानी से रंग बदलने, पार्टी बदलने, विचार बदलने वाले नेताओं की भरमार हो गयी है, किन्तु बालासाहेब के बारे में पूरी प्रामाणिकता से कहा जा सकता है कि एक बार उन्होंने जो कह दिया, उस पर अन्त तक अडिग रहते थे। वे अपने वक्तव्य के विषय में कहा करते थे, ‘मैं अपनी ठाकरी भाषा में ही बोलूंगा।’ बाला साहब की ‘ठाकरी’ भाषा अलग ही तरह की थी। जिन्हें अन्य कोई भाषा समझ में नहीं आती थी, उनके लिए विशेष रूप से गढ़ी गयी खास ठाकरी भाषा शिवसेना के मुखपत्र ‘सामना’ और हिन्दुत्व के हुंकार की भाषा है।

बाला साहब ठाकरे हिन्दू समाज के साथ ही सभी समाज के आकर्षण के केन्द्र थे। प्रखर व्यक्तित्व के धनी बाला साहब महाराष्ट्र और इसके बाहर पूरे देश में विशिष्ट नेता थे। वे क्या कहते थे, किसी विषय में उनके विचार क्या थे, इसे सुनने-जानने के लिएं सभी समाचार पत्र पढ़ते थे।

राजनीति में अनेक विचारों की पार्टी होती है। कुछ यथार्थवादी, तो कुछ आदर्शवादी दल होते हैं। बहुत से राजनेता ऐसे भी हैं जो मुद्दों के अनुरूप यथार्थवादी और आदर्शवादी रुख अपनाते हैं। बाला साहब सदैव यथार्थवादी विचार व्यक्त करने और बोलने वाले राजनेता थे। किसी घटना के पीछे की सत्यता क्या है, भविष्य में उसका परिणाम क्या हो सकता है इत्यादि सभी दृष्टि से विचार करके ही वे अपनी भाषा में कोई बात कहते या लिखते थे।

बाला साहेब ने जब भी कुछ कहा, वह सब सत्य सिद्ध हुआ। जीवन के संघर्ष और अनुभव के चलते उन्होंने दूरदृष्टि प्राप्त की थी। आरोप-प्रत्यारोप के युग में समाज की आवाज को ऊँचा स्वर देने वाले बाला साहब एक ‘सेफ्टी’ वाल्व की तरह थे।
बाला साहब ठाकरे समाज की वेदना और व्यथा पर गम्भीरता पूर्वक टिप्पणी करने वाले व्यंग्य चित्रकार थे। वे सटीक भाष्यकार थे, इसलिए उनकी पकड़ और यथार्थवादी भूमिका तरुणों की अपनी जैसी लगती थी। इसीलिए महाराष्ट्र और देश की राजनीति में उनकी भूमिका चिर तरुण जैसी थी। किसी शासकीय पद और सत्ता में न होते हुए भी चार दशक से वे भारतीय जनता के हृदय-सिंहासन पर आरूढ़ थे। देश की राजनीति में अनेक उतार-चढ़ाव आये, अनिश्चितता के बादल कई बार घिरे और बिखरे, किन्तु बाला साहब सबके मन में हमेशा बसे रहे। उनके राजनीतिक विचारों के प्रति मतभिन्नता हो सकती है, किन्तु उनके विचार हमेशा देश के हित में रहे, इस विषय पर सभी एकमत थे।
कभी मराठी व्यक्तियों के हक के लिए, तो कभी हिन्दुत्व के लिए वे जीवनभर पहले ‘मार्मिक’ और ‘शिवसेना’ और फिर ‘सामना’ के माध्यम से अपनी बात उठाते रहे। अपनी कूंची के द्वारा आकर्षण व्यंग्यचित्र आकर्षक वाणी, स्पष्ट विचार और धारदार लेखनी द्वारा किसी को न बख्शते हुए वे चालीस वर्षों तक व्यवस्था पर प्रहार करते रहे। मराठी व्यक्ति और हिन्दुओं पर भविष्य में आने वाले संकट का मुकाबला करने की दूरदृष्टि रखते हुए बाला साहब ने महाराष्ट्र के हरेक भाग में तरुणों के मन व मष्तिस्क को हमेशा जगाए रखा। वर्ष 1993 में मुंबई पर मुसलमानों द्वारा किए गए हमले के समय बाला साहब की दूरदृष्टि काम आयी। वे जैसा कहते थे वैसा ही हुआ। यदि उन्होंने दूरदृष्टि से पहले से ही सबको सचेत रहने के लिए न कहा होता, तो मुंबई में हिन्दुओं का जो हाल होता, उसकी कल्पना नहीं की जा सकती है।

