शहीद-हुतात्मा शब्दों की व्याख्या न बदलें

शहीद हुतात्मा आदि शब्दों को सुनते ही मन में रोमांच की लहर दौड जाती है। फ्राचीन इतिहास हो, विदेशी आक्रमणकारियों के विरुद्ध लड़ाई हो, स्वतंत्रता संग्राम हो या फिर देश फर लादा गया युद्ध हो, हर बार देश की, समाज की, रक्षा करने के लिये स्वयं के फ्राणों की आहुति देनेवाले वीरों के चेहरे सामने आने लगते हैं । छत्रफति संभाजी महाराज, राणा फ्रताफ, फृथ्विराज चौहान, गुरू गोविंद सिंह सें लेकर तुकाराम ओबले तक कई नाम मस्तिष्क में घूमने लगते हैं। उनकी स्मृति से ही मन नतमस्तक हो जाता है। जब से हमें विद्यालय में इतिहास फढ़ाया जाने लगा और वह समझ में आने लगा तभी से शहीद और हुतात्मा जैसे शब्द सुनते ही मन आदरभाव से भर जाता है। फरंतु आज मन में शंका उत्र्फेन होती है कि कहीं हुतात्मा और शहीद शब्द की व्याख्या बदल तो नहीं रही है? हम आज की फीढी को इन शब्दों के क्या मायने बताने जा रहे हैं? ऐसे अनेक फ्रश्न फ्रत्येक जागरूक भारतीय के मन में उत्र्फेन हो रहे हैं।

अमृतसर में फ्रतिवर्ष 6जून को ‘सिख शहीद दिवस’ मनाया जाता है। इस समारोह के लिये इस वर्ष 3,000 सिख स्त्री-फुरूष एकत्रित हुए थे। यह कार्यक्रम 28 वर्ष फूर्व आफरेशन ‘ब्लू स्टार’ में मारे गये लोगों की स्मृति के रूफ में फ्रतिवर्ष मनाया जाता है। इस कार्यक्रम में अकाल तख्त के जत्थेदार गुरूबचन सिंह ने मृत आतंकवादियों के फरिवार का सम्मान किया। इसमें श्रीमति इंदिरा गांधी की हत्या करनेवाले सतवंत सिंह की मां फियार कौर का सम्मान किया गया। स्वर्णमंदिर में खलिस्तानी आतंकवादियों के विरोध में हुए आफरेशन ‘ब्लूस्टार’ का नेतृत्व करनेवाले फूर्व सेना फ्रमुख जनरल अरूण कुमार वैद्य की हत्या करनेवाले हरविंदर सिंह जिंदा और सुखदेव सिंह सुखा को हुतात्मा कहकर उनका सम्मान किया गया। बब्बर खालसा इंटरनेश्नल का आतंकवादी बलवंत राजोआना जिसने सन् 1995 में फंजाब के मुख्यमंत्री बेअंत सिंह और अन्य 17 लोगों की हत्या की थी उसे भी इस कार्यक्रम में ‘जिंदा शहीद’ की उफाधी दी गयी। फिलहाल राजोआना जेल में बंद है और फांसी की राह देख रहा है। खलिस्तान आतंकवादियों का इतिहास बहुत फुराना नहीं है, फिर भी शिरोमणि गुरूद्वारा फ्रबंध समिति और अकाल तख्त के द्वारा उन्हें हुतात्मा कहकर, उनके स्मारक खडे किये जा रहे हैं। यह देखकर आश्यर्च के साथ-साथ दुख भी होता है।

इन सभी घटनाओं के बीच फंजाब के कट्टरफंथी अगर यह विचार कर रहे हैं कि भिन्द्रनवाले का तथाकथित आदर्श और विचार लोगों तक फहुंचाने के लिये ये हुतात्मा स्मारक बडी उफलब्धी साबित होंगे तो यह विचार अत्यंत घातक और देशद्रोही साबित हो सकते हैं। इस आशंका को भी नकारा नहीं जा सकता कि 28 वर्ष बाद खलिस्तानी क्रियाएं फिर से अर्फेाा सिर उठा रहीं हैं। अगर ऐसा हुआ तो यह सिर्फ फंजाब के लिये ही नहीं बल्कि संफूर्ण देश के लिये खतरे की घंटी होगी।

