फैसला

राजन बाबू आज ही कनाडा से लौटे हैं। कनाडा में उनका शाकाहारी रेस्टोरेन्ट है। वे रमन के मित्र हैं। इसलिए वे रमन से मिलने रमन के घर पहुँचे परन्तु सन्ध्या ने उन्हें बताया कि वे संन्यास लेकर सिद्धेश्वर मंदिर में ही रहते हैं। अब वे घर नहीं आते। यह सुनकर राजन बाबू सिद्धेश्वर मंदिर की ओर चल दिए। रास्ता चलते हुए वे सोच रहे थे कि ऐसा क्या हुआ होगा, जिसने रमन को संसार और परिवार से विरक्त कर दिया।

वह रमन के सद्व्यवहार, उत्तम चरित्र, सादगी एवं प्रेम से युक्त मृदुल व्यवहार से परिचित थे। इसके अतिरिक्त रमन अपनी पत्नि संध्या और बच्चों से बहुत प्रेम करता था। सारी दुनिया के सामने वह अपनी पत्नि और बच्चों की बातें करते था। जब भी उसकी राजन बाबू से बातें होतीं अथवा वह उनको पत्र लिखता था, तब भी वह संध्या की अच्छाइयों के विषय में ही बताता था। राजन बाबू का मन कह रहा था कि निश्चित ही रमन के इस फैसले के पीछे कोई बड़ा कारण होगा। लोग जिन्हें झरना कहते हैं, वे सच में पत्थरों के आँसू हैं परन्तु इसका अंदाजा लगाना अधिकांश लोगों के लिए मुश्किल है; जबकि रमन तो बहुत ही कोमल स्रदय वाला व्यक्ति है। राजन बाबू यह सोचते हुए उसके अतीत की स्मृतियों में खो गए।

रमन एक मेधावी छात्र था। वह विद्यालय की पढ़ाई पूरी कर कॉलेज में पढ़ा। इसके बाद वह एक प्राथमिक विद्यालय में अध्यापक हो गया। इस सभी के दौरान उसने कभी किसी लड़की की ओर आँख उठाकर भी नहीं देखा। कितनी ही लड़कियां उसकी सादगी पर जान छिड़कती थीं। परन्तु उसने किसी को मित्रवत भी स्वीकार नहीं किया। कलियुगी श्रवण कुमार जो था। कठोर परिश्रम कर माता-पिता और भाई-बहन को सुखी रखना ही उसका उद्देश्य था। अपने भविष्य के रूप में आई.ए.एस. करना ही उसका सपना था।

रमन के पिताजी ने संध्या के पिताजी को बिना रमन से बात किए ही शादी की सहमति दे दी थी। रमन ने शादी के लिए बहुत मना किया परन्तु पिता जी रमन की कोई दलील मानने को तैयार न थे। इसलिए रमन को संध्या के साथ शादी के बंधन में बँधना पड़ा और वैवाहिक रिश्ते का सम्मान करने के लिए उसका आई.ए.एस. बनने का सपना चूर-चूर हो गया।

कुछ दिन बाद पिताजी ने रमन से कहा- “अब तुम्हारी शादी हो चुकी है। इसलिए इस घर को छोड़कर कहीं भी चले जाओ और अपना परिवार स्वयं चलाओ।”

यद्यपि रमन या संध्या का कोई दोष नहीं था फिर भी रमन ने कलियुगी राम बनकर पिता की आज्ञा का पालन किया और वनवास के समान घर से अलग होना स्वीकार किया। इस अवधि में उसने संध्या को इतना प्यार दिया कि शायद शादी से पहले पूरे जीवन में उसे इतना प्यार न मिला होगा। इतना प्यार किसी प्रेमी ने भी शायद अपनी प्रेमिका से न किया होगा। रमन उसके हर दुख-सुख का पूरा ध्यान रखता था। संध्या बीमार हुई तो रमन ने जी-जान लगाकर संध्या की सेवा-सुश्रूषा की।

राजन बाबू यह सोच ही रहे थे कि रोशनी काकी आ पहुँची। राजन बाबू ने रोशनी काकी को राम-राम की। रोशनी काकी ने राम-राम लेकर पूछा- “कैसे हो राजन? क्या सोच रहे हो?

