क्या फिर बनेगी भाजपा की सरकार?

बालासाहेब ठाकरे के विचारों एवं नीतियों को तिलांजलि देकर जिस तरह से उद्धव ठाकरे ने अपनी कट्टर विरोधी पार्टियों कांग्रेस-राकांपा से हाथ मिलाया है, वही उनको धूल में मिला सकते हैं। कांग्रेस-राकांपा उद्धव ठाकरे के समक्ष आए दिन चुनौतियां पेश कर रहे हैं। यह बात उन्हें जितनी जल्दी समझ में आ जाये यह उनके लिए अच्छा है। बहरहाल वह इससे कैसे निपटते हैं यह उनके राजनीतिक अनुभव व रणकौशल पर निर्भर है।

मध्य प्रदेश में भाजपा की सरकार बनने के बाद अब सभी की नज़रे महाराष्ट्र की ओर टिकी हुई है। राजनीति का समीकरण कब कैसे बदल जाये, कुछ कहा नहीं जा सकता। शिवसेना, राकांपा और कांग्रेस के गठबंधन से बनी सरकार राज्य में कब तक टिकेगी यह तो अभी भविष्य के गर्त में छुपा हुआ है। अभी इस पर कुछ कहना ठीक नहीं है लेकिन जिस तरह से इन तीनों पार्टियों में रस्साकसी जारी है उसे देख कर तो लगता है राज्य में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। विरोधी पार्टियां कह रही है कि केवल दाल में कुछ काला नहीं बल्कि पूरी दाल ही काली है। आईए राज्य में चल रहे राजनीतिक घमाशन पर नजर डालते है…

मतभेद नहीं, मनभेद है !

कांग्रेस, राकांपा और शिवसेना में केवल वैचारिक अंतर ही नहीं है बल्कि मतभेद के साथ मनभेद भी है। शिवसेना कट्टर हिन्दुत्वादी विचारधारा को माननेवाली राजनैतिक पार्टी मानी जाती है। वही दूसरी ओर कांग्रेस व राकांपा सेक्युलर एवं मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए जानी जाती है। धीरे – धीरे उद्धव ठाकरे सरकार के कामकाज की परत दर परत खुलती जा रही है और उनके आपसी खींचातान की खबरे सामने आने लगी है। उनमें आपसी घमाशान की स्थिति ये है कि कोई भी मंत्री या नेता अपनी मनमानी करने पर तुला हुआ है। इनका आपस में कोई तालमेल दिखाई नहीं दे रहा। उदाहरण के तौर पर नवाब मालिक के मुस्लिम आरक्षण की घोषणा को ही ले लीजिये।

संविधान के विरुद्ध है जातिगत मुस्लिम आरक्षण

अल्पसंख्यक विकास मंत्री नवाब मालिक ने बिना किसी चर्चा व सहमती के एकतरफा यह घोषणा कर दी थी कि मुस्लिमों को आरक्षण दिया जायेगा। इसके तुरंत बाद कांग्रेस ने भी श्रेय लेने में देरी नहीं की और कांग्रेस के राजस्व मंत्री बालासाहब थोरात ने कहा कि मुस्लिमों को आरक्षण देने का मूल विचार कांग्रेस का ही है। उन्होंने आगे कहा कि मुस्लिमों को आरक्षण देने का प्रस्ताव सर्वप्रथम तत्कालीन कांग्रेस सरकार के दौरान ही लाया गया था। लेकिन मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को यह बात नागवार गुजरी और उन्होंने इसे सिरे से ख़ारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि ऐसा कोई प्रस्ताव हमारे सामने नहीं लाया गया है। इसके बाद शिवसेना के कद्दावर नेता व मंत्री एकनाथ शिंदे ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि तीनों दलों के नेता मिलकर ही कोई निर्णय करेंगे। वैसे बता दें कि जाती के आधार पर आरक्षण देना संविधान के विरुद्ध है।

सता रहा महाराष्ट्र सरकार की अनिश्चितता का डर

शिवसेना के दोनों साथियों कांग्रेस और राकांपा को भी महाराष्ट्र सरकार की अनिश्चितता का डर सता रहा है। इसलिए वोट बैंक को सुरक्षित रखने एवं मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति का पालन करते हुए जल्द से जल्द मुस्लिमों को आरक्षण देकर कांग्रेस व राकांपा अपने-अपने वादों पर खरा उतरना चाहती है ताकि भविष्य में भी उन्हें मुस्लिम वोट बैंक का लाभ मिलता रहे। वहीं दूसरी ओर उद्धव ठाकरे इनकी रणनीति को समझते हुए अपने कार्यकाल में मुस्लिमों को आरक्षण देने से बचना चाहते है। भाजपा भी इसी मौके के तलाश में है कि उद्धव से कोई गलती हो और उन्हें घेरा जाए। पूर्व मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस ने विरोध करते हुए कहा है कि संविधान में धर्म के आधार पर आरक्षण का कोई प्रावधान नहीं है। यदि मुस्लिमों को आरक्षण दिया गया तो वह असंवैधानिक होगा और ओबीसी व मराठा आरक्षण पर अतिक्रमण होगा। भाजपा के प्रखर विरोध को देखते हुए उद्धव ठाकरे मुस्लिम आरक्षण पर अपने पैर पीछे खींचना चाहते है लेकिन कांग्रेस और राकांपा उन पर दबाव बनाये हुए है। आरपीआई नेता रामदास आठवले ने इस बाबत कहा है कि मुस्लिम आरक्षण का पासा फेंक कर राकांपा व कांग्रेस उद्धव ठाकरे को फांसना चाहते है। उन्होंने शिवसेना को मुस्लिम आरक्षण का विरोध करने और फिर से भाजपा के साथ आने की सलाह दी है।

