सिनेमा में कॉमेडी- ये कहां आ गए हम!

‘सहज हास्य’ से ‘असहज हास्य’ और वहां से ‘अश्लीलता’ और वहीं से ‘फूहड़ता’ और फिर उसके नीचे ‘असहनीयता’ की ओर ढलान की यात्रा कर रहे हास्य के इस दौर में कोई सोच भी नहीं सकता कि कभी हिंदी सिनेमा में हास्य की सहज-सरस-निर्मल धारा बहा करती थी।

मुंबई से निकलने वाली एक फ़िल्म पत्रिका हर साल पुरस्कार बांटती है। इन पुरस्कारों का वितरण एक भव्य समारोह में होता है, जिसमें सभी बड़े सितारे शिरकत करते हैं। कुछ साल पहले ऐसे ही एक कार्यक्रम की एंकरिंग नई पीढ़ी के दुलारे रणबीर कपूर और भूतपूर्व दुलारे शाहरूख खान कर रहे थे। थोड़ी देर तक तो सब-कुछ ठीक-ठाक चलता रहा। अचानक जाने क्या हुआ कि दोनों अपने-अपने सूट उतार कर लड़कियों के वेष में आ गए और नकली ‘तू तू मैं मैं’ करने लगे। यह इतना अप्रत्याशित व स्तब्ध करनेवाला दृश्य था कि यदि किसी ने ज़िंदगी में एक बार भी हृषिकेश मुखर्जी की फिल्म देखी होती या शरद जोशी का कोई व्यंग्य पढ़ा होता या श्रीलाल शुक्ल के उपन्यास के पन्ने पलटाए होते तो वह कुढ़ कर ‘शेडड’ किए बिना नहीं रहता। लेकिन ऐसा हुआ नहीं।  रणबीर और शाहरुख की यह अदा देख आगे की वी. आई. पी. पंक्तियों पर विराजित फ़िल्म इंडस्ट्री के तमाम ‘हूज हू’ हंस-हंस कर लोटपोट होने लगे और उन्हीं की पिछली कतार में बैठी तमाम भूतपूर्व नायिकाएं गदगदायमान होने लगीं।

यह बानगी है, हास्य के उस बेढब स्वरूप की, जो इन दिनों हमारे सिनेमा और समाज में बुरी तरह छाया हुआ है। जब तक नई पीढ़ी के लाड़ले रितेश देशमुख एकाध सीन में लड़की ना बनें, प्रशंसकों को संतोष नहीं होता और जब तक छोटे परदे के कॉमेडी कार्यक्रमों के सितारे अधेड़ औरत का रूप न धरें, शो पूरा नहीं होता। हालत यह है कि कलाकार जितना फूहड़ होंगे, जज की कुर्सी पर काबिज सितारे उतनी ही दानवता से अट्टहास करते हुए प्रतिभागियों को अधिक से अधिक अंक देंगे। ‘सहज हास्य’ से ‘असहज हास्य’ और वहां से ‘अश्लीलता’ और वहीं से ‘फूहड़ता’ और फिर उसके नीचे ‘असहनीयता’ की ओर ढलान की यात्रा कर रहे हास्य के इस दौर में कोई सोच भी नहीं सकता कि कभी हिंदी सिनेमा में हास्य की सहज-सरस-निर्मल धारा बहा करती थी।

चालीस के दशक से लेकर साठ के दशक तक हास्य कलाकार हर फिल्म का अनिवार्य हिस्सा हुआ करते थे। भोले-भाले भगवान दादा (‘अलबेला, ‘भागम भाग’, ‘चोरी चोरी’) का अपनी डब्बू-डब्बू आंखें हिलाना जहां लोगों को भाता था, वहीं गोप और या़कूब की मासूम जोड़ी (‘पतंगा’, ‘बाज़ार’, ‘सगाई’) हॉलीवुड के लॉरेल-हार्डी को टक्कर देते हुए अपने डील-डौल और हास्य बोध के जरिए दर्शकों को हंसने पर मजबूर कर देती थी। आगा की मासूमियत के तो दर्शक दीवाने थे। ‘हमारा घर’, ‘चांदनी चौक’, ‘मिस्टर एंड मिसेस 55’ और ‘दूल्हा दुल्हन’ जैसी फिल्मों में उनकी कॉमेडी को दर्शक अब तक भुला न पाए हैं। सामान्य सी बातचीत पर ‘हां-हूं’ करते-करते अचानक चौंका देने की उनकी मौलिक शैली थी। वे गंभीर भूमिका में भी सिद्धहस्त थे। ‘पतिता’ में नन्हे बच्चे को साथ ले ‘तुझे अपने पास बुलाती है तेरी दुनिया’ गीत में उनकी गहन गंभीरता लोगों के आंसू छलका देती है।