रोशनी काकी के प्रश्न का उत्तर देते हुए वे बोले- “ठीक हूँ काकी! रमन से मिलने आया हूँ; पर सुना है, वह संन्यासी हो गया है।”
रोशनी काकी बोली- “बात तो सही है।”

राजन बाबू ने प्रश्न किया- “काकी! इसका क्या कारण रहा होगा?”
रोशनी काकी ने उत्तर दिया- “राजन बाबू! मैं उनके घर खाना बनाने जाती थी, तब जो देखा और समझा वही बता रही हूँ। काकी ने बताना शुरू किया- “रमन ने हमेशा झूठ से नफरत की है और सच से प्रेम। यह तो आप भी जानते हैं कि वह सबसे प्रेम करते हैं और कभी किसी से उन्होंने स्वयं कुछ नहीं छुपाया।”

राजन बाबू रास्ता चलते-चलते काकी की बात गम्भीरता से सुन रहे थे। काकी ने आगे कहा- “संध्या के घर वाले और स्वयं संध्या का व्यवहार ठीक नहीं है। संध्या के घर वालों ने कभी रमन से कुशल क्षेम तक नहीं पूछी। संध्या पूरे-पूरे दिन घरवालों से फोन पर बात करती थी परन्तु कभी रमन के विषय में कोई बात नहीं की। चलो, यहाँ तक तो ठीक है परन्तु संध्या के परिवार वाले और रिश्तेदार आते तो संध्या रमन को यह भी नहीं बताती थी। इस तरह आठ साल बीत गए। रमन का बेटा कृष्णा भी बड़ा हो रहा था। एक दिन जैसे ही रमन घर लौटे, कृष्णा ने उन्हें बताया – “मामा आए थे।”

रमन ने संध्या से पूछा तो उसने हमेशा की तरह अनसुना कर दिया। उस दिन रमन ने भी जिद पकड़ ली, वह बोला- “मैं तो तुम्हारे परिवार का सहयोग ही करता हूँ फिर मुझसे छुपाती क्यों हो, चाहे कुछ भी हो, आज तो तुम्हें बताना ही पड़ेगा।”
सन्ध्या ने कहा- “मुझे अपने व्यक्तिगत जीवन में किसी की दखलंदाजी पंसद नहीं। तुम कान खोल कर सुन लो। मैं नहीं बता सकती कि कब कौन आता है और कौन जाता है।”

“राजन बाबू! रमन उसी दिन घर छोड़कर निकल गए और संन्यासी हो गए। मैंने भी उसी दिन से उनके घर जाना छोड़ दिया है।”
रोशनी काकी की बात सुनते हुए राजन बाबू सिद्धेश्वर मंदिर पहुँच गए। वहाँ जाकर देखा तो रमन ध्यानस्थ थे। राजन बाबू थोड़ी देर बैठे तो रमन के नेत्र खुले। राजन बाबू कुछ कहते इससे पहले ही रमन ने कहा- “यह संसार मिथ्या है, केवल ईश्वर ही सत्य है, वही प्रेम के योग्य है। उसी से प्रेम करो। पिता-माता, गुरू, बन्धु-बान्धव, प्रेमी, पति-पत्नी, पुत्र-पुत्री आदि सम्बन्ध, इस आत्मा के उस परमात्मा से ही संभव हैं।”
राजन बाबू यह सब सुनकर समझ गए कि रमन की लगन ईश्वर में लग चुकी है, अब उसे संसार में लाना संभव नहीं है। अत: वह उठे और रमन को प्रणाम कर अपने घर की ओर लौट गए।

 

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