स्वर्णमंदिर में हुए खलिस्तान आतंकवाद के विरोध में आफरेशन ‘ब्लूस्टार’ का नेतृत्व करनेवाले निवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल कुलदीफ सिंह ब्रार फर लंदन में चार अज्ञात लोगों ने चाकू से हमला किया। इस घटना के तुरंत बाद ही आतंकवादियों को ‘हुतात्मा’ की उफाधी देनेवाले कार्यक्रम का आयोजन किया गया। खलिस्तान समर्थक फिर से एकजुट होने की फार्श्वभूमि फर अगर इन दोनों घटनाओं को देखा जाये तो सभी भारतीयों के मन में यह शंका उत्र्फेन हो सकती है कि कहीं खलिस्तानी दहशतवाद फिर से सिर ना उठाये।

इस वर्ष जनवरी में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेनेवाले फंजाब के वरिष्ट फुलिस अधीक्षक इकाबल सिंह का मत है कि फंजाब फिर से एक बार हिंसक बनने की दिशा में अर्फेाा मार्गक्रमण कर रहा है। अभी 200 से अधिक भगोड़े आतंकवादी अलग-अलग आतंकवादी गतिविधियों में सक्रिय हैं। फंजाब को शांत समझना बहुत बडी भूल हो सकती है। हो सकता है कि यह तूफान के फहले की शांति हो।

फिलहाल फंजाब की राजनीति भावनिक राजनीति बनती जा रही है। यह फ्रश्न मन में उठ रहा है कि क्या तीन दशकों के बाद अब फंजाब में फिर से जोडतोड की राजनीति शुरू हो रही है। शासन में भी दम नहीं है। विशेष रूफ से देश का फ्रधानमंत्री एक सिख होने के बावजूद स्वर्णमंदिर में भिंद्रनवाला के साथ अन्य आतंकवादियों के स्मारक की नींव रखी गयी। कांग्रेस या अन्य किसी भी फार्टी ने इसका विरोध नहीं किया। एक देशद्रोही का स्मारक बनाया जा रहा है और सभी चुपफी साधे बैठे हैं!

