दिल्ली की उस घटना के लिये फिल्में कितनी जिम्मेदार?

दिल्ली में एक निरपराध युवतीने चलती बस में हुए सामूहिक बलात्कार की दुर्भाग्यपूर्ण घटना के बाद दम तो़ड़ दिया और सारा समाज व्यथित हो उठा। पूरे देश में इस भीषण कांड़ के बाद जोरदार प्रदर्शन हुए। इस पूरी घटना का काला साया 2012 के जाने और 2013 के आगमन पर भी रहा।

जब इस घटना पर सामाजिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक सभी ओर से उंगलियां उठाई जा रही थीं तब एक उंगली फिल्मों पर भी उठ रही थी। इस घटना के दौरान निरंतर यह सवाल पूछा गया कि स्त्री को भोग्या समझने, उसपर जबरदस्ती करने की भावना उद्दीप्त करने, उस पर पैशाचिक ढ़ंग से बलात्कार करने इत्यादि भावनाओं को बढ़ाने में दोष क्या फिल्मों का दोष नहीं है?

समाज में ऐसी कोई घटना होने के बाद उसका दोष मसाला मिक्स फिल्मों को देने का चलन ही बन गया है। परंतु इस बार ऐसे आरोपों में गंभीरता अधिक थी। हिन्दी फिल्मों की नायिका की प्रतिमा जैसे-जैसे ‘मदर इंड़िया’ से ‘ड़र्टी पिक्चर’ और ‘छोड़ दो आंचल’ से ‘चिकनी चमेली’ तक फिसली वैसे-वैसे उनकी ओर देखने का दर्शकों का नजरिया भी बदलता गया। पुरानी फिल्मों की नायिका दर्शकों को अपनी दोस्ती, सखी, या प्रेमिका लगती थी, परंतु अब कहानी की विद्या बालन जैसे कुछ नायिकाओं को छोड़कर वह केवल एक ‘गुड़िया’ या ‘सेक्स सिंबल’ लगती है। इन्हे देखकर ही आरोप लगते हैं कि इनके कारण पुरुषों के अंदर का राक्षस जागृत होता है। लालची नजरों का साहस बढ़ता जाता है। इन आरोपों को सर्वथा गलत भी नहीं कहा जा सकता।

फिल्मों में बलात्कार के दृष्य का जन्म उस मसाला फिल्म के एक भाग के रूप में हुआ। सटीक तौर पर कहा जाये तो यह उस जमाने की बात है जब नायक-नायिका के बीच खलनायक प्राण की ‘एण्ट्री’ होती थी। नायिका पर प़ड़नेवाली खलनायक की वक्र दृष्टि, खलनायक द्वारा फाड़े गये कपड़ो के कारण दिखने वाली उसकी पीठ (खलनायक तब केवल वही कपड़े फाड़ते थे।) और फिर नायक द्वारा खलनायक से बदला लिया जाना इत्यादि बातें बलात्कार का हुकुमी इक्का थे। साठ के दशक में इन दृश्यों की शुरुवात की और सत्तर के दशक में तो इनका विकास ही हुआ।

रंजीत ऐसे दृश्यों के ठेकेदार बन गये और रेपिस्ट के तौर पर ही मशहूर हुए। रंजीत के द्वारा ही निर्देशित ‘कारनामा’ की पार्टी में जब उनसे इस बारे में चर्चा की गई तो अंदाजा हुआ कि उन्हे अपनी इस इमेज पर गर्व होता है। ब्रीज द्वारा निर्मित ‘विक्टोरिया नंबर 203’ नामक मसालेदार फिल्म में सायरा बानो पर चित्रित बलात्कार का दृश्य सत्तर के दशक का चर्चित दृश्य बन गया। ऐसे दृश्यों को देखकर हो सकता है किसी दर्शक के अंदर का ‘पुरुष’ जाग जाये परंतु क्या वास्तविकता में किसी लड़की का बलात्कार कर पायेगा?

फिल्मों यह सफर यहीं तक आकर नहीं रुका। कुछ बातों के संदर्भ में हिन्दी फिल्में अपनी गती और पद्धति से प्रगति करती रहती है। उन्हे लगता है कि किसी घटना का दूसरा पहलू भी देखना चाहिये। इसके उदाहरण के रूप में माणिक चटर्जी द्वारा निर्देशित ‘घर’ उल्लेखनीय है। देर रात को फिल्म देखकर लौटने वाले दंपत्ती (विनोद मेहरा और रेखा) का कुछ गुंड़े रास्ता रोकते हैं। पति को बेदम पीटते हैं और पत्नी पर क्रूरतापूर्ण जबरदस्ती करते हैं। इस हादसे का नायिका पर जो मानसिक परिणाम हुआ। वही इसका ‘पासिटिव पाइन्ट’ था। बी.आर. चोपड़ा के ‘इंसाफ का तराजू’ में एक कंपनी का बॉस (राज बब्बर कुछ) दिनो के अंतराल से दो बहनो (जीनत अमान और पद्मिनी कोल्हापुरे) पर जबरदस्ती करता है। जब नायिका देखती है कि न्यायालय से भी उसे योग्य न्याय नहीं मिल रहा है तो वह स्वयं पिस्तौल लेकर उस नराधम का खातमा कर देती है। राजकुमार संतोषी निर्मित ‘दामिनी’ में धनाढ्य परिवार के कुछ मनचले लड़के होली की भांग के नशे में अपने घर में काम करनेवाली नौकरानी के साथ कुकर्म करते हैं। परिवारवाले समझते हैं कि पैसे से न्याय भी खरीदा जा सकता है। तब उस परिवार की नई बहू (मीनाक्षी शेषाद्री) उस दुखी और त्रस्त नौकरानी के पक्ष में खड़ी रहती है और उसे न्याय दिलवाती है।

