भक्ति रस की संगीत गंगा

भक्ति रस की संगीत गंगा का प्रवाह कई शतकों से अनवरत अनथक बहता आया है। मानव के मन के उन्नयन के लिए यह प्रेरक साबित हुआ है। आज भी भगवान को मानने वाले आस्तिक और न मानने वाले नास्तिक पाए जाते हैं। लेकिन भक्ति संगीत तो हरेक के दिल को छूने वाला विषय होने के कारण गाना सुनने के बहाने नास्तिक भी इस भक्ति रस गंगा में शामिल हो जाते हैं।

आज भी जब ‘ऐसी लागी लगन… मीरा हो गई मगन…’ के अनूप जलोटा केे स्वर सुनाई देते हैं तब सुनने वाले लगन से वह गीत सुनने लगते हैं। जब ‘ठुमक चलत रामचंद्र, बाजत पैंजनियां’ यह पुरुषोत्तमदास जी का भजन सुनाई देता है तब सुनने वालों की आंखों के सामने रामचंद्र जी का मनमोहक बाल रूप साकार हो जाता है। ‘चदरिया झिनी रे झिनी’ यह कबीर जी की रचना हो, ‘श्री रामचंद्र कृपालु भज मन’ यह तुलसीदास जी की रचना हो, ‘मैं नहीं माखन खायो’ सूरदास जी की रचना हो, ‘मोहे लागी लगन गुरु चरणन की’ अथवा ‘चलो मन गंगा जमना तीर’ मीराबाई जी रचना हो, ‘तू सुमिरन कर ले…’ गुरु नानक जी की रचना हो, ‘हरि नाम सुमिर सुख धाम’ ब्रह्मानंद जी की रचना हो, ‘श्रीकृष्ण गोविंद हरे मुरारे…’ यह नामावली हो, ‘वैष्णव जन तो तेने कहिए…’ यह नरसी मेहता की रचना हो मनुष्य सुनते ही भावविभोर होकर ठोलने लगता है। संगीत के क्षेत्र में आधुनिक बदलाव आने के बावजूद आज भी यह भक्ति संगीत मन को मोह लेता है, क्या है इस बात का रहस्य?

मराठी संगीत सृष्टि के विख्यात संगीतकार यशवंत देव का कहना है कि गायन का प्रारंभ कराह से होता है। मानव का दर्द से कराहना भी गायन का एक अंग है, क्योंकि वह तो उसके दिल की पुकार होती है। मानव के हृदय में षठ्चक्रों में से जो एक चक्र स्थित है उसका नाम है अनाहत चक्र और उसके वर्णाक्षर ‘क’ से लेकर ‘ठ’ तक हैं। अनाहत शब्द ही ऐसे बना है। इसे शब्दब्रह्म कहा जाता है। यह व्यापक नाद के रूप में सारे ब्रह्मांड में व्याप्त है और इसकी ध्वनि मधुर संगीत जैसी है। यूरोप के प्राचीन दार्शनिकों को भी इसके अस्तित्व में विश्वास था और यह वहाँ ‘म्यूझिक ऑफ दि स्फियर्स’ अर्थात विश्व का मधुर संगीत कहलाता था।

महाराष्ट्र के अत्यंत प्रिय देवता है वारकरी पंथ के ‘विट्ठल’ इस ध्वनि का सीधा संबंध मानव के हृदय से आता है। इसीलिए महाराष्ट्र के वारकरी संतों ने विट्ठल नाम का संस्मरण करते हुए समाधि का अनुभव प्राप्त किया था।
सृष्टि के आरंभ से ही मानव को आत्मा से परमात्मा तक पहुंचने की चाह रही है। इस चाह को मूर्त रूप देने में संगीत ने मानव की अमूल्य सहायता की है। संगीत मानव को मिली अनुपम देन है। संगीत मन को सुकून देता है। संगीत मन की एकाग्रता में सहायक होता है। संगीत मन को आनंद की अनुभूति देता है। इस शरीर में मौजूद आत्मशक्ति को परमात्म शक्ति से एकरूपकरना है तो इस देह को कुछ समय के लिए भूल जाना आवश्यक बन जाता है। इसलिए भक्ति में संगीत का महत्व क्यों बढ़ गया यह ध्यान में आ जाता है।

