उत्तराखंड में उच्चशिक्षा का परिद़ृष्य

राज्य निर्माण के समय उत्तराखंड में मात्र 34 राजकीय स्नातक एवं स्नातकोत्तर महाविद्यालय थे। सहायता प्राप्त एवं निजी महाविद्यालयों की संख्या 60 के लगभग थी जिनमें अधिकांश संस्कृत की शिक्षा से सबंधित थे। राज्य में वर्ष 2000 से पूर्व तीन राजकीय, एक डीम्ड विश्वविद्याालय और दो राष्ट्रीय महत्व के उच्चशिक्षा संस्थान थे। पिछले 20 वर्षों में उत्तराखंड में विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों एवं अन्य उच्च शिक्षण संस्थानों में अभूतपूर्व संख्यात्मक वृद्धि हुई।

मानव जीवन में शिक्षा मनुष्यों को न केवल विद्वान व विचारक बनाती है बल्कि वास्तविक शिक्षा उन्हें जीवन में उदार एवं चरित्रवान रहने का पाठ भी पढ़ाती है। जीवन यापन के लिए अधिक अवसर जुटाना, राष्ट्र के विकास के उपयुक्त मार्ग खोजना, मानवमूल्यों के प्रति संवेदना जगाना शिक्षा का मूल उद्देष्य होता है। इसलिए शिक्षा किसी भी राष्ट्र की आत्मा कही जाती है। भारत में इस तथ्य को भारतीय संस्कृति के उदय के समय से ही आत्मसात कर लिया गया था। इसके कारण भारत न केवल अपनी संस्कृति एवं दर्शन के लिए विश्वभर में जाना जाता रहा है बल्कि वह एक पथ प्रदर्शक का कार्य भी करता रहा है।

आजादी के बाद भारत के लिए न केवल बुनियादी शिक्षा का प्रसार महत्वपूर्ण हो गया बल्कि उच्चशिक्षा की प्रांसिगता बढ़ाना भी चुनौती बन कर सामने आयी। इन चुनौतियों का सामना करने के लिए हम अपने युवाओं को किस प्रकार शिक्षित व प्रशिक्षित करें, इस उद्देष्य से भारत सरकार ने तत्कालीन उच्चकोटि के शिक्षाविदों एवं विचारकोंं के अधीन शिक्षा आयोग का गठन किया। आजाद भारत में सर्वपल्ली डा. राधाकृष्णन की अघ्यक्षता में पहला शिक्षा आयोग बना।

उच्चशिक्षा सहित हर स्तर की शिक्षा के लिए विकास व संवर्धन के लिए बनाया गया यह पथप्रदर्षक दस्तावेज सरकारों, विश्वविद्यालयों, शिक्षकों व छात्रों के लिए सुझावों, कार्ययोजनाओं व देश में शिक्षा के माध्यम से आर्थिक प्रगति करने के उपायों से परिपूर्ण था। इसको भारतीय परम्पराओं, तत्कालीन परिस्थितियों एवं भावी आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर बनाया गया था। इसके द्वारा अपेक्षा की गयी थी कि हमारी शिक्षा ऐसी होगी जो ऐसे युवाओं का निर्माण करेगी जो अपनी राजनैतिक, प्रशासनिक अथवा व्यवसायिक क्षेत्रों में उच्चस्तरीय कार्य कर समाज सुधार एवं जनतांत्रिक प्रणाली को सफल बना सकें।

आजादी के बाद उच्चशिक्षा को समवर्ती सूची में रखा गया ताकि केन्द्र एवं राज्य दोनों सरकारों के माध्यम से इसका संचालन किया जा सके। तद्नुसार ही शिक्षा के क्षेत्र को विकसित करने का प्रयास किया गया। परन्तु शिक्षा पर किए जाने वाले बजट की सीमा इतनी कम रखी गयी कि सरकारी शिक्षण संस्थाएं आधारभूत संसाधनों के अभाव, शिक्षकों की कमी एवं बढ़ती छात्र संख्या के कारण अपेक्षित दक्ष मानव संसाधन नहीं जुटा पाया। इसलिए समय-समय पर विभिन्न आयोगों के माध्यम से शिक्षा की गुणवता बढ़ाने के उद्देष्य से नीतियों में परिवर्तन किया जाता रहा।