साठ के दशक में महमूद का सितारा बुलंदियों पर था। ‘ससुराल’, ‘जिद्दी’, ‘ज़िंदगी’, ‘दिल तेरा दीवाना’, ‘लव इन टोकियो’ जैसी बीसियों फिल्मों में नायक-नायिका के समानांतर उनकी भी शुभा खोटे के साथ प्रेम कहानी चला करती थी, जिनमें उनकी टक्कर अपने भावी ससुर धुमाल के साथ होती थी। धुमाल के चेहरे पर परमानेंट मुस्कान और मासूमियत का समुच्चय दिखलाई देता था। महमूद और धुमाल में कमाल की जुगलबंदी थी। उसी दौर में आई एस जौहर सिर्फ अपने हाथ हिलाकर पब्लिक से मुखातिब होने के विशिष्ट अंदाज की वजह से शालीन दर्शकों की पहली पसंद बन गए थे। उन्होंने ‘जौहर, महमूद इन गोवा’ और ‘जौहर, महमूद एंड हांगकांग’ जैसी बहुत दिलचस्प फिल्में बनाईं। ओम प्रकाश (‘दस लाख’, ‘पड़ोसन’ ‘जोरू का गुलाम’, ‘चुपके चुपके’) का रोतली आवाज में संवाद बोलने का अनोखा अंदाज़ था। उनमें हास्य के साथ करुणा प्रस्तुत करने की अद्भुत क्षमता थी। दादा मुनि अशोक कुमार हरफनमौला थे। अक्सर छड़ी उठाकर बच्चों और बहू को आदेश देने वाले इस कलाकार की ‘विक्टोरिया नंबर 203’, ‘चोरी मेरा काम’ और ‘छोटी सी बात’ में कमाल की कॉमेडी थी। उनके भाई किशोर कुमार तो गायन में जितने परफेक्ट थे, अभिनय में भी उतने ही। उनके द्वारा अभिनीत ‘चलती का नाम गाड़ी, ‘हाफ टिकट’, ‘प्यार किए जा’ और ‘पड़ोसन’ को ऑल टाइम कॉमेडी माना जा सकता है।

सत्तर के दशक में अमिताभ का सितारा बुलंदियों पर पहुंचा और कॉमेडी भूमिकाएं वे स्वयं ही करने लगे। फिर भी उस दौर में कुछ कलाकारों ने अपनी सार्थक उपस्थिति दर्ज की। रंगमंच की पृष्ठभूमि से आए उत्पल दत्त ने अपने संवादों को थोड़ी लड़खड़ाहट के साथ बोलने और बड़ी-बड़ी आंखों से घूरते हुए कंधे उचकाकर हंसने की मौलिक शैली ईजाद की, जिसका ‘गोलमाल’, ‘नरम गरम’ जैसी फिल्मों में दर्शकों ने भरपूर लुत्फ उठाया। उनका ‘ई ई ई ई ई’ कहना आज भी दर्शकों को याद है। पुणे फिल्म इंस्टीट्यूट से प्रशिक्षित असरानी की आवाज और टाइमिंग अद्भुत थी। ‘छोटी सी बात’, ‘चुपके चुपके’ और ‘आज की ताज़ा खबर’ में उन्होंने कॉमेडी को नई ऊंचाइयां दीं। ‘अभिमान’, ‘परिचय’ और ‘खून पसीना’ में उनकी गंभीर भूमिकाएं भी याद की जाती हैं। देवेन वर्मा हाथ की अंगुलियों के संचालन से कॉमेडी करते थे। उनकी आवाज भी अनोखी थी। ‘चोरी मेरा काम’, ‘एक से बढ़कर एक’ और ‘अंगूर’ में उनका अंदाज़ निराला था। इसी दौर में एक सरीखी टाइप्ड भूमिकाओं के बावजूद केष्टो मुखर्जी भी दर्शकों का दिल जीतने में सफल रहे। ‘बॉम्बे टू गोवा’ में उनका बस को हवा में धक्का देना, ‘इनकार’ में पानी में माचिस की तीली डालते ही आग देखते ही हड़बड़ाकर पुलिस स्टेशन की ओर चल देना और ‘गोलमाल’ में उत्पल दत्त के सामने अपनी कैप में से ‘इधर देखो इधर देखो’ बोलते हुए शराब की बोतल निकालना जैसे कई दृश्य आज भी दर्शकों के मानस पटल पर अंकित हैं।

