राष्ट्रीय एकात्मता की सिंधु दर्शन यात्रा

सिंधु नदी के तट पर सिंधु उत्सव मनाने और सिंधु दर्शन यात्रा करने वाले भारतीय भी अपने मूल से परिचित हों और लेह में दर्शन के लिए आएं जिससे वे अपने समृद्ध, अमूल्य एंव गौरवशाली प्राचीन धरोहर का सम्मान करें तथा गर्व से विश्व में अपना शीश ऊंचा रख सकें।

सिंधु दर्शन यात्रा का बीजारोपण तो सन् 1983-84 में ही हो गया था, जब रा.स्व.संघ के वरिष्ठ प्रचारक माननीय इंद्रेश कुमार को भारत का मुकुट कहलाये जाने वाले राज्य जम्मु-कश्मीर में प्रचारक का कार्यभार सौंपा गया। जम्मु-कश्मीर पहुंचने के कुछ महीनों के उपरान्त सन् 1984 में लेह यात्रा के दौरान सिंधु नदी के दर्शन से वो इतने अधिक मत्रंमुग्ध हुए कि उन्हें प्रतीत होने लगा जैसे मानो उनका जीवन धन्य हो गया हो। इस ऐतिहासिक रोमांचित घटना से वे बैचेन हो उठे। कई प्रश्न सामने आए जैसे कि क्यों हम भारतीय अपने मूल को भूल चुके थे? क्यों यह प्रदेश इतने लम्बे समय से अलग-थलग पड़ा था? हम कैसे अपने मूल की उपेक्षा कर सकते थे? कैसी विषमता थी कि एक ओर तो हम अपनी आने वाली हर पीढ़ी को बड़े गर्व से अपने मूल यानि सिंधु सभ्यता के बारे में ज्ञान दे रहे थे परन्तु, वहीं दूसरी ओर कड़वी एवं कठोर सच्चाई यह थी कि यह प्रदेश एवं यहां के निवासी पूर्णत: उपेक्षित थे। लेह में कुछ दिन रहने के उपरान्त माननीय इंद्रेश कुमार ने यह अनुभव किया कि यह पूरा प्रदेश जो कभी वैदिक मान्यताओं का ढृढ़ अनुयायी था एक समग्र बदलाव की ओर अग्रसर हो रहा था। वहां के लोगों का धीरे-धीरे बौद्ध धर्म की ओर तथा इस्लाम आक्रमण के बाद, इस्लाम की ओर झुकाव बढ़ रहा था। अत: समय की मांग थी कि हम राष्ट्रीयता, संस्कृति के प्रति भाईचारे का भाव विकसित करने के लिए उनका विश्वास पुन: प्राप्त करें। उसके लिए आवश्यक था कि स्नेह एंव विश्वास के रिश्ते को गहरा किया जाए ताकि उन्हें पुन: यह विश्वास हो सके कि वे सब भी भारत एवं भारतीयता की प्रमुख धारा के अहम् भागीदार हैं।

इतिहास से संदर्भ लेते हुए श्री इंद्रेश कुमार ने महसूस किया कि सभ्यताओं का जन्म सदा नदियों के किनारे पर ही हुआ है और प्राचीन काल में महान विद्वानों न समाज का गहन अध्ययन करने तथा उनकी सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक जानकारी एकत्रित करने के लिए व्यापक यात्राएं की थी। इसी के साथ इस विचार ने जन्म लिया कि क्यों ने भारत के सभी कोनों से या सभी राज्यों के निवासियों को लेह-लद्दाख लाया जाए ताकि सभी समुदाय एक दूसरे की सस्कृंति, भाषा आदि से परिचित हो। उन्होंने जम्मू-कश्मीर की सुदूर एवं व्यापक यात्रा कर वहां की जनता के अलावा उनके सहयोगियों के साथ-साथ सामाजिक और आर्थिक रूप से सक्रिय लोगों से भी इस विचार पर संवाद किया। ईश्वर की कृपा से, 1989 में डॉ. हेडगेवार की सौवीं जयंती के शुभ अवसर पर उनके मन की आवधारणा को गति मिली जब समारोह के लिए हिन्दुस्तान में बहने वाली सभी नदियों का पवित्र जल नागपुर लाया गया तो, यह जानकर कि सिंधु नदी का जल भी लाया गया है, बहुत से लोगों को सुखद आश्चर्य हुआ व विभाजन के बाद सिंधु नदी भारत में बह रही हैं। अत: इस प्रकरण से हिन्दू मूल की ओर बहुत सारे लोगों का ध्यान गया और सिंधु नदी के महत्व तथा उसके महत्व को पुर्नजीवित करने