काग्रेस का हाथ महंगाई के साथ

महंगाई अब सामान्य व्यक्ति को जीवन के हर कदम पर तकलीफ दे रही है। इन तकलीफों को सहन करते हुए जीने वाला प्रत्येक व्यक्ति स्वयं को असहाय महसूस करने लगा है। देश की सामान्य जनता की केवल इतनी ही अपेक्षा है कि ये हालात बदलकर जीवन शांतिपूर्वक चले। परन्तु अब जनता यह महसूस कर रही है कि इतनी छोटी सी अपेक्षा को भी पिछले 10 सालों में पूरा नहीं किया गया है।

अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में जब पेट्रोल की कीमतें बढ़ीं तो कांग्रेस ने पूरा देश सिर पर उठा लिया था। कांग्रेस ने उस समय टिप्पणी की थी कि भाजपा सरकार देश के गरीबों पर अत्याचार कर रही है। 2004 के चुनावों में कांग्रेस ने इसे ही अपना चुनावी मुद्दा बनाया था। वही कांग्रेस जब खुद सरकार में आयी तो ये सारी बातें भूल गयी। पिछले 10 सालों में पेट्रोल के दाम तीन गुना बढ़ गये हैं और महंगाई से पूरा देश त्रस्त है फिर भी सरकार को हर महीने ऐसा लगता है कि पेट्रोल के दाम बढ़ाये जाएं। क्या उस सामान्य जनता को फंसाया नहीं जा रहा है, जिसने कांग्रेस को इतने विश्वास से मत दिये थे। पिछले कुछ सालोंमें महंगाई ने जो रिकॉर्ड तोड़े हैं उन्हें देखकर सामान्य लोगों का जीना दूभर हो गया है। इस महंगाई की आग में झुलसे लोगों के मन में आशा निर्माण करने के स्थान पर कांग्रेस सरकार और उनके तोते (नेता) आम जनता के जख्मों पर नमक छिड़कने का काम कर रहे हैं।

गरीबी खत्म करने के लिए कमेटियां बनाना, गरीबी की व्यर्थ व्याख्या करना, गरीबी की सीमा निर्धारित करने के अनुमान लगाना इत्यादि क्या कम थे कि कांग्रेस के नेता यह भी कहने लगे कि देश में महंगाई है ही नहीं। यह महंगाई से झुलसे लोगों के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा ही है। समाजवादी पार्टी से कांग्रेस में आये परन्तु उसकी संस्कृति में न ढले अभिनेता और नेता राज बब्बर ने कुछ ऐसे शब्द-सुमन बिखेरे हैं कि 12 रुपये में भरपेट भोजन मिल सकता है। इसी की तर्ज पर रशीद मसूद ने कह दिया कि दिल्ली की जामा मस्जिद के पास 5 रुपये में भरपेट भोजन मिलता है। इस प्रकार के वाक्य गरीबों का मजाक उड़ाने वाले हैं ।

कुछ दिन पहले कांग्रेस के नेता पी. चिदंबरम ने कहा था कि ‘मध्यम वर्गीय लोग बेकार ही महंगाई बढ़ने का शोर करते हैं। ये लोग बीस रुपये की आइसक्रीम खाते हैं, परन्तु महंगाई अगर एक रुपये भी बढ़ जाये तो शोर मचाते हैं। यह मध्यम वर्ग पाखण्डी है।’ इस तरह चिदंबरम ने महंगाई के विरोध में आवाज उठाने वाले सभी मध्यम वर्गीय लोगों को पाखण्डी कह दिया था। हमेशा हवाई वातावरण में रहने वाले, बिजनेस क्लास से हवाई यात्रा करने वाले इन नेताओं को देश में बढ़ने वाली महंगाई, जनता की परेशानियों का अहसास ही नहीं होता। बाजार में दाल, सब्जियों की बढ़ी हुई कीमतों का इन पर कोई असर नहीं हुआ। इसलिए राज बब्बर और रशीद जैसे नेताओं के ‘राष्ट्रीय विनोद’ (गैर जिम्मेदार वक्तव्य) सुनकर भूख से व्याकुल गरीबअपनी हंसी नहीं रोक पाये। हे ‘जनता के नेता’ के रूप में शान से घूमने वाले नेताओं! आप जो भी वक्तव्य देते हैं उसका अर्थ समझने के लिए कभी वास्तविक जीवन मे भी उतरकर देखो। हवा में रहने वाले नेता जब केवल शब्दों के ढोल पीटेंगे तो यही हाल होगा जो रशीद मसूद और राज बब्बर जैसे यथार्थ की जमीन पर न रहने वाले नेताओं का दिख रहा है।

