मानवीय असंवेदनाओं की होम डिलीवरी

अलादीन द्वारा चिराग घिसे जाने के बाद ‘जो हुक्म मेरे आका’ कहते हुए चिराग से बाहर निकलने वाला जिन्न सभी को पता है। किताबों, तिलस्मी कहानियों, जादुई फिल्मों में हम सभी ने इसे देखा है। लेकिन क्या आपने अपने आस-पास घूमने वाले जिन्नों को देखा है? क्योंकि आजकल जिन्न चिरागों में नहीं रहते। ये मोबाइल के नंबरों में रहते हैं। आपने नंबर डायल किया, अपनी आवश्यकता का सामान मंगाया और जिन्न आपके दरवाजे पर। ये जिन्न कोई और नहीं वही ‘होम डिलीवरी’ करने वाले लोग हैं, जो आपके एक फोन पर आपके लिए इमारत के नीचे वाली दुकान से लेकर कोसों दूर विदेशों से आया सामान तक आपके घर पहुंचाते हैं। इन्हें जिन्न इसलिए कहा क्योंकि आजकल इनसे जिन्न की तरह ही अपेक्षाएं की जा रही हैं। होम डिलीवरी करने वाला भी इंसान ही है यह आधारभूत मानवीय संवेदना ही खत्म होती जा रही है।

हाल ही में बंगलुरु में हुई घटना ने ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया है। इस पूरी प्रक्रिया में किसकी कितनी गलती थी, यह तो जांच के बाद पता चलेगा ही; परंतु दो अनजान व्यक्तियों के बीच कुछ ही पलों में हाथापाई की नौबत आ जाए यह समाज के किस पहलू की ओर इशारा कर रहा है? भारतीय समाज में यह किस प्रकार की संस्कृति शामिल होती दिखाई दे रही है? अपने भोजन में से पहले गौग्रास निकालने के हमारे संस्कारों को कहीं यह होम डिलीवरी ग्रस तो नहीं रही है?

बात ध्यान देने योग्य इसलिए भी है क्योंकि धंधा-व्यवसाय चाहे कोई भी हो अमूमन सभी में ग्राहक को भगवान या सर्वोपरि मानने का ही चलन है। ऐसे में किसी भी ग्राहक से सभ्यता की सीमाओं के अंदर रह कर व्यवहार करना बहुत आवश्यक है। परंतु यहां ग्राहक का भी यह कर्तव्य है कि वह होम डिलीवरी करने आने वालों से सभ्य व्यवहार करें। सर्दी, गर्मी, बरसात सहन करके सामान की डिलीवरी करने आने वाले ये लोग और कुछ न सही परंतु आपसे अच्छे व्यवहार की अपेक्षा तो कर ही सकते हैं। बंगलुरू की घटना कोई पहली या आखरी नहीं है। हां, यह बात अलग है कि सोशल मीडिया में आने के कारण वायरल कुछ अधिक हो गई है।

हमारे यहां होम डिलीवरी कोई नई बात नहीं है और न ही उसमें होने वाली किचकिच कोई नई है। घर पर सुबह-सुबह दूध पहुंचाने के लिए घंटी बजाने वाले तो अकसर बुर्जगों के प्रकोप के भागी बन जाते थे और दूध में पानी मिलाने के ताने सुनते थे सो अलग। परंतु कभी भी दूधवाला उस बुजुर्ग को पलट कर जवाब नहीं देता था; क्योंकि वही बुजुर्ग व्यक्ति थोड़ी सी देर होने पर उस दूधवाले से बड़े ही ममत्व और अपनत्व से पूछता भी था कि आज देर हो गई सब ठीक तो है? पांच मिनट से भी कम समय के इस अनौपचारिक वार्तालाप के कारण किसी से हाथापाई की नौबत नहीं आती थी। घर-घर जाकर सब्जी बेचने वाले से नोंकझोंक, मटका कुल्फी बेचने वाले से कुल्फी के आकार को लेकर तनातनी, साइकल या ठेले पर छोटे-छोटे सामान बेचने वालों से मोलभाव करने में होने वाली बहस ये सारी आम, साधारण और तात्कालिक बातें हुआ करती थीं। एक बार हुए झगड़े के कारण न लोग खरीदना छोड़ते थे, न बेचना।

