हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव यह बदलाव ठीक नहीं

हिमाचल प्रदेश के मतदाताओं ने गत दिनों हुए राज्य विधानसभा चुनाव में पांच साल बाद सरकार बदलने की परंपरा को कायम रखते हुए राज्य में सत्ता परिवर्तन कर भाजपा के स्थान पर कांग्रेस को सरकार बनाने का अवसर प्रदान कर दिया। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता वीरभद्र सिंह के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों के बावजूद राज्य की सत्तारूढ़ भाजपा सरकार के विरोध में मतदान क्यों किया, यह बात समझ में नहीं आ रही है। यह सच है कि एक ही सरकार को राज्य में ज्यादा दिनों तक बनाये रखना ठीक नहीं, पर जिस पार्टी के नेता पर भ्रष्टाचार के कई मामले दर्ज हो, उसे सत्ता में बैठाना अच्छी परंपरा नहीं माना जा सकता।

दलीय स्थिति एक नजर में
कांग्रेस- 36
भाजपा- 26
अन्य-06
कुल सीटें- 68

हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 36 सीटें जीतकर भाजपा को सत्ता से दूर रखा। यहां 2007 में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 41 सीटें जीती थीं, जबकि कांग्रेस को 23 सीटों पर ही संतोष करना पड़ा था। इस बार राज्य के मतदाताओं ने सत्ता परिवर्तन का अपना पुराना ट्रेड बरकरार रखते हुए कांग्रेस को 36 सीटों पर जीत दर्ज करवाई, जबकि भाजपा की झोली में 26 सीटें ही जाने दीं। विधानसभा की 68 सीटों में 36 सीटें जीतकर राज्य में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में सामने आई कांग्रेस को अपनी इस जीत पर बेहद प्रसन्नता तो हो रही है, पर कांग्रेस की इस जीत से देश की जनता दुखी हुई है। कुछ राजनीतिक जानकारों ने कहा था कि हिमाचल में भ्रष्टाचार, घोटालों से घिरी होने के कारण कांग्रेस पार्टी के पक्ष में मतदाता वोट नहीं डालेंगे।

राज्य में 1977 के बाद से अब तक कभी ऐसा नहीं हुआ कि किसी एक पार्टी की सरकार लगातार दो बार सत्ता में आई हो। भाजपा को इस बार के विधानसभा चुनाव में 2007 के मुकाबले 15 सीटें कम मिलीं, जबकि कांग्रेस को यहां गत चुनाव से 10 सीटें ज्यादा मिलीं, इस कारण कांग्रेस को मिली सीटों की संख्या बढ़कर 36 हो गई ओर उसे राज्य में स्पष्ट बहुमत प्राप्त हो गया।

मुख्यमंत्री प्रेमकुमार धूमल ने कांग्रेस के नरिंदर ठाकुर को 9500 मतों से हराकर हमीरपुर सीट तो जीत ली, पर धूमल मंत्रिमंडल के चार सहयोगी नरिंदर बराग्टा, खिमी राम, कृष्ण कुमार तथा रोमेश धवना को पराजय झेलनी पड़ी। धूमल मंत्रिमंडल के गुलाब सिंह, मोहिंदर सिंह, जयराम ठाकुर, रविंदर सिंह रवि, सरवीन चौधरी, ईश्वर दास धीामान चुनाव जीतने में जरूर सफल रहे।

हिमाचल में सत्ता परिवर्तन के बहाव में राज्य के मतदाताओं ने यह तक नहीं सोचा कि हर पांच साल बाद किसी दूसरी पार्टी की सरकार को पदारूढ़ करने के चक्कर में ऐसे लोगों के हाथ सत्ता तो नहीं जा रही कि जिनकी ताजपोशी से पहले ही घोटालों के कई प्रकरण दर्ज हैं।
राज्य विधानसभा चुनाव परिणाम पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए निवर्तमान मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल ने कहा है कि पार्टी इस बात की समीक्षा करेगी कि कांटे के मुकाबले की स्थिति के बावजूद यहां कई सीटों पर कांग्रेस प्रत्याशियों को सहज जीत कैसे मिल गई?
भाजपा के शासनकाल में गत पांच साल में राज्य का सर्वागीण विंकास होने के बावजूद मतदाताओं ने राज्य की मौजूदा भाजपा सरकार के विरोध में मतदान सिर्फ हर बार सत्ता बदलने की परंपरा को कायम रखने के लिए किया है।

गुजरात के मतदाताओं की तरह हिमाचल के मतदाताओं ने विकास के मुद्दे को लेकर मतदान नहीं किया, अगर इन मतदाताओं ने विकास को मुख्य मुद्दा मानकर अपने मताधिकार का प्रयोग किया होता तो शायद गुजरात की तरह ही हिमाचल में भी कमल ही विजयी होता। यह सच है कि लोकतांत्रिक मान्यताओं के अनुरूप किसी राज्य कई सालों तक एक ही सरकार को सत्तारूढ़ ठीक नहीं, इसलिए हर चुनाव में सत्ता परिवर्तन का ट्रेड कुछ राज्यों के मतदाता अपनाते हैं, लेकिन सत्ता परिवर्तन के ट्रेड को अपनाते समय इस बात का विवेक जरूर होना चाहिए कि जिसे हम पूर्ववर्ती सरकार के स्थान पर चुन कर दे रहे हैं, वह उससे बेहतर हो, अगर बेहतरी के लिए सत्ता परिवर्तन हो तो इससे अच्छा कुछ और हो ही नहीं सकता। हिमाचल प्रदेश में इस बार हुआ सत्ता परिवर्तन किसी को रास नहीं आया, इस जीत से जहां कांग्रेस खेमे में प्रसन्नता का आलम है, वहीं निवर्तमान मुख्यमंत्री इस मंथन में जुटे हैं कि आखिर राज्य के मतदाताओं ने ऐसा क्यों किया। अगर हर बार सत्ता परिवर्तन के निकष पर राज्य में मतदाता इसी तरह भ्रष्टाचार, घोटाले करने वाली पार्टी के हाथ सत्ता सौैैंपते रहे तो ऐसे सत्ता परिवर्तन का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा।

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