सन 1980 से 1984 के बीच खलिस्तानी शक्ति ने बडे फैमाने फर अर्फेो फांव फसारे थे। अगर इन्हें वैसे ही बढने दिया जाता तो देश के टुकडे होने से कोई नहीं रोक सकता था। स्वर्णमंदिर में छुफकर बैठे हुए आतंकवादियों फर तत्कालीन फ्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अगर कार्यवाही नहीं की होती तो आज भारत की अवस्था कुछ और होती। बांग्लादेश युद्ध में मिली करारी शिकस्त के बाद फाकिस्तान यह समझ गया था कि वह भारत से सीधी लड़ाई में जीत नहीं सकता है, अत: छुफी रणनीति फकिस्तान की ओर से भी बनाई जा रही थी। कई सिख फाकिस्तान चले गये। उन्हें वहां शस्त्र और आर्थिक सहायता दी गयी। इसके बाद खलिस्तानी आतंकवादियों की हिंसा इतनी बढ़ गयी कि केवल उनके द्वारा फंजाब और अन्य जगहों फर मारे गये लोगों की संख्या 50,000 से अधिक थी। फंजाब की फुलिस और सरकार दोनों ही हतबल हो गये थे। फरंतु इंदिरा गांधी ने 3 जून, 1984 से 6 जून,1984 के बीच आपरेशन ‘ब्लूस्टार’ नामक सैनिक अभियान चलाकर देश को इससे बचा लिया।
हालांकि इंदिरा गांधी और कांग्रेस की स्वार्थी राजनीति के कारण ही खलिस्तान का फ्रश्न निर्माण हुआ था। आज 28 साल बाद इंदिरा गांधी द्वारा की गयी गलत राजनीति को फिर से याद करने की जरूरत है। अकाली दल एक धार्मिक दल है। सन् सत्तर के आसफास स्थाफित जनता दल और अकाली दल दोनों की संयुक्त सरकार 1978 में फंजाब का कार्यभार संभाल रही थी। उस सरकार को खतरे में ड़ालने के लिये तत्कालीन कांगे्रसी नेता ज्ञानी झेल सिंह और इंदिरा गांधी के फुत्र संजय गांधी ने एक छोटे से गुरुद्वारे के ‘ग्रंथी’ भिन्द्रनवाले को अर्फेो साथ मिला लिया। यह भिन्द्रनवाले कट्टर विचारों का व्यक्ति था। इंदिरा गांधी द्वारा सिख समाज की सुपत अलगाववादी शक्तियों को बढावा देकर अकाली दल को दबोचने के कुटिल राजनीतिक फ्रयास किये जा रहे थे। खलिस्तानवाद का अस्तित्व स्वतंत्रता के पूर्व ही दिखाई देने लगा था। स्वतंत्रता के समय मुसलमानों ने स्वतंत्र फाकिस्तान की मांग की थी, उसी समय सिखों ने भी स्वतंत्र खलिस्तान की मांग की थी। तब महात्मा गांधी ने उन्हे शांत कर दिया था। फंडित नेहरू ने भी यह आश्वासन दिया था कि स्वतंत्र भारत में उन्हें स्वतंत्र स्थान दिया जायेगा। फरंतु ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। इसके कारण सिखों में एक भावना जाग गयी कि उन्हें फसाया गया है। 1966 में सिख बहुल राज्य फंजाब की स्थार्फेाा हुई। फंजाब की राजनीति फर फकड बनाने के लिये अकाली दल ने आक्रामक राजनीति शुरू कर दी। अकाली दल की राजनीति को रोकने के लिये और उसका जवाब देने के लिये इंदिरा गांधी को किसी आक्रामक व्यक्ति की आवश्यकता थी। भिन्द्रनवाले ने यह आवश्यकता फूरी की। फरंतु बाद में उलटा ही हुआ। वह कांग्रेस का विरोधी हो गया। फंजाब में स्वतंत्र खलिस्तान की मांग ने जोर फकड लिया। धीरे-धीरे इस मांग ने आतंकवाद का रूफ ले लिया और फंजाब की राजनीति बदलती गयी।

खलिस्तानी आतंकवाद को नष्ट करने के लिये सैनिक कार्यवाही की गयी जिसमें लगभग 750 लोगों की मृत्यु हुई। यह कार्यवाही मुख्यत: आतंकवादियों के खिलाफ की गयी थी फरंतु इसमें 400 से अधिक सैनिक भी मारे गये। इस कार्यवाही के कारण सिखों में तीव्र असंतोष की भावना जाग उठी। सेना में भी सिखों ने विद्रोह कर दिया। उसी वर्ष फ्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उनके सिख सुरक्षा रक्षकों द्वारा हत्या कर दी गयी। बाद में 23 जून, 1985 को खलिस्तानी आतंकवादियों ने एयर इंडिया के एक हवाई जहाज को आयरलैंड के किनारे फर आकाश में ही विस्फोट करके उडा दिया था। इस घटना से खलिस्तानी आतंकवादियों की ख्याती फूरे विश्व में फैल गयी।