कई बार हिन्दी फिल्मों ने बलात्कार के दृष्य को वाजिब स्थान नहीं दिया। यह बहुत आवश्यक था कि फिल्मों के माध्यम से यह संदेश दिया जाता कि बलात्कारी को कठोर शिक्षा मिलती ही है, परंतु दुर्भाग्यवश ऐसा नहीं हुआ। खलनायक की वासना और लालसा को पूर्ण करने का माध्यम है बलात्कार जो किसी भी अन्य पुरुष की वासना को जागृत कर सकता है, जैसे कई गलत संदेश फिल्मों के माध्यम से समाज को दिये गये। इन गलत संदेशों के प्रसार के लिये फिल्मों जैसा सशक्त और चारों ओर फैला माध्यम दोषी है।

आयटम सांग ने भी हिंदी फिल्मों में नायिका की प्रतिमा को पूर्ण रूप से बदल दिया और उसे हल्के दर्जे की बनाने में अपना सहयोग दिया। इसकी शुरुवात 1993 में आई सुभाष घई द्वारा निर्देशित फिल्म ‘खलनायक’ के ‘चोली के पीछे क्या है’ जैसे द्वीअर्थी गाने से हुई। इससे पहले इस तरह के गीतों पर बिन्दू, जयश्री टी आदि अदाकारायें थिरकती थीं। लेकिन इन्होंने भी अपने शरीर की थिरकन को अश्लीलता की हद तक नहीं जाने दिया। परंतु जब माधुरी दीक्षित जैसी अभिनेत्री स्वयं ही इस तरह के गानों पर नृत्य करने लगी तो इसे एक नया प्रवाह मिल गया। ‘खलनायिका’ फिल्म के ‘चोली में है तबाही, तबाही’ जैसे गीत से लेकर ‘दबंग-2’ के ‘फेवीकोल से’ तक इन आयटम गीतों की ‘हिट एण्ड़ हॉट’ फसल लहलहा रही है। ‘शूल’ के ‘दिलवालों के दिल का करार लूटन’ से लेकर ‘दबंग’ के ‘मुन्नी बदनाम’ तक न जाने कितने आयटम गाने आये। इनमें इन गीतों के ‘बोल’ और इन पर थिरकने वाली नायिकाएं (शिल्पा शेट्टी या राखी सावंत जैसी, जो जल्दी प्रसिद्ध होना चाहती थी।) बहुत फूहड़ लगती हैं। ‘अग्निपथ’ में कतरीना कैफ द्वारा ‘चिकनी चमेली’ पर किया गया नृत्य भी बहुत निम्न स्तर का और आक्षेपपूर्ण था। कई बार इन गीतों का उद्देश्य पुरुषों की नजरों को सुख देना और उससे लोकप्रियता पाना ही होता है।

प्रत्यक्ष फिल्म इंड़स्ट्री में देखने पर ‘बी’ व ‘सी’ ग्रेड़ फिल्मों की नायिकाओं का रहन-सहन भी ठीक नहीं लगता। यह तुरंत ध्यान में आता है कि सिगरेट पीना, पुरुषों के गले पड़ना या लगना, छोटे व तंग कपड़े पहनना आदि बातें लोगों को आकर्षित करने के लिये ही है। उन लोगों की यह गलत फहमी है कि इन सब बातों का शस्त्र के रूप में उपयोग करके ही इस इंड़स्ट्री में टिका जा सकता है।

कुछ नायिकाओ के फोटो सेशन्स, उनके अफेयर और तलाक आदि की मिर्च-मसाला लगी खबरों के कारण भी स्त्री की ‘भोग्या’ रूप की ही प्रतिमा सामने आती है। यह वातावरण ही कुछ ऐसा है जो पुरुषों का स्त्री की ओर देखने का नजरिया बदल रहा है।

इन सब का तात्पर्य यह है कि, अगर यह सवाल किया जाये कि समाज में बढ़नेवाली बलात्कार की घटनाओं के पीछे क्या फिल्म इंड़स्ट्री का भी हाथ है? तो दुर्भाग्य से इसका उत्तर ‘हां’ ही होगा। हिन्दी फिल्मों के माध्यम से यह बताना आवश्यक है कि स्त्री केवल ‘ग्लैमर ड़ॉल’ या ‘शो पीस’ नहीं है। वरन् उसमें स्वाभिमान, मन और भावनायें भी होती है। इसके लिये आवश्यक है कि नायिकाएं आयटम गीतों (जिनमें फूहड़ता होती है।) पर थिरकने से मना करने की हिम्मत दिखाये। अभी तो आलम यह है कि ‘अगर वह मना कर रही है तो मैं तैयार हूं’ जैसे विधान सामने आ रहे हैं।

