ड्रग्स के भयानक दुष्चक्र से देश को बचाना जरूरी

नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो यानी एनसीबी की रेव पार्टी कार्रवाई को लेकर खड़ा किए गए विवाद तथा नवाब मलिक बनाम समीर वानखेडे प्रकरण को अलग रखकर विचार करिए तो सच्चाई यही है कि हमारा देश मादक पदार्थों यानी ड्रग्स के विध्वंसक दुष्चक्र में फंसता जा रहा है। एनसीबी ने पिछले डेढ़ वर्ष में जितनी कार्रवाई की है उससे इतना  साफ हो गया है कि हमारी फिल्मी दुनिया ड्रग्स की भयानक गिरफ्त में है। इस बीच जो लोग गिरफ्तार हुए या जिन पर मुकदमे चल रहे हैं उनमें ज्यादातर 40 से नीचे उम्र के हैं, टीवी कलाकार हैं, कुछ द्वितीय- तृतीय श्रेणी की फिल्मों में काम करने वाले कलाकार हैं या फिर धनाढ्य ,रसूखदार या नामी गिरामी परिवारों के बच्चे। यह केवल मुंबई फिल्मी उद्योग तक सीमित नहीं संपूर्ण देश के भयावह यथार्थ का नमूना भर है । आप मुंबई के बाहर देश के दूसरे हिस्सों में  ड्रग्स लेने या उसके व्यापार के आरोप में हुई गिरफ्तारियों पर नजर दौड़ाएं तो उनमें ज्यादातर किशोर व युवा हैं।

पहले पंजाब के ड्रग्स की गिरफ्त में आने से देश चिंतित था। पंजाब के 67 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों में कम से कम एक सदस्य नशे का शिकार है। हर पांच में से एक युवक वहां नशे का आदी माना गया है। उड़ता पंजाब फिल्म पर विवाद हुआ जो केवल उसकी झलक थी। अब तो यह कहना पड़ेगा कि उड़ता पंजाब उड़ते हुए उड़ता भारत तक विस्तारित हो चुका है। कईयों को यह जानकर हैरत हो कि नसों में नशे की सुई लेने वालों के मामले में उत्तरप्रदेश शीर्ष पर है तथा उसके बाद दिल्ली और पश्चिम बंगाल का नंबर है। बिहार झारखंड और बंगाल जैसे राज्यों में भी ड्रग्स गांव तक पहुंच चुका है। मोटा मोटी आंकड़ा है कि तीन करोड़ से ज्यादा लोग भारत में ड्रग्स का सेवन करते हैं। सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय द्वारा 2019 में जारी एक रिपोर्ट में कहा गया था कि 3.1 करोड़ लोग भांग, 50 लाख चरस एवं गांजा, 63 लाख हेरोइन और 11 लाख अफीम लेते हैं। 

 विश्व भर में ड्रग्स के आदी लोगों की संख्या बढ़ी है खासकर एशिया, अफ्रीका और लातिनी अमेरिका में। इस कारण यह वैश्विक चिंता का विषय है और कई अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन इस पर हो चुके हैं। इससे संबंधित अंतरराष्ट्रीय कानून हैं तथा देशों के बीच अवैध व्यापार को रोकने की घोषणाएं भी। बावजूद पिछले एक दशक में ड्रग्स का कारोबार व्यापक रूप से फैला है। प्रति वर्ष व्यापार का आंकड़ा 700 अरब डॉलर तक दिया जा रहा है। विश्व स्तर पर माफियाओं का बड़ा गिरोह पनप चुका है। जाहिर है ,ऐसी स्थिति को बदलना है तो समस्या को इसके व्यापक संदर्भों में देखकर ही काम करना पड़ेगा।

