इस भारत को जीतना ही होगा

जैसे मरुथल में अचानक मलय की बयार बहे, वैसे संसद में नरेंद्र मोदी का भाषण हुआ। कांग्रेस के कई नेता मुझसे मिले और बोले कि जो मोदी ने कहा वे शब्द सुनने के लिए उनके कान तरस गए थे। वे सांसद भी जो विचारधारा से भाजपा के विरोधी हैं, यह कहते सुने गए कि पहली बार देश के किसी प्रधानमंत्री के मुंह से भारत माता का इतना भावनापूर्ण, रोमांचक और हृदयस्पर्शी उल्लेख सुना। पहली बार किसी प्रधानमंत्री ने राज्यों को सहयोगी, बराबर का साथी और राष्ट्र के विकास में महत्त्वपूर्ण भागीदार बताया और प्रधानमंत्री के साथ मुख्यमंत्रियों की भारत टोली यानी टीम इंडिया का ऐलान किया। पहली बार किसी प्रधानमंत्री ने भारत माता की पूर्वी और पश्चिमी भुजाओं में अंतर तथा शक्ति और कमजोरी की बात करते हुए राष्ट्रीय एकता को व्याख्यायित किया। पहली बार किसी प्रधानमंत्री ने अपने सबसे कट्टर विरोधी विपक्षी दलों के प्रति आदर और सम्मान के शब्दों का इस्तेमाल करते हुए कहा कि जब तक आपका साथ नहीं मिलता तब तक देश भर से मिले व्यापक समर्थन को भी मैं अधूरा मानूंगा और देश के विकास के लिए मैं आपके मार्गदर्शन में भी काम करने को तैयार हूं। पहली बार किसी प्रधानमंत्री ने अपनी नएपन को विनम्रता से बताते हुए प्रार्थना की अगर उनसे कोई गलती हो जाए तो नया जानकर क्षमा करेंगे।

एक अद्भुत रोमांच और भावनाओं के अतिरेक में हम सब सांसद बह से गए जब हमारे समक्ष सदन में नरेंद्र भाई मोदी प्रधानमंत्री के नाते पहली बार अपना भाषण दे रहे थे, ऐसा लगा कोई राजनेता नहीं, बल्कि देश इस संसद में बोल रहा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक अपने साथी स्वयंसेवक के इस रूप से विशेष रोमांच और स्वप्नवत आनंद अनुभव कर रहे थे। मैं नागपुर में हूं जहां रा. स्व. संघ के वार्षिक प्रशिक्षण के तृतीय वर्ष का वर्ग पूर्ण हो रहा है। इस समारोह के मुख्य अतिथि श्री श्री रविशंकर जी हैं। हर दिन हम स्वयंसेवक सदा वत्सला भारत माता का स्मरण करते हुए प्रार्थना करते हैं। वह भारत माता दीन, दु:खी, गरीब, बेघर, बेसहारा, किसान, मजदूर की पी़डा से कितना दु:खी होती है, इसका एहसास ही अजीब अंधेरेपन में धकेल देता है। जब नरेंद्र मोदी संसद में भारत के गरीबों की पी़डा व्यक्त करते हुए, भारत माता की दोनों भुजाओं यानी पूर्वी भाग को पश्चिम की तरह मजबूत और समृद्ध बनाने की बात कर रहे थे, तो ऐसा लगा कि भारत माता स्वयं संसद में आ गई हैं। वह वेदना और संकल्प राजनेता के छलावे भरे वायदे नहीं बल्कि हृदय से निकले संकल्प और आंखों से नि:सृत प्रतिबद्धता थी।