चिदंबरम साहब! महंगाई का एक रुपये बढ़ना केवल समाचार पत्रों का समाचार नहीं है। मध्यम वर्गीय और उसके नीचे का भी एक तबका है। यह विषय इन दोनों के जीवन में चक्रवात लाने वाला है । एक रुपये बढ़ने वाली और परिणाम स्वरूप जीवन के हर क्षेत्र पर प्रभाव डालने वाली महंगाई का सम्बन्ध मध्यम वर्गीय जनता की दाल‡रोटी से होता है, उसके परिवार से होता है, उसकी भूख से होता है और उसकी नींद से होता है। उसकी मानसिक शांति भंग करने वाली अनेक बातों से होता है। मिलने वाली आमदनी से खर्च अधिक हो रहा है ऐसे में खायेंगे क्या, घर कैसे चलाएंगे, बच्चों को अच्छी शिक्षा कैसे देंगे? आम आदमी को चक्रव्यूह में फंसाने वाले इन सभी प्रश्नों का एक रुपये बढ़ी महंगाई से सम्बन्ध होता है।

अत्यन्त गरीबी में जीवन यापन करने वालों का भोजन है वड़ा-पाव। परन्तु अब यह भी सामान्य नागरिकों की जेब पर भारी पड़ रहा है। ऐसे में मुंबई में सिर्फ 12 रुपयों और दिल्ली में सिर्फ 5 रुपयों में भरपेट भोजन मिलने की बात कहकर कांग्रेस नेताओं ने तमाम गरीबों की खिल्ली ही उड़ायी है। हमारे यहां महंगाई कोई आर्थिक घटना नहीं है। उसका समाज पर बहुत गहरायी से असर होता है। इस विषय को समझने के लिए भारतीय सिनेमा पर एक नजर डालनी चाहिए। भारतीय समाज का प्रतिबिंब सिनेमा में दिखायी देता है। दो बीघा जमीन, मदर इण्डिया, उपकार, पीपली लाइव इत्यादि फिल्मों में भारत की गरीबी, गरीब समाज, महंगाई को प्रस्तुत किया गया है। सिनेमा व्यवसाय से सम्बन्धित राज बब्बर ने शायद इन फिल्मों को देखने की भी जहमत नहीं उठायी। फिल्म, समाज, राजनीति में से किसी भी क्षेत्र की जानकारी न रखते हुए कही गयी बातें खोखली ही होती हैं। इस तरह के गैर जिम्मेदार बयान देने और बाद में उसके लिए क्षमा मांगने की कांग्रेसी नेताओंकी हमेशा ही आदत रही है।

‘कांग्रेस का हाथ, आम आदमी के साथ’ जैसी घोषणा करते हुए कांग्रेस सत्ता में आयी। परन्तु ये घोषणाएं और चुनावी भाषा केवल मत प्राप्त करने तक ही होते हैं। चुनावों में दिये गए आश्वासन पालन करने के लिए नहीं होते हैं। कांग्रेस अभी तक के अपने रवैये से यही बता रही है। अत: सामान्य जनता की जरा भी परवाह न करते हुए रोज नये स्वरूप में महंगाई का संकट उस पर थोपा जा रहा है। कहा जाता है कि डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार आर्थिक सुधार कर रही है, उदारीकरण की नीति अपना रही है। राजनेता भले ही यह दावा करते हों कि सरकार की नीतियां आम आदमी को ध्यान में रखकर बनायी जाती हैं, परन्तु उनके दावों का प्रतिबिंब समाज में रोजमर्रा के जीवन पर नहीं दिखता है। ऐसी नीतियां किस काम की हैं जिनसे सामान्य जनता का जीना ही मुश्किल हो गया हो।

