अध्यात्म एवं विज्ञान की प्रगति में ही मानवहित

यह समझ सभी में निर्माण होने की आवश्यकता है कि अध्यात्म को अपंग एवं विज्ञान को अंधा बनाने से मनुष्य का कोई भी हित साध्य नहीं होगा। विज्ञानवादी अध्यात्म को चुनौती देकर अध्यात्म की अवहेलना न करें और अध्यात्मवादियों की ओर से वैज्ञानिक मूल्यों को पैरों तले न रौंदा जाए।

मानवी जीवन के क्रमिक विकास की ओर यदि हम ध्यान दें तो हमें यह ज्ञात होगा कि अध्यात्म की प्रगति के साथ-साथ विज्ञान की प्रगति का आलेख भी उतना ही महत्वपूर्ण है। प्राचीन काल में मानवी जीवन में विज्ञान कोई अलग शास्त्र नहीं वरन अध्यात्म का ही एक भाग था। हमारे दैनंदिन जीवन में सुख समृद्धि के लिए, युद्ध में विजय के लिए, अलग-अलग देवताओं से प्रार्थना की जाती थी। अधिकतर लोगों का मानना था और आज भी है कि मानव का संपूर्ण जीवन परमात्मा के कृपाप्रसाद पर निर्भर है।

अखिल मानव जाति का विज्ञान पूरी दुनिया में केवल अध्यात्म की छत्रछाया के नीचे प्रसारित हो रहा था। फिर भी भारत में यह दिखाने वाले साक्ष्य हमें मिलते हैं कि प्राचीन भारत में भी विज्ञान का अपना अलग अस्तित्व था। आज के प्रगतिशील कहलाने वाले युग में यह टिप्पणी की जाती है कि भारतीय जीवन दृष्टि पहले विज्ञान से विमुख थी। हालांकि यह पूर्ण सत्य नहीं है, इसके मुख्य उदाहरण हैं चौथी शताब्दी के आर्यभट्ट एवं भास्कराचार्य। उनके गणित एवं खगोलशास्त्र के अनुसंधान धर्मशास्त्रीय संकल्पनाओं के विरोधी थे। पहले यह समझा जाता था कि पृथ्वी समतल है और सूर्य उसके चारों ओर चक्कर लगाता है। परंतु आर्यभट्ट ने इसवीं सन की चौथी सदी में यह खोज की कि पृथ्वी गोल है और वह पश्चिम से पूर्व की ओर घूमती है, जिससे दिन और रात होते हैं। भास्कराचार्य ने यह खोज की कि पृथ्वी गोल है। पृथ्वी की दो गतियां हैं। पृथ्वी अपनी कक्षा में भ्रमण करती है एवं कक्षा के बाहर भी भ्रमण करती है। पृथ्वी के चारों और साठ मील तक वातावरण है। पृथ्वी में गुरुत्वाकर्षण की शक्ति है। पृथ्वी के चारों ओर आकर्षण शक्ति है। भास्कराचार्य ने यह भी कहा था कि चंद्रमा स्वयं प्रकाशित नहीं है। राहु-केतु का कोई अस्तित्व नहीं है। ग्रहण राहु-केतु के कारण नहीं होते हैं। वरन वे चंद्र और पृथ्वी की छाया का परिणाम हैं। उस समय किसी भी प्रकार के उपकरण न होते हुए भी भास्कराचार्य ने कितनी विलक्षण खोजें की थीं। वास्तव में भास्कराचार्य परमोच्च स्तर के वैज्ञानिक थे। उस काल में इन वैज्ञानिकों के द्वारा उठाए गए प्रश्नों की भारत में ही कदर नहीं की गई।
हालांकि विदेशों में धर्म के विरुद्ध कुछ कहने के कारण वैज्ञानिकों पर जिस प्रकार भयंकर अत्याचार किए गए उस प्रकार भारत में कुछ नहीं हुआ, क्योंकि भारतीय धर्म परंपरा दूसरे के मतों को भी सहिष्णुता के साथ सुनने की रही है। धर्म के ठेकेदार अपने विज्ञान विरोधी मतों को अपने अनुसार ठेलने का प्रयत्न कर रहे थे। भारतीय समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग अशिक्षित होने के कारण वैज्ञानिक मत उन तक पहुंच नहीं पाते थे। भारत के धार्मिक नेताओं ने भास्कराचार्य के गणित के सिद्धांत मान्य किए थे। क्योंकि भास्कराचार्य द्वारा रखे गए गणित विषयक सिद्धांत शंकाओं से परे थे। विज्ञान के विषय में अज्ञान के कारण उसके बारे में भारतीयों की प्रतिक्रिया अभी-अभी तक तीव्र विरोधी थी। विरोध की यह भावना अब पूर्णत: भले ही समाप्त न हुई है परंतु धीरे-धीरे कम हो रही है। विज्ञान को उचित मान्यता देते हुए विज्ञान और अध्यात्म का सामंजस्य बिठाने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। विशेषत: यूरोप में भयंकर संघर्षों से सामना करने के बाद विज्ञान की प्रगति हुए हुई है। ऐसा भयंकर संघर्ष भारत में नहीं हुआ।