उत्तराखंड में उच्चशिक्षा संस्थाओं में संख्यात्मक वृद्धि

दो दशकों से उत्तरप्रदेश का हिस्सा रहा उत्तराखंड अन्य प्रदेशों की तुलना में नया व युवा प्रदेश है। यहां की भौगोलिक व जटिल परिस्थितियां इसके विकास में अलग प्रकार की समस्याएं पैदा करती रहती है। शिक्षा के क्षेत्र में भी ये समस्याएं देखी जा सकती हैं। तथापि यह स्कूली शिक्षा का एक बड़ा हब बना और उच्च शिक्षा के विकास में भी सरकारों द्वारा प्रयत्न किए जाते रहे।

दुनिया में आबादी के हिसाब से दूसरे स्थान पर चल रहे भारतवर्ष का उच्चशिक्षा तंत्र चीन व अमेरिका के बाद सबसे बड़े तंत्र में आता है। वतर्मान में देश में 47 केन्द्रीय, 381 राज्य सरकारी, 123 डीम्ड और 291 निजी मिलाकर 900 के लगभग विश्वविद्यालय हैं।

राज्य निर्माण के समय उत्तराखंड में मात्र 34 राजकीय स्नातक एवं स्नातकोत्तर महाविद्यालय थे। सहायता प्राप्त एवं निजी महाविद्यालयों की संख्या 60 के लगभग थी जिनमें अधिकांश संस्कृत की शिक्षा से समब्न्धित थे। राज्य में वर्ष 2000 से पूर्व तीन राजकीय, एक डीम्ड विश्वविद्याालय और दो राष्ट्रीय महत्व के उच्चशिक्षा संस्थान थे। पिछले 20 वर्षों में उत्तराखंड में विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों एवं अन्य उच्च शिक्षण संस्थानों में अभूतपूर्व संख्यात्मक वृद्धि हुई। इनमें सामान्य विषयों के अतिरिक्त तकनीकी, चिकित्सा, आयुर्वेद, कृषि, संस्कृत, प्रबन्धन से सम्बन्धित विश्वविद्यालय एवं महाविद्यालय सम्मिलित हैं। आज उत्तराखंड में 11 राजकीय व 20 निजी विश्वविद्यालयों के अधीन 114 राजकीय, 17 अनुदानित और 394 स्ववित्तपोशित उच्चशिक्षा संस्थान संचालित हो रहे हैं। एक केन्द्रीय विश्वविद्याालय  के अलावा आई.टी.आई. रुड़की, एम्स हृषिकेश, आई.आई.एम., एन.आइ.टी. सहित राज्य में राष्ट्रीय महत्व के संस्थानों की संख्या 07 हो गयी है। इतने नए व छोटे राज्य में इतनी बढ़ी संख्या में शिक्षण संस्थाओं के होने पर हम गर्व अवश्य कर सकते हैं। परन्तु इसमें समस्याओं का अम्बार भी उतना ही बड़ा है।

उच्चशिक्षा संस्थाओं की गुणात्मक स्थिति

हमारे समाज में यह भावना प्रबल है कि हमारी उच्चशिक्षा का स्तर निम्न होने के कारण युवाओं की एक बड़ी फौज तैयार हो रही है, उनका पलायन हो रहा है। शिक्षा का व्यापारीकरण हो रहा है आदि-आदि। मेरी द़ृष्टि में यह पूर्ण सत्य नहीं है। इसका एक नकारात्मक पक्ष अवश्य है परन्तु हमारी शिक्षा के कई सकारात्मक पक्ष भी हैं। नए राज्य के प्रथम दशक में जिस तेजी से उच्चशिक्षण संस्थानों की स्थापना हुई उसमें गुणात्मक पक्ष कमजोर रहा। अधिकतर निजी क्षेत्र की संस्थाओं ने अपने फायदे के लिए कम संसाधनों में ही काम चलाने का कार्य किया। सरकारी महाविद्यालयों में भी शिक्षकों की कमी देखी जा सकती थी। परन्तु अब अभिभावक व छात्रों के जागरूक होने के साथ शासन-प्रशासन भी गुणवता के प्रति जागरूक हुए हैं। बिना मूलभूत सुविधाओं वाले संस्थानों में छात्रों की संख्या काफी कम हो गयी है। सरकारी महाविद्यालयों में सुविधाएं बढ़ रही है।