दुबली-पतली देहयष्टि, किन्तु कमाल के बलशाली मनवाले बाला साहब को अपना सब कुछ समर्पित करने वाले साथी मिले थे, ऐसा कहने के बजाय यह कहना उचित होगा कि उन्होंने अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले शिवसैनिकों को तैयार किया था। ये शिवसैनिक गली-कूचे का कचरा साफ करने से लेकर हिन्दू-मुस्लिम दंगों में हिन्दुओं की सहायता करने में हमेशा आगे रहते हैं। ‘किसकी आवाज…’ ऐसा नारा लगाते हुए स्वयं के शिवसैनिक होने के अभिमान से रक्त का संचार बढ़ जाता है। महाराष्ट्र अथवा हिन्दुत्व के श्रद्धास्थान पर जब-जब आघात होने का प्रसंग आया, तब-तब बाला साहब की एक आवाज पर मुंबई महानगर की गतिविधि को ठप्प कर देने की शक्ति शिवसैनिकों में है।

46 वर्ष पूर्व शिवसेना में शामिल हुए शिवसैनिक आज सत्तर वर्ष की आयु में पहुंचे हैं। इन सत्तर वर्ष के वयोवृद्ध लोगों से लेकर 15-16 वर्ष के तरुणों तक सबके मन में बाला साहब के प्रति अनन्य आस्था कायम है। महाराष्ट्र की राजनीति के सार्वकालिक केन्द्र बिन्दु बाला साहब रहे हैं। स्वतन्त्रता प्राप्त होने से पूर्व उस समय के नेताओं के आह्वान पर जिस तरह से देश का युवा मर मिटने के लिए तैयार रहता था, उसी तरह से बाला साहब के आहवान पर मराठी तरुण हर समय तैयार रहता था। ऐसी लोकप्रियता वाले 86 वर्षीय बाला साहब ने विगत् सात वर्षों में बदलते राजनीतिक प्रवाह में बदलती राजनीतिक निष्ठा एवं महत्वाकांक्षा के राजनीतिक समीकरण को नये अर्थों में देखा। उन्होंने अपने तथा परायों के विवाद को सहन किया। बाला साहब केवल अपने सुख-वैभव तक सीमित नहीं रहे, वरन एक नन्हें से बीज को विशाल वट वृक्ष के रूप में विस्तार देने में सक्रिय रहे और उनके कुशल व अनुभवी नेतृत्व में भाषा, प्रान्त, हिन्दुत्व और राष्ट्रवाद की ओर शिवसेना उत्तरोत्तर अग्रसर होती रही।

जिस तरह से अन्य राजनीतिक दल के मुखिया सत्ता पाने के लिए चुनावी मैदान में उतरते हैं, वैसा बाला साहब ने नहीं किया। अपनी विचारधारा को सत्ता की राजनीति के कीड़े से बचाने के उद्देश्य से उन्होंने शुरू से ही स्वयं को सत्ता की राजनीति से दूर रखा। राजनीति में यह सावधानी और कुशलता ही उनकी शक्ति बनी। यही उनकी विचारधारा की सामर्थ्य है। प्रखर वाणी, स्पष्ट पारदर्शी विचार, कट्टर हिन्दुत्व और इनके साथ ही सत्ता की राजनीति से स्वयं की दूरी उनके विशेष गुणों में गिने जाने लगे। प्रदेश के तमाम आबाल-वृद्धों के मन में उनके प्रति सम्मान का भाव था। बाला साहब ने एक भेंट में कहा था, ‘‘यू कैन लव मी, यू कैन हेट मी, बट यू कैन नाट इग्नोर मी’’ (तुम मुझे प्यार कर सकते हो, तुम मुझसे घृणा कर सकते हो, किन्तु तुम मेरी अनदेखी नहीं कर सकते।) सचमुच में उन पर प्राण न्योछावर करने वाले असंख्य लोग थे, उन पर टीका-टिप्पणी करने वाले लोग भी थे, किन्तु इस देश में हिन्दुओं के नेता के रूप में उन्हें बिसराने वाले नही थे।

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