राजस्थान में स्वामी विवेकानंद

नरेन्द्र नाथ दत्त को विश्व विजयी स्वामी विवेकानंद बनाने में राजस्थान का बहुत बड़ा योगदान रहा है । सन 1890 में युवा संन्यासी नरेन्द्र ने विविदिषानंद के नाम से मेरठ से राजपूताना में प्रवेश किया था। यहां यह उल्लेखनीय है कि स्वामी जी ने अपना विवेकानंद का नाम 1893 में अमेरिका जाने से पहले ग्रहण किया था और इस नाम को उन्हें राजस्थान में खेतड़ी के महाराजा अजीत सिंह के अनुरोध पर स्वीकार किया था। इससे पहले स्वामी विवेकानंद का नाम स्वामी विविदिषानंद तथा स्वामी सच्चिदानंद था।

परिव्राजक के रूप में स्वामी जी ने अपनी यात्रा सन 1888 में बिहार से प्रारम्भ की थी। बिहार के विभिन्न शहरों का भ्रमण करते हुए वे काशी पहुंचे थे और वहां वे गंगा तट पर द्वारिकादास आश्रम में ठहरे थे। वहां साधु, सन्तों तथा विद्वान आचार्यों के साथ सत्संग करके वाराह नगर वापस आ गये थे, किन्तु वे अधिक दिनों तक वाराह नगर में नहीं ठहर सके और पुन: काशी आ गये। वहां उनका परिचय संस्कृत साहित्य तथा वैदिक दर्शन के आचार्य बाबू प्रमददास मित्र से हुआ। स्वामी जी बाबू प्रमददास मित्र की विद्वता से अत्यन्त प्रभावित हुए। अगस्त 1888 में स्वामीजी ने काशी से प्रस्थान किया और अयोध्या पहुंचे, वहां से लखनऊ होते हुए वे वृन्दावन आये। राधा कुण्ड में स्नान करते समय उनकी एक मात्र कौपीन बन्दर ले गया था। बाद में स्वामी जी को किसी एक अनजान व्यक्ति ने वस्त्र दिया, जिसे पहनकर जब वे पुन: कुण्ड के पास पहुंचे थे तो उन्हें अपना कौपीन सुरक्षित वापस मिल गया था। स्वामी जी वृन्दावन के बाद हाथरस पहुंचे थे, वहां उन्हें रेलवे के स्टेशन मास्टर शरत चंद्र गुप्त मिले, जो बाद में उनके शिष्य बने, वहां से स्वामी जी हरिद्वार-ऋषिकेश पहुंचे, वहां उन्हें मलेरिया हो गया और पुन: स्वामी जी को वाराह नगर वापस लौटना पड़ा। कलकत्ता में स्वामी जी लगभग एक वर्ष रहे। इस दौरान उन्होंने भारतीय वेद, वेदांग तथा शास्त्रों का गहन अध्ययन किया और अपने जीवन की दिशा निश्चित की और एक बार पुन: सब कुछ त्याग कर भारत भ्रमण करने का निश्चय किया।

जुलाई 1890 में स्वामी जी ने मठ छोड़ने का निश्चय किया और भारत भ्रमण के लिए आशीर्वाद प्राप्त करने हेतु मां शारदा देवी के पास गये और उनके चरणों में अपना मस्तक रख कर कहा कि मां जब तक मैं गुरु के बताये कार्य को संपन्न नहीं कर लूंगा तब तक नहीं लौटूंगा। आप आशीर्वाद दें कि मेरा यह संकल्प पूर्ण हो। मां ने स्वामी जी के शीश पर हाथ रख कर उन्हें सफल होने का आशीर्वाद दिया। मां के पवित्र स्पर्श से स्वामी जी को दिव्य और अलौकिक ऊर्जा की अनुभ्ाूति हुई। उन्हें ऐसा विश्वास हो गया कि अब उनका संकल्प पूर्ण होगा और कोई भी विघ्न अब उन्हें अपना लक्ष्य प्राप्त करने से रोक नहीं सकेगा।

