रक्तरंजित ‘ममता’राज

वैसे बात केवल राजनैतिक हिंसा का नहीं है बल्कि राज्य में जिस तरह से हिन्दुओं पर हमले की घटनाओं में वृद्धि हुई है उससे यह लगता है कि राज्य में हिन्दुओें के दमन और पलायन के लिए सुनियोजित ढंग से हिंसा हो रही है या कार्रवाई की जा रही है। 24 परगना, मुर्शिदाबाद, बीरभूम, मालदा आदि ऐसे कई उदाहरण सामने हैं। हालात तब से ज़्यादा बिगड़ने लगे हैं जब से बांग्लादेशी और रोहिंग्या शरणार्थी भी राज्य में डेरा जमाए हुए हैं।

पश्चिम बंगाल के दौरे पर गए भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा के काफ़िले पर राज्य में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस पार्टी के लोगों ने हमला कर दिया तो कोलकाता से लेकर दिल्ली तक हर कोई हिल गया। बंगाल में राजनैतिक झड़पों में बढ़ोतरी के पीछे मुख्य तौर पर तीन वजहें मानी जा रही हैं – बेरोज़गारी, विधि-शासन पर सत्ताधारी दल का वर्चस्व और भाजपा का उभार।

नई दिल्ली, पश्चिम बंगाल में यूं तो राजनैतिक हिंसा की घटनाएं लगातार घट रही हैं लेकिन हद तो तब हो गई जब पश्चिम बंगाल के दौरे पर गए भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा के काफ़िले पर राज्य में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस पार्टी के लोगों ने हमला कर दिया। इससे कोलकोता से लेकर दिल्ली तक लोकतंत्र में आस्था रखने वाला हर कोई भीतर से हिल गया। क्योंकि किसी भी लोकतंत्रिक राज्य की पहली कसौटी यह होती है कि उसके शासन में लोग कितनी स्वतंत्रता के साथ अपनी बात कह सकते हैं, लेकिन, पश्चिम बंगाल में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा के काफ़िले पर हमले और लगातार एक के बाद एक भाजपा कार्यकर्ताओं की हत्या की घटनाओं ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया है। नड्डा के काफ़िले में भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय, राष्ट्रीय सचिव डॉ. अनुपम हाजरा, पार्टी के सांगठनिक महासचिव शिवप्रकाश सहित भाजपा के कई राष्ट्रीय नेताओं की गाडियां शामिल थीं, जिन पर हमले किए गए। पश्चिम बंगाल प्रदेश भाजपा अध्यक्ष दिलीप घोष और राष्ट्रीय उपाध्यक्ष मुकुल रॉय की गाडियों में तोडफ़ोड़ की गई है। भाजपा का आरोप है कि स्थानीय प्रशासन की मिलीभगत से यह हमला किया गया है।

दरअसल, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा के काफ़िले पर यह हमला तब हुआ जब वे मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बैनर्जी के संसदीय क्षेत्र डायमंड हार्बर में आयोजित एक कार्यक्रम में शामिल होने जा रहे थे। जैसे ही भाजपा नेताओं का काफ़िला शिराकोल के पास पहुंचा, वहां सड़क के दोनों ओर बड़ी संख्या में पहले से एकत्रित तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने भाजपा नेताओं की गाडियों पर हमला बोल दिया। उनकी गाडियों पर ईंट-पत्थर फेंके गए। पुलिस मौजूद थी, लेकिन किसी को भी रोकने की कोशिश नहीं की गई। यह भी आरोप लगाया जा रहा है कि अभिषेक बैनर्जी के इशारे पर हमले हुए हैं। उल्लेखनीय है कि एक दिन पहले भी कोलकाता के हेस्टिंग्स इलाके में भारतीय जनता पार्टी के नवनिर्मित कार्यालय का उद्घाटन करने पहुंचे पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा की सुरक्षा में चूक की गई थी। तृणमूल कांग्रेस के लोगों ने दफ्तर में घुसकर काले झंडे दिखाने की कोशिश की थी। इसे लेकर प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को पत्र भी लिखा था। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा के काफ़िले पर हमले की घटना को गंभीरता से लेते हुए केंद्रीय गृह मंत्रालय ने राज्य सरकार से इस मामले में रिपोर्ट तलब की है।

