संगीत एवं अध्यात्म

योगियों की भाषा में संगीत नादयोग है। इसकी साधना करने से संगीत के द्वारा परमात्मा से संबंध स्थापित करना संभव है। कुंडलीनी जागृत करना, षड्चक्र भेदन करना, आदि क्रियाएं नाद योग की साधना से करते हैं।

भारत धर्म प्रधान देश है। भारतीय विचारधारा सदा से ही आध्यात्मिक भावभूमि पर प्रवाहित होती रहती है, जिसका प्रयोजन मानव कल्याण रहा है। मानव जीवन का परम लक्ष्य परमात्मा का साक्षात्कार माना गया है। इसे प्राप्त करने के अनेक माध्यम हैं,जिसमें संगीत भी एक सर्वोत्तम साधन माना गया है। इसीलिए संगीत ईश्वर के पास पहुंचने का सबसे सुगम व सरल मार्ग है जिसे अनादि काल से साधकों द्वारा अपनाया गया। भारत में षड्दर्शनों के समान ही संगीत भी अध्यात्म चिंतन का विषय रहा है। वेदों में साम वेद, गंधर्व वेद ये तो पूर्ण रूप से सांगीतिक वेद ही हैं, पर बाकी वेदों की भी ऋचाओं का गायन किया जाता रहा है। वेद हमारे प्राचीनतम आध्यात्मिक, धार्मिक ग्रंथ हैं जो मानव को शांति एवं परमात्मा से साक्षात्कार कराने में सक्षम हैं। भारतीय साधकों, आराधकों का लक्ष्य मोक्ष प्राप्ति तथा परमात्मा से संबंध स्थापित करना रहा। अतः उन्होंने संगीत कला को लक्ष्य की ओर उन्मुख किया एवं देवी देवताओं से संबंध स्थापित किया।

भारतीय अध्यात्म ने संगीत के माध्यम से यहां के साधकों को अंतर्दृष्टि दी है, जिसके द्वारा वे संगीत की आत्मा को पहचानने में समर्थ हुए हैं। भारतीय साधकों, कलाकारों ने संगीत को कभी साध्य नहीं माना। इसे साधन के रूप में स्वीकार किया। योगी तपस्वियों ने भी शक्तियों को उर्ध्वगामी बनाने में संगीत को सहायक माना है। योगियों की भाषा में संगीत नादयोग है। इसकी साधना करने से संगीत के द्वारा परमात्मा से संबंध स्थापित करना संभव है। कुंडलीनी जागृत करना, षड्चक्र भेदन करना, आदि क्रियाएं नाद योग की साधना से करते हैं।

किंतु योग से सुगम और सरल मार्ग भक्ति का है, यह भी आध्यात्मिक मार्ग माना जाता है। इस भक्ति के मार्ग से अनेक भक्त, कवि, साधकों, संतों ने परमेश्वर प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त किया। सूर, कबीर, मीरा, नामदेव, तुलसीदास, वैष्णव संप्रदाय के संत, नाथ संप्रदाय के संत, अष्टछाप कवि, तुकाराम, गुरु नानक देव और भी कई ऐसी विभूतियों ने यह मार्ग अपनाया। इन सभी की रचनाएं विख्यात हैं, जो आज भी प्रचलन में हैं। जिस समय इन रचनाओं की रचना की गई वह सभी रचनाएं गेय रहीं, तात्पर्य यह कि संगीत के माध्यम से जन मानस में जो आध्यात्मिक भाव जागृत किया जा सकता था, वह केवल गद्य के माध्यम से नहीं किया जा सकता। इस बात की अनुभूति से पूर्ण रूप से परिचित थे।

साहित्य मे हमें उल्लेख मिलता है कि संत जन प्रभु की भक्ति करते-करते मूर्छित हो जाया कराते थे, उन्हें ईश्वर से साक्षात्कार होता था। सूर, मीरा, तुलसी, तुकाराम आदि संतों की अंतर्दृष्टि थी, जिसके द्वारा उन्होंने परमात्मा का साक्षात्कार किया और जनता को कराया। इस काल का संगीत आध्यात्मिक एवं भक्ति भावना से परिपूर्ण था। शायद इस बात से आज हम सहमत न हों, परंतु यह यथार्थ में था।

यह स्थिति अधुना काल में भी हमें यदा-कदा अनुभूत होती है। वर्तमान समय में साप्ताहिक संगीतमय प्रवचन, भागवत कथा, शिव पुराण कथा, देवी भागवत, रामायण कथा आदि का प्रचलन बहुत अधिक हो गया है। प्रवचनकार संगीत के साथ अर्थात संगीतमय प्रवचन देता है, श्रोता इतना तल्लीन हो जाता है कि उसे भान ही नहीं रहता और वह ईश्वर की आराधना में लीन हो जाता है। संगीत के साथ इस प्रकार का प्रस्तुतिकरण अत्यंत कर्णप्रिय होता है, इसमें साधक और श्रोता दोनों ही तल्लीन हो, बाकी समस्त चिंताओं से मुक्त होकर परमात्मा की आराधना में लीन हो जाते हैं। मन की मलिनता से मुक्ति पाकर ईश्वर से संबंध स्थापित करने का प्रयास करते हैं।

संगीत, अध्यात्म एवं साधना का वह कौन सा रूप है जो परमात्मा से संबंध स्थापित करने के लिए प्रेरित करता है। प्राचीन काल में वेद, ऋचाएं, श्लोक आदि को गेय प्रस्तुत किया जाता रहा है। फिर हमने देखा कि मध्य काल में अनेक संत कवियों द्वारा भजन, अभंग रूपी रचनाओं के माध्यम से संगीत और अध्यात्म को आत्मसात करने का प्रयास किया। आधुनिक काल में भी हम संगीतमय आध्यात्मिक साधना को साधने का प्रयत्न कर रहे हैं। तात्पर्य यह है कि संगीत के किसी न किसी माध्यम से, उसके किसी न किसी स्वरूप को हम आध्यात्मिक साधना के साथ प्रयोग में लाकर परमात्मा को आत्मसात करने के प्रयत्न करते हैं। राम धुन हो, कीर्तन हो, भजन हो, आरती श्लोक हो, गायत्री मंत्र हो, रामायण हो, गीता हो या अन्य किसी भी प्रकार की आध्यात्मिक साधना हो, उसे संगीतमय प्रस्तुत करने का प्रयास किया जाता है, क्योंकि यह संगीतमय होने से कर्णप्रिय, मधुर, आकर्षक गेय हो जाती है, जो मन को शांत एवं ईश्वर से साक्षात्कार कराने की अनुभूति कराता है।

वैदिक काल से चली आ रही आध्यात्मिक सांगीतिक परंपरा का संबंध अटूट है। उसके प्रस्तुत होने के आयाम समय-समय पर परिवर्तित होते रहे हैं, परंतु साथ कभी नहीं छूटा। भारतीय अध्यात्म और संगीत को साथ में लेकर उच्चादर्शों के उस परम शिखर पर आसीन करना है, जहां पर अध्यात्म और संगीत परमात्मा के साथ एक रूप हो जाए।

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