पहले ‘नमस्ते!’

‘हिंदुस्तानी प्रचार सभा’ में गत 15‡16 वर्षों से मैं विदेशियों को हिंदी सिखा रही हूं । वैसे तो मेरा पूरा जीवन ही हिंदी शिक्षण के प्रति समर्पित रहा है‡स्नातक स्तर तक असंख्य छात्राओं को मैंने हिंदी सिखायी है । उनमें से कुछ तो उच्च पदों पर कार्यरत रहने के बाद अवकाश तक प्राप्त कर चुकी हैं।

लेकिन विदेशियों को हिंदी सिखाना एक बहुत चुनौती पूर्ण कार्य है। इस कार्य में कई धुरन्धर नाकामयाब हो चुके हैं। स्वयं का हिंदी ज्ञान कितना भी महत्त्वपूर्ण क्यों न हो, लेकिन दूसरों तक ज्ञान पहुंचाना आसान नहीं होता। पढ़ाते समय उनके स्तर तक उतरे बिना कुछ भी हासिल नहीं हो पाता। विदेशियों को हिंदी सिखाने का पहला चरण है‡ हाथ जोड़कर नमस्ते बोलने की शिक्षा देना। जब विदेशी विद्यार्थी हाथ जोड़कर नमस्ते कहते हैं तो दिल जुड़ जाता है।

फिर शुरू होता है अक्षर‡ज्ञान और बारहखड़ी। चुटकी बजाते ही वे सीख लें, यह सम्भव नहीं होता। अक्षरों के साथ, फिर शब्दों के साथ और फिर उसके बाद वाक्यों से उनकी दोस्ती करवानी पड़ती है। समूची शिक्षा व्याकरण पर आधारित होती है। एकवचन‡बहुवचन, पुल्लिंग‡स्त्री लिंग, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया, क्रिया-विशेषण आदि‡आदि।

परसर्ग (अंग्रेजी का preposition/हिन्दी काpostposition) का प्रयोग सीखकर विदेशी विद्यार्थी समझ पाते हैं कि ‘मेरा कमरे में’ सही नहीं है, ‘मेरे कमरे में’ ही सही प्रयोग है। ‘बालिकाएं को’ गलत है और ‘बालिकाओं को’ ही शुद्ध है। ज्यों‡ज्यों विद्यार्थी व्याकरण की गहरायी में उतरते जाते हैं, उनकी हिंदी भाषा के प्रति दिलचस्पी बढ़ती जाती है।
दिक्कत तब पैदा होती है, जब वे लोगों से हिंदी में बा

त करना चाहते हैं, लेकिन हमारे लोग गोरी चमड़ी देखकर अंग्रेजी में जवाब देकर अपनी शेखी बघारने का प्रयत्न करते हैं।
हमारे यहां वे ही विद्यार्थी हिंदी सीखने आते हैं, जिन्हें हिंदी भाषा से प्रेम है, हिंदी सीखकर वे भारतीय संस्कृति को समझना चाहते हैं। वे चमत्कृत तो हमें तब कर देते हैं, जब वे हिंदी सीखते‡सीखते बहुत‡सी बातें हमें सिखा देते हैं। भारत के विभिन्न कॉलेजों में पढ़ाने वाले शिक्षकों से क्षमा मांगते हुए मैं कहना चाहती हूं कि हम लोग ‘ड्यूटी लीव’ के बड़े दीवाने होते हैं‡ कहीं भी संगोष्ठी या कार्यशाला या सम्मेलन में भाग लेने के लिए ‘ड्यूटी लीव’ का आनंद उठाते हैं, पर आश्चर्य की बात है कि जापानी लोगों को ‘ड्यूटी लीव’ की बात करना भी पसन्द नहीं। एक बार मैंने अपने जापानी विद्यार्थी से कहा कि मंगलवार को दिन में आप लोगों के लिए मैं कार्यशाला का आयोजन करना चाहती हूं। उसने कहा, ‘मंगलवार को तो मैं नहीं आ सकता।’ मैंने कहा, ‘क्यों, तुम्हें ‘ड्यूटी लीव’ नहीं मिल सकती?’ छूटते ही उसने कहा, ‘ड्यूटी लीव? मैं ‘ड्यूटी लीव’ के बारे में सोच भी नहीं सकता। इस प्रकार छुट्टी लेने से हमारे कार्यालय का कितना नुकसान हो जाएगा! ऐसा क्यों नहीं करतीं? रविवार को कार्यशाला रख लीजिए, मैं जरूर आऊंगा।’ उसकी बात सुनकर मेरी तो बोलती बन्द हो गयी। मुंबई में रविवार को किसी कार्यक्रम का आयोजन करना मतलब ‘सिरफिरे’ की उपाधि प्राप्त करना।

