गंगा तेरा पानी अमृत

गंगा को भारत में एक पवित्र स्थान प्राप्त है। वह केवल निरंतर प्रवाहित रहनेवाली नदी ही नहीं है वरन उससे सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक और भावनात्मक लगाव भी है। इन सारी बातों को जोड़ने, अपने में समाहित करने वाली गंगा शायद दुनिया की इकलौती नदी होगी।

गंगा और उसके सांस्कृतिक पहलुओं पर नजर डालें तो उसके साथ हिंदी और भोजपुरी फिल्मों की लंबी यात्रा दिखाई देती है। गंगा जिन स्थानों से गुजरती है, वह सारा भौगोलिक और सामाजिक परिसर हिंदी फिल्मों के लिए हमेशा ही उपयुक्त रहा है। फिल्मों के नाम, पटकथा, चरित्र, गीत-संगीत-नृत्य और प्रदर्शन के लिये भी ये स्थान महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं।

गंगा किनारे बसे शहर में रहने वाला शहरी नायक पहाड़ी इलाकों में रहने वाली नायिका के सौंदर्य और स्वभाव पर मोहित हो जाता है। दोनों का प्रेम परवान चढ़ता है। वह युवक विवाह के लिए अपने माता-पिता की आज्ञा लेने घर आता है; परंतु माता-पिता ने तो उसकी शादी किसी रईस खानदान की युवती से तय कर दी है। उधर वह पहाड़ी स्त्री रोज अपने शहरी बाबू के लौटने का इंतजार करती है। इसी बीच उसे पता चलता है कि वह गर्भवती है। वह अपने शहरी बाबू को ढूंढने शहर में आती है। दुर्भाग्य से उसे गंगा नदी के मंदिर परिसर में एक व्यक्ति अपने जाल में फंसा कर कोठे पर ले जाता है। नायिका को अपने फंसने का अंदाजा लग जाता है परंतु अपने बच्चे के लिए वह मजबूरी में नाचना शुरू कर देती है। किसी तरह से नायक को इस बात का पता चलता है और वह इस संकट से अपनी प्रेमिका को मुक्त कर उसे अपनाता है।
हिंदी फिल्म का यह आदर्श नायक गंगा को मैली होने से बचा लेता है और यह भी सिद्ध करता है कि गंगा अभी भी उतनी ही स्वच्छ और पवित्र है। आप यह समझ ही गए होंगे कि यह पटकथा राज कपूर निर्देशित फिल्म ‘राम तेरी गंगा मैली’ की है। कभी उन्होंने फिल्म की नायिका को गंगा नदी के प्रतीक के रूप में दिखाया तो कभी पवित्र गंगा किस तरह पापियों के पापों के कारण दूषित हो रही है यह भी बाताया।

राम तेरी गंगा मैली हो गई
पापियों के पाप धोते-धोते

गंगा की यह आर्त पुकार गंगा नदी को बचाने, उसकी पवित्रता को संजोने के लिए है। पटकथा के साथ ही राज कपूर ने प्रणय गीत, संगीत, नृत्य इत्यादि पर भी समान रूप से जोर दिया। मनोरंजन के माध्यम से ‘गंगा नदी’ की पवित्रता दर्शकों के सामने लाने का राज कपूर का प्रयास सटीक साबित हुआ।

हमारी जनता के मन में गंगा नदी के प्रति अटूट श्रद्धा है, इस भाव को फिल्मों में उतारना कई फिल्मों के सफल होने की कुंजी रही है।
राज कपूर के ‘जिस देस में गंगा बहती है’ से लेकर फिल्मी परदे पर बहने वाली गंगा की संस्कृति भिन्न-भिन्न तरह से दिखाई देती है। फिल्म में गंगा नदी के परिसर में रहने वाले डाकू रांका (प्राण) का गंगा की स्वच्छ संस्कृति के कारण हृदय परिवर्तन हो जाता है। सीधा सादा राजू (राज कपूर) अपने मूल्यों के आधार पर जीत जाता है। फिल्म की नायिका (पद्मिनी) भी उसका साथ निभाती है।