सब देशों से मित्रता करेंगे, अपनी सेना और सैनिकों की शक्ति ब़ढाएंगे, दुनिया के हर देश के साथ बराबरी और कंधे से कंधा मिलाकर, आंख से आंख मिलाकर व्यवहार करेंगे। जितनी अमरीका और युरोप की पूरी जनसंख्या है, उससे कहीं अधिक हमारे यहां केवल मतदाता हैं। इतनी महान जनता के होते हुए भारत दुनिया में भला किससे और क्यों दबकर रहे?
एक वाक्य में भी नरेंद्र मोदी जी ने अपने विपक्षी कांग्रेसियों को उनकी पराजय पर ताना मारते हुए यह नहीं कहा कि शर्म करो तुम क्यों हारे। उन्होंने तो कहा कि आपने काम किए उसी का नतीजा है कि देश इस मुकाम पर पहुंचा है। आपने बहुत काम किए हैं, फर्क सिर्फ इतना है कि और अधिक काम हो सकते थे, ज्यादा उपलब्धियां हासिल की जा सकती थीं, जो नहीं हुईं। हम अब मिलकर आगे का रास्ता तय करेंगे। अब कोई विजेता और कोई परास्त नहीं, बल्कि हम सब इकठ्ठा होकर देश की सेवा करेंगे। राजनीति के लिए चुनाव से पहले का एक वर्ष पर्याप्त होता है। आइए ये चार वर्ष तो राजनीति से परे होते हुए इकठ्ठा, एकजुट होकर देश के लिए काम करें और इस काम में कोई विभाजक रेखा नहीं। मैं आपके मार्गदर्शन में भी काम करने को तैयार हूं।

यह स्वर प्रधानमंत्री का नहीं भारत माता के मन का स्वर था।
युवाओं को कौशल सीखना चाहिए। पूरी दुनिया में देश घोटालों के देश के नाते बदनाम हुआ। हम मिलकर इस देश को निपुणताओं का देश बनाएं।

मोदी के देश की एकता के अद्भुत प्रयोग बताए। उत्तर पूर्वांचल में विद्रोह और आतंकवाद है यह सब जानते हैं। वहां के युवक-युवतियां शेष देश में अनेक प्रकार की भेदभाव और प्रतिकूल व्यवहार का भी निशाना बनते हैं। नरेंद्र मोदी ने कहा देश में तीस हजार शिक्षा संस्थान हैं। हर संस्थान से बच्चे, विद्यार्थी थोडी बहुत संख्या में उत्तर पूर्वांचल के राज्यों में भ्रमण और पर्यटन के लिए जाएं तो कैसा दृश्य बनेगा कि देश के विभिन्न राज्यों के छात्र उत्तर पूर्वांचल को समझेंगे और उत्तर पूर्वांचल के नागरिकों का शेष देश के विभिन्न अंचलों के लोगों और सांस्कृतिक रश्मियों से परिचय कराएंगे। उन्होंने कहां कि पिछले अनेक वर्षों के केंद्र सरकार से आग्रह करता आ रहा हूं कि वह उत्तर पूर्वांचल सभी राज्यों से पुलिस कर्मी गुजरात भेजे। दो साल-चार साल तक वह गुजरात में रहे। वहां के लोगों के साथ उनकी मित्रता होगी, और सांस्कृतिक आदान-प्रदान होगा। फिर चार साल बाद वे वापस जाएं और फिर नए समूह भेजे जाएं। राष्ट्रीय एकता मिलने-जुलने और परिचय करने तथा एक दूसरे को समझने से ब़ढती है।

नरेंद्र मोदी ने कहा कि वे एकरूपता के पक्षधर नहीं। भारत के विविधता में एकता का देश है, एकरूपता का नहीं। यह वह देश है जहां दक्षिण से हम इडली खाते-खाते उत्तर में पराठों तक आ जाते हैं। इस महान देश की परंपरा का सम्मान होना चाहिए। इस देश को आगे ब़ढने से कोई रोक नहीं सकता।

सत्ता में मनुष्य ही है। लेकिन पिछली वर्षों के अंधकार में कालखंड में सामान्य जनता के मन बैठे भरोसे को कितना तो़ड दिया अब बहुत भरोसे की बात पर भी भरोसा कठिन होता है। सब यही प्रार्थना करते हैं कि जितने अच्छे ढंग से कामकाज शुरू हुआ वे ब़ढता जाए और सफल हो। रेल स्टेशन पर बैठे कुली से लेकर तपती दोपहरी में 49 डिग्री का ताप सरपर झेलते हुए काम करने वाले किसान, मजदूर और सुरक्षाकर्मी एक महान भारत का सपना आंखो में संजोए दिल्ली की ओर आशा से देख रहे हैं। इस आशा का साकार होना अब पार्टी और विचारधारा से परे भारत की जय-पराजय का विषय बन गया है। भारत को जीतना ही होगा।

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