अति प्राचीन काल से यदि अध्यात्म एवं विज्ञान की प्रगति का लेखा-जोखा देखा जाए तो यह नजर आता है कि पहले अध्यात्म एवं विज्ञान एक दूसरे का हाथ पकड़कर चलते थे। कुछ काल बाद अध्यात्म में कपोल कल्पनाएं, भ्रामक कल्पनाएं, जादू टोना इत्यादि की पैठ होने लगी। उस समय विज्ञान अध्यात्म से थोड़ा अलग होने लगा, परंतु फिर भी विज्ञान था तो अध्यात्म के आलोक में ही। दोनों की प्रगति की समानांतर ही थी। परंतू 18 वीं एवं 19वीं सदी में पश्चिमी देशों में अध्यात्म और विज्ञान दोनों एक दूसरे को मात देने लगे। दोनों एक दूसरे के विरोध में खड़े हो गए हुए। अब 20 वीं एवं 21वीं सदी में वे पुन: एक दूसरे के पास आ रहे हैं। अभी भी वे अधिकतर समांतर ही है। 18वीं एवं 19वीं सदी में अध्यात्मवादी लोग विज्ञान के साथ कितना अतार्किक एवं हटवादी व्यवहार करते थे, इसके कई उदाहरण हमारे सामने हैं।

अमेरिका के बेंजामिन फ्रैंकलिन ने विद्युत प्रतिबंधक, विद्युत प्रवाहक की खोज की। इसके कारण आकाशीय बिजली इमारत पर न गिरकर सीधे धरती में समा जाती है और इमारत बच जाती है। इस पर सनातनी लोगों का कहना था कि पापी लोगों को सजा देने के लिए ईश्वर आकाशीय बिजली पृथ्वी पर भेजता है, इससे मनुष्य या इमारतों की रक्षा करना ईश्वर की इच्छा के विरुद्ध व्यवहार करने जैसा है। डॉ. वॅसालीअस मृत शरीर का विच्छेदन करते थे। स्पेनिश उमराव के शव विच्छेदन के बाद उस पर खून करने का आरोप लगाया गया। पुराने जमाने में ‘माता’ आना एक जानलेवा बीमारी थी। ऐसी बीमारी पर जब टीके की खोज की तब सनातनी लोगों और कैंब्रिज सरीखे विश्वविद्यालय ने भी यह कहकर टीका लगाने का विरोध किया था कि ‘माता’ ईश्वरीय आदेश से आती है और उसके विरोध में टीका लगवाना पाप है। शरीर को बेहोश करने वाली दवा अर्थात क्लोरोफॉर्म की खोज होने के बाद भी सनातनी लोगों ने प्रसूति के समय स्त्रियों को क्लोरोफॉर्म देकर उनकी वेदनायें कम करने का विरोध किया। उनका कहना था कि एक पुरानी धार्मिक मान्यता के अनुसार स्त्री को श्राप मिला है कि ‘संतति को जन्म देते समय का दु:ख वह आजन्म भोगेगी।’ ईश्वर का यह श्राप पूर्ण होना ही चाहिए और प्रसूति के समय महिलाओं को दु:ख भोगना ही चाहिए। यह विरोध 19वीं सदी के दूसरे दशक तक जारी रहा। विज्ञान के विविध आविष्कारों के विरोध में सनातनी लोगों की एक तरफा भूमिका हमें कई स्थानों पर दिखाई देती है। इससे सिद्ध होता है कि अध्यात्म को विज्ञान का विरोधी बनाने वाला विश्व का सनातनी वर्ग ही अध्यात्म का वास्तविक शत्रु है। परिवार नियोजन को भी ईश्वरी इच्छा के विरुद्ध मानने वाला समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग आज भी भूतल पर विराजमान है।