एक विदेशी छात्रा की उक्ति उसी की जबानी अंग्रेज़ी में

‘I recall what the teacher said to our class in the very beginning of our 1st year class- ‘I am your teacher and I stand before you to help you learn. But when you sit at home, I am also with you. Picture me in front of you and try to remember, what has been tought in the class.’ I always remembered her words and studied accordingly.’

जब जापान में सन 2011 में सूनामी का कहर टूटा था, तब वहां के लोगों की मनोवृत्ति और उनकी सोच के बारे में अखबारों से तो बहुत कुछ जानकारी प्राप्त होती ही थी, लेकिन जापानी विद्यार्थियों से प्रत्यक्ष जानकारी हासिल होती रहती थी। एक बार एक जापानी विद्यार्थी को मैं वातानुकूलित कक्षा में हिंदी सिखा रही थी और कमरे का तापमान 28 डिग्री पर रखा था। मैंने कहा, ‘24 डिग्री पर कर दूं, तुम्हें गर्मी लग रही होगी।’ उसने कहा, ‘मेरे देश में बड़े‡बड़े कार्यालयों में कमरे का तापमान 28 डिग्री से कम नहीं रखा जाता। उससे बिजली की बचत होती है और उसके अनुसार देश में बिजली की खपत में किफायत हो जाती है।’ मैं लगातार सोचती रही, हम लोग अनावश्यक रूप से पंखे चलाने और कमरों में बल्ब और ट्यूब लाईट जलाकर रखने में अपनी शान समझते हैं…और वे लोग!

हमारे विदेशी विद्यार्थी परीक्षा में नकल करने की प्रवृत्ति से घृणा करते हैं। एक बार मैंने परीक्षा के समय विद्यार्थियों से कहा कि वे चाहें तो परीक्षा के दौरान एक बार किताब खोलकर देख सकते हैं। परीक्षा के समय किसी भी विद्यार्थी ने इसकी अनुमति नहीं ली। मैंने उन्हें याद दिलाने की कोशिश की तो एक विद्यार्थी ने कहा कि अगर हम पुस्तक खोलकर देखेंगे तो फिर हमारी असली परीक्षा तो होगी ही नहीं।
विदेशी विद्यार्थियों में आत्मविश्वास भरपूर दिखायी देता है। उनके व्यक्तित्व की गरिमा सबका मन मोह लेती है।

देश के प्रति स्वाभिमान की भावना उनमें कूट‡कूट कर भरी होती है। एक बार एक डेनिश छात्रा ने ‘हिंदुस्तानी प्रचार सभा’ द्वारा आयोजित संगोष्ठी में अपने वक्तव्य में कहा, ‘आप लोगों की राष्ट्रभाषा हिंदी है, यदि आप ही अपनी राष्ट्रभाषा की कद्र नहीं करेंगे तो कौन करेगा! श्रोताओं के बीच में बैठी अन्तरराष्ट्रीय स्कूल की एक शिक्षिका इतनी प्रभावित हुईं कि उसने अपने स्कूल में ‘हिंदुस्तानी प्रचार सभा’ द्वारा संचालित सरल हिंदी का पाठ्यक्रम शुरू किया। …तो ये विदेशी छात्र हिंदी सीखते‡सीखते हमें यह भी सिखा देते हैं‡

‘निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति कौ मूल।
बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल॥’
(भारतेंदु हरिश्चंद्र)

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