भारत  युवा आबादी तथा पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक व्यवस्था में हुए बदलावों से उत्पन्न जटिलताएं एवं भौगोलिक स्थिति ड्रग्स के अवैध व्यापार में लगे समूहों के लिए विश्व में सबसे ज्यादा आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। आबादी में किशोरों व युवाओं का सर्वाधिक प्रतिशत वाला देश ,जहां 10 से 35 वर्ष के आयु वर्ग की संख्या 50 करोड़ से ज्यादा है, निश्चय ही ड्रग्स के दुष्ट कारोबारियों की घातक नजर में है। इस आयु वर्ग के लोगों को आसानी से शिकार बनाया जा सकता है। समाज के बड़े बुजुर्ग युवाओं के भटकाव से बचाने के बड़े कारक रहे हैं। संयुक्त परिवार में वैसे भी बच्चों को स्वाभाविक लाड़ प्यार के साथ जीवन की दिशा प्राप्त होती रहती थी।  दोनों ही स्थितियां व्यापक रूप से बदल चुकी है। संयुक्त परिवार टूटा है तथा सामाजिक व्यवस्था में अब बड़े बुजुर्गों का सम्मान उस रूप में नहीं रहा। गांव से लेकर शहरों तक लोग निजता में सिमटते गए हैं। एकल परिवार में अगर माता-पिता दोनों नौकरी, व्यापार या अन्य पेशे के लिए निकल जाते हैं तो बच्चों को सही मार्गदर्शन मिलना संभव नहीं रहता। माता-पिता में से कोई नशे का शिकार है तो किशोरों और युवाओं के लिए बहकने का यूं ही आधार मिल जाता है। ऐसे बड़े बुजुर्ग उनके सामने नहीं होते जो उन्हें समझा-बुझाकर भटकाव से बचा सके।

आर्थिक उदारीकरण ने देश में व्यापार निवेश की संभावनाएं बढ़ाईं, आधारभूत संरचनाओं का विकास किया, अर्थव्यवस्था का आकार बहुगुणित हुआ और रोजगार के अवसर बढ़े, किंतु इसने ऐसी जीवनशैली लाई जिसमें युवा वर्ग स्वतंत्रता ही नहीं स्वच्छंदता की मानसिकता में पहुंच गया। इनमें ऐसे की संख्या बहुत ज्यादा है जो माता-पिता या दादा -दादी के मार्गनिर्देश में जीने और रहने को तैयार नहीं है। रोजगार मिलने के साथ युवाओं की आय  इतनी हो जाती है कि परिवार को नजरअंदाज कर स्वच्छंद जीवन जी सकें। पारिवारिक और सामाजिक व्यवस्था में धर्म और नैतिकता का पहलू अत्यंत कमजोर हुआ है तथा शिक्षा में भी इसका अभाव है। टीवी, सिनेमा और सोशल मीडिया के कारण उन्मुक्त जीवन शैली को सहज स्वभाविक  मानने की मानसिकता सबल हुई है। उच्च वर्ग और उच्च मध्यम वर्ग में कीमती नशे को अब बीमारी की जगह एंजॉयमेंट तथा कहीं-कहीं सोशल स्टेटस के रूप में भी लिया जा रहा है। ऐसे लोग मिल जाएंगे जो एनसीबी या पुलिस के छापे को गलत मानेंगे। उनके अनुसार थोड़ा ड्रग लेना ही चाहिए। तभी तो इतनी रेप पार्टियां होती हैं। स्वर्णिम त्रिकोण कहलाने वाले देश-म्यांमार, लाओस और थाईलैंड तथा स्वर्णिम अर्धचंद्र दक्षिण पश्चिम देश पाकिस्तान, अफगानिस्तान और ईरान से भौगोलिक रूप से निकट होने के कारण  यहां से ड्रग्स भारत पहुंच जाता है।