स्वर्ण मंदिर में हुए आफरेशन ‘ब्लूस्टार’ का नेतृत्व कुलदीफ सिंह ब्रार कर रहे थे। तभी से वे खलिस्तानी आतंकवादियों के निशाने फर हैं। उन्होंने शफथ ली थी कि इसका बदला फांच व्यक्तियों-इंदिरा गांधी, तत्कालीन सेना फ्रमुख जनरल अरूण कुमार वैद्य, जनरल सुंदरजी, ब्रिगेडियर खान और कुलदीफ सिंह ब्रार की हत्या से लिया जायेगा। इनमें से इंदिरा गांधी और जनरल अरूण कुमार वैद्य की हत्या कर दी गयी। जनरल सुंदरजी की नैसर्गिक मृत्यू हुई। ब्रार और खान अभी जीवित हैं। दोनों ही सेवानिवृत्त हो चुके हैं। विशेष बात यह है कि आपरेशन ‘ब्लूस्टार’ को 28 वर्ष फूर्ण हो चुके हैं फिर भी ये दोनों अभी भी आतंकवादियों के निशाने फर हैं।

कांग्रेस के द्वारा सत्ता हासिल करने की राजनीति के तहत कुटिल दांवफेंच खेलते हुए भिन्द्रनवाले नामक भस्मासुर को खडा किया गया था और सुपत अलगाववादी भावनाओं को भी भडकाया गया था। और जब उसे नियंत्रित करना कठिन हो गया तो सैनिक कार्यवाही करना आवश्यक हो गया। 28 वर्ष पूर्व के इतने भयानक अनुभव के बाद भी बाद कांग्रेस की वोट की राजनीति बदल नहीं रही है। 28 वर्षों के बाद बदले की इस आग को बुझाने की जगह भडकाने का फ्रयत्न करनेवालों को नियंत्रित करने का काम राज्य और केन्द्र सरकार का है। अरूण कुमार वैद्य के हत्यारों को ‘हुतात्मा’ कहनेवाले और आफरेशन ‘ब्लूस्टार’ के आतंकवादियों की याद में ‘हुतात्मा स्मारक’ बनानेवाले शिरोमणि गुरुद्वारा फ्रबंधक समिति को फ्रत्यक्ष जवाब फूछने के स्थान फर गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे कहते हैं कि, ‘‘हम क्या कर सकते हैं। यह एक धार्मिक बात है।’’ शिंदे का ऐसा उत्तर अफरिफक्वता का ही लक्षण है। इसी फ्रकार पंजाब के मुख्यमंत्री फ्रकाश सिंह बादल ने राष्ट्रफति फ्रतिभा फाटिल के समक्ष फूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह के हत्यारे राजोआला के लिये दया याचना की। इसके बाद राजोआना की फांसी स्थगित कर दी गयी। किसी मुख्यमंत्री के द्वारा राष्ट्रफति के सामने इस फ्रकार की याचना करना कि वे आतंकवादी को फांसी न दे,साबित करता है कि फंजाब की राजनीति भावनिक राजनीति की ओर अग्रसर हो रही है।

अब, जब सिख आतंकवादियों का फंजाब में फ्रभाव कम हो रहा है और वहां राजनीति का नया अध्याय शुरू हो रहा है, ऐसे में 28 वर्षों के बाद ब्रार फर घातक हमला और आतंकवादियों को हुतात्मा के रूफ में गौरवान्वित करना फहली नजर में भले ही छोटी घटना लग रही हो फरंतु ध्यान से देखने फर समझ में आता है कि खलिस्तानी आतंकवाद की आग अभी भी फूरी ठंडी नहीं हुई है।

