त्रिगुनरूप भगवान दत्तात्रय

अनन्याश्चिंतयन्तो मा यो जन: पर्युपासते।
तेषां नित्यभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहं॥


गीता के इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो व्यक्ति समर्पण भाव से मेरे पास आता है, मैं उसे भयमुक्त करता हूं और हमेशा उसकी रक्षा करता हूं। भगवान अपने भक्तों की रक्षा के लिये और कालानुरूप अवतार लेते है। भगवान दत्तात्रय ने भी धर्मकार्य को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से अवतार लिया। भगवान दत्तात्रय ब्रह्मा, विष्णु व महेश तीनों के एकत्र रूप हैं। उनके जन्म की संक्षिप्त कथा कुछ इस प्रकार है कि अत्रि ऋषि की पत्नी अनुसुइया का तेज अपने सतीत्व व पतिव्रत धर्म के कारण बढ़ रहा था। उनकी परीक्षा लेने के उद्देश्य से तीनों भगवान अर्थात ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश ऋषि रूप में अवतरित हुए। मध्यान्ह भोजन के समय जब ऋषि आश्रम में नहीं थे, तब वे आश्रम में आये और ऋषिपत्नी से भोजन परोसने का आग्रह किया। ऋषिपत्नी ने उन्हें अत्रि ऋषि के आने तक रुकने का आग्रह किया, परंतु वे नहीं माने। ऋषियों को बिना भोजन किये जाते देख ऋषिपत्नी ने उन्हें भोजन के लिये आमंत्रित किया। तीनों देवों ने ऋषिपत्नी के समक्ष शर्त रखी कि वे विवस्त्र होकर भोजन परोसेंगी, अन्यथा वे भोजन नहीं करेंगे। ऋषिपत्नी न देवों को नाराज करना चाहती थी, न ही उनकी शर्त मान सकती थीं। अत: उन्होंने अपने हाथ में जल लेकर अपने इष्टदेव व अपने पति का स्मरण किया और जल को तीनों देवों पर छिड़क दिया। उनके सतीत्व के प्रताप से वे तीनों देव नन्हें शिशु बन गये और उन्होंने ऋषिपत्नी को वर दिया कि वे आज से दत्त रूप में उनके पुत्र कहलायेंगे।

इन्हीं भगवान दत्तात्रय ने आगे चलकर तीन अवतार लिये। श्री सरस्वती गंगाधर के द्वारा रचित ‘श्री गुरुचरित्र’ नामक ग्रंथ में इसका विस्तृत वर्णन दिया गया है।

भगवान दत्तात्रय का पहला अवतार पीठापुर मे सन 1320 ई. को भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी (गणेश चतुर्थी) को हुआ। भारद्वाज गोत्रोद्भव ब्रह्मश्री घंडिकोटा अप्पलराज शर्मा और सुमति देवी इनके माता-पिता थे। इन्होंने कहीं भी कोई पारंपरिक शिक्षा ग्रहण नहीं की। वे जन्मत: ज्ञानी थे। उन्होंने 7 वर्ष की उम्र में सभी वेदों और शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त कर लिया था और अपनयन संस्कार के बाद इस पर प्रवचन देना आरंभ कर दिया था। माता-पिता का विवाह प्रस्ताव अस्वीकार कर वे 16 वर्ष की आयु में काशी यात्रा पर निकल गये। इसके बाद वे गोकर्ण महाबलेश्वर पहुंचे और वहां से श्री शैल पर्वत पर गये। इसके बाद उन्होंने अपने जीवन के कई वर्ष कुखपुर में बिताये।

‘श्रीपाद श्रीवल्लभ चरित्रामृत’ पढकर इनके जीवन का संपूर्ण ज्ञान हो जाता है। शंकर भट नामक कर्नाटकी देशस्थ स्मति ब्राह्मण जो श्रीपाद श्रीवल्लभ के समकालीन थे, उन्होंने इस ग्रंथ की रचना संस्कृत में की। जिसका बाद में तेलगू अनुवाद किया गया। इस ग्रंथ की विशेषता है कि इसमें भविष्य में होनेवाली घटनाओं का वर्णन किया गया है। जैसे-

