हमारा कर्तव्य

इस साल पर्यूषण पर्व के अवसर पर भारतीय जीव जंतु कल्याण बोर्ड के द्वारा 6 अगस्त 2020 को वधशालाओं तथा मांस की दुकानों को बंद रखने का आदेश जारी कर 11 अगस्त 2020 को आदेश को वापस ले लिया जो कानूनी परिधि के प्रतिकूल निर्णय था और यह देश भर में चर्चा का विषय बन गया है। देश के पशु प्रेमी इस निर्णय से अत्यंत दुखी हैं और उन्हें विश्वास नहीं हो रहा है कि पशु-पक्षियों के हित की बात करने वाला भारतीय जीव जंतु कल्याण बोर्ड इस तरह का कदम उठा सकता है।

इस साल जैन धर्म का पर्यूषण पर्व हमेशा की तरह आया और चला गया लेकिन, कई प्रश्नवाचक चिन्ह छोड़कर हमें सोचने के लिए विवश कर गया। आपको जानकर यह आश्चर्य होगा कि पर्यूषण पर्व के अवसर पर भारतीय संविधान के अनुसार सभी धर्म के लोगों की आस्था और भावनाओं का आदर करते हुए सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के अनुसार देशभर कीवधशालाओं तथा मांस विक्री की दुकानें बंद रखी जाती रही है। लेकिन इस साल इस विषय को देखने वाले केंद्र सरकार के पशु कल्याण विभाग एवं भारतीय जीव जंतु कल्याण बोर्ड ने पशुवध केंद्रों को बंद करने का आदेश जारी करके फिर उसे वापस ले लिया है। इस निर्णय से देश भर के पशु प्रेमी दुखित एवं आश्चर्यचकित हैं। सभी का मन आहत हो गया है।

भारत के संविधान में हर व्यक्ति को उसके मूलभूत अधिकारों के तहत अपने धर्म, संस्कृति एवं रहन-सहन के अनुसार रहने और सम्मान प्राप्त करने की विधिवत चर्चा की गई है। इन्हीं बातों को लेकर पर्युषण पर्व के महत्व को देखते हुए भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने वर्ष 2008 में हिंसा विरोधक संघ बनाम मिर्जापुर मोती कुरेश जमात तथा अन्य मामले में दिए गए अपने फैसले में कहा था कि ‘यदि साल भर के कुछ चंद दिन के लिए वधशालाएं तथा मांस की दुकानें बंद रहेंगी तो कोई परेशानी नहीं होगी।’ इसी आदेश के प्रतिपादन में भारतीय जीव जंतु कल्याण बोर्ड ने गत वर्ष देश भर के जिलाधिकारियों को पत्र लिखकर अनुरोध किया था कि ‘सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के परिपालन में दूकानें बंद रखी जाएं।’ लेकिन इस साल बिल्कुल उल्टा हुआ है।

भारतीय जीव जंतु कल्याण बोर्ड द्वारा जारी पत्र जिसमें देशभर की वधशालाओं तथा मांस की दुकानों को बंद रखने का पत्र लिखा गया था, उसमें बोर्ड द्वारा जीवजंतु क्रूरता निवारण (वधशाला) अधिनियम 2001 के साथ-साथ सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा 7 मई 2014 के उस आदेश का भी हवाला दिया गया था; जिसमें पशु-पक्षियों के पांच मूलभूत अधिकारों का पालन करने आदेश दिया गया है। बड़े ही स्पष्ट ढंग से सर्वोच्च न्यायालय के आदेश में कहा गया है कि केंद्रीय अधिनियम के अनुसार अवैधानिक वधशालाएं तथा मांस की दुकानों का संचालन अवैध एवं दंडनीय है। इस आदेश का सख्ती से पालन कर पशुओं के साथ होनी वाले क्रूरता, जुल्म और अत्याचार को रोका जाए। इतना ही नहीं सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इस दिशा में की गई कार्यवाही का उस समय रिपोर्ट भी मांगा गया था।

इस साल पर्यूषण पर्व के अवसर पर भारतीय जीव जंतु कल्याण बोर्ड के द्वारा 6 अगस्त 2020 को वधशालाओं तथा मांस की दुकानों को बंद रखने का आदेश जारी कर 11 अगस्त 2020 को आदेश को वापस ले लिया जो कानूनी परिधि के प्रतिकूल निर्णय था और यह देश भर में चर्चा का विषय बन गया है। देश के पशु प्रेमी इस निर्णय से अत्यंत दुखी हैं और उन्हें विश्वास नहीं हो रहा है कि पशु-पक्षियों के हित की बात करने वाला भारतीय जीव जंतु कल्याण बोर्ड इस तरह का कदम उठा सकता है। बोर्ड का एक सदस्य होने के नाते मैंने इस निर्णय का सख्त विरोध किया और भारत के प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर यह अनुरोध किया था कि भारतीय जीव जंतु कल्याण बोर्ड के ऐसे निर्णय जो संविधान तथा जीव जंतु क्रूरता निवारण अधिनियम के साथ-साथ सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों का अवहेलना कर रहा है, उसे रोका जाना चाहिए।

