हिंदी फिल्मो कि उद्योगप्रियता

क्या आपको कोई ऐसी हिंदी फिल्म याद है जिसमें चारों ओर उद्योगपति किरदार दिखाई देते हों? हृिएकेश मुखर्जी की नमक हराम याद है? उसमें एक कारखाने का मालिक (ओम शिवपुरी) बीमार पडने कारण उसका बेटा विकी(अमिताभ बच्चन) कुछ दिन कारखाने का कामकाज संभालने का निश्चय करता है। तब उसका दोस्त सोमू(राजेश खन्ना) अपने उद्योगपति मित्र की मदद करने के लिए चंदर नाम धारण कर उसकी कंपनी में नौकरी करना शुरू करता है। वह अपनी मेहनत और स्वभाव से कम्रचारियों का विश्वास सम्पादन करने में कामयाब हो जाता है। यूनियन के चुनाव में वह बुजुर्ग अध्यक्ष(ए.के.हंगल) को हरा देता है। चंदर मजदूरों के सुखदुख, दर्द, कठिनाइयां चंदर को बताता है और उससे मदद की उम्मीद करता है परंतु विकी के पिता को यह मंजूर नहीं होता। वे अपने चमचे(मनमोहन) को कारखाने में भेजते हैं और चंदर की सच्चाई सबके सामने आ जाती है कि वो विकी का दोस्त है। मजदूर यह सच सह नहीं पाते और चंदर को उनकी मार खानी पडती है। इन सभी के लिए विकी को जिम्मेदार ठहराया जाता है। मालिक मजदूरों का किस तरह फायदा उठाते हैं, किस तरह उनके लाभों पर पानी फेर देते हैं इसका चित्रण नमक हराम में बखूबी किया गया है।

हिंदी फिल्मों के ‘उद्योगपति’ एक अलग विषय है, जिनमें कालानुरूप परिवर्तन हो रहा है। यश चोपडा के द्वारा निर्देशित, सलीम जावेद की पटकथा वाली ‘त्रिशूल’ में इसका अलग रं नजर आता है। एक उद्योगपति(संजीव कुमार) का नाजायज बेटा विजय(अमिताभ बच्चन) अपनी मां(वहीदा रहमान) पर किए गए अन्याय का बदला अलग तरीके से लेना का निश्चय लेता है। एक ओर वह उद्योगपति की सेक्रेटरी(राखी) से दोस्ती करता है और दूसरी ओर वह उद्योगपति की ‘मार्केट इमेज’ को गिराने के लिए दांवपेंच खेलता है। टेंडर के दामों से लेकर नीलामी की बोली तक में विजय अपने पिता को मात देता है। विजय की भावना थी कि उसकी मां को फंसाकर इस उद्योगपति ने इतना उंचा मकाम हासिल किया है। इन तमाम संघर्षों के बीच वह उद्योगपति यह नहीं जान पाता कि विजय उसी महिला का बेटा है जिसे उसने धोखा दिया था। त्रिशूल का यह संघर्ष अत्यंत नाट्यमय था। अमिताभ बच्चन कजी एंग्री यंगमैन स्टाइल लोगों के दिलों को छू गई।

पारंपरिक लोकप्रिय फिल्म में उद्योगपति व्यक्तिरेखाएं तथा उद्योगपति घरानों की मानसिकता, दृष्टिकोण, उतार चढाव, तनाव आदि का फिल्मों जैसे प्रभावी माध्यन से लोगों तक पहुंचना आसान और आवश्यक था।

श्याम बेनेगल के द्वारा निर्देशित और शशि कपूर के द्वारा निर्मित ‘कलयुग’ फिल्म की पटकथा उद्योगपति घरानों के महाभारत पर आधारित है। इसमें उद्योगों का साम्राज्य अपने नियंत्रण में रखने, महत्वपूर्ण स्थानों पर अपने दोस्त रिश्तेदारों को रखने, और आवश्यकता पड़ने पर किसी को रास्ते से हटाने तक की चालबाजियां दर्शाई गईं। यह फिल्म वास्तविकता के बहुत नजदीक थी। फिल्म में शशि कपूर, रेखा, कुलभूषण खरबंदा, ओम पुरी, अमरीश पुरी, सुप्रिया पाठक आदि की मुख्य भूमिकाएं थीं। यह फिल्म समांतर फिल्मों में गिनी गई।

कई अन्य फिल्मों में भी कम अधिक पैमाने पर उद्योगपतियों का चित्रण किया गया है। सुरेन्द्र मोहन द्वारा निर्देशित ‘धनवान’ फिल्म के नाम में ही उद्योगपति का सा इम्प्रशन होता है। अहंकारी उदगयोगपति(राजेश खन्ना) नायिका(रीना रॉय) को अपना बनाने के लिए कई दांवपेंच रचता है। एक बार तो वह उसके नृत्य के सारे टिकिट खरीद लेता है और हॉल में अकेला बैठकर नृत्य देखता है। हालांकि यह एक सामाजिक फिल्म थी परंतु उद्योगपतियों के पैसे का घमंड इसमें साफ दिखाई देता है।
मधुर भंडारकर द्वारा निर्देशित कॉर्पोरेट फिल्म में आधुनिक उद्योगों का दर्शन होता है। कॉर्पोरेट क्षेत्र के इगो प्रॉब्लेम, स्पर्धा, दांवपेंच, अस्तित्व की लड़ाई

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