के बारे में सोचा गया। सिंधु नदी के तट पर सिंधु उत्सव मनाने और सिंधु दर्शन यात्रा करने वाले भारतीय भी अपने मूल से परिचित हों और लेह में दर्शन के लिए आएं जिससे वे अपने समृद्ध, अमूल्य एंव गौरवशाली प्राचीन धरोहर का सम्मान करें तथा गर्व से विश्व में अपना शीश ऊंचा रख सकें। संयोग से श्री लालकृष्ण आडवाणी जी तत्कालीन गृहमंत्री थे 1996 में चुनाव प्रचार के लिए लेह आए। तत्कालीन लेह क्षेत्र की संसदीय प्रत्याक्षी सुश्री स्पेल्जेश अंगमों ने आडवाणी जी से मुलाकात की। उस समय आडवाणी जी, तरूण विजय के साथ सिंधु नदी के तट पर बने बिजली विभाग के रेस्ट हाउस चोगलमसर में रूके हुए थे। अगले दिन लेह के कार्यकर्ता उनसे नाश्ते की मेज़ पर मिले तथा श्री आडवाणी जी को सिंध ख्वाब (सिंधु का उद्गम स्थल) के बारे में बताया, उन्होंने यह भी बताया कि सिंधु नदी रेस्ट हाउस के पास से होकर बह रही हैं। यह जानकर श्री आडवाणी जी अत्यंत उत्साहित हुए और वहां जाने की इच्छा व्यक्त की। यह जानकर श्री आडवाणी जी, तरूण विजय, ताशी सैम्पल, तांगे थारिक, सेंरिग ताशी के साथ सिंधु नदी के किनारे गये। सिंधु नदी के तट पर पहुंचाने के बाद उन्होंने सर्वप्रथम पवित्र जल से आचमन किया और अत्यन्त अभिभूत हो गये। उन्हीं के शब्दों में, “यह एक दिव्य क्षण था, मुझे लगा जैसे मेरी मां मुझ पर आशीर्वाद बरसा रही है”। लेह में श्री लालकृष्ण आडवाणी जी की यात्रा के उपरान्त श्री इंद्रेश कुमार और तरूण विजय दिल्ली में श्री आडवाणी जी से मिलने गये और उनके साथ सिंधु दर्शन यात्रा की पूरी अवधारणा पर चर्चा की। श्री आडवाणी जी की एक हां ने इस यात्रा के प्रस्ताव में रंग भर दिए और कार्यकर्ताओं ने उसे उचित आकार देना आरम्भ कर दिया। आरम्भ में जब बौद्ध समुदाय को इस यात्रा की योजना बनाए जाने का ज्ञान हुआ तो उन्होंने खुलकर इस यात्रा का विरोध किया उन्हें यह सन्देह हुआ कि शायद संघ वाले उनके धर्म परिर्वतन का कोई प्रारूप बना रहे हैं। उन्होंने कहा कि वे सिंधु जल के दो टैंकर दिल्ली भेजने को तैयार हैं-एक भाजपा मुख्यालय और दूसरा राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ कार्यालय के लिए लेकिन उनकी शांति भंग न की जाए। श्री इंद्रेश कुमार व उनके साथियों को उन्हें समझाने और आश्वस्त करने में महीनों लग गए कि संघ की ऐसी कोई मंशा नहीं है। हांलाकि यह एक अत्यन्त कठिन कार्य था लेकिन आख़िरकार यह टीम उनका भरोसा जीतने में सफ़ल हुई।

पहले इस तीर्थयात्रा का नाम था सिन्धु दर्शन अभियान, फिर नाम पड़ा सिन्धु स्नान पर्व। किन्तु, अभी तक के नामकरण से इतना तो स्पष्ट है कि यह तीर्थ और कोई नहीं, वही प्राचीन और पवित्र सिन्धु नदी है जिसके तट पर वैदिक संस्कृति पल्लवित हुई थी, जिस नदी ने हमारे देश को नाम दिया, हमें हमारी सांस्कृतिक पहचान दी। सहस्त्राब्दियों से यह नदी हमारी चेतना में बसी हुई थी, हमारी श्रद्धा का केन्द्र थी। नदी सूक्त में प्रतिदिन हम उसका स्तवन करते आ रहे थे, किन्तु, 1947 में देश-विभाजन से हम समझ बैठे थे कि हमारी संस्कृति की प्रवाहिका यह पवित्र नदी हमसे छिन कर पाकिस्तान के अधिकार में चली गयी है, उसके पवित्र जल में अब हम स्नान नहीं कर सकेंगे, उसके तट पर बैठकर हम अपनी गौरवमयी इतिहास यात्रा का पुण्य स्मरण नहीं कर सकेंगें, मानो हमसे हमारा नाम छिन गया है, हमने अपनी पहचान खो दी है। 