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा के काफ़िले पर हमले की घटना से पश्चिम बंगाल के राज्यपाल जगदीप धनखड़ भी आहत हैं। लिहाज़ा, इस हमले की घटना के बाद उन्होंने अपनी रिपोर्ट गृह मंत्रालय को भेज दी। अपनी रिपोर्ट में राज्यपाल ने कहा है कि भाजपा अध्यक्ष के दौरे के दौरान सुरक्षा व्यवस्था में कमी रही। राज्यपाल जगदीप धनखड़ कहते हैं कि ’किसी भी राज्य में राजनैतिक हिंसा लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं हैं। यह लोकतांत्रिक व्यवस्था को धक्का पहुंचाने वाली घटना थी। जब मुझे भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के दौरे का पता चला था तो मैंने राज्य के डीजीपी को अलर्ट किया था। इसके अलावा मैं मुख्य सचिव से भी संपर्क में था। मैंने उन्हें सिर्फ सूचित नहीं किया बल्कि इनपुट भी दिए, लेकिन इसके बाद माहौल नहीं सुधारा गया। ’असल में राज्यपाल जगदीप धनखड़ की राज्य में राजनैतिक हिंसा को लेकर चिन्ता जायज़ भी है, क्योंकि पश्चिम बंगाल में राजनैतिक हिंसा की घटनाएं राजनैतिक व्यवस्था और लोकतंत्र के लिए खतरा पैदा कर रही हैं।

वैसे कुछ दिन पहले ही राज्य में भाजपा विधायक देवेंद्र नाथ रे की कथित आत्महत्या की घटना ने भी हर किसी को हिला दिया था। विधायक देवेंद्र नाथ रे की पत्नी को अपने पति की मौत का रहस्य जानने के लिए भी अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा। यह ’ममता’ का राज है। पर यह कितना अभद्र और असहिष्णु है कि अपने विरोधियों से अपनी विचारधारा के साथ जीने की स्वतंत्रता भी छीन लेता है। विधायक देवेंद्र नाथ रे की संदिग्ध मौत को संज्ञान लेते हुए राज्यपाल जगदीप धनखड़ ने ट्वीट किया कि विधायक देवेंद्र नाथ रे की मृत्यु, हत्या के आरोपों सहित गंभीर मुद्दों को उठाती है। सच्चाई को उजागर करने और राजनैतिक हिंसा को रोकने के लिए पूरी निष्पक्ष जांच की आवश्यकता है। दरअसल, भद्रलोक की छवि वाला पश्चिम बंगाल, ममता शासन में बढ़ती राजनैतिक हिंसा, हिन्दू विरोधी दंगों और राजनैतिक कार्यकर्ताओं की हत्या के लिए कुख्यात हो गया है। इसलिए भाजपा अध्यक्ष जे.पी. नड्डा कहते भी हैं कि ’ममता सरकार में गुंडा राज है और यह कानून-व्यवस्था की विफ़लता है। लोग ऐसी सरकार को माफ नहीं करेंगे’।

