उत्तर भारत में चमत्कार की उम्मीद

भारत के उत्तरी क्षेत्र के राज्यों का चुनावी परिदृश्य पर बहुत असर रहने वाला है। इन राज्यों में जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड, हिमाचल, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड शामिल हैं। इन राज्यों में लोकसभा की कुल 543 सीटों में से 205 सीटें हैं। इनमें दिल्ली में 7, बिहार में 40, उत्तर प्रदेश में 80, उत्तराखंड में 5, झारखंड में 14, हिमाचल में 4, जम्मू-कश्मीर में 6, चंडीगढ़ में 1, हरियाणा में 10, पंजाब में 13 तथा राजस्थान में 25 सीटें हैं। फरवरी में हुए सर्वेक्षण कहते हैं कि इनमें से कोई 120 सीटें भाजपा के कब्जे में आएगी। जैसे जैसे चुनावी माहौल गर्म होगा हवा का रुख बदलने वाला है। देश में अभी जो बयार दिख रही है उसमें भाजपा व एनडीए के प्रति रुझान बढ़ जाने से इन सीटों में इजाफा हो सकता है। लेकिन एक बात का स्पष्ट संकेत है कि कांगे्रस का लगभग सफाया होता दिखाई दे रहा है।

उत्तर प्रदेश और बिहार

उत्तर प्रदेश और बिहार दो बड़े राज्य हैं, जहां लोकसभा की 120 सीटें हैं। इनमें से 55 से अधिक सीटें भाजपा को मिलने के वर्तमान संकेत हैं। इन राज्यों में चुनाव के दौरान जातियों का बड़ा महत्व है। उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह और मायावती इसी आधार पर अपना दबदबा बनाए हुए हैं। बिहार में नीतिश कुमार और लालू यादव का आधार भी जातियां ही हैं। मुलायम और लालू मुसलमानों को साधने की राजनीति करते रहे हैं। मुसलमान वहां एक बड़ा वोट बैंक है, जो पहले कांग्रेस का स्थायी वोट बैंक था। लेकिन बाद में मुसलमानों को आभास हो गया कि वे लगातार छले गए हैं तो उन्होंने कांग्रेस से अपना पल्ला झाड़ लिया। वे उत्तर प्रदेश में कभी मुलायम के साथ तो कभी मायावती के साथ हो जाते हैं। बिहार में वे कई चुनावों तक लालू के साथ रहे, लेकिन पिछले चुनावों में वे नीतिश कुमार के साथ हो गए। नीतिश और लालू दोनों नरेंद्र मोदी का चेहरा आगे कर मुसलमानों को डराने की रणनीति अपना रहे हैं। उत्तर प्रदेश के यादव मुलायम-अखिलेश को चाहते तो हैं, लेकिन वे एक बार मोदी को भी देख लेने के पक्षधर हो गए हैं। यही वजह है कि मुलायम ने इसकी काट के लिए तुरूप का पत्ता फेंक दिया है। वह यह कि तीसरे मोर्चे के सर्वमान्य नेता के रूप में वे सामने आ जाएंगे। मायावती भी अंगूर के पेड़ के नीचे बैठी हुई हैं। उन्हें लगता है कि अगर महिला प्रधान मंत्री की बात उठी तो वह जयललिता व ममता को पछाड़ने में कामयाब हो जाएंगी। वर्तमान संकेत यह है कि उ.प्र. में कांग्रेस बहुत पीछे छूट रही है। मुकाबले में भाजपा-बसपा-सपा ही होंगी। भाजपा को सर्वाधिक 34 सीटों का अनुमान लगाया जा रहा है, जबकि बसपा 21 व सपा 20 सीटों पर रहने के अनुमान हैं।

बिहार

बिहार में भी नीतिश बहुत पिछड़ते दिखाई दे रहे हैं। पिछली बार भाजपा-नीतिश एकसाथ थे इसलिए लालू-कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो गया था। भाजपा को वहां 21 सीटों का अनुमान लगाया जा रहा है, जबकि लालू एक दर्जन और नतिश 5 सीटों पर रह जाएंगे।

झारखंड

झारखंड का हाल भी ऐसा ही है। झारखंड में कुल 14 सीटें हैं। पिछली बार भाजपा के पास 8 सीटें थीं, लेकिन इस बार यह संख्या एक दर्जन हो सकती है। झारखंड भाजपा का गढ़ माना जाता है। बिहार से अलग होने के बाद वहां भाजपा की ही सरकार बनी थी। आदिवासी वोटों पर वहां शिबू सोरेन के झारखंड मुक्ति मोर्चे का दबदबा है। मगर आदिवासियों के वोट अब एकगट्ठा नहीं रहे। दूसरी ओर भाजपा ने गांव-जंगल तक अपने काम से इतना विश्वास पैदा कर दिया है कि झारखंडी नेताओं के सामने संकट पैदा हो गया है, हालांकि वहां अभी उन्हीं के नेतृत्व में सरकार चल रही है। गैर-भाजपाई सारे दल उनके साथ हो गए हैं। सरकार का ट्रेक रिकार्ड इतना खराब है कि वहां के लोग नरेंद्र मोदी की जयकार में लग गए हैं।

