राजस्थान में चुनाव नतीजों से भाजपा गदगद

जयपुर । राजस्थान विधानसभा चुनाव के नतीजों ने सबकों चौंका दिया। भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने सपने में भी कल्पना नहीं की होगी कि पार्टी की इतनी बड़ी जीत होगी, जो राजस्थान की राजनीति में एक नया इतिहास रच देगी। वहीं कांग्रेस की इतनी बुरी गत होगी इसका अंदाज भी उसके नेताओं ने नहीं लगाया होगा। इस चुनाव में प्रदेश में अब तक सर्वाधिक 75 फीसदी मतदान हुआ था। इसमें भी पुरूषों के मुकाबले महिलाओं ने ज्यादा वोट डाले। यह दोनों नए कीर्तिमान ह्।

भाजपा ने नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाकर चुनाव जीतने का एक बड़ा फैक्टर अपने पक्ष में कर लिया है। इसका असर लोकसभा चुनाव में भी देखने को मिलेगा। क्योंकि राजस्थान में लोकसभा की 25 सीटें ह््ैं। प्रदेश में आए चुनाव परिणामों ने यह साबित कर दिया कि कांग्रेस विरोधी बयार बह रही है।

पूरे चुनाव के दौरान मतदाता खामोश रहा है, महौल किसके पक्ष में बन रहा है इसका आकलन करना सियासी पार्टियों के लिए मुश्किल हो रहा था। प्रदेश में हुए रिकार्ड मतदान ने चुनाव नतीजों से पहले सभी की धड़कनें तेज कर रखी थी। कोई यह तय नहीं कर पा रहा था कि आखिर ऊंट किस करवट बैठेगा।

राजस्थान की 200 सदस्यों वाली विधानसभा में 199 सीटों पर चुनाव हुआ (एक सीट पर बसपा प्रत्याशी के निधन के कारण मतदान 13 दिसंबर को होगा)। इनमें भारतीय जनता पार्टी के खातें में 162 सीटें गई और कांग्रेस 21 सीटों पर ही सिमट कर रह गई्। आपातकाल के बाद देश में हुए आम चुनाव के दौरान भी कांग्रेस ने यहां विधानसभा चुनाव में 41 सीटें जीती थी। यह वह दौर था जब देश में कांग्रेस और इंदिरा विरोधी लहर थी। तीसरी ताकत के रूप में ताल ठोकने वाली नेशनल पार्टी को 4, बसपा को 3, जमींदार पार्टी को 2 और 7 सीटों पर निर्दलीय प्रत्याशी जीते। प्रदेश के 17 जिले तो ऐसे हैं जहां कांग्रेस का खाता भी नहीं खुला। अल्पसंख्यक वोटों पर दांव खेलने के लिए कांग्रेस 16 मुस्लिम उम्मीदवार मैदान में उतारे थे, लेकिन इनमें से एक भी नहीं जीत पाया, जबकि साम्प्रदायिकता के आरोप सहने वाली भाजपा से दो मुस्लिम उम्मीदवार चुनाव जीते।

इस चुनाव में कांग्रेस के विरोध में जो वातावरण बना उनमें प्रमुख रूप से केन्द्र सरकार पर लगे भ्रष्टचार, कालेधन और घोटालों के आरोपों के साथ ही प्रदेश के कई मंत्रियों के स्कैंडल भी जिम्मेदार ह््ैं। दुराचार और हत्या के आरोपों में जेल की हवा खा रहे मंत्रियों के परिजनों को टिकट देकर कांग्रेस ने खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारी। जनता जनार्दन ने दागी मंत्रियों के परिजनों को नकारा और उनकी चुनाव में शिकस्त हुई्। वहीं कांग्रेस का वंशवाद का फार्मूला भी इस बार यहां बेअसर रहा।
भारतीय जनता पार्टी के लिए नरेन्द्र मोदी लहर और वसुंधरा राजे की सुराज संकल्प यात्रा का जोरदार असर हुआ। अकेले मोदी ने प्रदेश में 20 चुनावी रैलियों को सम्बोधित किया। मोदी की रैलियों में उत्साहित युवाओं की जमकर भीड़ होती थी, जबकि राहुल गांधी ने केवल 5 रैलियां कीं, इनमें भी भीड़ नहीं जुट पाई्। वसुंधरा के मुकाबले अशोक गहलोत कम रैलियों में गए्।
मुख्यमंत्री अशोक गहलोत द्वारा पांच सालों में जनता के लिए शुरू की गई योजनाएं जिनमें निशुल्क दवाइयां, जांच, पेंशन, गरीबों के लिए मकान, सस्ती दर पर अनाज जैसी जन प्रभावी योजनाएं भी बेअसर रहीं। इनमें कई ऐसी योजनाएं हैं जो चुनावी साल में लाई गईं। भाजपा ने इसे प्रलोभन बताया और जनता को भी यह लगा, इसलिए कांग्रेस के खिलाफ ज्यादा मतदान हुआ। चुनाव में कांग्रेस के 22 मंत्रियों सहित कई विधायकों को हार का सामना करना पड़ा। अब देखना है कि भाजपा के पक्ष में बनी जबरदस्त लहर को पार्टी लोकसभा चुनावों तक किस तरह कायम रखती है और कांग्रेस अपनी हार पर क्या मंथन करती है, यह तो आने वाला समय ही बताएगा।

 

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