किसान आंदोलन की आड़ में विपक्ष लड़ रहा अस्तित्व की लड़ाई!

देश की 22 राजनीतिक पार्टियां मिलकर कृषि सुधारों को पलीता लगाने के लिए भारत बंद बुलाती हैं, लेकिन यह फेल हो जाता है। आखिर क्यों? हालांकि इसके बहुत से कारण हो सकते हैं लेकिन इनमें सबसे अहम कारण है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर लोगों का विश्वास। आप कितना ही जोर से चिल्ला ले लेकिन आम भारतीय जनमानस कम से कम इस आरोप पर तो विश्वास नहीं कर सकता है कि मोदी ग़रीब किसानों के अहित में कोई फैसला ले सकते हैं। अब इसका मुकाबला कीजिए भारत बंद करने चली पार्टियों की विश्वसनीयता और ईमानदारी से, जरा तोल कर देखिए एक तरफ मोदी और दूसरी तरफ चालीस चोर दोनों में कितना फर्क नजर आ रहा होगा।

दिल्ली में चल रहे प्रायोजित धरना प्रदर्शन के अलावा कहीं भी विरोध नहीं हो रहा है और विरोध तो छोड़िए जरा राजस्थान के पंचायत चुनाव पर ही गौर कर लीजिए, विशुद्ध रूप से किसानों के बीच हुए इस चुनाव में भाजपा को ज़ोरदार सफलता मिली है जो यह स्पष्ट करती है कि कृषि सुधारों पर किसान की मुहर लग गयी है।

किसानों की मसीहा बनने चली कांग्रेस पार्टी और उसके पिछलग्गू गैंग का ट्रैक रिकॉर्ड किसान के पास है। वही किसान जो कभी यूरिया के लिए लाठी खाता और फिर ब्लैक में खाद खरीदता था। कांग्रेस के महान अर्थशास्त्री डॉ मनमोहन सिंह की सरकार को किसान भूला नहीं है। 2004 में जब यूपीए की सरकार बनी तो अटल बिहारी बाजपेई ने कृषि क्षेत्र में 4 फीसद विकास दर की विरासत छोड़ी थी लेकिन सन 2014 में जब मनमोहन सिंह की मंडली से देश को आजादी मिली तो विकास दर नकारात्मक होकर शून्य से भी नीचे चली गई थी। यह कृषि और उस क्षेत्र से जुड़े समूचे वर्ग का सबसे अहम सूचकांक है।

किसानों की यह दुर्गति करने में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के शरद पवार का भी अहम योगदान रहा है। शरद पवार यूपी के शासनकाल में कृषि मंत्री थे। कृषि मंत्री बनने से पहले उन्होंने मंत्री पद पर रहते हुए और उसके बाद भी आज तक कृषि उत्पादों के दामों के साथ कैसे खेलना है इसके पवार महारथी थे। मनमोहन सिंह और शरद पवार की जोड़ी कितनी किसान हितैषी थी यह जरा इन आंकड़ों पर गौर करें, वैसे आधिकारिक आंकड़ा 1 लाख 70 हजार है हालांकि उत्तर प्रदेश के कृषि अनुसंधान मंत्री सूर्य प्रताप शाही दावा करते हैं की यूपीए के शासनकाल में कुल 2 लाख 66 हजार किसानों ने आत्महत्या की थी। यह भी जानकर आपको ताज्जुब नहीं होना चाहिए कि जिस महाराष्ट्र से शरद पवार आते हैं वहां आबादी के औसत से किसानों की आत्महत्या की दर सबसे ज्यादा रही है।

25 जून 2015 को सरकार द्वारा प्रायोजित दुनिया की सबसे बड़ी आवासी योजना शुरू की गई थी, प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत अभी तक 35 लाख ग़रीबों को पक्का मकान मिल चुका है जबकि 60 लाख से ज्यादा आवास मंजूर किए जा चुके हैं। कुल मिलाकर 1 करोड़ 10 लाख लोगों के सिर पर पक्की छत के वादे में आधा काम पूरा हो चुका है अब इतने विकास के बाद उन घरों में रहने वाला कोई व्यक्ति कैसे इस बात पर विश्वास कर सकता है कि उसे पक्की छत देने वाला शख्स उसकी जमीन छीन लेगा और उसकी उपज अमीरों को दे देगा।

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2 अक्टूबर 2014 से अब तक देश में कुल 10 करोड़ से अधिक शौचालय का निर्माण करवाया जा चुका है जो शख्स आपकी बहू बेटी को खुले में शौच के लिए जाते नहीं देख सकता वह आपकी जमीन किसी और को कैसे दे सकता है। उज्जवला योजना के तहत करीब 5 करोड़ से अधिक गैस कनेक्शन बांटे जा चुके हैं उज्जवला योजना का लाभ लेने वाले ज्यादातर परिवार ग्रामीण इलाके से हैं और वह किसान है फिर उन्हें यह कहकर कैसे बरगलाया जा सकता है कि उनकी जमीन मोदी सरकार छीनने वाली है।

कुल मिलाकर किसान के आंदोलन पर अगर गहरी नजर डालें तो एक ही सोच सामने आती है और वह है पार्टी अस्तित्व बचाने की आखिरी लड़ाई, कॉंग्रेस हो या टीआरएस, सपा हो या द्रमुक या फिर वामपंथी दल, यह सभी दलों के सामने अब अपना अस्तित्व बचाने की होड़ लगी हुई है। अस्तित्व बचाने की इस लड़ाई में यह दल इससे पहले सीएए और एनआरसी के मुद्दे पर राष्ट्र विरोधी ताकतों की गोद में बैठे थे और अब यह किसानों को भड़काने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन हर बार की तरह इस बार भी इन्हें सफलता नहीं मिलेगी क्योंकि देश की जनता सब कुछ जानती है।

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