जो शक्ति इस जग का संचालन करती है उसकी अगर हम आराधना करना चाहते हैं तो हमें संगीत की ही सहायता लेनी पड़ती है। जब ठीक ढंग का वाद्य भी नहीं था, तब भी मानव ताली बजाकर अथवा पैरों से भूमि पर आघात कर गाता था। बाद में अवनद्ध वाद्य, तंतुवाद्य, सुषिर वाद्य विकसित हुए और परमशक्ति की आराधना के लिए वह वाद्य सहायक बन गए।
मानव ने जब गीत रचना का आरंभ किया तब भी उसने इसी शक्ति की महानता वर्णन करने की तथा कृपा प्राप्त करने की ही बात सोची इसलिए वैसे ही गीत आरंभ से बनने लगे। आज भी संगीत में राग का स्वरूप स्पष्ट करने वाली अनेक बंदिशों में प्रभु का गुणगान अथवा वर्णन हम देख सकते हैं।

गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर भी कहते हैं कि, ‘संगीत यह कला का पवित्रतम रूप है…इसलिए सच्चे कवि जो संत भी थे उन्होंने जगत को संगीत के रूप में अभिव्यक्त किया… गायक का सब कुछ अपने आपमें ही होता है। उसके जीवन से ही संगीत उभरता है, वह कहीं बाहर से नहीं आता है।’

एक दंतकथा भी ऐसी है कि, गान सम्राट तानसेन का गायन सुनकर सम्राट अकबर सदा मुग्ध हो जाते थे। एक बार तानसेन के गुरुजी का गायन सुनने की बात उन्होंने मन में ठान ली। गुरुजी तो दरबार में पधार कर गायन करने वाले नहीं थे; अत: भेष बदलकर तानसेन के साथ अकबर गुरुजी के आश्रम में गए। जब गुरुजी का गायन सुना तब वे अतीव प्रसन्न हो गए और उन्होंने तानसेन से कहा कि, ‘तानसेन, तुम्हारे गुरुजी तो आप से कई गुना अच्छा गाते हैं। तुम्हारा गायन इतना अच्छा क्यों नहीं लगता है?’ तब तानसेन ने कहा था, ‘शहेनशाह, मैं तो अपने बादशाह को रिझाने गाता हूं, मगर गुरुजी सारी दुनिया का जो बादशाह है उसकी आराधना में गाते हैं। उनका ध्येय अत्युच्च होने से गायन भी उस स्तर का है।”

शायद इसी हेतु से भारतीय संतों ने ईश्वर की आराधना और भक्ति के लिए संगीत ही चुना। भारतीय संगीत तो असल में भक्ति संगीत ही है। भगवान को भी भक्तों ने संगीत के अनुकूल बना लिया है। सरस्वती माता के हाथ में वीणा होती है, गणेश जी मृदुंग बजाने के साथ नर्तन भी करते हैं, उनके पिताश्री महादेव शंख बजाते हैं, डमरू बजाते हैं और साथ में तांडव नृत्य भी करते हैं। भगवान कृष्ण को बंसीधर कहा जाता है। यही तो भक्ति संगीत की परंपरा है।

हम उत्तर हिंदुस्थानी संगीत देखे अथवा कर्नाटकी संगीत उसमें भक्ति और आध्यात्मिकता का बड़ा प्रभाव नजर आता है।भगवान की खोज, भगवान के दर्शन और मुक्ति की प्राप्ति यह संगीत का हेतु रहा है। चारों वेदों में सामवेद तो गायन से ही नाता रखता है। संत भाष्यकार और ग्रंथकारों से अधिक गीतकार, संगीतकार और गायक ही रहे हैं। ईश्वर भक्ति के लिए संतों ने केवल गीतों की रचना ही नहीं की; बल्कि अपने मधुर स्वरों में वाद्यों का साथ लेकर भगवान के सामने उसका गायन भी किया है। इन रचनाओं के माध्यम से संतों के मन में उमडी भावना को सामूहिक रूपदिलाना संभव हुआ है। ईश्वर भक्ति की अनुभूति का सामूहिक रूप इसी माध्यम से हो पाया। जब हम तुलसी रामायण का पाठ करते हैं तो संत तुलसीदास के मन में जो भावना थी उसी का अंश रूप में हमारे हृदय में जागरण करते हैं। अन्य रचनाओं के साथ भी यही होता है। इसीलिए भक्ति की सामाजिकीकरण होने में संगीत की अहम भूमिका रही है। महान भगवद्भक्त और पुराण पुराणोत्तम नारद जी तो हाथ में वीणा लेकर भक्ति का प्रसार शुरू से ही करते आए हैं और उनके साथ तुंबरू भी आते हैं। स्वयं महादेव नाद के प्रतीक और उनकी अर्धांगिनी पार्वती लास्य का प्रतीक तथा शिव वाहन नंदी तो लय के ज्ञाता माने जाते हैं। यक्ष, किन्नर और गंधर्वों के साथ संगीत जोडा गया ही है।