इन सभी में दो घटक बहुत महत्वपूर्ण लगते हैं। एक तो सेन्सर बोर्ड़ और दूसरा प्रसार माध्यम। इन परिस्थितियों में जब फिल्मों के माध्यम से स्त्री की ‘भोग्या’ रूप में प्रतिमा बन रही है तो सेंसर की कैंची को क्या जंग लग गयी है? कुछ अभिनेत्रियां पाश्चात्य पद्धति के अनुरूप ऐसे परिधान पहनती हैं जो अंतर्वस्त्रों की तरह लगते हैं और इनपर सबकी नजरें टिकती हैं, ऐसे में सेंसर इन पर आक्षेप क्यों नहीं करता? बलात्कार के प्रसगों का रंग कम करने का हक और धार दोनो ही इस कैंची में है तो वह इसका उपयोग क्यों नहीं करते हैं? जब आयटम गीतों के बेधड़क मुखड़े और उनपर थिरकने वाली नायिकाओं पर भी सेन्सर की नजर नहीं पड़ती तब बहुत ही आश्चर्य होता है। सेन्सर में कौन लोग होते हैं? सेंसर में समाज के विभिन्न क्षेत्रों के लोग होते हैं जैसे साहित्यिक पत्रकार, वकील, ड़ॉक्टर, इंजीनियर, बुद्धिजीवी, आंदोलनकर्ता इत्यादि। ये सभी लोग जागरुक नागरिक के रूप में पहचाने जाते हैं। फिर ये फिल्मों की कामुकता और विभत्सता को रोकने का काम क्यों नहीं करते? अर्थात समाज में किसी बलात्कारी को निर्माण करने का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष दोष सेंसर पर भी लगाया जाये।

प्रसारमाध्यमों के द्वारा भी इस प्रदूषित वातावरण को साफ करने का काम किया जाना चाहिये। इस सत्य को जब से हिन्दी फिल्म इंड़स्ट्री ने जान लिया है कि आजकल फिल्में अपनी गुणवत्ता पर कम और प्रसार माध्यमों की मदद और साथ के कारण ही अधिक चलती हैं, तब से प्रसार माध्यम उनके लाउड़ स्पीकर हो गये हैं। प्रसार माध्यमों को वस्तुत: जनता का प्रतिनिधि होना चाहिये परंतु वे भी फिल्म जगत को प्रसिद्ध करने में ही प्रयासरत दिखाई देते है। प्रसार माध्यमों का मनोरंजन उद्योग पर इतना ‘ड़िपेंड़’ रहना अखबारों की स्वतंत्रता के लिये धोकादायक है। कोई भी चैनल यह क्यों नहीं कहता कि हम फूहड़ आयटम गानों को अपने चैनल पर नहीं दिखायेंगे, भले ही इससे हमारा आर्थिक नुकसान हो? हर चैनल को इस तरह के गीत बहुत पैसा और लोकप्रियता दिलाते है। क्या इन चैनलों को यह समझ में नहीं आता कि ऐसे गानों को दिखाकर वे समाज में एक प्रकार का विष ही फैला रहे हैं।

इन गानों का उपयोग करके ही कोई लड़का किसी लड़की को छेड़ता है, भीड़ का फायदा उठाकर उसे धक्का मारता है या कोई नराधम बलात्कार भी करता है। किसी आयटम गाने का परिणाम इतना प्रचंड़ भयावह भी हो सकता है। इंटरनेट और मोबाइल क्रांति ने भी सांस्कृति-सामाजिक-लैंगिक परिस्थियों पर बहुत प्रभाव ड़ाला है। इसमे कामुक दृश्यों, चित्रों आदि का समावेश होता है, अत: खराब वृत्तियों को अधिक बल मिलता है। परंतु इन पर तो सेंसर भी नहीं बिठाया जा सकता।

सामाजिक परिस्थिती बिगाड़ने, कमजोर करने की लहर सी उठी है। यह प्रश्न क्यों पूछा जाये कि इस लहर को निष्क्रीय करने की जिम्मेदारी किसकी है?

दिल्ली की एक घटना ने इन सब को चर्चा का विषय बना दिया। हर संवेदनशील व्यक्ति के मन में यही भावना है कि ऐसा दोबारा न हो। अत: सभी की जिम्मेदारी है कि इन घटनाओं के लिये प्रेरक वातावरण का निर्माण न होने दें। अगर फिल्म निर्माता, निर्देशक, पटकथा लेखक, कलाकार, सेन्सर बोर्ड़, प्रसार माध्यम, आदि सभी लोगों ने अपनी जिम्मेदारी निभाई तो परिस्थिती काफी नियंत्रण में आ सकती है।

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