केन्द्रीय योजना आयोग की रिपोर्ट के अनुसार पिछले सात सालों में देश की गरीबी बहुत कम हो गयी है। इसके पहले केन्द्र सरकार के द्वारा बनायी गई तेंदुलकर समिति ने शहरी भाग में 33 रुपये और गावों में 27 रुपये से अधिक कमाने वाला व्यक्ति गरीब नहीं है, ऐसा निर्णय दिया था। इसके कारण देश में बहुत हंगामा हुआ था। यह चर्चा का विषय बन गया था। इसके कारण योजना आयोग ने गरीबी की सीमा रेखा तय करने वाली व्याख्या को अमान्य करते हुए इस सन्दर्भ में पुन: रंगराजन समिति का गठन किया गया। इस समिति की रिपोर्ट सन 2014 में आएगी। देश में 2014 में चुनाव होने वाले हैं। इस पार्श्वभूमि पर इसे केवल चुनावी स्टंट कहा जा सकता है। कभी-कभी तो यह लगता है कि देश में गरीबी और महंगाई की वास्तविक स्थिति जानने से ज्यादा उसे छुपाने पर ही अधिक जोर दिया जा रहा है। अपनी आर्थिक नीतियों को सही ठहराने के लिए कांग्रेस गरीबों की संख्या कम बता रही है। आश्चर्य की बात यह है कि एक ओर गरीबों की संख्या कम बताना और दूसरी ओर देश के गरीबों के लिए खाद्य सुरक्षा अधिनियम लागू करने का अट्टाहास करना, ये दोनों ही बातें विरोधाभास प्रदर्शित करती हैं।

गरीबी की व्याख्या करने या गरीबी की सीमा रेखा हटाने जैसी ओछी बातों को अलग रखकर देश की वास्तविकता की ओर ध्यान दिया जाये तो गरीब उसे कहा जा सकता है जो स्वयं का, स्वयं के परिवार का खाना, इसके साथ बिजली, पानी, शिक्षा और चिकित्सा जैसी मूलभूत सुविधाओं से दूर है । हमारे देश के लगभग एक तिहाई लोगों को दो समय का भोजन भी नहीं मिल पाता तो बिजली, पानी, शिक्षा, चिकित्सा और अन्य आवश्यक सुविधाओं की कल्पना ही नहीं की जा सकती। ऐसी परिस्थिति में 33 और 27 रुपये की मर्यादा में गरीबी की व्याख्या करना मूर्खता होगी। देश में दूध 40 रुपये लीटर है, पेट्रोल 78 रुपये लीटर है और सब्जियां 30‡35 रुपये किलो हैं। ऐसे समय में 33 और 27 रुपये का महत्व स्पष्ट होता है। कांग्रेस पार्टी और सरकार के प्रचार के लिए और विपक्ष पर निशाना साधने के लिए कांग्रेस को ऐसे मुद्दे नहीं उठाने चाहिए। क्या कांग्रेस को यह समझ नहीं है या वह समझने की मानसिकता में नहीं है।

देश का सामान्य व्यक्ति महंगाई की आग में झुलस रहा है। पिछले 10 सालों में भारत में महंगाई की दर तीन गुनी हो गयी है। इतना होने के बाद भी भारत सरकार इस ओर ध्यान नहीं दे रही है। मांग के अनुसार आपूर्ति न होने की परिस्थिति ही महंगाई को निमंत्रण देती है। यही अर्थशास्त्र का नियम है। परन्तु भारत में तो अत्यधिक मात्रा में उत्पादन होता है और उसे रखने के लिए गोदाम कम पड़ जाते हैं। अत्यधिक मात्रा में उत्पादन होने के कारण अनाज सड़ने के बजाय उस अनाज को गरीबों को कम दाम में क्यों उपलब्ध नहीं करवाया जाता?ऐसे में योजना आयोग और व्यर्थ की बक बक करने वाले कांग्रेसी नेताओं द्वारा गरीबी की व्याख्या की जाती है और सस्ता भोजन कहां और किस दर से मिलता है, जनता को बताया जाता है। इससे यह जाहिर होता है कि राजनीति का मापदण्ड गरीबों का शोषण करना ही है।

