यही उनका बड़प्पन

“रमेश, तुम्हारा यह लेख बहुत अच्छा है, सटीक है, भाषा संयमित है, पाठक और कार्यकर्ताओं को योग्य संदेश देने वाला है”। आबासाहेब के साथ यह संवाद गत 30-35 वर्षों में जाने कितनी बार हुआ होगा, कह नहीं सकता। अंतर्मन से तारीफ करना उनका स्वभाव था। यह तारीफ़ के शब्द अब कभी सुनाई नहीं देंगे, यह रह-रहकर याद आ रहा है और मन उदास हो रहा है। मृत्यु अटल है और यह जीवन का शाश्वत सत्य है, फिर भी इस शाश्वत सत्य के कटु घूंट को हलक से नीचे उतारने में अतीव कष्ट होता है। मेरे नाम पर अनेक पुस्तकें हैं। पुस्तकें पढ़ने के बाद आबासाहब का फोन आता था, “रमेश, तुम्हारी किताब अतिशय उत्कृष्ट है। पुस्तक में इतने संदर्भ दिए गए हैं कि समझ में नहीं आता कि इतना सब तुम कब पढ़ते हो”? संविधान पर पर लिखी मेरी पुस्तक पढ़ने के बाद तो जैसे आबा साहब ने मेरी तारीफों के पुल बांध दिए। उन्होंने कहा, “योग्य समय पर नया विषय अत्यंत सरल भाषा में तुमने प्रस्तुत किया है, इसके लिए तुम्हारी जितनी तारीफ़ की जाए कम है”। यह सब याद आते ही याद आता है कि अब तारीफों के इन शब्दों ने विराम ले लिया है। यह सारा अहसास बहुत दुखदायक है।

आबा साहब के साथ मेरा संबंध कब से या किस दिन से है, नहीं कह सकता! परंतु, उनकी ख्याति उनसे परिचय के पूर्व ही मैंने सुनी थी। प्रत्यक्ष चुनाव के माध्यम से चुने गए हुए डोंबिवली के वे पहले नगर पालिका अध्यक्ष थे। जब वे जनसंघ की टिकट पर इस पद पर चुने गए तब जनसंघ छोटा ही था। अपना व्यक्ति जब चुनकर आता है तब जैसी कार्यकर्ताओं में ख़ुशी होती है वैसी ही ख़ुशी मुझे भी हुई। मेरी दृष्टि में उस समय वे एक बहुत बड़े व्यक्ति थे। ऐसे बड़े व्यक्ति के साथ उनके सहकर्मी के रूप में मुझे विवेक का काम करना पड़ेगा ऐसा स्वप्न में भी नहीं सोचा था।  जो स्वप्न में नहीं होता वह प्रत्यक्ष में होता है, इसे ही नियति का खेल कहते हैं। सन् 1980 से विवेक नए रूप में प्रकाशित होने लगा। दिलीप करमबेलकर जी के साथ उस समय आबा साहब थे। विवेक की आर्थिक स्थिति कुछ अच्छी नहीं थी। उस काल में आबा साहब ने पूर्णकालिक कार्यकर्ता के नाते विवेक का काम किया। पूरे महाराष्ट्र का अनेक बार प्रवास किया। अलग-अलग आर्थिक स्रोत विवेक से जोड़ने का प्रयत्न किया। ‘इसमें मुझे क्या मिलेगा’, इसकी कोई अपेक्षा नहीं रखी। मान-सम्मान की अपेक्षा भी नहीं रखी। आगे चलकर मैं सह-संपादक, कार्यकारी संपादक और फिर संपादक बना। उन्होंने खुले दिल से मुझे स्वीकार किया और एक पालक के समान मुझे संभाल लिया। वैसे ही मेरी तारीफ़ करने में कभी कंजूसी नहीं की। उनके कारण ही मैं डोंबिवली में रहने गया। बोरीवली का मेरा मकान मात्र एक कमरे का था। बच्चे बड़े होने लगे थे, इसलिए कम से कम 2 कमरे तो आवश्यक थे। आबा साहब ने विट्ठलराव काले की स्टार कॉलोनी में वन रूम किचन की एक जगह बुक कर रखी थी। मैं वहां रहने गया। नया गांव, नई जगह होने के कारण अनेक अड़चनें निर्माण हुई। उस ओर आबा साहब की सूक्ष्म दृष्टि थी।