1997 की पहली यात्रा में केवल 65 श्रद्वालु उपस्थिति थे तो 1998 में 500 यात्रियों ने इस यात्रा में भाग लिया। बढ़ते-बढ़ते आज यह संख्या हज़ारों तक पहुंच गयी है व जिसमें लगभग देश के बारह राज्यों का प्रतिनिधित्व होता है। उसके बाद तो संख्या महत्वपूर्ण नहीं रह गयी, सिन्धु मां से मिलने को भाव-विह्वल देशवासी सिन्धु दर्शन का हर वर्ष बेसब्री से इतंज़ार करने लगे। शुरू में भारत सरकार के पर्यटन विभाग ने अपनी धनशक्ति व मानवशक्ति लगाकर पूरे देश को अब तक उपेक्षित पड़े देश के इस हिस्से के बारे में बताया, चाहे वह सूचना विभाग द्वारा हो या वेबसाइट पर। सन् 2000 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी ने सिन्धु दर्शन के जरिये लेह-लद्दाख के विकास के नए मार्ग खोल दिए, लेह में तीन करोड़ की लागत से बनने वाले सिंधु सांस्कृतिक केंद्र व दस एकड़ धरती पर सात करोड़ की लागत से बनने वाले केन्द्रीय बौद्ध अध्ययन संस्थान की भी आधारशिला रखी। इसके अलावा प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी बाजपेयी ने दिल्ली से लेह वाया मनाली आने वाले रास्ते में मुख्य अवरोधक रोहंताग पास बनाने की भी घोषणा की ताकि देश के किसी भी कोने से लेह तक का रास्ता पूरा साल चलता रहे जिससे अधिक से अधिक लोग लद्दाख जा सकें व लद्दाख की सभ्यता और बौद्ध संस्कृति के बारे में जान सकें व पर्यटन से लद्दाख की आर्थिक तरक्की भी हो। इस अटल टनल का उद्धघाटन हाल ही में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वंय किया है। लेकिन, सन् 2004 में आते-आते केन्द्र के सत्ता परिवर्तन के साथ ही इस यात्रा पर राजनीति के बादल छाने लगे तो यात्रा के सूत्रधारों ने यह निर्णय लिया कि इस यात्रा को राजनीति के पंजे से मुक्त कर इसे हर देशवासी की अपनी यात्रा बनाना है जिस तरह काशी व हरिद्वार जाने के लिए किसी पर्यटन विभाग की ज़रूरत नहीं होती तो फिर लेह जाने के लिए क्यों? लेह के मौसम के अनुसार लोगों को सूचना देना व लेह में यात्रियों के लिए अनुकूल माहौल बनाना एक महत्ती कार्य था सो इसलिए सन् 2005 के जून माह में सिन्धी भाषियों की एक शीर्ष सामाजिक संस्था भारतीय सिन्धु सभा के तत्वाधान में सिन्ध व सिन्धु दर्शन यात्रा समिति का गठन किया गया। यद्यपि यह नौंवी सिन्धु दर्शन यात्रा थी पर इसे हम पहली बगैर सरकारी सहयोग के पूर्ण की गई सामाजिक व धार्मिक सिन्धु दर्शन यात्रा कह सकते है। इस यात्रा में केवल 68 तीर्थ यात्री थे जिसमें 3 यात्री गैर सिन्धी व बाकी 65 सिन्धी भाषी थे जिन्हें मां सिन्धु का प्यार लेह खींच लाया था। सरकारी सहयोग न होने के कारण दिल्ली से लेह वाया मनाली जाने में यात्रियों को काफी कष्ट उठाने पड़े इससे हमें यह आभास हुआ क्यों पिछले समय में तीर्थाटन में लोगों को वर्षों लग जाते थे। परन्तु यह कष्ट मां सिन्धु को देखते व इसका स्पर्श करते ही दूर हो गया। यात्रा सफ़ल रही, लेह के लोगों ने इस सिन्धु दर्शन दल का तहेदिल से स्वागत किया व यह विश्वास दिलाया कि इस सिन्धु दर्शन के लिए वह यात्रियों की हर संभव सहायता के लिए तत्पर रहेगें। सन् 2006 में आयोजकों व संयोजकों ने इस यात्रा में अन्य सामाजिक संगठनों को भी जोड़ दिया। हिमालय