जम्मू-कश्मीर, हरियाणा, हिमाचल

जम्मू-कश्मीर में 6 सीटें हैं। वहां कांग्रेस, नेशनल कांफ्रेंस और मुफ्ती की बेटी के बीच लड़ाई चल रही है। जम्मू वाले इलाके में भाजपा की उम्मीद दिखाई दे रही है। चंडीगढ़ में एक सीट है, जो भाजपा को मिलती दिखाई दे रही है। वहां से हमेशा सतपाल जैन उम्मीदवार रहा करते थे, लेकिन अब कोई दूसरा उम्मीदवार देने की चर्चा है ताकि कांग्रेस को मात दी जा सके।
हरियाणा की राजनीति में चार दलों के बीच मुकाबला है। कांग्रेस, भाजपा, इंडियन नेशनल लोकदल व हरियाणा जनहित कांग्रेस। वहां भाजपा का लोकदल या जनहित से समझौता हो जाता है तो भाजपा काफी फायदे में रहेगी। फिलहाल बिना किसी समझौते के भी उसे 10 में से 6 सीटें मिलने की पक्की उम्मीद है। हिमाचल में 7 सीटें हैं, जिनमें से कम से कम 6 सीटें भाजपा की झोली में जाएगी। पिछली बार कांग्रेस की 4 और भाजपा की 3 सीटें थीं।

पंजाब, उत्तराखंड

पिछली बार पंजाब की 13 सीटों में से कांग्रेस को 8 मिली थीं, भाजपा को महज एक पर संतोष करना पड़ा था। इस बार राहुल गांधी के 1984 के दंगे के बयान के बाद पैदा हुए विवाद से कांगे्रस को नुकसान होने की संभावना है। भाजपा-अकाली गठबंधन को ज्याद सीटें मिलने की उम्मीद है।

उत्तराखंड में भाजपा की स्थिति हमेशा मजबूत रही है। इस बार वहां केंद्र सरकार की नीतियों के प्रति गुस्सा तो है ही, राज्य सरकार के कामकाज के प्रति भी काफी असंतोष है। यही वजह है कि वहां कांग्रेस को मुख्यमंत्री बदलने की कवायद करनी पड़ी। वहां के लोग पिछली बार विधान सभा चुनाव में भाजपा को सत्ता न सौंपने पर अफसोस जाहिर कर रहे हैं। इसलिए उम्मीद की जा रही है कि लोकसभा चुनाव में सूद समेत भाजपा को भरपाई करने वाले हैं।

राजस्थान

भाजपा अगर सब से ज्यादा निश्चिंत है तो वह राजस्थान में। वहां की 25 सीटों में से पिछली बार कांग्रेस को 20 सीटें मिली थीं। इस बार यह स्थिति बदलने वाली है। इस बार यह आंकड़ा 21-22 होने का अनुमान है। राजस्थान के लोग सीधे तौर पर गुजरात से जुड़े हैं। लोगों की इच्छा है कि राजस्थान को गुजरात के बराबर खड़ा किया जाए। राज्य में सत्ता तो हासिल हो ही गई है, अगर केंद्र में भाजपा आ जाती है तो दोनों हाथ में लड्डू आ जाएंगे।

कांग्रेस की स्थिति का आंकलन करें तो वह सपा, बसपा के करीब भी पहुंचने की स्थिति में नहीं दिखाई देती। ऐसे में सत्ता वापसी का सपना देखना भी एक टेढ़ी खीर है। तब उसकी निगाह तीसरे मोर्चे पर होगी। तीसरे मोर्चे में प्रधान मंत्री पद के लिए सर्वसम्मत उम्मीदवार कोई नहीं आ पाया तो कांग्रेस अपने लिए समर्थन मांग सकती है। या फिर भाजपा को रोकने के लिए अरविंद केजरीवाल सरीखे नेता को खोजेगी जो मोदी को सत्ता से दूर रख सकें।

भाजपा के पक्ष में यह बात दिखाई देती है कि इन राज्यों की 120 सीटों के बारे में फिलहाल जो अनुमान लगाए जा रहे हैं वे प्रत्यक्ष चुनाव में चमत्कारिक ढंग से बदलेंगे।
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