यद्यपि जन मनरंजन के लिए संगीत का उपयोग किया गया और किया जाता है, संगीत का प्राणतत्व तो भक्ति ही है। हम देखें तो पूरा भारत ही भक्ति के रंग में रंगा दिखाई देता है। राजस्थान की मीराबाई हो, ओडिशा के भक्त जमदेव हो, उत्तर प्रदेश के सूरदास, तुलसीदास, रैदास और संत कबीर हो, महाराष्ट्र के ज्ञानेश्वर, नामदेव, एकनाथ, तुकाराम, रामदास आदि वारकरी संत हो, दक्षिण के अलवार एवं नामन्मार हो यह सारी भक्ति संगीत की ‘कलकल छलछल बहती’ अविरत गंगाधार दिखाई देती है। इसमें भजन, कीर्तन, नामसंकीर्तन आता है। दोहे, चौपाई, सवाई, ओवी, अभंग आदि रचनाओं की विविधता दिखाई देती है।

भक्तों में जयदेव का स्थान भी बहुत बडा है जो उन्हें उनकी रचना ‘गीतगोविंद’ के कारण मिला हुआ है। बारहवीं सदी के यह भक्त अपनी रचनाओं के कारण ख्याति प्राप्त है। मध्ययुग में कृष्ण भक्ति का उफान ही आया था। इस भूप्रदेश के जनजीवन पर वैष्णव संप्रदाय की गहरी छाप थी। जयदेव ने भक्त और भगवान का नाता विशद करने हेतु भगवान कृष्ण और राधा का रूपक अपनाया है। भक्त का प्रेम और समर्पण किस हद तक जाता है, इसका अनुभव हमें गीतगोविंद से आता है।

तुलसीदास (इ.स. 1532-1623) महान दार्शनिक तथा एक अच्छे कवि भी थे। उनका रामचरितमानस जनप्रिय हुआ और साथ में हनुमान चालिसा का गायन तो आज भी हम सुनते आए हैं। तुलसीदास आदिकवि वाल्मिकी के अवतार ही माने जाते हैं। वाल्मिकी ने संस्कृत भाषा में रामायण की रचना की और तुलसीदास ने हिंदी भाषा की बोली मानी जाने वाली अवधी भाषा में इसकी रचना की।

कबीर भी पंद्रहवीं सदी के महान भगवद्भक्त थे जो हिंदुओं के साथ साथ मुसलमान और सिक्खों में भी आदरणीय माने गए हैं। कबीर ने साधे सरल दोहों के माध्यम से अपना महान दार्शनिक ज्ञान विशद किया।

सूरदास (1478-1581) भी महान संत कवि हैं। उनकी भक्ति रचनाएं ‘सूरसागर’, ‘सूर-सुरावलि’ और ‘साहित्य लहरी’ इन नामों मशहूर हैं। सूरदास स्वयं नेत्रहीन होकर हिंदी साहित्य के आसमान में सूर्य की भांति प्रकाशमान हैं। लोग उन्हें भगवान के भक्त के रूप में ही जानते हैं। उन्होंने अपनी रचनाएं साहित्य सेवा करने के हेतु से नहीं लिखी हैं, यह तो उनकी भक्ति और आराधना है। यही भक्ति संगीत लोगों ने सर पर उठा लिया है।

सूरदास के बारे में ऐसी कथा बताई जाती है कि, जब उनके भक्ति गायन के बारे में सम्राट अकबर को पता चला तो वह गायन सुनने के लिए सूरदास को दरबार में बुलावा भेजा था। मगर सूरदास ने वहां जाने से इनकार कर दिया। आखिर अकबर को सूरदास का भक्ति संगीत सुनने हेतु स्वयं उनके सामने उपस्थित होना पडा था।
ऐसा कहा जाता है कि, सूरसागर में करीब 1,00,000 रचनाएं थीं, यद्यपि आज केवल 8,000 रचनाएं ही पाई जाती हैं। भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का बखान करने वाली सूरदास की रचनाएं भक्तों में अति प्रिय हैं। उनकी रचनाएं ब्रज भाषा में हैं।

सोलहवीं सदीं की महान नारी संत मीराबाई उनकी कृष्ण भक्ति एवं भजनों के लिए विख्यात हैं। मीराबाई आज गीत, नृत्य तथा चित्रकला के लिए भी प्रेरणा बन गई हैं। मीराबाई मूल रूप से भक्त थी, उनका उद्ेश्य काव्य रचना करना नहीं था। उसने तो अपने प्रभु गिरिधर नागर के प्रति एकनिष्ठ भक्ति भाव को सीधे सरल शब्दों में जिस रूपमें अभिव्यक्ति दी, भक्तिगान किया, वही उसका भक्ति काव्य बन गया। इसलिए मीरा के काव्य में सहजता है। मीरा के काव्य में सरलता है। वह हृदय से निकले शब्द हैं। उनमें पीडा की गहराई है। संत मीराबाई कहती है – ‘हे री मैं तो दरद दीवानी म्हारो दरद न जाणै कोय।’ यही पीडा मीरा के भक्ति संगीत का मूल स्वर बन गया। वह अपनी भक्ति साधना और भक्ति रचनाओं के कारण आज भी भारत के कोटि-कोटि लोगों के हृदय में विराजमान हैं।