जाहिर है सहिष्णुता और लोकतंत्र में आस्था रखने वाला हर कोई व्यक्ति राजनैतिक हिंसा का इसी प्रकार विरोध करेगा, लेकिन, चीन के कम्युनिस्ट नेता माओ त्से तुंग ने कहा था, ’सत्ता बंदूक की नली से निकलती है’। लिहाजा लंबे समय तक वामदलों के शासन वाले इस पश्चिम बंगाल में सत्ता तो बदली लेकिन ममता के राज में राजनैतिक कार्यकर्ताओं की हत्या को देखा जाए तो बंगाल की राजनैतिक हिंसा का पैटर्न ठीक उसी प्रकार है जो एक दशक पूर्व वामपंथी राज में था। अंतर इतना है कि हमलावर वहीं हैं, लेकिन उनकी पार्टी बदल गई है। पर राजनैतिक हिंसा की ये घटनाएं, लोकतंत्र की आत्मा को छलनी करते हुए नेताजी के सपने ‘सोनार बांग्ला’ को धराशायी कर रही हैं। लोकतंत्र का मूल सिद्धांत राजनैतिक स्वतंत्रता, कानून का शासन और समानता है। तो, दूसरी ओर तानाशाही की विशेषताएं नागरिक स्वतंत्रता का हनन और राजनैतिक विरोधियों का दमन भी है। इसलिए, पश्चिम बंगाल में उत्तर दिनाजपुर में आरक्षित सीट हेमताबाद के भाजपा विधायक देवेंद्र नाथ रे की मौत ने कई सवाल खड़े कर दिए थे। अब भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नड्डा पर हमले के बाद राज्य की व्यवस्था पर कोई भरोसा करें भी तो कोई कैसे करें। पर यह ’ममता’ का राज है।

वैसे देखा जाए तो 19 मई, 2019 के बाद से जिस बड़ी संख्या में राजनैतिक हिंसा की घटनाएं इस राज्य में सामने आई हैं, वे चिन्ता पैदा करने वाली हैं। क्योंकि हिंसा की यह राजनैतिक घटनाएं लोकसभा चुनाव के बाद की हैं। यह घटनाएं पश्चिम बंगाल में लोकसभा चुनाव के लिए मतदान और जनता के जनादेश के बाद उभर कर सामने आई थी। लोकसभा चुनाव के बाद नेशनल यूनियन ऑफ़ जर्नलिस्ट इंडिया ने अपने सामाजिक दायित्व को समझते हुए पश्चिम बंगाल की राजनैतिक हिंसा की प्रत्येक छोटी-बड़ी घटना को एकत्र करना और उसका विश्लेषण करना शुरू किया तो रक्तरंजित बंगाल की तस्वीर उभर कर सामने आई। उस पश्चिम बंगाल की जो अपने स्वतंत्रता संग्राम में महान योगदान, साहित्य-कला और भद्रलोक की छवि के लिए दुनियाभर में जाना जाता है। लेकिन, यह सवाल भी अपने में विश्लेषण का हैं कि आख़िर 19 मई, 2019 के बाद भी पश्चिम बंगाल में राजनैतिक हिंसा क्यों हुई या हो रही है। दरअसल लोकसभा चुनाव में मतदान और परिणाम सामने आने के बाद राज्य में सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच राजनैतिक हिंसा ने कई नए सवाल खड़े कर दिए। कारण 19 मई, 2019 से 21 जून, 2019 के बीच घटी 150 हिंसक और संघर्ष वाली घटनाओं में 16 भाजपा के और एक तृणमूल कांग्रेस का कार्यकर्ता मारे गए। इसी प्रकार 158 घायलों में 136 भाजपा कार्यकर्ता थे और 16 तृणमूल कांग्रेस के थे। जबकि एक पुलिसकर्मी घायल हुआ और पांच आम नागरिक। हांलाकि एक तथ्य यह भी है कि, कई ऐसी घटनाएं भी घटीं जो थाने में दर्ज नहीं हुई, इसलिए उन्हें मीडिया में भी स्थान नहीं मिला। वैसे करीब एक माह के दौरान पश्चिम बंगाल जैसे राज्य में 150 घटनाएं रक्तरंजित राजनीति, सांप्रदायिक टकराव के रूप में सामने आती हैं और बौद्धिक दृष्टि से जागरूक माने जाने वाले पश्चिम बंगाल में मीडिया इन घटनाओं को वृहद् रूप में नहीं देखता या लिखता या उसका विश्लेषण नहीं करता तो सवाल मीडिया की भूमिका पर भी उठता है।

