कोरोना की विध्वंसक लहर

शर्मनाक तो ऑक्सीजन जैसी सामान्य सुविधा का अकाल पड़ना है। बिस्तरों की उपलब्धता, चिकित्सा स्टाफ को सही प्रशिक्षण और उन्हें इस तनाव के हालात में बेहतर सेवा देने लायक सुविधाएं देने में हम नाकाम रहे। ज़ाहिर है कि हमारा चिकित्सा तानाबाना इस समय बेदम हो कर गिर रहा है।

इसे चेतावनी ही मान लें। कोरोना का आतंक और असर पिछले साल से कई गुना अधिक है। दिल्ली एनसीआर में अस्पतालों में बिस्तर नहीं हैं, ऑक्सीजन नहीं है, वेंटिलेटर का अकाल है। भोपाल, पुणे जैसे शहर मौत घर बने हैं। सिवनी, छिंदवाड़ा हो या लखनऊ, गुवाहाटी, मौत नाच रही है। श्मशान स्थल हों या कब्रिस्तान जगह कम पड़ गयी है। यह दु:खद है कि एक साल के लम्बे समय का इस्तेमाल हमने अनुभवों से सीखने, समाज को दीर्घजीवी बदलाव के लिए तैयार करने और चिकित्सा तन्त्र को चुस्त दुरस्त करने में नहीं किया। इस बीच वायरस अपने रूप बदलता रहा और हम नारे लगाते रहे। झूठी शान, आपदा के लिए तैयारी के बनिस्बत श्रेय लूटने के छिछोरेपन और प्रकृति के विपरीत खड़े होने की ज़िद ने आज हालात बहुत ग़मगीन कर दिए हैं।

इस बार का वायरस पिछले साल की तुलना में दो दर्जन बार रूप बदल चुका है। अतः यह इन्सान के रक्त कणिकाओं में अलग तरीके से कब्ज़ा कर रहा रहा है, आंखों में खुजली या पानी आना, पेट खराब होना या कई बार बुखार भी न आना और महज़ कमज़ोरी लगने का अर्थ भी है कि कोरोना वायरस आपके शरीर में प्रवेश कर चुका है। इस बार का वायरस इंसान के तरीकों को शायद भांप चुका है, सो वह इतना ताकतवर हो गया है कि एक संक्रमित व्यक्ति पांच मिनट में आठ से नौ लोगों को अपनी चपेट में ले रहा है। इसके बावजूद दिल्ली मेट्रो में भीड़ कम नहीं है। यह दु:खद है कि दिल्ली में मेट्रो में सीट पर तो एक छोड़ कर एक बैठना है, लेकिन, खड़े होने पर सट कर कंधे छीलती भीड़ पर कोई रोक नहीं है। जब कोरोना अपने रूप बदल कर गर्मी के माकूल मौसम का इंतज़ार कर रहा था, तब तीन महीने पहले यूरोप में कई जगह फिर से लॉकडाउन लगने ने जता दिया था कि अभी यह महामारी और रंग दिखायेगी, हम लोग जीडीपी, व्यापार और मार्च 2020 के पहले के जीवन में फिर से लौटने की जुगत लगा रहे थे।

बड़ा हल्ला हुआ कि हमने कोरोना की दवा को खोज लिया है और इस दवा से वायरसग्रस्त मरीज़ की जान बचायी जा सकती है। इधर होली के विदा होते ही कोरोना के पंजे भारत पर मज़बूत पकड़ बना रहे थे। दिल्ली-नोएडा में यह इंजेक्शन दस गुणा ज्यादा दाम पर मिला, इंदौर, अहमदाबाद और पुणे में इसके लिए कई किलोमीटर लम्बी कतारें दिखीं, जिसमें जाहिर है कि कोरोना गाईड लाईन का पालन भी नहीं हुआ। शर्मनाक तो ऑक्सीजन जैसी सामान्य सुविधा का अकाल पड़ना है। बिस्तरों की उपलब्धता, चिकित्सा स्टाफ को सही प्रशिक्षण और उन्हें इस तनाव के हालात में बेहतर सेवा देने लायक सुविधाएं देने में हम नाकाम रहे। ज़ाहिर है कि हमारा चिकित्सा तानाबाना इस समय बेदम हो कर गिर रहा है।