एक इसाई युवक को पुन: हिंदू बनाने के कारण बालशास्त्री जांभेकर को सनातनी लोगों ने प्रायश्चित करने की सजा दी थी। लोकमान्य तिलक को एक ईसाई मिशनरी के यहां चाय पीने एवं विदेश जाने के कारण प्रायश्चित करना पड़ा था। महात्मा गांधी, स्वामी विवेकानंद को भी विदेश जाने के कारण भारतीय समाज की टीका-टिप्पणी सहनी पड़ी थी। वैसे देखा जाए तो विज्ञान अभी-अभी तक भारतीयों के मन का एक अप्रिय भाग रहा, परंतु इस अप्रियता की पार्श्वभूमी विनाश नहीं थी।
टीका लगाना, प्रसूति के समय महिलाओं को क्लोरोफॉर्म देना, शव विच्छेदन करना इत्यादि वैज्ञानिक सुधारों का धार्मिक कारणों से भारत में कोई विरोध नहीं हुआ। भारत के आध्यात्मिक विचारों की रचना पश्चिमी देशों के आध्यात्मिक विचारों की रचना से थोड़ी अलग है। स्वामी विवेकानंद, महात्मा गांधी, योगी अरविंद जैसे अनेक विचारशील लोगों ने इस दृष्टि से भारतीयों का मार्गदर्शन किया है। इस मार्गदर्शन के कारण विदेशों की तरह भारत में सनातनियों की ओर से विज्ञान का अधिक विरोध नजर नहीं आता। भारत के सुधि लोगों को भी धीरे-धीरे यह समझ में आने लगा था कि अध्यात्म का विज्ञान से समन्वय यह समय की वास्तविक आवश्यकता है, क्योंकि मानसिक क्षेत्र में विज्ञान कमजोर है और भौतिक क्षेत्र में अध्यात्म कमजोर है। परंतु इन दोनों के समन्वय से मानव का सर्वांगीण विकास संभव है। श्रद्धा अंधी नहीं होना चाहिए और बुद्धि पाखंडी नहीं होना चाहिए। श्रद्धा खुली आंख वाली और बुद्धि विवेकपूर्ण होनी चाहिए। भारतीय तत्वज्ञान को तत्कालीन विचारकों के द्वारा इस भूमिका से समाज के समक्ष रखा गया। मानव को यदि प्रगति करना है तो विज्ञान एवं अध्यात्म का संतुलन अपने आचरण से अपने जीवन में करना होगा। यह इन विचारकों की सीख एवं तत्वज्ञान का सार था। तत्कालीन विचारकों के ये सूत्र और सार समाज में होने के कारण भारत में विज्ञान के प्रयोगों का बड़े पैमाने पर विरोध नहीं हुआ।

अध्यात्म एवं विज्ञान के बीच का संघर्ष काल अब समाप्त हो गया है। अब उनमें एक दूसरे को सहायता एवं सहयोग करने की प्रवृत्ति दिखाई पड़ती है। एक तरह से अध्यात्म एवं विज्ञान के बीच यह संयोग अपरिहार्य है, क्योंकि दोनों का उद्देश्य एक ही है। दोनों ही परमात्मा की खोज में हैं। अध्यात्म मानसशास्त्र के जरिए विश्व की अर्थात ईश्वर की खोज कर रहा है। वहीं विज्ञान अज्ञात की खोज शास्त्रीय उपकरणों की सहायता से कर रहा है। अध्यात्म में मन का आधार लिया जाता है तो विज्ञान में तकनीक का सहारा लिया जाता है। विज्ञान की सहायता से दृश्य सृष्टि की हलचलों का पता लगता है और उस पर स्वामित्व स्थापित कर मनुष्य जीवन को सुखी एवं समृद्ध बनाया जा सकता है। अध्यात्म की सहायता से मन की खोज की जा सकती है। मन के आगे भी जो एक परमानंद देने वाला विश्व है, उसकी भी खोज की जा सकती है। मनुष्य के सुखी एवं समृद्ध जीवन के लिए अध्यात्म और विज्ञान दोनों ही महत्वपूर्ण हैं। इन दोनों विषयों की ओर मानव को समान रूप से ध्यान देना चाहिए। यदि ऐसा होता है तो मानव को मानसिक एवं भौतिक शांति मिल सकती है। इसके लिए विज्ञान और अध्यात्म के जो शास्त्र-नियम हैं, उन्हें मानव को अपने आचरण में लाना पड़ेगा तथा उनके विकास के लिए निष्ठापूर्वक सतत प्रयत्न करने होंगे। यही सही अर्थों में मानव के विकास की कुंजी होगी।

