नई सरकार और फिल्म जगत की समस्याएं

कुछ फिल्मी कलाकार भारी मतों से जीतते हैं, तो कुछ हार जाते हैं। भारतीय लोकतंत्र को अब इसकी आदत हो गई है। जनता के प्रेम से जीते फिल्मी कलाकारों का हार्दिक अभिनंदन; और जो नहीं जीत सके वे अपने क्षेत्र के मतदाताओं के सतत संपर्क में रहकर अगले लोकसभा चुनावों की तैयारी करें।

जो अभिनेता जीतकर सांसद बने हैं वे अपने क्षेत्र के विकास के साथ ही फिल्म जगत की समस्याएं भी सुलझाएं ऐसी अपेक्षा है। नरेंद्र मोदी के मंत्रिमंडल से भी फिल्म जगत की कुछ अपेक्षाएं हैं। यह स्वाभाविक भी है।

राजनैतिक प्रणाली और फिल्म जगत की समस्याओं पर फोकस करें तो कुछ बातें स्पष्ट होती हैं। मुख्यत: दक्षिण भारत के राज्यों जैसे कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु आदि राज्यों की राजनीति में फिल्मी लोगों का प्रत्यक्ष सहभाग है। कुछ लोगों ने तो मुख्यमंत्री पद तक प्रगति की है। कुछ कलाकारों का राजनीति में स्वयं का वोट बैंक है। ऐसे कलाकार राजनीतिज्ञों को फिल्म जगत की समस्याओं की जानकारी है। उन समस्याओं का समय पर और व्यवस्थित समाधान भी होता है। विशेषत: प्रदर्शित होने वाली नई फिल्मों की पायरेसी से संबंधित वहां क़डे नियम हैं। तमिलनाडु में तो इस नियम पर पूर्ण रूप से अमल किया जाता है। हिंदी फिल्म जगत की कई समस्याओं की ओर सांसद कलाकारों द्वारा आवश्यक ध्यान नहीं दिया जाता। सत्तर के दशक में जब नर्गिस राज्यसभाकी सांसद थीं तो उनके एक वाक्य से खलबली मच गई थी। राज्यसभा में एक चर्चा में सहभागी होते समय उन्होंने कहा था कि सत्यजीत रे की कलात्मक कही जाने वाली फिल्मों से वास्तव में दुनिया के सामने हिंदुस्तान की गरीबी, दरिद्रता का ही प्रदर्शन होता है।

सन 1984 के लोकसभा चुनावों में इलाहाबाद से अमिताभ बच्चन, उत्तर-मध्य मुंबई से सुनील दत्त और चेन्नई से वैजयंती माला इंदिरा कांग्रेस के सांसद के रूप में चुने गए। सन 1986 में महाराष्ट्र में फिल्मी उद्योग ने एक महीने तक बंद रखा था। ये तीनों सांसद उस समय उनकी समस्याओं का समाधान नहीं कर पाए थे। वीडियो की चोरी और राज्यों में ब़ढते मनोरंजन कर को रोकने के उद्देश्य से यह बंद रखा गया था। इसके साथ ही और भी कई प्रश्न और समस्याएं थीं।

इसके बाद राज बब्बर से गोविंदा तक और जयाप्रदा से हेमा मालिनी तक कई कलाकार सांसद बने। कोई लोकसभा चुनावों में विजयी रहा तो किसी को अलग-अलग पार्टियों द्वारा राज्यसभा में मनोनीत किया गया। परंतु इस सारे प्रवास में या इतिहास में फिल्म जगत की कितनी समस्याएं सुलझाई गईं? या फिर ये सांसद सोचते हैं कि हमें सामान्य जनता ने चुना है अत: हमें उनकी समस्याएं, प्रश्न, तकलीफों की ओर अधिक ध्यान देना चाहिए? क्या उनकी सोच है कि वे फिल्म जगत के नेता नहीं हैं तो वे उस ओर क्यों ध्यान देंगे?