एक बात और, जिस जल्दबाज़ी में हमने टीका खोजने का जश्न मनाया, वह भी आम लोगों को भ्रमित और कोरोना के प्रति बेपरवाही के लिए प्रेरित करने वाला था, यह बताया नहीं गया कि इंसान एक या दोनों बार टीका लगवा कर भी निरापद नहीं है। यह टीका महज साठ फ़ीसदी ही सफल है, वह भी दूसरी डोज़ लगने के तीन हफ्ते बाद महज छः महीने के लिए।

हमारे तन्त्र की सबसे बड़ी विफ़लता बड़े शहरों से लोगों का पलायन रोक पाना रही है और जान लें इससे पिछ्ले साल भी और इस बार भी कोरोना संक्रमण का सबसे तेज विस्तार हुआ है। आज हर एक लाश का गुनाहगार हमारे हड़बड़ी मे उठाये गए कदम हैं, जिनके चलते पलायन के बाद लोग गाँव से शहर लौटे। चुनाव के लिए भीड़ जोड़ना, बगैर सोचे समझे बाजार-यातायात को सामान्य कर देना, शिक्षण संस्थान खोल देना जैसी, ऐसी गलतियां हैं जो देश को बहुत भारी पड़ेंगीं। अब हालात बेकाबू हैं-

* हम एक साल में वैक्सीन और कोरोना से निबटने की दवा खोजने का दावा करते रहे लेकिन आपातकाल में चिकित्सा तन्त्र की मजबूती के लिए काम नहीं कर पाए। एक साल बाद भी हम बिस्तर, ऑक्सीजन की कमी से जूझ रहे हैं।

* जान लें कि कोरोना के विस्तार से उन लोगों की दिक्कतें और बढ़ जाती हैं जो अन्य बीमारियों से ग्रस्त हैं दिल्ली एम्स हो या लखनऊ का मेडिकल कॉलेज, बड़ी संख्या में चिकित्सक संक्रमित हो गये हैं। वैसे ही हमारे यहां डॉक्टरों की कमी है, यह हालात कई अन्य रोगियों को बगैर ईलाज के लिए मरने को मज़बूर कर रहे हैं।

* हर मोहल्ले में वैक्सीन की तैयारी क्यों नहीं? सात साल से अधिक और 14 साल से कम के लोगों को घर में रहना अनिवार्य किया जाए, यदि प्रारंभ में केवल शहरी आबादी (जहां भीड़ के कारण संक्रमण तेज़ी से ़फैलता है) को सामने रखा जाए तो हमें लगभग 35 करोड़ लोगों को वैक्सीन देना होगा। इस योजना से क्यों काम नहीं हुआ? आज तीन महीने में महज छः फीसदी लोगों तक ही वैक्सीन पहुंची है, इस गति से तो हमें एक साल और लगेगा और तब तक न जाने कौन सा रूप धार कर यह वायरस नए सिरे से कहर बरपाए।

* कोरोना काल का वसूला गया स्पेशल फंड कहां गया जो अब लोगों से वैक्सीन के पैसे वसूले जा रहे हैं?

* ऑक्सीजन उत्पादन, वैक्सीन उत्पादन को क्यों नहीं बढ़ाया गया?

* अभी प्रकृति नहीं चाहती कि उसे फिर से दूषित करो, लेकिन, हमने लॉकडाउन को उसकी मर्जी के विपरीत पूरा खोल दिया और फिर गंदगी मचाना शुरू कर दी। एक साल में हमारे पास पलायन, दैनिक मज़दूर और मजबूर लोगों के आंकड़े थे। काश विज्ञापन पर पैसे फूंकने की जगह इन लोगों को नियमित राशन, घर से काम के विकल्प के लिए योजनाबद्ध काम किया जाता। सरकारी दफ्तर खोलने की जल्दी थी ताकि मलाईदार लोग फिर जुट सकें। आज भी कई निजी कम्पनियां वर्क फ्रॉम होम कर रही हैं और उनके स्टाफ का कोविड आंकडा लगभग शून्य है।

* लॉकडाउन तो करना होगा, लेकिन, पलायन होता है तो संक्रमण तेजी से फैलेगा। सरकार को अमेरिका की तर्ज़ पर असंगठित क्षेत्र के लोगों के खाते में सीधे धन भेजने, बाज़ार को एक चौथाई खोलने जैसी योजना पर विचार करना होगा, रात्रि कर्फ्यू महज़ पुलिस राज के परीक्षण के लिए है। भीड़ और बेपरवाही दिन में ज्यादा होती है। जान लें लापरवाह मत रहें, वायरस बहुत खतरनाक है, इस बार डिप्रेशन और बैचेनी ज्यादा बढ़ेगी, घर और दोस्तों को साथ बनाये रखें।

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