वास्तव में पश्चिम बंगाल की सत्ता संरक्षित और प्रायोजित हिंसा, लोकतंत्र के नाम पर सबसे बड़ा धब्बा बन चुका है। दरसअल, पश्चिम बंगाल में हिंसा और राजनीति एक-दूसरे के पूरक हैं। जब भी पश्चिम बंगाल में राजनीति की बात होती है तो पहले वहां की सियासी हिंसा की चर्चा होती है। देश के करीब-करीब हर राज्य में चुनाव के दौरान हिंसा की छिटपुट घटनाएं होती हैं यानी इन राज्यों में हिंसा चुनावी होती है। वहीं, पश्चिम बंगाल में हिंसा का नाता चुनाव से नहीं राजनीति से हो गया है।

पश्चिम बंगाल में दशकों से राजनैतिक हिंसा आम बात है। पश्चिम बंगाल में कहीं किसी पार्टी की रैली हो, बड़े नेता का दौरा हो, कोई विरोध प्रदर्शन हो तो हिंसा होना आम-सा हो गया है। कुछ समय पहले ही 24 परगना ज़िले में भाजपा कार्यालय पर कब्ज़े की सूचना पाकर वहां जा रहे पार्टी सांसद अर्जुन सिंह पर हमला कर दिया गया, जिसमें वह गंभीर रूप से घायल हो गए। भाजपा ने इसे लोकतंत्र की हत्या करार दिया। पश्चिम बंगाल में कोरोना लॉकडाउन काल में भी विभिन्न इलाकों में हिंसा की घटनाएं तेज हो रही हैं। कोलकाता से ही सटे दक्षिण 24 परगना ज़िले में वामपंथी संगठन एसयूसीआई और तृणमूल कांग्रेस के बीच हुई हिंसक झड़पों में दोनों दलों के एक-एक नेता की हत्या कर दी गई और दर्जनों घर जला दिए गए। मुर्शिदाबाद ज़िले में दो लोगों की मौत देसी बम बनाते समय विस्फोट की वजह से हुई।

भाजपा अध्यक्ष जे.पी. नड्डा ने कुछ दिन पहले कोलकाता में अपनी एक वर्चुअल रैली में कहा भी था कि राज्य में हिंसा और राजनीति का अपराधीकरण असहनीय स्तर तक पहुंच गया है। वैसे बात केवल राजनैतिक हिंसा का नहीं है बल्कि राज्य में जिस तरह से हिन्दुओं पर हमले की घटनाओं में वृद्धि हुई है उससे यह लगता है कि राज्य में हिन्दुओें के दमन और पलायन के लिए सुनियोजित ढंग से हिंसा से हो रही है या कार्रवाई की जा रही है। 24 परगना, मुर्शिदाबाद, बीरभूम, मालदा आदि ऐसे कई उदाहरण सामने हैं। हालात तब से ज़्यादा बिगड़ने लगे हैं जबकि बांग्लादेशी और रोहिंग्या शरणार्थी भी राज्य में डेरा जमाए हुए हैं। राज्य में हिन्दू आबादी का संतुलन बिगाड़ने की साजिश लगातार जारी है। मुस्लिमों ने हिन्दुओं की जनसंख्या को फ़साद और दंगे के माध्यम से पलायन के लिए मजबूर किया।