1) ‘यह ग्रंथ मल्लदि बापलावधानुलु (श्रीपादजी के पितामह) की 33 वीं पीढी में प्रकाशित होगा।’ श्री मल्लादि गोविंद दीक्षितुलु मल्लादि बापन्नावधानुलु के 33 वे वंशज हैं जिन्होंने यह ग्रंथ प्रकाशित किया।

2) ‘मेरा अगला अवतार कारंजा में नृसिंह सरस्वती के रुप में होगा। मेरा रुप मेरे पितामह (दादाजी) जैसा होगा। इसके बाद मैं गंधर्वपुर और वहां से कर्दली जन में जाऊंगा। यहां 300 वर्षों तक समाधीस्थ रहने के बाद श्रीस्वामी समर्थ नाम से अक्कलकोट में आऊंगा।’
3) मेरे ज्येष्ठ बंधु श्रीधर स्वामी महाराष्ट्र में रामदास स्वामी के रुप में आयेंगे और नरसिंह छत्रपति शिवाजी के नाम से महाराष्ट्र में हिन्दु राज्य स्थापन करेंगे और रामदास स्वामी के शिष्य कहलायेंगे

4) मेरे दूसरे भाई श्रीराम शर्मा श्रीधर नामक महायोगी बनेंगे।

5) इसके अलावा इस ग्रंथ में साईबाबा, गाडगे महाराज आदि लोगों का भी उल्लेख किया गया है।

श्रीपाद वल्लभ का संपूर्ण जीवन लोगों को उपदेश करने और सन्मार्ग की ओर प्रवृत्त करने में व्यतीत हुआ। अपने भक्तों की रक्षा करने के लिये और कठिनाइयों में मदद करने के लिये वे सदैव तत्पर रहते थे। उनका अवतार समाप्ति के पश्चात की एक कथा प्रसिद्ध है। उनका एक ब्राह्मण भक्त था। जिसका नाम वल्लभेष था। कुरवपुर में वह श्रीपाद श्रीवल्लभ के आश्रम के दर्शन हेतु जा रहा था। उसके पास कुछ धन था। वह श्रीपाद श्रीवल्लभ के नाम का जप करते हुए जा रहा था। उसके पास धन देखकर कुछ लोग कपट वेष में उसके साथ चलने लगे। मौका देखकर उन्होंने ब्राह्मण की हत्या कर उसका धन लूट लिया। भक्त की रक्षा करने हेतु श्रीपाद श्रीवल्लभ त्रिशूल हाथ में लिये वहां प्रगट हुए। उन्होंने उन लुटेरों का वध किया। लुटेरों में एक ने अभयदान मांगते हुए कहा कि वह तो केवल धन लूटने आया था। उसे नहीं पता था कि उसकी हत्या कर दी जायेगी। श्रीपाद श्रीवल्लभ ने उस लुटेरे को अभय दिया और ब्राह्मण को जीवित कर आशीर्वाद दिया। अत: कहा जाता है कि जो भी श्रीपाद श्रीवल्लभ की भक्ति करता है वे सदैव उसकी रक्षा करते हैं।

सन् 1378 के आसपास महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र के कारंजा नामक स्थान पर देशस्थ ब्राह्मण ‘काले’ परिवार में इनका जन्म हुआ। इनकी मां का नाम अंबा और पिता का नाम माधव था। बचपन में इन्हें नरहरि नाम से जाना जाता था। बालक नरहरि से सबसे पहला शब्द ‘ऊँ’ कहा था। सात वर्ष की आयु तक इस बालक ने ‘ऊँ’ के अलावा कुछ नहीं कहा। उनके माता-पिता और अन्य सभी लोग इस बात से दुखी थे, परंतु जैसे ही आंठवे वर्ष में बालक नरहरि का उपनयन संस्कार किया गया, वे न केवल बोलने लगे, अपितु उन्होंने चारों वेदों की ऋचाओं का गायन किया और उन पर प्रवचन आरंभ कर दिया। 7-8 वर्ष के बालक के पास कई प्रौढ़ लोग शिक्षा के लिये आने लगे।

