पेट्रोल डीजल में लगी महंगाई की आग

मेरा मानना है कि सरकार को डीजल-पेट्रोल के दाम को कम करना चाहिए और वैकल्पिक ईंधन पर भी काम करना चाहिए। पेट्रोलियम में पुनः पूल फंड का इस्तेमाल करना चाहिए तथा इस तेल को जीएसटी के दायरे में लाना चाहिए ताकि इस पर एक यूनिफार्म टैक्स आल इंडिया लग सके। अलग-अलग राज्यों की अलग-अलग दर ना हो।

खाने के तेल के अलावा लोग पेट्रोल और डीजल के मूल्यवृद्धि से परेशान हैं और इस पर किसी का वश नहीं चल रहा है। पहली बार जब पेट्रोल का आंकड़ा 100 को पार किया था, तो बड़ा शोर हुआ था लेकिन कई महीनों से पेट्रोल का रेट 100 से ऊपर ही हैं और लोगों की इस बढ़े हुए कीमत की आदत पड़ चुकी है। डीजल एक ऐसा ईंधन है, जिसकी मूल्य वृद्धि क्रमिक प्रभाव डालती है। चूंकि यह खेती, पम्पिंग सेट और ट्रैक्टर में इस्तेमाल होता है इसलिए यह किसानों, फसलों की कीमतों और इससे बन रहे उत्पादों को सीधे तौर पर प्रभावित करता है।

दूसरा, माल परिवहन की गाड़ियां जैसे- ट्रक, टेम्पो, पिकअप इत्यादि डीजल से ही चलती है। किसी भी कारखाने या व्यापारी के पास माल लाने या ले जाने के लिए परिवहन एक आवश्यक प्रक्रिया है और जब डीजल का रेट बढ़ता है, तो कच्चे माल की लागत के साथ तैयार माल की लागत भी बढ़ जाती है। इसका असर प्रति माल लागत पर पड़ता है, जिसे कारखाना मालिक या व्यापारी अंत में उपभोक्ता से ही कीमत बढ़ा कर लेता है और इस कारण महंगाई बढ़ जाती है। देश का शहरी मध्य वर्ग पेट्रोल का एक बड़ा उपभोक्ता है। यदि पेट्रोल की कीमत बढ़ती है, तो उसका मासिक कैश फ्लो गड़बड़ होता है। इस कारण वह कहीं न कहीं अपने उन खर्चों को कम करता है, जो जीडीपी के आंकड़ों की गिनती में आते हैं।

जनता ने क्यों छोड़ी उम्मीद?

जनता इस मूल्य वृद्धि से निराश हो चुकी है और उसने उम्मीद भी छोड़ दी है कि शायद ही अब पेट्रोल 100 से नीचे आए। कुछ वर्ष पूर्व जब सरकार ने इसे खुला बाज़ार दिया था, तो यह तर्क दिया गया था कि अब तेल अंतराष्ट्रीय बाजार के हिसाब से तय होगा। लोगों में उम्मीद जगी कि तेल सस्ता हो जाएगा क्योंकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल का दाम काफी कम हो गया था लेकिन आम आदमी तब निराश हो गया, जब पेट्रोल-डीजल को बाजार के हवाले करने के बाद भी सरकार ने टैक्स बढ़ा कर अपना हिस्सा बढ़ा दिया। वहीं जो लाभ जनता को मिलना चाहिए था, उसे रोककर सरकार ने मूल्य कम नहीं किया। उसकी जगह टैक्स बढ़ा दिया और मूल्य स्थिर रखा या पहले से बढ़ा दिया। इस कारण अब आम आदमी किसी भी सुधार के कदम को लेकर सशंकित हो गया है इसलिए मोनटाईज़ेशन के लाख अच्छे तर्कों के बावजूद भी चुप्पी साधे हुए है।