पंद्रहवीं और सोलहवीं शताब्दी में उत्तर भारत में वैष्णव भक्ति संप्रदायों की एक बाढ़-सी आ गई थी। वल्लभ संप्रदाय, निंबार्क संप्रदाय, चैतन्य संप्रदाय, हरिदासी संप्रदाय, राधास्वामी आदि संप्रदायों ने कृष्ण भक्ति का तूफान मचा दिया था। इन संप्रदायों की भक्ति पद्धति भिन्न-भिन्न थी लेकिन सभी के उपास्यदेव श्रीकृष्ण हैं। यह सभी सगुणोपासक हैं, सभी का मुख्य आधार श्रीमद्भागवत है, सभी माधुर्य भक्ति में आस्था रखते हैं।

मराठी भाषा के संत नामदेव अपनेआप में एक महान व्यक्तित्व हैं। उन्हें कीर्तन भक्ति का प्रवर्तक माना जाता है। उत्तर भारत के हिंदी भाषी प्रांतोें में संत नामदेव का हितोपदेश और सत्कार्य की कीर्तिध्वजा आज भी सम्मानपूर्वक फहर रही है। पंजाब, हरयाणा, उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश आदि राज्यों में संत नामदेव के आठ सौ से भी अधिक मठ एवं मंदिर हैं। साथ में उनके गुरुद्वारा भी बनाए गए हैं। हिंदी में विपुल पद रचना करने वाले यह एकमात्र मराठी संत हैं।
इस भक्ति संगीत में भीमसेन जोशी का योगदान अमूल्य है। मराठी अभंग गायन का कार्यक्रम ‘संतवाणी’ लोकप्रिय हो गया था। उनके इस कार्यक्रम की चर्चा उत्तर भारत में भी फैली और यूरोप-अमेरिका तक भी! पंजाब में होने वाले कार्यक्रम में ‘काया ही पंढरी’ इस अभंग की फर्माईश होने लगी। उनके कार्यक्रम में ‘क्लासिकल’ और ‘भक्ति रस’ इस तरह दुगुना आनंद श्रोताओं को मिलता था। 1982 में शहाबाद में एक बडा कार्यक्रम हुआ था। तब शाम 6 बजे 4-5 हजार श्रोता जमा हो गए थे। यह कार्यक्रम खुले मैदान में छत बनाकर हो रहा था। सर पर तूफान मंडराने लगा, मगर न पंडित जी आसन से हिले, न कोई श्रोता। महाराष्ट्र के चंद्रपुर में तो भरी बारिश में छतरी लेकर लोगों ने संतवाणी का आनंद लिया था। बैठक के लिए बनाए व्यासपीठ के नीचे से पानी बहने लगा लेकिन ‘संतवाणी’ रूकी नहीं थी।

विष्णु दिगंबर पलुस्कर और वी. एन. भातखंडे ने भारतीय शास्त्रीय संगीत और भजन का नाता वापस जोडा। पंडित कुमार गंधर्व ने संत कबीर और मालवा प्रांत के निर्गुणी भजन लोकप्रिय बनाए। जानीमानी नृत्य निर्देशिका मल्लिका साराभाई ने भजन पर आधारित कई नृत्य प्रस्तुतियां भी तैयार की हैं। हैदराबाद के अभिनय चक्रवर्ती जे. एस. ईश्वर प्रसाद राव ने संप्रदाय भजन पर आधारित नृत्य संकीर्तन नामक कार्मक्रम भी बनाकर प्रस्तुति की है। साई भजनावलि और सत्यसाई भजनावलि भी लोकप्रिय हो गई है।

इस तरह भक्ति रस की संगीत गंगा का प्रवाह कई शतकों से अनवरत अनथक बहता आया है। मानव के मन के उन्नयन के लिए यह प्रेरक साबित हुआ है। आज भी भगवान को मानने वाले आस्तिक और न मानने वाले नास्तिक पाए जाते हैं। लेकिन भक्ति संगीत तो हरेक के दिल को छूने वाला विषय होने के कारण गाना सुनने के बहाने नास्तिक भी इस भक्ति रस गंगा में शामिल हो जाते हैं और यह वास्तव है!
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