बाद के 25 सालों में गंगा में बहुत कुछ शामिल हुआ। उस परिसर की सामाजिक, सांस्कृतिक स्थिति, परिस्थिति बदली। इस सभी को सन 1985 में बनी ‘राम तेरी गंगा मैली’ में राज कपूर ने फिर एक बार पर्दे पर उतारा। आपको जानकर शायद हैरानी होगी कि तत्कालीन समीक्षकों ने ‘राम तेरी गंगा मैली’ फिल्म पर कई टीका टिप्पणियां की थीं परंतु गंगा नदी की पवित्रता जिन लोगों के दिलों में थी उन सभी लोगों ने इसे सिर आंखों पर बिठाया। देश के अन्य भागों में गंगा भले ही न बहती हो परंतु उन लोगों को गंगा नदी का महत्व और प्रभाव ज्ञात है। शायद इसीलिएकई फिल्मों की पटकथा पर इसका प्रभाव दिखाई देता है। ‘हिमालय की गोद में’ से लेकर ‘नदिया के पार तक’ और ‘हरियाली और रास्ता’ से लेकर ‘लागा चुनरी में दाग तक’ सभी में गंगा विविध रूप में दिखाई देती है। ‘गंगा, जमुना, सरस्वती’, ‘गंगा तेरा पानी अमृत’, गंगा की सौगंध’, ‘गंगा’, ‘गंगा का वचन’ इत्यादि फिल्मों के नामों से भी गंगा निरंतर प्रवाहित हो रही है।

‘पोंगा पंडित’ फिल्म में गंगा नदी के किनारे पलाबढ़ा नायक (रणधीर कपूर) नायिका (नीता मेहता) को ‘गंगा घाट का पानी पिया है?’ पूछते हुए उसे मजा चखाता है। पर ऐसा क्यों? क्योंकि शहर से आई मॉडर्न युवती जब गंगा के पानी में बिकनी पहन कर उतरती है तो यह सब वह परंपरावादी, संस्कारवान नायक सहन नहीं कर पाता।

फिल्मों के गीत और संगीत में भी बडे पैमाने पर ‘गंगा’ का उल्लेख मिलता है। ‘तू गंगा की मौज मैं जमुना का धारा’ (बैजू बावरा) से लेकर ‘छोरा गंगा किनारेवाला’ (डॉन) तक कई गानों में गंगा के अनेक रूप दिखाई देते हैं। ‘जिस देश में गंगा रहता है‘ यह फिल्म का नाम पुराने फिल्मी गाने से ही प्रेरित है। गंगा तेरा पानी अमृत में के बारे में भी यह कहा जा सकता है।

बहती गंगा और फिल्मों का नाता यहीं तक सीमित नहीं है। सन 1984 में अमिताभ बच्चन ने समाजवादी नेता हेमवतीनंदन बहुगुणा के विरोध में चुनाव लड़ा था और भारी मतों से उन्हें जीत मिली थी। तब इस चुनाव की पहचान ‘छोरा गंगा किनारेवाला’ के रूप में ही हुई। जिस मतदान क्षेत्र के लिए यह चुनाव हुआ था वह इलाहबाद भी गंगा नदी के किनारे बसा हुआ है। अमिताभ बच्चन का जन्म भी भी इसी इलाहबाद शहर में हुआ है। गंगा नदी के किनारे जन्मे, पलेबढ़े और शिक्षित कई लोग मुंबई की फिल्म इंडस्ट्री में हैं।

हिंदी की तरह ही भोजपुरी में भी ‘गंगा’ पर अधारित फिल्मों का निर्माण होता रहा है। ‘गंगा देवी’, ‘गंगा किनारे मेरा गांव’, ‘गंगा की बेटी’ आदि फिल्में भोजपुरी में बनी हैं। मनोज तिवारी इसी तरह भोजपुरी फिल्मों की सफलता से सुपर स्टार बने हैं। अपनी स्थानीय भाषा की फिल्में होने के कारण गंगा नदी के परिसर में रहने वाले दर्शक भी काफी खुश होते हैं।

राजश्री प्राोडक्शन नामक फिल्मों का निर्माण और वितरण करने वाली कंपनी ने इस क्षेत्र में कदम रखा और ‘दोस्ती’, ‘तकदीर’, ‘उपहार’ जैसी कई साफ-सुथरी और पारिवारिक फिल्में बनाते समय गंगा परिसर का विशेष उपयोग किया।

कुछ सालों बाद लगभग 80 के दशक में हिंदी फिल्में ‘मुंबई’ को केन्द्रित कर बनने लगीं। सन 1995 में आई ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे’ की सफलता के बाद तो हिंदी फिल्मों ने विदेशोंं में बसे भारतीयों और वहां की संस्कृति का प्रदर्शन शुरू कर दिया। दुनिया के उत्तमोत्तम पर्यटन स्थल और प्रकृति की ओर हिंदी फिल्म इंडस्ट्री का झुकाव बढ़ने लगा। न्यूजीलैंड से लेकर मैक्सिको तक हिंदी फिल्मों की पटकथा पहुंचने लगी। इन सभी में गंगा के किनारों पर आधारित फिल्में कहीं पीछे छूट गईं परंतु आज भी अगर पटकथा की पार्श्वभूमि गंगा के इर्दगिर्द घूमती है तो उसे दर्शकों द्वारा जरूर स्वीकारा जाएगा।
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