विवेक के काम में व्यस्त रहते, मुझे इन अड़चनों का सामना न करना पड़े इसका उन्होंने पूरा ध्यान रखा। पुत्रियों के शाला प्रवेश का प्रश्न उत्पन्न हुआ। बाबा साहब ने डोंबिवली के तिलक विद्यालय में बच्चियों को सहज प्रवेश दिलवा दिया। मैं चिंता मुक्त हो गया। लड़कियों की पढ़ाई कैसी चल रही है, कुछ अड़चन तो नहीं है, इसकी वह बीच-बीच में पूछताछ करते रहते थे। लेखक को इस प्रकार सांसारिक जंजीरों में फंसकर नहीं रहना चाहिए, इसका पूर्ण भान आबा साहब को था। इसलिए वह पालक के नाते अनेक बातें सहज रूप से करते रहते थे। डोंबिवली में उनका जनसंपर्क इतना ज्यादा था कि उसका परिमाण बताने हेतु शब्द भी कम पड़ जाएंगे। उनके साथ रास्ते पर चलने के कई प्रसंग आए। जहां पहुंचने में 10 मिनट लगते थे, वहां पहुंचने में 30-40 मिनट लग जाते। आबा साहब से अनेक लोग मिलते और प्रत्येक के साथ बात करने के लिए उनके पास कोई न कोई विषय होता था। आबा साहब सबके साथ प्रसन्नतापूर्वक बात करते थे। मैं उनके बाजू में शांत भाव से खड़ा रहता था। आबा साहब स्वतः एक चलती फिरती संस्था थे। डोंबिवली के सार्वजनिक जीवन में सभी महत्वपूर्ण सामाजिक संस्थाओं से उनके संबंध थे। अनेक संस्थाओं में वे पदाधिकारी थे। उस संस्था की सर्वांगीण उन्नति में उनका अमूल्य योगदान रहता था। ‘गणेश मंदिर संस्थान’ डोंबिवली की ग्राम देवता का स्थान। इस संस्थान के भी वे अनेक वर्षों तक अध्यक्ष रहे। मंदिर के सभागृह में डॉक्टर बाबासाहेब आंबेडकर के जीवन पर मेरा एक भाषण उन्होंने आयोजित किया था। यह एक बहुत साहसी निर्णय था। सामाजिक समरसता के प्रति भी वे मन से आस्थावान थे। समरसता मंच का काम कैसे चल रहा है, किन किन विषयों को हमने हाथ में लिया है, इसकी जानकारी वह मुझ से प्राप्त करते रहते थे। “गंभीर विषयों के अभ्यास वर्ग के लिए मुझे भी बुलायें”, ऐसा उनका आग्रह रहता था। यमगरवाड़ी का प्रकल्प प्रारंभ हुआ। बच्चों की संख्या बढ़ने लगी। अड़चनों के पहाड़ भी बड़े होने लगे। बच्चों के दोनों समय भोजन की व्यवस्था विशेष चिंता का विषय थी। एक बार मैंने आबा साहब से पूछा कि क्या गणेश मंदिर संस्थान की ओर से भक्तों से यमगरवाड़ी प्रकल्प के लिए अनाज इकट्ठा किया जा सकता है? यमगरवाड़ी में उस की नितांत आवश्यकता है। आबा साहब ने संस्था की बैठक में विषय रखा और केवल अनाज ही नहीं तो तेल, नमक, प्याज, मिर्ची, आलू, इस प्रकार का एक ट्रक सामान एकत्रित हुआ जिसे लेकर संस्था के पदाधिकारी यमगरवाड़ी गए। आबा साहब ने छ: माह की चिंता दूर कर दी थी। सबकी चिंता करने वाला यह निष्काम कर्मयोगी अब अनंत में विलीन हो गया है। उनका जाना असंख्यों को दु:ख देने वाला है पर इस के बावजूद भी उन्होंने जो विरासत रखी है, वह चिरंजीव है, अक्षय है। वे महान थे, परंतु, उन्होंने अपनी महानता का कभी दिखावा नहीं किया। इतना ही नहीं, उनके साथ रहने वाले कार्यकर्ताओं को उनकी महानता कभी बोझ भी नहीं बनने दी। यही उनका बड़प्पन है।

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