भारतीय जीव जंतु कल्याण बोर्ड के इस निर्णय पर मुझे बड़ा आश्चर्य है और दुख भी है। मेरी समझ में यह नहीं आ रहा है कि देश भर के पशु-पक्षियों की रक्षा करने वाली विश्व की प्रख्यात संस्था भारतीय जीव जंतु कल्याण बोर्ड से भविष्य में क्या आशा की जाए कि उनके द्वारा जीव जंतु क्रूरता निवारण अधिनियम 1960 के अधीन बनाए नियमों का पालन कर पशुओं पर होने वाले अपराध को नियंत्रित किया जाएगा और उनके कल्याण किया जाएगा?

यहां पर यह उल्लेख करना आवश्यक हो जाता है कि 5 मार्च 1954 को जब भारतीय जीव जंतु कल्याण बोर्ड की संस्थापक चेयरमैन श्रीमती रुकमणी देवी अरुंडेल ने पार्लियामेंट में जीव जंतु क्रूरता निवारण बिल 1953, प्रस्तुत किया था; तो उन्होंने अपने संभाषण में कहा था कि भारत के समस्त देशवासियों की यह आकांक्षा है कि पशु पक्षियों पर होने वाले अत्याचार को रोका जाए, इसलिए इस पर कानून बनाया जाना अति आवश्यक है। हालांकि, सदन में प्रस्तुत प्राइवेट बिल को सरकार की तरफ से रखने का प्रस्ताव रखा गया, जिसका नतीजा यह है कि आज जीव जंतु क्रूरता निवारण अधिनियम 1960 हमारे प्रयोग में है।

मुझे बड़ा गर्व है कि सर्वोच्च न्यायालय ने वर्ष 2008 में हिंसा विरोधक संघ बनाम मिर्जापुर मोती कुरेश जमात तथा अन्य का निर्णय आने के बाद बतौर भारत के पशु प्रेमी प्रधानमंत्री तथा गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात में आयोजित एक पब्लिक मीटिंग में इस निर्णय का हार्दिक अभिनंदन किया था और पर्युषण पर्व की आस्था एवं सम्मान में एक ऐतिहासिक निर्णय बताया था। लेकिन आज भारतीय जीव जंतु कल्याण बोर्ड के निर्णय ने देश भर में संचालित जीव जंतु कल्याण कार्यक्रमों तथा हजारों पशु प्रेमियों को निराश और हतोत्साहित कर दिया। प्रधानमंत्री जी ने उस समय गुजरात मुख्यमंत्री के रूप में यह कहा था कि ‘आज हमें अपने जैन संत-महात्माओं की भावना का सम्मान करना चाहिए जैसे पूज्यपाद गच्छाधिपति और आचार्य भगवंत आदि का। लेकिन पर्युषण पर्व के पावन अवसर पर यदि वधशालायें एवं मांस की दुकानें बंद नहीं रहेंगी तो देश भर के जैन मुनियों एवं संतों के लिए प्रस्तुत किए जाने वाला आज का यह सम्मान अस्तित्वहीन हो जाएगा।’

मैं भारतीय जीव जंतु कल्याण बोर्ड के सदस्य के रूप में पशु प्रेमी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी का हार्दिक अभिनंदन करता हूं और बताना चाहता हूं कि अभी कुछ दिन पहले उनके दिल्ली स्थित सरकारी निवास पर राष्ट्रीय पक्षी मोर के जोड़ों को चारा-दाना देते और उनसे मित्रता का जो वीडियो सोशल मीडिया में वायरल हो रहा है, वह उनके पशु प्रेम के अटूट बंधन तथा निश्चल मनोभाव आज सारी दुनिया को प्रेरणा दे रहा है जिसमें अहिंसा का बहुत बड़ा संदेश छिपा हुआ है। अहिंसा का यह संदेश हमें महात्मा गांधी, बुद्ध, तिरुवल्लुवर एवं भगवान महावीर के द्वारा दिया गया है कि ‘भारत में जीव दया एवं करुणा भारतीय संस्कृति की अस्मिता है, एक धरोहर है जो कभी हमारे जेहन से दूर नहीं हो सकती।’ हमें विश्वास है कि भारतीय जीव जंतु कल्याण बोर्ड की विचलित भूमिका जल्दी ही सुधार ली जाएगी।

This Post Has One Comment

  1. Pramodghatkar

    मोदीजी आप भी पशु प्रेमी है तो हम आपके सात है

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