मनोनुकूल विजय

भारत के प्रत्येक जागरुक नागरिक की नजर गुजरात चुनावों पर लगी थी, चाहे वह गुजरात का हो या बाहर का। 182 सीटों में से कितनी सीटें भाजपा को मिलेंगी इसका अनुमान हर कोई लगा रहा था। किसी ने कहा 130 तो किसी ने कहा 115 से 120 के बीच। एक्झिट पोल के द्वारा भाजपा को 140 सीटें मिलने के अनुमान को जब मीडिया के द्वारा उछाला जा रहा था तो मोदी और भाजपा के समर्थक फूले नहीं समा रहे थे, परंतु वास्तव में 115 सीटों का मिलना उनकी खुशी को झटका दे गया।

नरेन्द्र मोदी की जीत का प्रत्येक वाक्य राजनीति के पंडितो के मुखों से किंतु-परंतु के साथ निकलता दिखाई दिया और साथ ही दिखाई दिये हमेशा की तरह वही प्रासंगिक सवाल कि इन किन्तु-परन्तु के पीछे का राज क्या है? 115 का आंकडा क्या निर्देशित करता है? 2014 के चुनावों को के संदर्भ में राजनीति के बदलते ‘ट्रेण्ड’ में इस विजय की क्या भूमिका है? और अंत में सन 2007 के परिणामों और अभी के परिणामों में क्या संबंध है?

इन प्रश्नों के उत्तर के लिये थोडा सा पीछे की ओर अर्थात चुनाव प्रचारों की ओर नजर घुमानी होगी। भाजपा के चुनाव प्रचारों को नरेन्द्र मोदी की विवेकानंद युवा विकास यात्रा ने गति प्रदान की इस यात्रा के दौरान विकास के मुद्दे को लेकर उन्होंने गुजरात के हर हिस्से को छूने का प्रयत्न किया। सोशल मीडिया, तकनीक, शहरों की जनता युवाओं तक पहुंच इत्यादि ने जीत के नये पायदान तैयार किये। इसमें गूगल हैगंआउट जैसे त्रिआयामी प्रचार का भी बडा योगदान रहा।

सोशल मीडिया के प्रचार की शक्ति को समझने का प्रयत्न कांग्रेस के द्वारा भी किया जा रहा है। मोदी और कांग्रेस के प्रचार के अंतर को विवेक कौल ने ‘फर्स्ट पोस्ट’ के अपने लेख ‘कांग्रेस ट्राइंग टु डू अ रोमनी इन गुजरात बाय अटैकिंग मोदी’ में उद्धृत किया है। जब मोदी अपनी प्रचार सभाओं के दौरान सकारात्मक विकास की बात कर रहे थे उसीं दौरान कांग्रेस के द्वारा कुपोषण और बेरोजगारी जैसे नकारात्मक मुद्दों को हवा दी जा रही थी। उत्तर गुजरात में पडे सूखे का कांग्रेस ने फायदा उठाया। किसानों को आकर्षित करने की कोशिश की और गरीबों के लिये घर बनाने की योजना लेकर आये। केशुभाई पटेल का गुजरात परिवर्तन पार्टी नामक नई पार्टी का निर्माण करना भी मोदी के लिये एक चुनौती थी।

परिणामों के 115 के आंकडे पर इन सारी बातों का प्रभाव पड़ा। कुछ ग्रामीण इलाकों में कांग्रेस के ‘उपेक्षित किसान’ और ‘असमान विकास’ के मुद्दे को पकड मिली, परंतु शहरी मतदाताओं के अगुवा नरेन्द्र मोदी ही रहे। कई टीवी चैनलों ने पहले ही यह घोषित कर दिया था कि सन 2007 की तुलना में इस बार भाजपा के क्षेत्र का विस्तार होगा और हुआ भी वैसा ही। सौराष्ट्र की 48 सीटों में 32 भाजपा को मिली। फिर क्यों नरेन्द्र मोदी अपने मन चाहे आंकडे 120 को पार नहीं कर पाये?

पहला मुद्दा मोदी की सरकार के पूर्व पांच मंत्रियों के द्वारा उठाया गया कि ग्रामीण और शहरी भागों में स्थानीय नेतृत्व को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अत: स्थानीय नेताओं को अपने मतदाताओं का विश्वास प्राप्त करना ही होगा, केवल नरेन्द्र मोदी द्वारा उनके लिये प्रचार करना काफी नहीं होगा। यही बात कांग्रेस के स्टार प्रचारकों अर्जुन मोधवाडिया और शक्ति सिंह गोहिल पर भी लागू होती है, जिन्होंने मोदी पर पलटवार करने के लिये अपने चुनाव क्षेत्रों के स्थानीय मुद्दों को उठाया। दूसरा मुद्दा यह था कि उन 15 चुनाव क्षेत्रों में जहां भाजपा की हार हुई है, हार और जीत का अंतर कुल वोटों का 2.5 प्रतिशत ही रहा है।

इतना सब ‘फील गुड’ होने के बाद भी सौ बात की एक बात यह है कि मोदी प्रधानमंत्री पद के दावेदार हैं या नहीं? गुजरात में जीती हुई सीटों की संख्या और प्रधानमंत्री पद के लिये बढ़ती दावेदारी चर्चा का विषय है। कौन है जो 2007 की 117 और आज की 115 का अंतर करेगा? केवल आंकडों के आधार पर कौन तय करेगा कि मोदी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हैं या नहीं। अब केवल दो सीटो की कमी के कारण 2007 के चुनाव प्रचार की खूबियों, 2012 की कमियों जैसी बातो को कोई भी इतना महत्व नहीं देगा।

इस चुनाव प्रचार पर आंकडो के गणित को परे रखकर गौर दिया जाना चाहिये। कांग्रेस ने 2004 में भाजपा के ‘इंडिया शाइनिंग’ के खिलाफ जो गरीबों की राजनीती खेली थी, उसे यहां भी खेलने का प्रयास किया, परंतु उस बार की तरह सफल नहीं हो पाये। आलोचकों की मोदी द्वारा विकास के मुद्दे को लेकर की गई आलोचनाओं के बावजूद लगातार तीसरी बार जीतना इस बात को स्पष्ट करता है कि लोगों के लिये विकास का मुद्दा जातिवादी और धार्मिक प्रतिभा से ऊपर है। मोदी जीत के बाद अपने भाषण में लोगों से विनम्रतापूर्वक कहते हैं कि उन्हें उनकी पिछली गलतियों के लिये क्षमा किया जाये, वे गुजरात के विकास के साथ ही पूरे देश को आगे ले जायेंगे। उनके उम्दा शासनतंत्र के कारण राजनीति की दिशा में बहुत परिवर्तन आया है। अत: हमें आंकडों के आधार पर इस जीत को नहीं देखना चाहिये। हमें एक देश के रूप में इस ओर ध्यान देना चाहिये। क्या हम एक ऐसे राजनैतिक तंत्र को लेना चाहते है जो आम आदमी के लिये अधिक अवसर प्रदान करता है या किसी ऐसे नकारात्मक तंत्र को जो विकास में बाधा उत्पन्न करता है।

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