अर्बन नक्सलियों को क्यों बचाना चाहती है महाराष्ट्र सरकार?

राज्य में नक्सलियों ने सबसे अधिक हिंसा, हमले और हत्याएं की है, बावजूद इसके उन्हें वैचारिक रूप से सपोर्ट करने वाले अर्बन नक्सलियों को महाराष्ट्र सरकार बचाना चाहती है। राज्य में सरकार बनते ही राकांपा अध्यक्ष शरद पवार लगातार अपने पद, पावर, प्रभाव का दुरूपयोग करते हुए उद्धव ठाकरे पर दबाव डालते हुए भीमा कोरेगांव हिंसा मामले में आरोपी एल्गार परिषद् के अर्बन नक्सलियों को बचाने का प्रयास कर रहे है। जबकि पुलिस जाँच में यह स्पष्ट हो गया है कि जातीय हिंसा भड़काने में अर्बन नक्सली मुख्य रूप से जिम्मेदार है। ऐसे में यह सवाल उठता है कि शरद पवार आख़िरकार अर्बन नक्सलियों की पैरवी क्यों कर रहे है? उन्हें बचाने के लिए इतने आतुर क्यों है? आखिर क्या कारण है जो शरद पवार भीमा कोरेगांव मामले में इतनी दिलचस्पी दिखा रहे है? क्या शरद पवार का नक्सलियों से कोई गुप्त संबंध है? इस मामले की संवेदनशीलता व गंभीरता को देखते हुए सामाजिक संगठन ‘विवेक विचार मंच’ ने शरद पवार से पूछताछ करने की मांग जांच एजेंसियों से की है। बता दे कि भीमा कोरेगांव आयोग ने शरद पवार को समन भेज कर आगामी 4 अप्रैल को पूछताछ के लिए पेश होने का आदेश दिया है। हाल ही में भीमा कोरेगांव हिंसा मामले की जांच एनआईए को सौपने के बाद शिवसेना और राकांपा में तनातनी बढ़ गई थी। जिसे लेकर शरद पवार ने उद्धव ठाकरे के निर्णय पर नाराजगी जताते हुए अपने पार्टी के सभी 16 मंत्रियों की बैठक बुलाई थी। इसके अलावा शरद पवार ने मोदी सरकार पर यह जांच अपने हाथ में लेने का आरोप लगाया था और कहा था कि महाराष्ट्र सरकार भीमा कोरेगांव मामले में कुछ निर्णय लेने वाली थी, इसलिए केंद्र सरकार ने एल्गार परिषद के मामले को अपने हाथ में ले लिया। जबकि कानून व्यवस्था राज्य सरकार के हाथ में होनी चाहिए। लेकिन इसमें आश्चर्य की बात है कि उद्धव ठाकरे ने केंद्र सरकार के इस निर्णय का विरोध नहीं किया।

एनपीआर पर भी शिवसेना – राकांपा में रार

देश की कांग्रेस सहित सभी विरोधी पार्टियों ने केंद्र सरकार के निर्णयों, नीतियों एवं कानूनों का विरोध करने की रणनीति बनाई है, भले ही इससे सम्बंधित प्रस्ताव कांग्रेस के शासनकाल में ही क्यों न लाया गया हो। इसी के तहत राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) का भी महाराष्ट्र में कांग्रेस – राकांपा विरोध कर रही है। लेकिन राष्ट्रवाद की प्रबल समर्थक रही शिवसेना ने एनपीआर का समर्थन कर दिया है। जिससे एक बार फिर राकांपा और शिवसेना के बिच तल्खी बढ़ गई है। गौरतलब है कि मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने 1 मई 2020 से राज्य में एनपीआर की प्रक्रिया शुरू करने की बात कही थी और केंद्र सरकार ने भी प्रक्रिया शुरू करने के लिए 1 मई 2020 की तारीख दी थी। बहरहाल सत्ता की मलाई खाने के लिए एक दुसरे की धुर विरोधी पार्टियों ने हाथ जरुर मिला लिया है लेकिन किसी का भी दिल नहीं मिल रहा है। आलम यह है कि तीनों ही पार्टियां एक दुसरे के खिलाफ चुनौतियां पेश कर रही है। इस उठापटक में तीनों ही पार्टियों के नेता एक दुसरे से बेहद नाराज है। खासकर शिवसेना के नेता अपने विचारों की उपेक्षा से काफी खफा है और वे कभी भी ग़दर कर सकते है। कमोबेश यही स्थिति कांग्रेस – राकांपा की भी है। जिसका फायदा मध्यप्रदेश की तरह भाजपा को महाराष्ट्र में भी मिल सकता है, ऐसी संभावना राजनीति के जानकार जता रहे है। भाजपा भी इसी तरह के किसी अवसर की तलाश में है।