जितना गूढ़ अध्यात्म है, उतना ही गूढ़ विज्ञान भी है। परंतु फिर भी अध्यात्मवादी विज्ञान को कम आंकते हैं और विज्ञानवादी अध्यात्म की ओर तुच्छता से देखते हैं। एक तरफ बुद्धि के बल पर मानव द्वारा की गई विराट प्रगति का चित्र हमें दिखाई देता है तो दूसरी ओर हमारा भारतीय समाज अब भी अध्यात्म के नाम पर दिनोंदिन अंधश्रद्धा, बाबागिरी में फंसता हुआ दिखाई देता है। उधर विज्ञान के माध्यम से प्रगति की हद पार करने के लिए ऐसे-ऐसे प्रयोग किए जा रहे हैं, जिनमें यह भी नहीं देखा जा रहा है कि इससे भविष्य में पर्यावरण और मानव जीवन कितना उध्वस्त होने जा रहा है। समाज की मानसिकता दर्शाने वाले इन परस्पर विरोधी चित्रों के कारण ऐसा लगता है कि अध्यात्म और विज्ञान के परस्पर सहयोगी संबंधों के विषय में समाज को आज पुनः नए से समझाने की आवश्यकता है।

अध्यात्म के विषय में जब बुद्धिवादी दृष्टिकोण से विचार करने का समय आता है तब तथाकथित विज्ञानवादी उस पर तटस्थता से विचार करने की बजाय ‘अध्यात्म वगैरह सब झूठ है, बकवास है’, इस प्रकार के पूर्वाग्रह से ग्रसित रहता है। इसके कारण वह कुछ भी सुनने को तैयार नहीं रहता। विज्ञान अपने चारों ओर उपलब्ध परंतु मर्यादित ज्ञान की खोज करता रहता है। इसके कारण विज्ञानवादियों की यह अतिशयोक्ति अध्यात्म के विरोध में है, ऐसा कहा जा सकता है। संकुचित वृत्ति के कारण विज्ञानवादी स्वयं अपने ज्ञान संपादन करने के विभिन्न रास्ते बंद कर लेता है। अध्यात्म वास्तव में क्या है, यह जाने बिना तथा किसी भी पद्धति का अभ्यास किए बिना केवल ‘मैं विज्ञानवादी हूं और इसलिए अध्यात्म का विरोध करना मेरा कर्तव्य है’ अत: ’विरोध के लिए विरोध’ इस भूमिका का निर्वाह विज्ञानवादी करता रहता है। जहां से मिले वहां से ज्ञान प्राप्त कर आत्मोन्नति करना ही मानव का कर्तव्य होना चाहिए। वह मार्ग विज्ञान का है या अध्यात्म का यह महत्वपूर्ण नहीं है अपितु ज्ञान एवं ध्येय महत्वपूर्ण है। इस ओर ध्यान देना ज्यादा महत्वपूर्ण है कि कहीं गलत दिशाओं में जाने वाले अध्यात्म या विज्ञान से मानव हित नजरअंदाज तो नहीं हो रहे?

आध्यात्मिक बातें करते समय कर्मकांड को अलग रखना होगा और विज्ञान का संबंध पर्यावरण से जोड़ना होगा। यह समझ सभी में निर्माण होने की आवश्यकता है कि अध्यात्म को अपंग एवं विज्ञान को अंधा बनाने से मनुष्य का कोई भी हित साध्य नहीं होगा। विज्ञानवादी अध्यात्म को चुनौती देकर अध्यात्म की अवहेलना न करें और अध्यात्मवादियों की ओर से वैज्ञानिक मूल्यों को पैरों तले न रौंदा जाए। आज स्वतः को प्रगतिशील कहने वाले समाज के सामने आध्यात्मिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण की सैद्धांतिक चर्चा होना आवश्यक है।

अध्यात्म एवं विज्ञान दोनों को ही अपनी-अपनी कार्यपद्धति की कमियां पता लगने लगी हैं। साथ ही यह भी धीरे-धीरे समझ में आने लगा है कि उन कमियों को दूर करके एक दूसरे के साथ सहयोग से काम करना संभव है। यह सहयोग की भावना जिस दिन पूर्ण हो जाएगी वह ‘शुभ दिन’ कहलाएगा। केवल अध्यात्म से मानव की भौतिक प्रगति नहीं होती, यह जितना सच है उतना ही सच यह भी है कि केवल विज्ञान मानव को मानसिक शांति देने में विफल है। मानव की आध्यात्मिक एवं विज्ञान की प्रगति के बिना मानसिक शांति एवं सामूहिक शांति प्राप्त करने का लक्ष्य दूर ही रहेगा। ऐसा यदि लगता है कि मानव का सर्वांगीण जीवन उज्जवल हो तो मानव की उन्नति आध्यात्मि और विज्ञान दोनों रूपों में होनी चाहिए। उन्नति एवं नि:श्रेयस की प्राप्ति का मार्ग मानव को दिखाया जाना चाहिए।

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