मां शारदा देवी से आशीर्वाद लेकर स्वामी जी भागलपुर, देवघर होते हुए नैनीताल तथा हिमालयी क्षेत्रों में पद यात्रा करते हुए ऋषिकेश पहुंचे और वहां उन्होंने अपना नाम विविदिषानंद रखा। ऋषिकेश अपने गुरुभाइयों से यह कह कर विदा ले ली कि अब उनकी इच्छा नितान्त अकेले यात्रा करने की है। वहां से स्वामी जी दिल्ली पधारे और मेरठ होते हुए उन्होंने फरवरी 1891 में अलवर राजस्थान में प्रवेश किया। वीर राजपूताना की भूमि पर आकर स्वामी जी को एक अलग प्रकार की अनुभूति होने लगी थी। अब स्वामी विविदिषानंद बिल्कुल एकाकी यात्री थे, उनके मुख पर धम्मपद की पंक्तियां रहती थीं, हाथ में लाठी, कमण्डल और एक जोड़ी भगवे वस्त्र के अलावा, उनके पास कुछ भी नहीं था। जहां जो मिलता, बस उसी का आतिथ्य ग्रहण करते।

अलवर में स्वामी जी को वहां के सरकारी अस्पताल के डॉ. बाबू गुरुचरण लश्कर और एक मौलवी मिल गये, जिन्होंने स्वामी जी के लिए सभी व्यवस्था की। स्वामी जी के आकर्षक व्यक्तित्व, तेजस्वी मुख मण्डल और ज्ञान ने सभी को प्रभावित किया। यहीं पर स्वामी जी को अलवर के महाराजा मंगल सिंह के महल में आने का अवसर प्राप्त हुआ। महाराजा मंगल सिंह बड़े ही अक्खड़ स्वभाव के थे। स्वामी जी के अत्यन्त प्रभावी व्यक्तित्व और ओजस्वी वाणी तथा अंगे्रजी पर प्रभुत्व के कारण महाराज में हीन भावना पैदा हो गयी थी। अत: स्वामी जी की चुटकी लेते हुए उन्होंने स्वामी से पूछा कि आप इतने विद्वान हैं और अंग्रेजी भी बहुत अच्छी बोल लेते हैं, फिर भी सारी सुख‡सुविधा छोड़कर भगवा कपड़ों में क्यों इधर-उधर भटक रहे हैं। यदि आप नौकरी करते तो निश्चय ही बड़े सरकारी पद पर आराम से जीवन यापन कर सकते थे।

स्वामी जी महाराजा मंगल सिंह का आशय समझ गये थे, अत: उन्होंने राजा मंगल सिंह से प्रति प्रश्न किया कि प्रजा का कल्याण करना आपका पहला कर्तव्य है, किन्तु उसे न करके आप अंग्रेजों के साथ शिकार खेलते हैं और उनके पीछे-पीछे विदेशों में घूमते हैं यह काम आप क्यों करते हैं?

स्वामी जी के इस प्रत्युतर से महाराजा विचलित हो गये और उन्होंने स्वामी जी से कहा कि यह सब उन्हें अच्छा लगता है अत: वे अंग्रेजों के साथ शिकार खेलते हैं और सैर-सपाटा करते हैं।

तब स्वामी जी ने कहा कि ठीक इसी तरह मैं भी संन्यासी जीवन जी रहा हूं, क्योंकि इसमें मुझे आनंद मिलता है।
कुछ देर के बाद बातों ही बातों में राजा मंगल सिंह ने स्वामी जी से पूछा, ‘स्वामी जी! मूर्ति पूजा में मेरा विश्वास नहीं है। ये लकड़ी, मिट्टी या पत्थर की मूर्तियों में क्या भगवान रहते हैं? मैं इसमें कोई भक्तिभाव नहीं रखता। क्या इसके लिए परलोक में मुझे सजा मिलेगी?’
स्वामी जी ने उत्तर दिया कि सबका अपना-अपना विश्वास है। स्वयं के विश्वास के अनुसार उपासना करना हर व्यक्ति का अधिकार है। अत: परलोक में सजा का कोई प्रश्न ही नहीं है।