हास्य के स्तर में अचानक गिरावट आई अस्सी के दशक में जब ‘हिम्मतवाला’ और ‘मवाली’ की सफलता से फूहड़ कॉमेडी का चलन शुरू हुआ। इस दौर में कुछ संवाद तो ऐसे आए कि दर्शकों का परिवार का साथ बैठकर फिल्म देखना मुहाल हो गया। नब्बे के दशक में गोविंदा और डेविड धवन की फिल्मों (‘राजा बाबू’, ‘आंखें’, ‘हीरो नंबर वन’, ‘बीवी नंबर वन’, ‘बड़े मियां छोटे मियां’) से कॉमेडी की नई परंपरा शुरू हुई, जिसमें इस काम का जिम्मा विशुद्ध कॉमेडियनों के बदले गोविंदा, अनिल कपूर, सलमान खान, अमिताभ बच्चन जैसे नायकों ने ले लिया। डेविड धवन के दृश्य पटल से बाहर होते ही अक्षय कुमार, रितेश देशमुख, चंकी पांडे जैसे कलाकारों की ओर से ‘गोलमाल’ और ‘हाउसफुल’ सीरीज की फिल्में आने लगीं।

आज के दौर की कॉमेडी फिल्मों को गौर से देखें तो परेश रावल, अनुपम खेर और राजपाल यादव को छोड़कर अधिकांश कलाकार लाउड हैं। इन फिल्मों में गाली-गलौज सामान्य बात है। किसी दौर में साहित्य और सिनेमा में जो विषय वर्जित माने जाते थे उन विषयों (जैसे ‘पीकू’ में पाखाना, ‘दोस्ताना’ में समलैंगिकता, ‘बधाई हो’ में अधेड़ उम्र में गर्भ धारण) पर फिल्में बनाई जा रही हैं और दर्शक बड़े मनोयोग से देख रहा है। ओटीटी प्लेटफॉर्म पर ‘कॉमेडी’ के नाम से दिखाई जाने वाली ‘बहुत हुआ सम्मान’ जैसी फिल्मों का क्या कहें, शुरू के दस मिनट में बीस गालियां सुनने के बाद कोई भी सुधि दर्शक इन्हें बर्दाश्त नहीं कर सकता। हास्य के नाम पर छोटे पर्दे पर आने वाले ‘कपिल शर्मा शो’ की लोकप्रियता हमारे समाज में हास्य की आवश्यकता और उसके रसातल पर पहुंच चुके स्तर का प्रमाण है। इस सीरियल के अधिकांश पुरुष कलाकार महिलाओं की वेशभूषा और स्पोर्ट्स शू पहनकर मानसिक गंदगी फैलाते रहते हैं। कौन कहेगा कि कभी छोटे पर्दे पर ‘ये जो है ज़िंदगी’, ‘मिस्टर योगी’, ‘तू तू मैं मैं’, ‘श्रीमानजी श्रीमतीजी’ जैसे स्वस्थ, रुचिकर धारावाहिक आया करते थे। आज जब बड़े और छोटे पर्दे पर हम हास्य के नाम पर इतनी बेहूदगियां देखते हैं, तो हिंदी सिनेमा का वह स्वस्थ दौर याद आ जाता है जब भोले, मासूम और निर्मल हास्य कलाकार अपनी सादगी से हमें हंसने पर मजबूर कर दिया करते थे।

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