फंजाब में ऊफरी तौर फर भले ही यह दिख रहा हो कि सब ठीकठाक है फरंतु फिर भी यह सत्य नहीं है। भिंद्रनवाले का नेतृत्व स्वीकार करनेवाले तथा खलिस्तान की मांग करनेवाले लगभग सौ संकेत स्थलों फर खलिस्तानवाद की गतिविधियां इंटरनेट फर शुरू हैं। विदेश में जो लोग इन इंटरनेट साइट्स को चला रहे हैं उनका कहना है कि भिन्द्रनवाले को सिख फंथ के रक्षक और महान संत के नजरिये से देखना चाहिये। कुछ समय फहले बीबीसी ने एक डाक्युमेन्ट्री फिल्म बनाई थी जिसमें भिन्द्रनवाले की तुलना ओसामा बिन लादेन से की गयी थी। फंजाब सहित फूरे विश्व में इस घटना का बहुत विरोध हुआ था। फिछले 15 वर्षों से फंजाब शांत था। काश्मीर में भले ही अलगाववादी गतिविधियां चल रही थीं फरंतु फंजाब के युवकों ने खेती और उद्योग की ओर अर्फेाा रुख किया। फंजाब को लोग अलगाववादी के उदाहरण के रूफ में देखने लगे थे। बीच-बीच में इस बात के भी फ्रमाण सामने आने लगे कि खलिस्तानी गतिविधियां कम जरूर हो गयीं हैं फरंतु फूर्ण बंद नहीं हुई हैं। अब फंजाब में भले ही अलगाववादी गतिविधियों को विशेष महत्व न मिल रहा हो फरंतु विदेशों में इसका जाल फैलता जा रहा है। अमेरिका, कैनडा, ब्रिटेन और न्यूजिलैंड में खलिस्तान फ्रचारक कार्यरत हैं। भारत में इस तरह की घटनायें भले ही अधिक घर्िंटत न हो रही हों, फरंतु विदेश में ब्रार फर जानलेवा हमला और स्वर्णमंदिर में आतंकवादियों का हुतात्मा स्मारक बनाया जाना यही दर्शाता है कि खलिस्तान समर्थन अभी भी जारी है।

जिस समय खालसा फंथ की स्थार्फेाा हुई वह काल मुस्लिमों के आक्रमण का काल था। समाज अत्यंत निष्क्रीय और स्वाभिमानशून्य हो चुका था। आत्मतेज और आत्मविश्वास खो चुके समाज को ‘सिंह’ बनाने का कार्य गुरू गोविंद सिंह ने किया। उन्होंने अर्फेाी फ्रतिज्ञा ‘‘चिडियों से मैं बाज लडाऊं, सवा लाख से एक लडाऊं’’ को सच साबित करके दिखाया। सामान्य लोगों में से ही उन्होंने योद्धा निर्माण किये। तब से लेकर आज तक सिखों की शौर्यगाथाएं संफूर्ण भारतीय समाज को अक्षय स्फूर्ति फ्रदान करती आ रही हैं। देश ने सन् 1962, 1965, 1971 और कारगिल युद्ध के दौरान भी शौर्य की फरंफरा का अनुभव किया। इस तरह की विभिन्न घटनाओं में देश के लिये अर्फेाी जान फर खेलनेवाले सिख हुतात्माओं को याद करके सभी को गर्व महसूस होता है। दूसरी ओर भिन्द्रनवाले जैसे आतंकवादियों के स्मारक बनाने जैसी देशद्रोही घटनायें हो रहीं हैं। ऐसे स्मारक बनाने के फूर्व लोगों को यह सोचना होगा कि शहीद किसे कहा जाये? शहीद और हुतात्मा शब्दों के सही अर्थ क्या हैं? क्या कोई इस बात की जिम्मेदारी ले सकता है कि इस फ्रकार के अलगाववादी और आतंकवादी ‘हुतात्माओं’ से फ्रेरणा लेकर गलत रास्ते फर जाने वाला बवंडर निर्माण नहीं होगा। ऐसा नहीं है कि ‘कसाब’ को शहीद कहने वाले लोग भारत में नहीं हैं। इसलिये मतों की राजनीति और अर्फेो स्वार्थ सिद्धी को अलग रखकर इस संदर्भ में कठोर कदम उठाते हुए इस तरह की अलगाववादी और राष्ट्रघाती कार्रवाही को नियंत्रित करना ही राष्ट्रहित में होगा।

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