स्वामी जी के इस उत्तर से वहां बैठे सभी लोग सोचने लगे कि स्वामी जी ने सगुण उपासना और मूर्ति पूजा के सम्बन्ध में कोई बहुत प्रभावी तर्क पूर्ण उत्तर नहीं दिया। वरना, स्वामी जी ने जब वृंदावन में श्री बिहारी जी के दर्शन किये थे, तो उनके सम्मुख भजन गाते-गाते उनकी आंखों से अश्रुओं की अविरल धारा बह चली थी, तो स्वामी ने इस प्रश्न को टाल क्यों दिया।

तभी स्वामी जी की दृष्टि उसी कक्ष में दीवाल पर टंगे महाराज के विशाल चित्र पर पड़ी। दरबारियों से कहकर स्वामी जी ने उसे उतरवा दिया और महाराज के सामने ही, दीवान तथा अन्य राज कर्मचारियों से उस चित्र पर थूकने के लिए कहा।

सभी राज कर्मचारी सकपका कर एक दूसरे को देखने लगे, तभी दीवान जी ने कहा, ‘स्वामी जी यह क्या आप कह रहे हैं, क्या हम महाराज के चित्र पर थूक सकते हैं?’ स्वामी जी ने कहा, ‘क्यों नहीं थूक सकते, यह मात्र कागज ही तो है और इस पर महाराज का चित्र बना हुआ है, तो क्या? यह महाराज स्वयं थोड़े ही हैं।’ किन्तु आप लोग इस पर इसलिए नहीं थूक रहे हैं कि यदि आपने इस पर थूका तो यह महाराज का अपमान होगा। क्यों, यही बात है ना?’

सभी ने कहा, ‘बिलकुल, यही बात है, यह महाराज का चित्र है।’ तब स्वामी जी ने महाराज से कहा, ‘क्या इस चित्र में आप नहीं हैं, किन्तु इस कागज के चित्र में आपका अस्तित्व लोगों को दिख रहा है, इसलिए इस पर कोई भी थूकने के लिए तैयार नहीं हैं । ये लोग आपको तथा आपके चित्र को एक ही प्रकार से सम्मान की दृष्टि से देखते हैं, ठीक इसी प्रकार से भक्तगण भगवान की मूर्ति में भगवान की छवि का दर्शन करते हैं। मैंने किसी हिंदू को यह कहते कभी नहीं सुना कि हे पत्थर, हे मूर्ति, हे धातु। मैं तुम्हारी पूजा कर रहा हूं और तुम मेरे पर कृपा करो; वरन वे सभी उस पत्थर की मुर्ति में केवल भगवान का दर्शन करते हैं और उनकी पूजा करते हैं।’

स्वामी जी के इस उत्तर से महाराजा मंगल सिंह निरुत्तर हो गये, किन्तु वहां पर उपस्थित सभी लोग स्वामी जी के इस उत्तर से गदगद हो गये थे। स्वामी जी के तेजस्वी और प्रभावी व्यक्तित्व से प्रभावित होकर अलवर में बहुत सारे लोगों ने स्वामी विविदिषानंद जी का शिष्यत्व ग्रहण किया कुछ दिनों के बाद स्वामी जी ने अलवर से आगे बढ़ने का निश्चय किया। जयपुर की ओर प्रस्थान करते समय स्वामी जी के अनेक युवा शिष्य उनके साथ हो लिये। स्वामी जी ने उन्हें बहुत रोका, लेकिन फिर भी वे नहीं माने । अत: वे सभी शिष्य स्वामी जी के साथ अलवर से अठारह मील (24 कि.मी.) दूर पांडूपोल गांव तक आये, स्वामी जी ने वहां के प्रसिद्ध श्री हनुमान मन्दिर में रात्रि विश्राम किया। स्वामी ने पांडुपोल से अपने शिष्यों को विदा किया और स्वयं जयपुर की ओर प्रस्थान कर गये। जयपुर में स्वामी जी का राज दरबार में स्वागत हुआ और उन्हें राजस्थान में ही ठहराया गया। वहां वे प्रतिदिन सभी राज दरबारियों तथा अन्य गणमान्य व्यक्तियों के साथ धर्म, दर्शन तथा संस्कृति पर चर्चा करते थे। साथ ही, राज दरबार के एक महा पंडित आचार्य से पाणिनि रचित अष्टाध्यायी के सूत्रों का भी अध्यन करते थे। अष्टाध्यायी पर अध्यन की समाप्ति के बाद स्वामी जी जयपुर से अजमेर की ओर प्रस्थान किया। अजमेर में स्वामी जी ने कुछ दिन बिताये और वहां से माउंट आबू की ओर प्रस्थान किया। माउंट आबू में आकर स्वामी जी ने आबू पर्वत की एक गुफा को अपना आश्रय स्थल बनाया और वहां साधना करने लगे।