मेरा मानना है कि सरकार को डीजल-पेट्रोल के दाम को कम करना चाहिए और वैकल्पिक ईंधन पर भी काम करना चाहिए। पेट्रोलियम में पुनः पूल फंड का इस्तेमाल करना चाहिए तथा इस तेल को जीएसटी के दायरे में लाना चाहिए ताकि इस पर एक यूनिफार्म टैक्स आल इंडिया लग सके। अलग-अलग राज्यों की अलग-अलग दर ना हो। हालांकि जीएसटी में लाने के बाद भी टैक्स कम होगा की नहीं यह सरकार की मंशा पर निर्भर हो सकता है कि वह जीएसटी में लाने के बाद इस श्रेणी के लिए अलग दर का निर्माण कर दे। हालांकि एक चीज की निश्चितता होगी कि सम्पूर्ण देश में पेट्रोलियम पर एक ही टैक्स की दर होगी। ऐसे में गोवा जैसे राज्य जहां पेट्रोल सस्ता है, वहां महंगा होने की संभावना है। सरकार चाहे तो सबसे पहले खेतों के लिए अलग से डीजल की दर निर्धारित कर सकती है लेकिन इसमें काला बाजारी नियंत्रित करना एक टास्क ही होगा।

इथेनॉल से कम होगी महंगाई

गौर करने वाली बात है कि पेट्रोल एवं डीजल के इस्तेमाल के आर्थिक एवं पर्यावरण स्तर पर भी कई नुकसान हैं। एक ओर बड़े पैमाने पर गाड़ियों में इस्तेमाल के कारण प्रदूषण बढ़ रहा है। वहीं आयात भुगतान का एक बड़ा हिस्सा खरीद का होने के कारण चालू खाते का घाटा बढ़ रहा है। साथ ही विदेशी मुद्रा का भण्डार भी खत्म हो रहा है इसलिए अच्छा है कि हम जीवाश्म ईंधन पेट्रोल एवं डीजल के विकल्प की तरफ रूख करें। इलेक्ट्रिक व्हीकल और फ्लेक्स फ्यूल वाले वाहनों को प्रोत्साहित करें। आम आदमी के स्तर पर भी डीजल और पेट्रोल उनके मुद्रा बचत घाटे को अपने बढ़ते दर के कारण बढ़ा रहा है, तो उनके बचत को भी खत्म कर रहा है। ऐसे में सस्ते ईंधन की तलाश और उसका विकास देश के साथ आम आदमी को भी राहत पहुंचाएगा। साथ में समय की मांग ग्रीन इकोनॉमी की तरफ एक महत्वपूर्ण कदम भी होगा।

अच्छी बात है कि डीजल-पेट्रोल के विकल्प के रूप में केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय अब इलेक्ट्रिक व्हीकल के बाद फ्लेक्स फ्यूल इंजन पर विचार कर रही है। अगले कुछ समय में इस पर बड़ा फैसला देखने को मिल सकता है। मंत्रालय की योजना इस इंजन को ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री के लिए अनिवार्य बनाने की है ताकि देश के मुद्रा भंडार बचत के साथ आम आदमी के मुद्रा भंडार में बड़ी बचत हो। इससे महंगाई भी कम होगी क्योंकि ये मौजूदा पेट्रोल-डीजल के मुकाबले तीस से चालीस फीसदी सस्ता होगा। फ्लेक्स फ्यूल की योजना लांच करने के बाद लोगों के पास यह विकल्प होगा कि वे पेट्रोल-डीजल की जगह 100 फीसदी कच्चा तेल या 100 फीसदी इथेनॉल का इस्तेमाल कर सकें। फिलहाल भारत अपनी जरूरत का 80% से ज्यादा क्रूड ऑयल आयात करता है। यदि हम एथेनॉल का इस्तेमाल बढ़ाएं तो भारत की क्रूड ऑयल पर निर्भरता कम होगी। साथ ही आयात में भारी कमी आएगी और देश का पैसा देश में ही रहेगा। केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी के अनुसार वाहनों के उपयोग में आने वाले इथेनॉल की कीमत 60-62 रुपये प्रति लीटर होगी। इसके इस्तेमाल से लोग प्रति लीटर 30 से 35 रुपये की बचत कर पाएंगे, जिससे एक तरफ जहां उनके और देश के पैसे बचेंगे, वहीं दूसरी तरफ प्रदूषण फैलाने वाले जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता भी घटेगी और देश में प्रदूषण के स्तर में भी कमी आएगी।