अब बातें धंधेबाज हो गई हैं। होम डिलीवरी एक पेशा बन चुका है। कई युवा इस पेशे को केवल इसलिए अपना रहे हैं क्योंकि उनके पास पैसा कमाने का कोई अन्य साधन नहीं है और अगर कोई साधन मिल गया तो इसे वे तुरंत छोड़ देंगे। इस पेशे से उन्हें पैसे के अलावा और कुछ नहीं मिलता। ऐसी परिस्थिति में जब किसी के साथ बंगलुरू जैसी घटना होती है तो वह सोचता है कि ‘मैं ग्राहक का नौकर थोड़े ही हूं।’ और दूसरी ओर ग्राहक के अंदर यह भावना जागृत होती है कि ‘मैंने पैसे दिए हैं तो मुझे मेरी शर्तों पर डिलीवरी चाहिए।’ उससे जरा सी भी देर बर्दाश्त नहीं होती। यही दोनों का अहम् भाव टकराता है और अन्य सारी भावनाओं को दरकिनार कर देता है। न ग्राहक को यह सोचने की फुर्सत है कि समय पर पहुंचने के लिए उस डिलीवरी बॉय ने किस तरह बाइक चलाई होगी और न ही डिलीवरी बॉय यह सोचता है कि आखिर ग्राहक की ऐसी क्या मजबूरी थी कि जरा सी देर बर्दाश्त नहीं कर सका।

यहां उन कंपनियों की भी अहम् भूमिका है जो ग्राहकों को समय सीमा के अंदर सामान पहुंचाने का वादा करते हैं। यह मुख्यत: ‘रेडी टू ईट फूड’ डिलीवरी के सम्बंध में अधिक होता है। ग्राहक से खाने का आर्डर मिलने से लेकर ग्राहक तक खाना पहुंचने तक के बीच छोटे-छोटे कामों की एक बहुत बड़ी श्रृंखला होती है। इनमें से किसी भी काम में देर हो सकती है जिसके कारण ग्राहक तक खाना देर से पहुंचता है, परंतु ग्राहक के गुस्से का शिकार डिलीवरी बॉय ही होता है क्योंकि वही ग्राहक के सामने होता है। अत: कम्पनियों को भी ग्राहकों को समय सीमा बताने से पहले सारी बातों का ध्यान रखना चाहिए। डिलीवरी बॉय सामान लेकर निकलने के बाद अन्य स्थानों पर समय बर्बाद न करके ठीक ग्राहक के पास ही पहुंचे यह ध्यान रखना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी यह भी है कि नियत समय के अंदर पहुंचने की कोशिश में कहीं वह दुर्घटनाग्रस्त न हो जाए।

दरअसल आज हम उस दुनिया में जी रहे हैं जहां हमें मोबाइल और लैपटॉप पर यह बताया रहा है कि हमारे लिए क्या अच्छा है। हमें क्या खाना-पीना चाहिए, क्या पहनना चाहिए और क्या सोचना चाहिए। इस संस्कृति में लोग केवल स्वयं तक सीमित होते जा रहे हैं। किसी और की भावनाओं, समस्याओं की ओर देखने की फुर्सत ही नहीं है। आपकी भूख मिटाने के लिए जो व्यक्ति आपका खाना पहुंचाता है, उसे एक ग्लास पानी भी नहीं पूछा जाता। अपना समाज किस तरह इतना बधिर और कुंठित हो चला है? सोचिए जरा! सहूलियत के नकाब के पीछे से कहीं मानवीय असंवेदनाओं की होम डिलीवरी तो नहीं हो रही है?

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  1. Anonymous

    👍👍

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