गिलगित को पाक के हाथ जाता देख क्यों चुपी रही तत्कालीन सरकार, बैठे जांच आयोग: कुलदीप चंद अग्निहोत्री

देहरा महाराजा की ओर से समस्त जम्मू-कश्मीर के विलय के बाद भी पाकिस्तानी हमले और ब्रिटिश षड्यंत्र के चलते गिलगित बाल्टिस्तान भारत के हाथ से बाहर हो गया। लेकिन इसके बाद भी तत्कालीन नेहरू सरकार चुप रही। आखिर सरकार ने क्यों यह चुप्पी साधी थी, इसकी जांच के लिए शासन को एक आयोग का गठन करना चाहिए। केंद्रीय विश्वविद्यालय हिमाचल प्रदेश के कश्मीर अध्ययन केंद्र की ओर से आयोजित कार्यक्रम में मुख्य वक्ता कुलदीप चंद अग्निहोत्री ने यह बात कही। उन्होंने कहा कि जम्मू कश्मीर कभी भी भारत से अलग नहीं रहा और उसका विलय भी देश की अन्य रियासतों की तरह ही हुआ था। लेकिन हम किसी भी राज्य के लिए इस शब्द का इस्तेमाल नहीं करते कि उसका भारत में विलय हुआ था।

उन्होंने कहा कि हम बार-बार जम्मू कश्मीर के विलय की बात करके यह गलती करते हैं और इससे ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे जम्मू-कश्मीर पहले अलग था, जबकि हकीकत यह है कि वह हमेशा ही भारत का हिस्सा था। यही नहीं भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के सलाहकार अग्निहोत्री ने पटियाला, मंडी समेत कई रियासतों का भी उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि ऐसी तमाम रियासतों का एकीकरण हुआ था, लेकिन हम जिक्र कश्मीर का ही करते हैं। इससे ही समाज में भ्रम पैदा हुआ है, उन्होंने कहा कि अकादमिक जगत को इस दिशा में शोध करने चाहिए ताकि संशय खत्म किया जा सकें।

बाहरी लोगों से नहीं, कश्मीरियों से ही करना चाहिए संवाद
यही नहीं उन्होंने कहा कि जब हम जम्मू कश्मीर के संदर्भ में बात करते हैं तो फिर हमें वहीं के लोगों से संवाद करना चाहिए। वर्तमान सरकार ने इस दिशा में प्रयास किए हैं, लेकिन अब तक की सरकारें मूल कश्मीरी लोगों की बजाया पाकिस्तान और बाहर से आए लोगों से बातें करती रही हैं। उन्होंने कहा कि हमें जम्मू कश्मीर में पैदा हुई समस्याओं के हल के लिए कश्मीर के लोगों से ही सीधी बात करनी चाहिए और उनकी ही राज्य में सबसे बड़ी हिस्सेदारी है। जम्मू कश्मीर के मुद्दे पर कई अहम पुस्तकें लिखने वाले अग्निहोत्री ने कहा कि जम्मू कश्मीर को लेकर कई भ्रम फैले हैं, लेकिन उन्हें दूर करने के लिए अकादमिक जगत से जरूरी प्रयास नहीं हुए, जिन्हें अब शुरू करना चाहिए।

कुलपति प्रोफेसर बंसल बोले- आर्टिकल 370 हटने से दूर होंगे भ्रम  

कार्यक्रम के अध्यक्ष एवं कुलपति प्रोफेसर सत प्रकाश बंसल ने भी अपने संबोधन में जम्मू कश्मीर के विलय को लेकर फैले भ्रमों का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि आज भी जम्मू कश्मीर का एक ऐसा वर्ग है, जो भारत से विलय को गलत परिप्रेक्ष्य में देखता है। उन्होंने कहा कि आर्टिकल 370 हटने से यह भ्रम दूर करने की दिशा में एक अहम कदम आगे बढ़ा है। इन प्रयासों को जारी रखने की जरूरत है। कुलपति प्रोफेसर बंसल ने इस दौरान जम्मू कश्मीर के देश में एकीकरण के लिए सरदार वल्लभ भाई पटेल की ओर से किए गए योगदान का भी जिक्र किया।


22 से 28 अक्टूबर तक चल रही है व्याख्यानमाला
बता दें कि विश्वविद्यालय के कश्मीर अध्ययन केंद्र की ओर से जम्मू-कश्मीर विलय दिवस के मौके पर साप्ताहिक व्याख्यानमाला का आयोजन किया जा रहा है। इस व्याख्यानमाला के तहत 22 अक्टूबर से 28 अक्टूबर तक विभिन्न वक्ताओं के वक्तव्य चल रहे हैं। इसी सिलसिले में मंगलवार को देहरा स्थित यूनिवर्सिटी के परिसर में कार्यक्रम में हुआ। इसके अलावा अन्य दिनों में इस व्याख्यानमाला का आयोजन ऑनलाइन चल रहा है। इस व्याख्यानमाला कार्यक्रम तथा केंद्र के निदेशक डॉ. मलकीत सिंह हैं। वहीं केंद्र के सहायक आचार्य डॉ. जयप्रकाश सिंह संयोजक और सहायक आचार्य संदीप सिंह सह-संयोजक के तौर पर कार्यक्रम का संचालन कर रहे हैं। इस पूरे आयोजन में केंद्र के शोधार्थियों संजीव कुमार शर्मा, विशाल कुमार, सतनाम सिंह, सूर्य प्रकाश आदि की भी सक्रियता रही है। इसके अलावा एमफिल के छात्र सुनील मिश्रा, अर्जुन आनंद, महेंद्र दीक्षित और हर्ष भी शामिल रहे हैं।

डॉ. सुनीता बोध की पुस्तक ‘ए ग्लिम्पसेज ऑफ ट्राइबल एरिया और लाहौल’ हुआ विमोचन
इस कार्यक्रम के दौरान ही विश्वविद्यालय के दीनदयाल अध्ययन केंद्र की सहायक आचार्या सुनीत बोध की पुस्तक ‘ए ग्लिम्पसेज ऑफ ट्राइबल एरिया और लाहौल’ का भी विमोचन मुख्य वक्ता कुलदीप चंद अग्निहोत्री एवं कुलपति प्रोफेसर सत प्रकाश बंसल के कर कमलों से हुआ। यह पुस्तक हिमाचल प्रदेश के जनजातीय क्षेत्र लाहौल व वहां की समृद्ध संस्कृति का परिचय कराती है।

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