इसके बाद नरहरि काशी चले गये और वहां जाकर उन्होंने श्रीकृष्ण सरस्वती से संन्यास ग्रहण किया और नृसिंह सरस्वती कहलाये। संन्यास के दौरान उन्होंने कई स्थानों पर भ्रमण किया और साधना की। वे जब कारंजा आये, तो उनकी उम्र लगभग 30 वर्ष थी। अन्य कई स्थानों का भ्रमण करने के पश्चात उन्होंने गाणगापुर को अपना निवास स्थान बनाया। इस अवतार में उन्होंने कई लीलाएं की। दीन-दुखियों का उद्धार किया। उन्होंने समाज को यह संदेश दिया कि वह मानव मात्र से प्रेम करें। सभी जातियों, धर्मों, संप्रदायों को समान रूप से देखें। इस संदर्भ में एक कथा इस प्रकार है- गाणगापुर में एक अत्यंत दुर्बल और गरीब व्यक्ति नृसिंह सरस्वती के दर्शन हेतु आया था। उसकी इच्छा थी कि वह वहां भंडारा करे। परंतु उसकी स्थिति ऐसी थी कि वह केवल तीन व्यक्तियों के लिये भोजन बना सकता था। वह रोज भंडारे में भोजन करता था। वह अपनी अनाज की पोटली को सिरहाने रखकर सोता था। लगभग तीन महीने इसी तरह बीत गये। अब लोग भी उसका उपहास करने लगे थे। अंतर्यामी नृसिंह सरस्वती को यह बात समझ में आई और उन्होंने दूसरे दिन उस व्यक्ति से कहा, ‘आज तुम भंडारा करो। सभी को निमंत्रण दो।’ उनकी बात मानकर वह व्यक्ति सभी को निमंत्रण देने पहुंचा। वहां भी सब लोगों ने उसका उपहास किया और कहा, ‘तुम्हारे पास जितना अन्न है उसका एक एक दाना भी सभी के लिये पर्याप्त नहीं होगा।’ उनकी बात सुनकर वह व्यक्ति नृसिंह सरस्वती के पास आया और सारी बातें उन्हें बताई। उसे सांत्वना देते हुए नृसिंह सरस्वती ने कहा, ‘‘तुम तैयारी करो, शेष मुझ पर छोड दो।’ उस व्यक्ति ने भोजन तैयार किया और सामने लाकर रखा। नृसिंह सरस्वती ने उस पर एक कपड़ा डालकर उसे ढ़ंक दिया और उस व्यक्ति से कहा कि, ‘‘जब तक सभी लोग भोजन न कर लें कपड़ा मत हटाना।’’ एक के बाद एक कई पंक्तियों में लोगों ने भोजन किया। गांव के लोगों को और प्राणियों को भोजन दिया गया। अंत में जब सभी तृत्प हो गये तब उस कपड़े को हटाया गया और आश्चर्य यह कि पात्रों में उतना ही अन्न शेष था जितना पकाया गया था। उस भोजन को जल में प्रवाहित करने का आदेश नृसिंह सरस्वती ने उस व्यक्ति को दिया जिससे जलचर भी भूखे न रहें। इस प्रकार उन्होंने अपने भक्त की इच्छा को पूर्ण किया। इस कथा का यह संदेश है कि व्यक्ति के वर्ण, स्वास्थ्य, सांपत्तिक स्थिती के आधार पर भेदभाव नहीं करना चाहिये।

जब नृसिंह सरस्वति ने देखा कि उनकी प्रसिद्धि चारों ओर फैल गई है और लोग उनके दिखाये मार्ग पर चलने की जगह उनके आस-पास अधिक समय व्यतीत करने लगे हैं, तो उन्होंने समाधि लेने का निर्णय लिया। वे गाणगापुर से श्रीशैल पर्वत की यात्रा पर निकले और कर्दली पेडों के जंगल में जाकर समाधि ली।