इसी समय माउंट आबू में खेतड़ी के महाराजा ग्रीष्म कालीन अवकाश के लिए पधारे थे। माउंट आबू में महाराजा के दीवान की जगमोहन लाल जी का स्वामी जी से सम्पर्क मिला । यह सम्पर्क उन्हें अपने एक मुस्लिम वकील से प्राप्त हुआ था। स्वामी माउंट आबू में जिस गुफा में रहते थे, वहां एक मुसलमान वकील ने उनको देखा, वह स्वामी जी के तेजस्वी व्यक्तित्व से बहुत प्रभावित हुए थे। उन्होंने स्वामी जी से अपने बंगले पर चलने का अनुरोध किया। इन वकील साहब का सम्बन्ध राजस्थान के कई राज घरानों से था। यहीं उन्हें खेतड़ी के महाराज के दीवान जगमोहनलाल मिले। दीवान ने स्वामी जी से पूछा, ‘महाराज, यह क्या आप एक मुसलमान के घर पर रहते हैं और उनका छुआ भोजन भी करते हैं। आप तो हिंदू संन्यासी हैं?’

स्वामी ने तपाक से उत्तर दिया कि मैं केवल संन्यासी हूं और आपकी हिंदू रूढ़ियों से बिलकुल मुक्त। मुझे किसी का भय नहीं है, किन्तु आप उच्च वर्णीय हिंदुओं से बहुत भय लगता है, क्योंकि आप लोगों ने न तो ईश्वर को जाना है और न ही धर्म को।
स्वामी जी के इस उत्तर से दीवान जगमोहन लालजी बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने महाराजा अजित सिंह, जो उस समय माउंट आबू में ही थे, स्वामी जी से भेंट कराने का निश्चय किया।

स्वामी जी की महाराजा अजित सिंह की भेंट माउंट आबू में उनके निवास स्थान पर हुई थी। महाराज अजित सिंह भी युवा थे और स्वामी जी भी युवा थे। दोनों ही लोग जीवन को एक अलग दृष्टि से देखते थे। अत: राजा साहब ने स्वामी जी से पूछा, ‘स्वामी जी मनुष्य जीवन का अर्थ बता सकते हैं आप?’ स्वामी जी ने जो उत्तर दिया, उसने महाराजा को स्वामी जी का अनुयायी बना दिया।

स्वामीजी ने कहा, ‘प्रत्येक जीव परिस्थिति से जकड़ा हुआ गुलाम है, उस गुलामी से मुक्त होने की चेष्टा करना तथा मुक्त होने के बाद आन्तरिक विकास से जो ज्योतिर्मयता की अनुभूति होती है, इसी का नाम जीवन है।’