पिछले पांच वर्ष के कुछ उल्लेखनीय कार्य

प्राचार्य : किसी भी परिवार को सुचारू ढंग से चलाने के लिए घर में मुखिया का होना आवश्यक माना जाता है। ठीक ऐसे ही हर एक इकाई की प्रगति व सफलता में उसके प्रधान का होना जरूरी होता है। परन्तु हमारे महाविद्यालयों में शिक्षकों के साथ प्राचार्यों की कमी  उनमें प्रशासनिक व्यवस्था न बन पाने का एक प्रमुख कारण रही है। सत्र 2.16-17 तक दो तिहाई से भी अधिक महाविद्यालयों में प्राचार्य नहीं थे। जहां 28 स्नाकोतर महाविद्यालयों में से 13 तो वहीं 72 स्नातक स्तर के महाविद्यालयों में से 30 में प्राचार्य नहीं थे। वर्तमान उच्चशिक्षा मंत्री ने इसको गम्भीरता व प्राथमिकता से लिया। प्राचार्यों की कमी पूरी करने के लिए विभागीय प्रोन्नति समिति की बैठकें करवाई गयी। इस प्रकार प्रदेश भर के सभी सरकारी महाविद्यालयों में प्राचार्यों की तैनाती कर दी गई। यह कई अन्य प्रदेशों के लिए मिसाल भी बनी।

शिक्षक: पूरे देश की शिक्षण संस्थाओं में जो सबसे बडी कमी हमेशा से ही देखने को मिलती है और हर एक की शिकायत रहती है वह है शिक्षकों का अभाव। इसका मुख्य कारण है युवाओं का शिक्षण के प्रति रुचि न दिखाना, भर्ती प्रक्रिया में लम्बा समय लगना, छात्र संख्या का लगातार बढ़ना, मानकों के अनुसार पदों का सृजन न होना तथा प्रदेशों के पास धनाभाव का होना है।

इन कारणों की आड़ में अधिकतर सरकारें भी इस ओर अधिक ध्यान नहीं देती। परन्तु उत्तराखंड ने इस मिथ को तोड़ा है। कोविड महामारी के चलते भी लोकसेवा आयोग के माघ्यम से 877 स्थायी शिक्षकों की नियुक्ति की गयी। अन्य रिक्त पदों पर यू.जी.सी. मानकों के अनुसार संविदा शिक्षकों का मानदेय 15000/- रु. से बढ़ाकर 35000/- रुपए प्रति माह कर रिक्त पदों को भरा गया है व स्थायी नियुक्तियों हेतु अघ्याचन की प्रक्रिया की गयी।

राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा अभियान

रूसा के माध्यम से चार विश्वविद्यालयों को 20-20 करोड़, तीन नए मॉडल कालेजों को 12-12 करोड़, एक व्यावसायिक कालेज को 26 करोड़, 7 को मॉडल कालेज में उच्चीकरण के लिए 4-4 करोड़, 46 को 2-2 करोड़ का अनुदान निर्माण, पुनर्निर्माण, उपकरणों, पुस्तकों, खेल सामग्री, स्मार्ट क्लास सहित अन्य सुविधाएं जुटाने को दिया गया। इस योजना के कारण उच्चशिक्षा में शिक्षण के लिए आवश्यक सुविधाएं मिलने से शिक्षण का नया वातावरण बना है और दूरस्थ क्षेत्र के महाविद्यालयों में भी बड़ा गुणात्मक परिवर्तन आ रहा है।

भूमि व भवन

वर्षों से कई महाविद्यालय भूमि व भवन की कमी के कारण अभाव में थे। पिछले चार वर्षों में यह स्थिति बहुत हद तक सुधर गयी है। अब तक चल रहे 106 राजकीय महाविद्यालयों में से 102 के अपने भवन हैं कुछ का विस्तार हो रहा है व कुछ निर्माणाधीन हैं। कुमाऊं, श्रीदेव सुमन, संस्कृत व दून विश्वविद्यालयों में इस राशि से कई सुविधाएं जुटा ली गयी हैं।

पुस्तकालय एवं इन्टरनेट सुविधा

शिक्षा मंत्री की सक्रियता से 2020-21 में सभी महाविद्यालयों व विश्वविद्यालयों में 4-जी कनैक्टिविटी दे दी गयी है, ई-ग्रन्थालय से जोड़ा गया है और पर्याप्त संख्या में पुस्तकें, एवं फर्निचर दिए गए हैं। अब राज्य विश्वविद्यालयों व महाविद्यालयों के परिसरों को नि:शुल्क वाई-फाई सेवा देने का कार्य किया जा रहा है। अधिकांश महाविद्यालयों को कम्प्यूटर लैब के लिए धनराशि दी गई है। कोरोना से पूर्व प्रदेश के 52 महाविद्यालयों को एडूसेट से जोड़कर व्याख्यानों के सीधे प्रसारण की व्यवस्था कर ली गयी थी।