इस घटना के लगभग तीन दशकों के बाद उसी वन से श्री स्वामी समर्थ प्रगट हुए। अक्कलकोट निवासी राजाधिराज योगीराज श्री स्वामी समर्थ की ख्याति सर्वत्र व्याप्त है। उनके विषय में अगर एक वाक्य में कहना हो तो यही कहा जा सकता है कि सन् 1856 से 1878 तक बाईस वर्षों में अक्कलकोट और वहां आये लोगों ने ‘‘एक कर्तुम, अकर्तुम तथा अन्यथा कर्तुम’’ जैसी महान शक्ति इस भूतल पर अपने नेत्रों से देखी, अनुभव की, अन्य लोगों को दिखाई और जिन्हें संभव था उन्होंने उसके बारे में लिखकर भी रखा। हजारों वर्षों से धर्म की अवनति का जो काल था वह समाप्त हो रहा था। यह उस त्रिकालज्ञानी को ज्ञात था। इसी पार्श्वभूमि पर अक्कलकोट से होने वाले धर्मकार्यों के लिये धर्म सिंहासन बनाने के उद्देश्य से श्री स्वामी समर्थ स्वेच्छा से अक्कलकोट आये थे।

जब वे सर्वप्रथम अक्कलकोट आये, तो उन्होंने शुरू के तीन दिन गांव की सीमा पर पताका लगाने की जगह पर बिताया। चौथे दिन अहमद अली खान नामक एक रिसालदार ने उनसे पूछा, ‘‘हुक्का पीते हो।’’ उन्होंने कहा, ‘‘हां पीता हूं।’’ रिसालदार ने बूढे व्यक्ति का मजाक उडाने के उद्देश्य से उन्हें खाली चिलम पकड़ा दी। त्रिकालज्ञानी को चिलम खाली होने का पता न हो ऐसा तो हो ही नहीं सकता। उन्होंने चिलम पर अंगार रखा और कश लिया कश लेते ही चिलम से भरपूर धूंआ उठा।

श्री स्वामी समर्थ द्वारा किया गया यह पहला चमत्कार था। चिलम खाली थी अर्थात अग्नि उपासना रसातल में जा चुकी थी। खाली चिलम से धुंआ निकालकर स्वामी ने यह संदेश दिया कि भविष्य में कोई ऐसा महापुरुष आयेगा जो अक्कलकोट में अग्नि प्रगट करके दिखायेगा। खाली चिलम से धुंआ निकालना कोई जादू या चमत्कार नहीं था। स्वामी समर्थ स्वयं अग्निरूप थे। उन्होंने अक्कलकोट में आते है संदेश दिया ‘अग्नि उपासना ही मूलधर्म है।’

स्वामी महाराज ‘महारुपुष’ थे। इसका उल्लेख उनके स्वयं के उद्गारों से मिलता है। उनके प्रगट होने से लगभग 60 साल पूर्व की घटना है। कर्नाटक के धारवाड जिले के मुरगोड गांव में अठारहवीं सदी के अंत में एक सिद्धपुरुष चिदंबरम दीक्षित ने एक यज्ञ किया था, जिसकी कीर्ति महाराष्ट्र एवं कर्नाटक में फैली थी। उन्होंने स्वयं कहा था कि, ‘‘मैं इस यज्ञ में घी परोस रहा था।’’

महानिर्वाण के पूर्व उन्होंने स्वयं भी एक बडा यज्ञ किया था। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि उनका उपदेश यही था कि, ‘धर्म याति यज्ञ’ और ‘यज्ञ याति धर्म।’ स्वामी जी अपने पास आये भक्तों को उनकी अध्यात्मिक अवस्था के आधार पर उपदेश देते थे। वे किसी को मूर्तिपूजा का विरोध करते और किसी को इष्टदेव की प्रतिमा या यंत्र देते थे। किसी को योगशास्त्र सिखाते तो किसी को मठ स्थापना का उपदेश देते थे।

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