कुछ दिनों तक स्वामी जी महाराजा अजित सिंह के साथ रहे, तभी महारजा ने स्वामी जी का शिष्यत्व ग्रहण किया और उनसे पुत्र प्राप्ति के आशीर्वाद की याचना की। स्वामी जी का आशीर्वाद प्राप्त कर महाराजा माउंट आबू से खेतड़ी लौट गये और स्वामी जी ने गुजरात की ओर प्रस्थान किया था। खेतड़ी के राज दरबार के वाकयात रजिस्टर में ऐसा उल्लेख मिलता है कि स्वामी जी खेतड़ी में 7 अगस्त से 27 अक्टूबर तक रहे थे। वे वहां पर विद्वानों, आचार्यों के साथ सत्संग तथा विचा-विमर्श करते थे। वहीं पर स्वामी जी खेतड़ी के आचार्य पंडित नारायणदास से पाणिनी अष्टाध्यायी का अध्यन किया। खेतड़ी में प्रवास के दौरान स्वामी जी पूरे समय राजमहल में न रहकर निर्धन ब्राह्मणों तथा अनुयायियों के यहां भी रहते थे। खेतड़ी में ही स्वामी के साथ एक हृदय स्पर्शी घटना घटी थी। स्वामी के सम्मान में खेतड़ी के महाराजा ने अपने महल में गणिका का संगीत नृत्य का कार्यक्रम रखा था। स्वामी जी ने सन्देश भेजा कि वे संन्यासी होने के कारण ऐसे कार्यक्रम में सम्मिलित नहीं हो सकते हैं। गणिका ने जब यह सुना और वह बहुत दुखी हुई और उसने सूरदास जी का एक भजन गाया- प्रभु जी मेरे अवगुण चित न धरौ। भजन इतना मधुर था कि अपने कक्ष में बैठे-बैठे स्वामी जी की आंखों से आसुओं की धार बहने लगी और वे भावावेश में अपना कक्ष छोड़ कर उस बड़े कक्ष में आये, जहां वह संगीत का कार्यक्रम चल रहा था और उस गणिका से क्षमा याचना करके उस संगीत सभा में अन्त तक रहे और यह कहा कि संन्यासी को किसी भी प्रकार का भेद नहीं करना चाहिए।

स्वामी जी का राजस्थान में दूसरी बार आगमन दो वर्ष बाद हुआ था। इस घटनाक्रम में कुछ ऐसा बना था कि स्वामी जी का शिकागो में विश्व धर्म सम्मेलन में भाग लेने के लिए मद्रास से जाना तय था। किन्तु इसी बीच स्वामी जी के आशीर्वाद के फलस्वरूप खेतड़ी के महाराजा को 26 जनवरी 1893 को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई और उन्होंने अपने दीवान मुंशी जगमोहन लाल को विशेष रूप से अपने नवजात शिशु को आशीर्वाद प्राप्त कराने के लिए स्वामी जी को खेतड़ी लाने के लिए भेजा। महाराजा के अनुनय-विनय को स्वामी जी टाल नहीं सके और मुंबई होते हुए खेतड़ी पहुंचे। महाराजा ने स्वामी जी का भव्य स्वागत किया और नवजात शिशु को स्वामी जी नेआशीर्वाद दिया। स्वामी जी खेतड़ी में कुछ दिन रुके और वहां उन्होंने निश्चय किया कि वे अब मद्रास से नहीं, बल्कि बाम्बे से शिकागो के लिए प्रस्थान करेंगे।

महाराजा के अनुरोध पर खेतड़ी में भव्य समारोह में स्वामी जी को विदाई दी गयी। यहीं स्वामी जी ने अपना नाम सच्चिदानंद से बदल कर स्वामी विवेकानंद स्वीकार किया। स्वामी जी को विदा करने तथा उनकी विदेश यात्रा की सारी तैयारी कराने के लिए महाराजा ने मुंशी जगमोहन लाल को स्वामी के साथ बाम्बे भेजा था और वे स्वयं जयपुर तक उन्हें विदा करने के लिए आये थे।

यह राजस्थान की पुण्य और वीर भूमि थी, जहां पूर्व के नरेन्द्रनाथ दत्त ने स्वामी विवेकानन्द का स्वरूप ग्रहण किया। स्वामी जी खेतड़ी से विदा होकर बाम्बे आये और वहां से उन्होंने 31 मई 1893 को पेन्निसून्नर जलयान से शिकागो के लिए प्रस्थान किया था। खेतड़ी में ही राजा अजित सिंह ने उन्हें राजस्थानी पगड़ी और गेरुआ अचकन प्रदान की थी, जिसे पहन कर स्वामी विवेकानन्द ने शिकागो की धर्म महासभा में सत्य सनातन िंहंदू धर्म की विश्व विजयी पताका फहरायी थी। िंहंदू धर्म के योद्धा संन्यासी के रूप में स्वामी विवेकान्द का जब भी स्मरण किया जाएगा, तब राजस्थान की गौरवपूर्ण परम्परा, परिवेश और वेश को भी याद किया जाएगा।

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