नरेंद्र मोदी की सरकार की ओर से फिल्म जगत को कुछ समस्याएं सुलझाए जाने की उम्मीदें अवश्य हैं। उसके लिए ये ‘कलाकार सांसद‘ कितना प्रयत्न करेंगे, इस मुद्दे को कुछ देर के लिए अलग कर देते हैं। परंतु फिल्म जगत की समस्याएं सुलझाने को अगर प्राथमिकता और महत्व दिया गया तो नई सरकार की लोकप्रियता जरूर बढ़ जाएगी। नई फिल्मों की वीडियो चोरी रोकना सबसे ज्यादा जरूरी है। सन 1982 से अर्थात जब देश में एशियाड का आगमन हुआ, तब से विडियो का चलन शुरू हुआ। यह समस्या भी तभी से शुरू हुई। समय के साथ यह समस्या सुलझने के स्थान पर और भी अधिक जटिल होती गई। अब तो उसमें आपराधिक प्रवृत्तियों का भी अगमन हो गया है। जैसे ही किसी नई फिल्म का शुक्रवार को ‘फर्स्ट डे फर्स्ट शो’ खत्म होता है उसकी डुप्लिकेट वीडियो सीडी बाजार में आ जाती है। अगर इसे रोका गया तो प्रत्येक राज्य की तिजोरी में कुछ करोे़ड रुपयों का मनोरंजन कर जमा होता और इसे पुन: फिल्म इंडस्ट्री के भले के लिए उपयोग किया जाएगा। इसके साथ ही हर राज्य में मनोरंजन कर एक जैसा हो इसके लिए भी केंद्र सरकार को समय रहते योग्य प्रयत्न करने चाहिए। यह कर अलग-अलग होने के कारण कुछ राज्यों को अर्थिक नुकसान भी होता है।

मल्टीप्लेक्स संस्कृति के कारण सामान्य एक परदे वाले थियेटर का अस्तित्व और प्रगति को खतरा दिखाई देने लगा है। इस दशक में परदा थियेटर की संख्या बारह हजार से घटकर लगभग आधी रह गई है। प्रत्येक राज्य शासन के इस बारे में कुछ नियम हैं। कुछ राज्य सरकारों के इससे संबंधित नियम बहुत क्लिष्ट हैं। नई केंद्र सरकार ऐसे थियेटर को बचाने का प्रयत्न करे, क्योंकि ऐसे थियेटर पुरानी फिल्मों का इतिहास हैं। साथ ही ये मध्यम वर्गीय लोगों की स्वप्नपूर्ति करने वाले सिनेमाघर हैं। बढ़ती महंगाई और मल्टीप्लेक्स के महंगे टिकटों के कारण मध्यम वर्गीयों के लिए एक परदा पारंपरिक थियेटर मनोरंजन का ब़डा साधन है। उनको बचाना केंद्र सरकार के वश में है। केंद्र सरकार प्रत्येक राज्य सरकार से उनके राज्य के एक परदा थियेटर की स्थिति और उन पर लगने वाले करों की जानकारी ले। इस कदम से केंद्र यह ‘प्रतिमा’ बनेगी कि नई केंद्र सरकार मध्यम और कनिष्ठ वर्ग के हितों का रक्षण करने वाली है। इसके अलावा विभिन्न कर और अनुमतियों की ओर भी केंद्र सरकार का ध्यान होना आवश्यक है। हिंदी फिल्म जगत का सबसे ब़डा दुर्भाग्य यह है कि कुछ फिल्मों की करो़डों रुपयों की कमाई, ग्लैमर और गॉसिप की जगमगाहट, पेज थ्री पार्टियों का मसालेदार वर्णन इत्यादि के कारण इस माध्यम और व्यवसाय को कोई परेशानी है, ऐसा लगता ही नहीं है। परंतु फिल्म निर्माण की प्रक्रिया में अलग-अलग स्तरों पर विविध समस्याएं होती हैं उनमें से कुछ का ताल्लुक सरकार से होता है। कलाकार सांसद इस बारे में अधिक जानकारी दे सकते हैं उन्हें नई सरकार को इन समस्याओं से अवगत कराना चाहिए।

सारी समस्याओं के बावजूद भी यही कहना प़डेगा कि ‘पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त।’

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