कोरोना काल में शिक्षण

कोरोना माहमारी का सबसे बुरा प्रभाव शिक्षा जगत पर पड़ा। शिक्षण संस्थाओं के बन्द होने के कारण उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य के लिए इस अवधि में शिक्षण एक चुनैाती था। परन्तु प्रदेश के शिक्षकों की मेहनत, अभिभावकों के सहयोग एवं छात्रों की पढ़ने की इच्छा और सरकार की सक्रियता से ऑनलाइन शिक्षण का प्रयोग बहुत हद तक सफल रहा। विश्वविद्यालय जहां आवश्यक था वहां परीक्षाएं करवा सके और परीक्षा परिणाम देकर छात्रोंका सत्र बचाने में कामयाब हुए।

छात्रों को प्रोत्साहन की व्यवस्था

उत्तराखंड में शिक्षा मंत्री ने छात्रों से संवाद की परम्परा को बढ़ावा देने के साथ ही उनको आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए कई योजनाएं प्रारम्भ की हैं। पुस्तक दान, पुस्तक मेलों का आयोजन कर पुस्तकों के प्रति छात्रों की रुचि बढाने का कार्य किया गया। प्रतियोगिता परीक्षाओं के लिए नि:शुल्क कोचिंग के लिए सुपर 30 व सुपर 100 योजना, शौर्य दीवार के माध्यम से देश प्रेम की भावना छात्रों में जगाने की योजना प्रारम्भ की गयी। शिक्षा की गुणवता को बढ़ाने के उद्देश्य से म. राष्ट्रपति जी की उपस्थिति में देशभर के शिक्षाविदों को ज्ञानकुम्भ के माध्यम से हरिद्वार में एक मंच पर लाकर प्रदेश के छात्रों को नई जानकारी देना व उन्हें भविष्य में सफलता के नए आयामों से परिचित करवाना भी एक उपलब्धि उच्चशिक्षा विभाग की है। ऑन लाइन पढ़ाई में छात्रों को आ रही कठिनाइयों को देखते हुए सरकार ने नि:शुल्क टैबलेट देने की योजना बनाई है।

नई शिक्षा नीति

भारत सरकार द्वारा देश के विकास में शिक्षा के महत्व को देखते हुए शिक्षा के सभी स्तरों में सुधार करने और देश की युवा पीढ़ी को कौशल विकास एवं रोजगार के अधिक अवसर प्रदान करने के उद्देश्य से वर्ष 2020 में नई शिक्षा नीति बनायी गयी है। इस नीति के तहत छात्र/छात्राओं को सक्षम बनाने एवं उनके समग्र विकास के लिए संस्थागत पुनर्गठन एवं समेकन के माध्यम से शिक्षण संस्थाओं में सीखने के लिए अनूकूलतम वातावरण बनाना एवं छात्रों में सहयोग की भावना बढ़ाने हेतु प्रेरित व सक्रिय संकायों की स्थापना करना है।

उत्तराखंड सरकार द्वारा नई शिक्षा नीति 2020 का प्रदेश में अधिग्रहण कर लिया गया है। इस नीति के कार्यान्वयन हेतु राज्यों को सक्रियता दिखाने के निर्देष व अपेक्षा भारत सरकार द्वारा की गयी है। इस क्रम में उत्तराखंड में एक टास्क फोर्स का गठन किया जा चुका है।

नीति में उच्चशिक्षा के क्षेत्र में भी केन्द्र व राज्यों के स्तर पर विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों के पुनर्गठन एवं सुद़ृणीकरण हेतु चरणबद्ध तरीके से योजना बनाने का प्रस्ताव है। नीति के तहत राज्य में विश्वविद्यालयों के स्तर पर पाठ्यक्रमों को सुधारकर उन्हें शिक्षण एवं शोध के लिए बहुविषयक बनाना है। सभी एकल विषयक महाविद्यालयों व विश्वविद्यालयों को बहु-विषयक करना भी नीति का एक हिस्सा है। राज्य सरकार चरणबद्ध तरीके से इस नीति के क्रियान्वयन की दिशा में काम कर रही हैं। परन्तु किसी भी अच्छी नीति का यदि क्रियान्वयन सम्पूर्णता में न हो तो नीति ही असफल हो जाती है। इसलिए प्रत्येक सरकार, नागरिक, शिक्षक व छात्र का योगदान शिक्षा की गुणवता बढ़ाने में होना आवश्यक है।

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