राष्ट्रीय क्षितिज पर राजनैतिक बदलाव

पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों को राजनैतिक विश्लेषकों ने जहां सेमीफाईनल कहकर देश की राजनीति के बदलते तेवरों का संकेत माना वहीं कांगे्रस ने पार्टी की पराजय पर हताशा जताते हुए इन कयासों को जन्म दिया कि आने वाला लोकसभा चुनाव उसके लिए बेहद अप हिलटास्क बन चुका है। प्रधानमंत्री पद के लिए किस पर दांव लगाया जाये यह गंभीर चिंता का विषय है। दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी का तीन राज्यों में जनता ने राजतिलक करते हुए उसके विकास और सुशासन के मिशन पर पीठ थपथपाते हुए कहा कि उसने प्रधानमंत्री पद के लिए गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को नामित करते हुए स्पष्ट कर दिया है कि देश की समस्याओं के प्रति लुका-छिपी की जो नीति यूपीए सरकार ने अपनायी है उसे कदापि बर्दाश्त करने के लिए जनता तैयार नहीं है। भारतीय जनता पार्टी अपने सहयोगी दलों के साथ मिलकर देश में नया परिवर्तन लाने के लिए कटिबद्ध है। पूर्व एनडीए के घटक दलों ने भारतीय जनता पार्टी से निकटता बढ़ाने के संकेत दे दिये है। तेलगुदेशम पार्टी के सुप्रीमों और आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री चन्द्रबाबू नायडू, शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने भारतीय जनता पार्टी की सरकार के शपथ ग्रहण समारोहों में अपनी हाजिरी दर्ज करके बता दिया है कि जीत पर हजारों निसार होते है और हार पर दुश्मन हजार होते है। यूपीए के घटक दलों (बाहर से समर्थन दे रहे और सरकार में शामिल) ने यूपीए के नेतृत्व पर सवालों की झड़ी लगा दी है। एनसीपी सुप्रीमों शरद पवार ने यूपीए के खाद्य कृषि मंत्री होते हुए जहां प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को कमजोर प्रधानमंत्री बताया वहीं सपा प्रमुख मुलायम सिंह और बसपा प्रमुख मायावती ने भी यूपीए सरकार की खुलकर आलोचना की है। तय है कि भले ही पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव सेमीफाईनल न हो लेकिन लोकसभा चुनाव में कांगे्रस और यूपीए गठबंधन की डगर मुश्किलात से भरपूर है और इसे राजनैतिक परिवर्तन का आगाज कहना सत्यता के निकट है। भाजपा राज्यों में शपथ ग्रहण के दौरान कांगे्रस की अनुपस्थिति ने उसकी लोकतंत्र के प्रति असहिष्णुता का सबूत दिया। लोकतंत्र में राजनैतिक परिवर्तन जनता का अधिकार है और उसे शिरोधार्य करके ही लोकतांत्रिक परिपक्वता का सबूत राजनैतिक दल दे सकते है। सत्ता पर एकाधिकार की प्रवृत्ति छोड़ना होगी।

मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, दिल्ली और मिजोरम में संपन्न हुए विधानसभा चुनावों में जहां मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ में भारतीय जनता पार्टी की सरकारें तीसरी बार बनी है और सरकार की नीतियों पर जनता ने वेशर्त मोहर लगाई है वहीं राजस्थान में सरकार में भारतीय जनता पार्टी की वापसी करके जनता ने कांगे्रस के गेहलोत के नेतृत्व वाली सरकार को खारिज कर दिया है। दिल्ली में कांगे्रस की शीला दीक्षित सरकार को जनता ने इस तरह बेदखल किया कि उसकी हैसियत विपक्ष में बैठने लायक भी नही रह गयी, शीला दीक्षित स्वंय अपनी सीट नहीं बपा पायी। हालांकि यहां भारतीय जनता पार्टी भी सरकार बनानें से चूक गयी है लेकिन ‘आप’ पार्टी ने जो दखल किया है उससे एक नयी शक्ति का दिल्ली में उदय हुआ है, जिसे जनता ने भ्रष्टाचार के विरोध का मुखर संकेत माना है। आप पार्टी की भूमिका निर्णायक हो गयी है। सरकार बनानें की स्थिति यदि नहीं बनी ंतो राष्ट्रपति शासन के लगने से इंकार नहीं किया जा सकता है। असलियत यह है कि “आप” अंहकारी तेवर अपना रही है। उसकी भूमिका तभी सार्थक होगी जब वह बड़े दल भारतीय जनता पार्टी अथवा कांगे्रस से हाथ मिलाकर समरसता की भावना से काम करेंं। लेकिन आप पार्टी अपनी श्रेष्ठता साबित करने के लिए कांगे्रस और भाजपा से अपनी विशिष्टता प्रदर्शित करती हुई आत्म मुग्ध है। उसने 18 मुद्दो पर चर्चा कर सशर्त समर्थन चाहा है। उसे राजनैतिक प्रतिबद्धता और परिपक्वता का सबूत देना होगा अन्यथा पानी का बुलबुला फोड़ते जनता देर नहीं लगायेगी। मध्यप्रदेश में शपथ ग्रहण समारोह में जहां मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अपनी अंतिम सांस पर जनता का अधिकार बताकर अपनी विनम्रता का परिचय दिया है, डॉ. रमन सिंह ने निरंहकार मन से जीत का सेहरा जनता-जनार्दन से सिर बांधकर जनता का मन मोह लिया है। मिजोरम में कांगे्रस की प्रचंड बहुमत के साथ विजय ने कांगे्रस को कुछ राहत जरूर दी है लेकिन उसके हाथ से राजस्थान का निकल जाना और मध्यप्रदेश तथा छत्तीसगढ़ में सत्ता प्राप्त करने के अरमानों पर घड़ों पानी फिर जाना संगठन और नेतृत्व की कार्यक्षमता पर सवालिया निशान लगा गया है। कांगे्रस जब राज्यों में जीत हासिल करती है ंतो श्रेय सोनिया गांधी और राहुल गांधी के खातें में दर्ज करने की प्रथा है। -2-
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जीत नहीं मिली ंतो ठीकरा क्षेत्रीय नेतृत्व पर फोड़ा जाना कांगे्रसी रिवाज है। इस बार की पराजय भी इसका अपवाद नहीं है। लेकिन फिर कांगे्रस न ंतो असल वजहों के प्रति गंभीर है और न देश की जनता की नब्ज टटोल पाने में कामयाब रही है। अन्यथा उसे देश में मंहगाई और भ्रष्टाचार, असुरक्षा और अनिर्णय जैसी वजहों पर खुलकर चर्चा करने, समाधान सुझाने का साहस दिखाना चाहिए था जो उसने करने तक का संकेत नहीं दिया है। जाहिर है कि कांगे्रस संकटापन्न स्थिति में भी उसी शुतुरमुर्ग की मुद्रा में बनी हुई है जिसमें पिछले 9 वर्षों से रही है। इसलिए जनता का उससे मोहभंग हो चुका है।
विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी की फतह के बाद जहां मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में विकास और सुशासन का एजेंडा आगे बढ़ेगा। किसानी को लाभ का धंधा बनानें की पुख्ता व्यवस्था होगी। 24 घंटा बिजली, हर खेत को पानी, हर हाथ को काम का अजेंडा जारी रहेगा। जो सिलसिला गत 10 वर्षों से चला है वह अंजाम पर पहुंचेगा, वहीं राजस्थान में विकास और सुशासन का वसुंधरा राजे को जनता को नया अहसास दिलाने की चुनौती होगी। लेकिन दिल्ली में अहंकार में डूबी आप पार्टी यदि जनता की अपेक्षा के अनुसार सरकार के गठन में मगरूरी दिखाती है और दोबारा चुनाव की नौबत में फिर कोई दल बहुमत हासिल नहीं कर पाता ंतो एक नयी उलझन में दिल्ली राज्य फंस जायेगा। यह एक राजनैतिक संकेत देश की जनता के लिये भी है कि वह लोकसभा चुनाव में एक दल को अथवा गठबंधन को स्पष्ट बहुमत की सौगात देकर देश को अनिश्चय के भंवर से मुक्त करें। ऐसा असंभव नहीं संभव करके जनता को दिखाना होगा। उत्तर प्रदेश की जनता ने कई बार अनिश्चय का खेल खेला था और मिली-जुली सरकार का हश्र देखकर फिर एक दलीय सरकारों की परंपरा आरंभ की है। तीन राज्यों में भाजपा की प्रचंड बहुमत वाली सरकारों के गठन ने संकेत दिया है कि भारतीय जनता पार्टी को राजैतिक अस्पृश्य मांगने वाले दल निकटता बढ़ाने की पहल कर सकते है। अब तक अकाली दल और शिवसेना साथ रहे है, एकजुटता रहेगी। आने वाले दिनों में तेलगुदेशम पार्टी, तामिलनाडू की जयललिता, उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने जिस तरह भारतीय जनता पार्टी की सरकारों विशेष रूप से नेतृत्व की प्रशंसा की है, आशा है कि ये दल इस ओर अपना रूख कर सकते है। नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में केन्द्र में सरकार के गठन के लिए अपनी प्रतिबद्धता दिखायेंगे। भारतीय जनता पार्टी को विधानसभा चुनाव में सरकारों की उपलब्धियों का लाभ मिला है। नेतृत्व के मुद्दो के प्रति गंभीरता, रचनात्मक समाधान की प्रतिबद्धता का फायदा हुआ है वहीं नरेन्द्र मोदी के स्पष्ट रूख, बेवाक बयानी और प्रतिबद्धताओं के ऐलान ने जनता का मन मोहा है। यही कारण है कि चार राज्यों में नरेन्द्र मोदी की रैलियों को प्रमुखता दी गयी। इन रैलियों में जनसैलाब ने उमड़ते हुए पालने में पूत के पांव का संकेत दिया है। अभी तक भारतीय जनता पार्टी को हिन्दी पटटी का दल माना जाता था, लेकिन नरेन्द्र मोदी की जिस तरह कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, केरल, तमिलनाडू से जम्मू-कश्मीर तक में स्वीकार्यता का विस्तार हुआ है धर्म निरपेक्षता के अलंबरदारों के माथे पर पेशानी बढ़ी है। उन्हें भविष्य के संकेत नजर आने लगे है। नरेन्द्र मोदी की तुलना में सोनिया गांधी और राहुल गांधी की रैलियों और सभाओं का फीका पड़ जाने के साथ देश में चुनाव विश्लेषकों का काम आसान हो गया और उन्होनें भारतीय जनता पार्टी की बढ़त दिखाने का काम किया, जिस पर कांगे्रस का ऐतराज उसकी हताशा का संकेत बन चुका था। इसका एक अर्थ यह भी है कि कांग्रेस का प्रादेशिक नेतृत्व, राहुल गांधी और सोनिया गांधी देश में केन्द्र सरकार की विफलता जनित आक्रोश और असंतोष को समझ पाने और समाधान खोजने में अपराधिक रूप से विफल साबित हुए। चुनाव परिणाम कांगे्रस और यूपीए सरकार के कामकाज पर सामान्य टिप्प्णी बनकर उभरे है। देश में लोकतांत्रिक परिवर्तन का यह एक संकेत है।

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