तेल कम्पनियां यह दावा कर रही हैं कि पेट्रोलियम पदार्थों की कीमत अन्तरराष्ट्रीय बाजारों में तेजी से बढ़ने के कारण भारत को वर्तमान कीमतों पर पेट्रोल और डीजल उपलब्ध कराने के लिए उन्हें बहुत नुकसान उठाना पड़ता है। उनका यह दावा शायद सही भी हो परन्तु बार-बार बढ़ने वाली कीमतों के कारण बढ़ने वाली महंगाई को सहन करने की शक्ति क्या जनता में है, इस बात का भी ध्यान सरकार को रखना चाहिए। विश्व के कई छोटे‡छोटे देशों में भारत की तुलना में कम कीमत पर पेट्रोल मिलता है। श्रीलंका, नेपाल जैसे छोटे और गरीब देश अगर भारत से कम कीमत पर पेट्रोल दे सकते हें तो भविष्य में महाशक्ति बन सकने वाला भारत क्यों नहीं दे सकता। गोवा में मनोहर पर्रीकर के नेतृत्व वाली सरकार द्वारा पेट्रोल पर लगने वाले कर कम करने के कारण अन्य राज्यों की तुलना में वहां पेट्रोल 11 रुपये कम कीमत पर मिलता है। यह निश्चित होता जा रहा है कि उपायों का विचार करके जनता का भार कम करने के स्थान पर जनता की जेब काटने में ही उन्हें अधिक रुचि है।

ऐसा माना जाता है कि अंशत: महंगाई बढ़ना अर्थव्यवस्था के लिए हितकर होता है। परन्तु उस महंगाई को सहन करने की क्षमता जनता के अधिकाधिक स्तरोंमेंहोना आवश्यक है। अगर समाज की क्षमता नहीं है तो महंगाई बढ़ना हानिकारक है। भारत में फिलहाल यही हो रहा है। सामान्य जनता के फायदों का वादा करके चुनाव जीतकर आयी सरकार अगर सामान्य जनता का गला घोटने लगी है। राज बब्बर , रशीद मसूद, चिदंबरम जैसे लोग सामान्य लोगों की भूख की खिल्ली उड़ाने लगे हैं। गरीबी की व्याख्या और सीमा निर्धारित करते समय सामान्य लोगों के अस्तित्व के साथ जीवन‡मृत्यु का खेल खेला जाने लगा है। अब ऐसी सरकार से जवाब मांगने का समय आ गया है। कांग्रेसी नेताओं की विकृति दूर करने का, उनकी खून चूसने वाली विचारधारा को नकारने के हक का उपयोग करने का समय आ गया है।

ेंअगर महंगाई एक रुपये बढ़ जाती है तो जिनकी थाली में एक रोटी कम हो जाती है, ऐसे सामान्य लोगों की संख्या कांग्रेस की कृपा से आज देश में अधिक है । अपनी थाली से भोजन छीनने वाली कांग्रेस मतदान का हक नहीं छीन सकती। जन सामान्य को मतदान की शक्ति पहचाननी होगी। विकृत कांग्रेसी नेताओं और सरकार की विचारधारा को अगर समय रहते दूर नहीं किया गया तो उसके भयानक परिणाम सामने आ सकते हैं। अब खरी कसौटी महंगाई से झुलसे वर्ग की ही है। ‘लाख दुखों की एक दवा है, क्यों न आजमा लें’। इन सारी समस्याओं का रामबाण उपाय अब सामान्य जनता के ही हाथ में है।

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