महानगरों में औसत अगर 100 के आसपास रेव पार्टियां प्रतिदिन होती हैं तो  एनसीबी या पुलिस कितनों पर रेड कर पाती है? जितने ड्रग्स अवैध रूप से भारत में आते हैं उनमें से कितने पकड़ में आते हैं? वैश्विक स्तर पर यह आंकड़ा 15 प्रतिशत है। इस तरह 85 प्रतिशत ड्रग्स देश में प्रवेश कर जाते हैं। पुलिस और एनसीबी महकमे में रेड करने वाले सारे ईमानदार ही होंगे ऐसा माना ही नहीं जा सकता।आप शहर दर शहर चले जाइए आपको गहरी छानबीन की आवश्यकता नहीं होगी, साधारण जानकारी प्राप्त करते हुए पता चल जाएगा कि किन-किन स्थानों पर आसानी से ड्रग उपलब्ध होते हैं। शहरों से निकलकर ड्रग्स अब गांवों तक फैल रहा है। सच कहा जाए तो भारत ड्रग्स के अवैध व्यापार और इस्तेमाल की आपात स्थिति में पहुंचने की ओर अग्रसर है। परिवार में कोई एक व्यक्ति नशेड़ी हो जाए तो उसकी दशा क्या होती है इसी से अनुमान लगाइए कि  देश में युवाओं का इतना बड़ा वर्ग नशेड़ी हो जाए तो स्थिति क्या होगी ?  जो धन देश की प्रगति में लगनी चाहिए वह नशे में अवैध रूप से चली जाए तो इसका अर्थव्यवस्था पर कितना विपरीत प्रभाव पड़ेगा इसकी कल्पना भी की जा सकती है। तो क्या हो सकता है?

दुर्भाग्य है कि जितनी चिंता इसकी होनी चाहिए उतनी न सरकारों के स्तर पर दिख रही है और न कोई राजनीतिक दल इस विषय को अपने एजेंडे में शामिल कर रहा है। व्यापक सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर पर भी ड्रग्स सामूहिक चिंता का विषय नहीं है। गहराई से विचार करने के बाद सरकार से लेकर राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर पर व्यापक अभियान ही तत्काल इसे रोकने का उपाय नजर आता है। इस पर संसद से तथा राज्य विधायिकाओं में गंभीर बहस होनी चाहिए । केंद्र सरकार जिस तरह आंतरिक सुरक्षा पर राज्य के अधिकारियों की नियमित सम्मेलन आयोजित करती है वैसे ही अलग से ड्रग कारोबार के निषेध तथा युवाओं को बचाने व ड्रग्स के लत से बाहर निकालने के लिए नियमित सम्मेलन आयोजित करे। राज्य सरकारें भी अपना आयोजन करें। केंद्र एवं राज्यों की एजेंसियों में तालमेल हो। नियम और व्यवस्थाओं की व्यापक समीक्षा कर नए सिरे से पुनर्निर्धारण हो। कुल मिलाकर इसे अभियान की तरह से चलाया जाए। 

स्वास्थ्य महकमे को भी नशा मुक्ति केंद्रों की व्यापक समीक्षा कर पुनर्रचना करनी होगी। सभी राजनीतिक दलों ,सामाजिक, सांस्कृतिक ,धार्मिक संगठनों व प्रमुख व्यक्तित्वों का सम्मेलन आयोजित कर उनके साथ समन्वय बनाया जाए। स्कूलों से कॉलेजों तक कानूनी एजेंसियों के अलावा ऐसे संगठन और व्यक्तित्व सक्रिय हों। अगर राजनीतिक दलों का सहयोग नहीं होगा तो ड्रग्स के भयावह जाल को तोड़ना संभव नहीं हो सकता। इसलिए सत्ता में हो या विपक्ष में सभी राजनीतिक नेताओं को भी अपनी जिम्मेवारी समझनी होगी। यही बातें धार्मिक, सांस्कृतिक व सामाजिक संस्थाओं -और संगठनों व्यक्तित्वों पर भी लागू होती है। उन्हें भी अपना दायित्व समझ कर काम करना होगा। इसमें दो राय नहीं कि कोई अकेला व्यक्ति अकेला संगठन ऐसा करेगा तो ड्रग्स माफियाओं का शिकार हो जाएगा। इसलिए पहले आपस में मिल बैठकर एकता बनायें और फिर संयुक्त रूप से अभियान चलाया जाए।

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