वैसे वामपंथी शासन की बात हो या ममता के राज की, पश्चिम बंगाल राजनैतिक हिंसा की घटनाओं के चलते सुर्खियों में ही रहा है। सत्ता बदली लेकिन राजनीति का चरित्र नहीं बदला। विकास की राह पर चलना था लेकिन उन्माद की ओर चल निकला। जैसे हिंसा को ही शासन और चुनाव जीतने का मूल मंत्र मान लिया गया हो। बीते लगभग पांच दशकों के दौरान इस राजनैतिक वर्चस्व की लड़ाई में हत्याओं और हिंसा को हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया गया है। इस दौरान सत्ता संभालने वाले चेहरे जरूर बदलते रहे, लेकिन उनका चाल-चरित्र, रत्ती भर भी नहीं बदला। दरअसल, साठ के दशक में उत्तर बंगाल के नक्सलबाड़ी से शुरू हुए नक्सल आंदोलन ने राजनैतिक हिंसा को एक नया आयाम दिया था। किसानों के शोषण के विरोध में नक्सलबाड़ी से उठने वाली आवाजों ने उस दौरान पूरी दुनिया में सुर्खियां बटोरी थीं। नक्सलियों ने जिस निर्ममता से राजनैतिक काडरों की हत्याएं कीं, सत्ता में रही संयुक्त मोर्चे की सरकार ने भी उनके दमन के लिए उतना ही हिंसक और बर्बर तरीका अपनाया। नंदीग्राम और सिंगुर की राजनैतिक हिंसा और हत्याओं ने सीपीएम के पतन का रास्ता साफ़ किया था।

 15 जुलाई, 2020 को पश्चिम बंगाल के नादिया ज़िले के कृष्णानगर में भाजपा युवा मोर्चा के 38 वर्षीय कार्यकर्ता बापी घोष की हत्या कर दी गई। बापी घोष के सिर पर बांस और रॉड से हमला किया। इस हमले में बापी घोष बुरी तरह से घायल हो गए। उन्हें तुरंत कृष्णानगर ज़िला अस्पताल में ले जाया गया लेकिन उनकी बिगड़ती देख डॉक्टर ने कोलकाता स्थित एनआरएस अस्पताल रेफर कर दिया। जहां इलाज के दौरान बापी घोष की मौत हो गई। बापी घोष के पिता निमाई घोष ने कहा कि मेरा बेटा कुछ दिन पहले ही भाजपा में शामिल हुआ था इसीलिए तृणमूल कांग्रेस के लोगों ने उसे मार डाला।

13 जुलाई, 2020 सीपीएम छोड़ भाजपा में आए उत्तर दिनाजपुर की सुरक्षित सीट हेमताबाद के विधायक देवेंद्र नाथ रे की हत्या कर दी गई। उनका शव एक दुकान के बाहर फंदे पर लटका मिला। स्थानीय लोगों का कहना है कि उन्हें पहले मारा गया और फिर लटका दिया गया। प्रशासनिक स्तर पर इस मामले को आत्महत्या बताए जाने के खिलाफ देवेंद्र नाथ रे की पत्नी ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। हत्या का आरोप तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं पर लग रहा है।

7 अप्रैल, 2020 पश्चिम बंगाल के कुलताली इलाके के कनकासा गांव में शकुंतला हलदर और उनके पति चंद्र हलदर की हत्या कर दी गई। चंद्र हलदर का शव उनके घर के बाहर पेड़ से लटका मिला, जबकि शकुंतला का शव घर के भीतर था। हत्या करने वालों ने घर में घुसकर मृतक दंपति के बच्चों को भी धमकाया। मृतक दंपति का कसूर इतना था कि उन्होंने देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आह्वान पर 5 अप्रैल को रात 9 बजे घर की लाइट बुझाकर दीया जलाया था। रिश्तेदारों का आरोप है इस बात से तृणमूल कांग्रेस के स्थानीय नेता नाराज़ हो गए क्योंकि उन्होंने प्रधानमंत्री का आग्रह नहीं मानने का फ़रमान जारी किया था। इसी का बदला लेने के लिए दंपति की हत्या कर दी गई।