महाराष्ट्र में बदलते राजनीतिक समीकरण

सत्ता में आते ही मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे कुछ बदले – बदले से दिखाई दे रहे है। सभी लोग एक स्वर में कह रहे है कि शिवसेना अब पहले जैसी नहीं रही, जैसे बाला साहेब ठाकरे के समय थी। सभी को बालासाहेब ठाकरे की कमी बहुत खल रही है। जिस तरह भाजपा के साथ सरकार में रहते हुए शिवसेना अपने मुखपत्र सामना के जरिये प्रधानमंत्री मोदी व मोदी सरकार एवं देवेन्द्र फड़नवीस सरकार के खिलाफ आग उगलती थी, टिका टिप्पणी एवं आलोचना करती थी। उस तरह की आलोचना अब कांग्रेस – राकांपा के खिलाफ करने का साहस उनमें नहीं रहा। यहां तक की मनमानी करने वाले नवाब मालिक, जीतेन्द्र आव्हाड जैसे नेताओं के खिलाफ भी उनके मुंह में दही जम गई है। शरद पवार, सोनिया गांधी, राहुल गांधी आदि नेताओं के खिलाफ सामना में कोई कटाक्ष भरी खबर भी नहीं आ रही है। शायद अब अभिव्यक्ति की आजादी और मीडिया के आलोचना के अधिकार उनके पास नहीं रहे या उनसे छीन लिए गए है इसलिए वह कुछ बोलने की स्थिति में नहीं है। खैर मनसे प्रमुख राज ठाकरे ने भगवा झंडा अपनाने के बाद खुलकर हिंदुत्व के मुद्दे पर आ गए है। आनेवाले समय में निश्चिन्त रूप से वह शिवसेना के लिए बड़ी चुनौती पेश करेंगे। महाराष्ट्र की जनता उनमें स्व. बालासाहेब ठाकरे का अक्स देख रही है और उनसे बालासाहेब की तरह भूमिका निभाने की आशा कर रही है। राज ठाकरे और भाजपा नेताओं की नजदीकियां भविष्य के बननेवाले राजनैतिक समीकरण का सन्देश दे रही है। बता दे कि भाजपा के साथ गठबंधन के चलते ही शिवसेना को विधानसभा में राजनीतिक लाभ मिला। महाराष्ट्र की जनता ने भाजपा – शिवसेना युति के समर्थन और कांग्रेस – राकांपा के खिलाफ जनादेश दिया था। बावजूद इसके उद्धव ठाकरे ने मुख्यमंत्री पद की अभिलाषा में विरोधी पार्टियों के साथ ही हाथ मिला कर सरकार बना ली। शिवसेना के विधायक एवं सांसद भी यह भलीभांति जानते और मानते है कि मोदी लहर में बहकर ही उनकी नैया पार हुई है और वह मोदीजी के नाम पर ही दोबारा चुनाव जीते है। लेकिन अगले मनपा, लोकसभा, एवं विधानसभा चुनाव में उनको इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा। स्व. बालासाहेब ठाकरे के विचारों एवं नीतियों को तिलांजलि देकर जिस तरह से उद्धव ठाकरे ने अपनी कट्टर विरोधी पार्टियों कांग्रेस – राकांपा से हाथ मिलाया है, वही उनको धुल में मिला देंगे। इसी मानसिकता के साथ कांग्रेस – राकांपा उद्धव ठाकरे के समक्ष चुनौतियां पेश कर रहे है। यह बात उन्हें जितनी जल्दी समझ में आ जाये यह उनके लिए अच्छा है। बहरहाल वह इससे कैसे निपटते है यह उनके राजनीतिक अनुभव व रणकौशल पर निर्भर है। फ़िलहाल कांग्रेस पार्टी द्वारा वीर सावरकर के अपमान पर, मध्य प्रदेश में छत्रपति शिवाजी महाराज की प्रतिमा को जेसीबी से हटाये जाने पर और वारिश पठान द्वारा दिए गए भाषण जिसमें उन्होंने कहा था कि ‘ हम 15 करोड़, 100 करोड़ पर भारी पड़ेंगे’ पर शिवसेना ने चुप्पी साधी है, वह उसके अस्तित्व व औचित्य पर प्रश्नचिन्ह लगाने के लिए काफी है।

 

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