तलाशने होंगे अन्य विकल्प

इथेनॉल का प्रयोग भी एक अच्छा विकल्प है। इथेनॉल एक अल्कोहल बेस्ड इंधन है। इसे इस समय अलग-अलग अनुपात में पेट्रोल के साथ मिलाकर वाहनों में ईंधन के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है। इथेनॉल का सबसे बड़ा फायदा है कि यह एक बायो-फ्यूल है। इसे स्टार्च और शुगर के फर्मेंटेशन से बनाया जाता है। एथेनॉल को बनाने में आमतौर पर गन्ना, मक्का और बाकी शर्करा वाले पौधों का इस्तेमाल किया जाता है। ये सस्ते भी होते हैं और इससे पेट्रोल-डीजल के मुकाबले कार्बन उत्सर्जन भी कम होता है। इसके इस्तेमाल से प्रदूषण भी कम होता है, जिससे यह वाहन चलाने में ईंधन के रूप में उपयोग हो सकते हैं।

यह एक तरह का अल्कोहल है, जिसे पेट्रोल में मिलाकर गाड़ियों में फ्यूल की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिलेगा। इथेनॉल बनाने के लिए गन्ना, मक्का, कपास के डंठल, गेहूं का भूसा, खोई और बांस आदि का उपयोग किया जाता है। अगर इथेनॉल का इस्तेमाल बढ़ेगा तो इससे सीधे तौर पर कृषि सेक्टर और किसानों को फायदा होगा।

कम होगा पर्यावरण नुकसान

फ्लेक्स फ्यूल इंजन योजना के तहत इथेनॉल का इस्तेमाल बढ़ेगा। इसके इस्तेमाल से 35 फीसदी कम कार्बन मोनाऑक्साइड का उत्सर्जन होता है। साथ ही सल्फर डाइऑक्साइज के उत्सर्जन को भी कम करता है। इसके अलावा इथेनॉल हाइड्रोकार्बन के उत्सर्जन को भी कम करता है। इथेनॉल में 35 फीसदी ऑक्सीजन होता है। इथेनॉल फ्यूल को इस्तेमाल करने से नाइट्रोजन ऑक्साइड उत्सर्जन में भी कमी आती है। इन सब कारणों से हम पर्यावरण को वर्तमान में होने वाले बड़े नुकसान को काफी कम कर सकते हैं। मिश्रण ईंधन के साथ-साथ इथेनॉल को स्टैंडअलोन फ्यूल के तौर पर भी इस्तेमाल किया जा सकता है। इस योजना के लांच में इलेक्ट्रिक चार्जिंग स्टेशन की तरह कोई बड़ा इंफ़्रा बदलाव भी नहीं करना होगा। बस मौजूदा पेट्रोल पंप पर एक मशीन और बढ़ जाएगी, जिससे एथेनॉल बेस्ड फ्यूल मिलेगा। साथ ही गाड़ियों के टैंक और स्पेस में भी कोई बड़ा बदलाव करने की जरुरत नहीं है। फ्लेक्सी फ्यूल इंजन वाली गाड़ियों में एक ही फ्यूल टैंक से काम चलाकर अलग-अलग तरह के फ्यूल जैसे- पेट्रोल और इथेनॉल का मिश्रण डाल सकते हैं। इसका इस्तेमाल कैसे करना है, वह वाहन में लगा ईंधन मिश्रण सेंसर निर्णय कर लेगा।

सरकार को अपने अन्य आय की दर बढ़ाकर, वैकल्पिक ऊर्जा का स्रोत बढ़ाकर और उसका इंफ़्रा बढ़ाकर पेट्रोल डीजल का विकल्प जनता को देना चाहिए क्योंकि जनता को 100 रुपये का पेट्रोल बहुत खलता है। इसे ऊपर के उपायों को अपनाने के साथ पेट्रोल की मूल लागत, टैक्स राशि, मिडिल मैन का लाभ और बिक्री मूल्य तीनों का डिसप्ले पेट्रोल पम्प पर करना चाहिए ताकि पारदर्शिता बनी रहे। साथ ही सरकार को इसके अधिकतम मूल्य पर भी एक कैप लगाना चाहिए।

 

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