7 मार्च, 2020 पश्चिम बंगाल के गंगासागर में भाजपा कार्यकर्ता देवाशीष मंडल की हत्या कर दी गई। देवाशीष मंडल भाजपा के बूथ अध्यक्ष थे और इलाके में पार्टी को मजबूत करने में लगे हुए थे। बताया जा रहा है कि स्थानीय तृणमूल कांग्रेस नेताओं को उनकी यह सक्रियता अच्छी नहीं लगती थी और इसी रंजिश में देवाशीष मंडल की निर्ममता से हत्या कर दी गई।

6 फरवरी, 2020 पश्चिम बंगाल में 24 परगना के सोनारपुर में भाजपा नेता नारायण बिस्वास की निर्मम हत्या कर दी गई। बाइक सवार हमलावरों ने पहले नारायण बिस्वास को गोली मारी और जब वो जख्मी होकर गिर गए तो चाकू मारकर उनकी हत्या कर दी गई। इस घटना से वहां अफ़रा-तफ़री मच गई। गोली की आवाज़ सुनकर आसपास के लोगों ने उन्हें अस्पताल पहुंचाया, जहां डॉक्टर ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। नारायण बिस्वास, भारतीय जनता व्यापार संघ के सोनारपुर दक्षिण विधानसभा संख्या 4 के अध्यक्ष थे। हत्या का आरोप तृणमूल कांग्रेस पर लगा।

नेशनल क्राइम रेकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2009 में राज्य में 50 राजनैतिक हत्याएं हुई थीं और उसके बाद अगले दो वर्षों में 38-39 लोग मारे गए। यह वाममोर्चा सरकार के उतार और तेज़ी से उभरती तृणमूल कांग्रेस के सत्ता की ओर बढ़ने का दौर था। वर्ष 2007, 2010, 2011 और 2013 में राजनैतिक हत्याओं के मामले में बंगाल पूरे देश में पहले नंबर पर रहा। वर्ष 2011 में ममता बनर्जी की अगुवाई में तृणमूल कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद भी राजनैतिक हिंसा का दौर जारी रहा। दरअसल, लेफ्ट के तमाम काडरों ने धीरे-धीरे तृणमूल का दामन थाम लिया था, यानि दल तो बदले लेकिन चेहरे नहीं अब धीरे-धीरे भाजपा के उभारने के बाद एक बार फिर नए सिरे से राजनैतिक हिंसा का दौर शुरू हुआ है। ममता बैनर्जी के कार्यकाल में राजनैतिक हिंसा की तस्वीर बदलती नजर नहीं आई। ऐसे में लोगों की उम्मीद अब किसी तीसरे विकल्प पर है, यह विकल्प 2021 के विधानसभा चुनावों में तय होगा। बंगाल में राजनैतिक झड़पों में बढ़ोतरी के पीछे मुख्य तौर पर तीन वजहें मानी जा रही हैं – बेरोज़गारी, विधि-शासन पर सत्ताधारी दल का वर्चस्व और भाजपा का उभार।
पश्चिम बंगाल में राजनीकि हिंसा का निष्कर्ष यही है कि राजनैतिक दलों ने वहां समाज का चरित्र ही हिंसा का बना दिया है। सामान्य आदमी भी यदि हाथों में बांस, लाठी, कटार, खंभे लेकर विरोधियों को मारने दौड़ रहा है तो इसका अर्थ और क्या हो सकता है? अगर समाज का चरित्र राजनैतिक हिंसा का बना दिया जाए तो उसे समाप्त कर पाना कठिन होता है। कुल मिलाकर पश्चिम बंगाल केवल राजनैतिक दृष्टि से ही नहीं बल्कि लोकतान्त्रिक मूल्यों की दृष्टि से भी भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी चुनौती बनकर खड़ा हो गया है। यह चुनौती पहले भी रही है पर अब इसमें आक्रामकता ज्यादा बढ़ी है और पात्र बदल गए हैं।

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