परिवार, धर्मयात्रा महासंघ व लद्दाख कल्याण संघ आदि सिन्धु दर्शन यात्रा समिति के घटक बन गए। यात्रा का स्वरूप वहृद हो गया। सनातन धर्म सभा, जम्मू ने यात्रा को दिल्ली की बजाए जम्मू से शुरू करवाने का प्रस्ताव दिया। उनका मानना था कि यात्री लेह जाने के लिए श्रीनगर व कारगिल के भी दर्शन कर सकें। समिति मान गई, 20 जून, 2006 को कुल 130 यात्री कश्मीर में फैले आंतकवाद को ठेंगा दिखाते हुए जम्मू में एकत्रित हो गए व बाकी 100 यात्री हवाई मार्ग द्वारा लेह पहुंच गए। यह क्या? समिति के सूचना के बगैर भी लगभग विभिन्न सामाजिक संगठनों के 150 यात्री लेह पहुंच गए, यह है समाज की अपनी शक्ति। यह मां सिन्धु का दिया हुआ आत्मिक बल ही था जो यात्री स्वंय तन-मन-धन की शक्ति के साथ आंतकवाद की परवाह किए बगैर ‘जय मां सिन्धु’ व ‘आयोलाल झूलेलाल’ के उद्घोष के साथ लेह पहुंच गए।
सन् 2007 में भी जून माह के नजदीक आते ही आयोजकों की नींद उड़ गई क्योंकि पहली बार इतने ज्यादा लोगों ने यात्रा के लिए आवेदन कर दिया कि 20 मई को पंजीकरण बंद करना पड़ा। लगभग 100 लोग हवाई मार्ग से व 250 लोग सड़क मार्ग के लिए पंजीकृत हो चुके थे। जैसा कि पिछले वर्ष हुआ था, इस वर्ष भी कोई 150 यात्री बगैर सूचना दिए लेह पहुंचे थे। 2008 में सिन्धु दर्शन यात्रा ने नए आयाम जोड़ लिए। सिन्धु दर्शन यात्रा समिति के घटक लद्दाख कल्याण संघ के लोगों द्वारा लेह में सिन्धु किनारे ज़मीन खरीदी गई व माननीय मोहनराव भागवत जी व हिमाचल के मुख्यमंत्री श्री प्रेमकुमार धूमल ने स्वयं प्रस्तावित सिन्धु भवन का भूमि पूजन किया। 2010 में राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधराराजे ने तो इस भवन की नींव रख दी। और, 2012 में 16वीं यात्रा के समय इस भवन का भूतल व पहली मंजिल बनने को तैयार था। 2016 की यात्रा में भारत के पूर्व उपप्रधानमंत्री व सिंधु पुत्र लालकृष्ण आडवाणी द्वारा इस भवन का लोकार्पण हो चुका है व अब भी इसके संग्रहालय व अन्य कई कार्य बाकी हैं। लगभग 3 से 5 करोड़ की लागत वाले इस भवन के लिए पूरे देश ने दिल खोलकर दान दिया है व दे भी रहे हैं। आने वाली 2021 की 25वीं सिन्धु दर्शन यात्रा यात्रा लेह में सिंधु के किनारे प्रथम सिंधु महाकुम्भ के नाम से भव्य रूप से आयोजित होने जा रही है। वस्तुत: इस युग में इस नए कुम्भ को जन्म लेते हुए हम सब देखेगें। अब इस सब को देखकर यही कहा जाए कि इससे ज्यादा राष्ट्रीय एकता का क्या प्रमाण माना जाए कि लेह जैसे दुर्गम माने जाने वाले इस स्थल पर मां सिन्धु के दर्शन व स्पर्श पाने के लिए लोग पहुंचे हैं। इसमें सिन्धी भी थे तो मराठी भी। इसमें हिन्दी भाषी भी थे तो दक्षिण भारत भाषी भी। इसमें हिन्दू व बौद्ध थे तो सिक्ख व मुस्लिम भी। अब तो ऐसा लगता है कि जिस तरह श्रद्वालु हरिद्वार या काशी जाकर मां गंगा में स्नान करने के लिए सब कष्ट सहने के लिए आतुर रहते हैं, उसी प्रकार वह दिन दूर नहीं जब लेह में श्रद्वालु मां सिन्धु में भी अपनी उसी श्रद्धा के साथ जुटने लगेंगें। श्री देवेन्द्र स्वरूप जी भी अपने शब्दों में कहते हैं कि धीरे-धीरे यह तीर्थ समस्त देशवासियों को पुन: भारत की सांस्कृतिक यात्रा की साक्षी सिन्धु नदी से जोड़ देगा।

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