पंजाब में आरएसएस का उल्लेखनीय योगदान

पंजाब में संघ का कार्य 1937 में शुरू हुआ। प्रारंभिक वर्षों में लाहौर तथा सियालकोट में राजाभाऊ पातुरकर और के डी जोशी प्रचारक के रूप में आए। हिंदू तथा सिखों पर इस सदी का भीषणतम संकट देश के विभाजन के समय आया जब लाखों हिंदुओं और सिखों को पश्चिमी पंजाब जो कि अब पाकिस्तान में है, वहां से विस्थापित होकर आना पड़ा। इस दौर में संघ के स्वयंसेवकों ने हिंदू समाज की रक्षा में स्वयं को झोंक दिया। संघ द्वारा उन दिनों में किए गए कार्य ए एन बाली द्वारा लिखित एक पुस्तक, जिसका नाम है now it can be told में उल्लिखित हैं ।
विभाजन के उस दौर में अनेकों कांग्रेसी कार्यकर्ताओं के परिवारों की संघ के स्वयंसेवकों ने रक्षा की है। अनेक कांग्रेसी कार्यकर्ताओं ने ही बाद में यह बताया है । 1950 में पद्म विभूषण द्वारा विभूषित प्रसिद्ध विद्वान गुरबचन सिंह तालिब जो लायलपुर खालसा कॉलेज के प्रिंसिपल भी रहे उन्होंने विभाजन में हुई हिंसक घटनाओं का संकलन करते हुए एक पुस्तक लिखी जिसे शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी अर्थात एसजीपीसी ने 1950 में छपवाया था, उस पुस्तक में संघ का उल्लेख आता है पुस्तक का शीर्षक है मुस्लिम लीग अटैक ऑन सिख्स एंड हिंदुस इन द पंजाब 1947। विस्थापित होकर आ रहे परिवारों के लिए संघ के स्वयंसेवकों ने पंजाब रिलीफ कमेटी बनाई।
विभाजन के समय पंजाब के लाहौर सियालकोट शेखुपुरा मिंटगुमरी आदि क्षेत्रों में संघ के स्वयंसेवकों द्वारा अपनी जान की बाजी लगाकर अपने समाज की रक्षा के काम का विस्तार पूर्वक वर्णन श्रीधर पराड़कर तथा माणिक चंद्र वाजपेई द्वारा लिखित पुस्तक ‘ज्योति जला निज प्राण की’ में विस्तार से मिलता है। खुशवंत सिंह द्वारा लिखित उपन्यास ट्रेन टू पाकिस्तान, जो 1956 में प्रकाशित हुआ था, में भी स्वयंसेवकों द्वारा देश विभाजन की आपदा में किए गए कार्य का उल्लेख मिलता है ।
भाषा के आधार पर जब पंजाब के पुनर्गठन का मामला आया तो उस समय एक वर्ग ऐसा था जो यह कहता था कि हम अपनी मातृभाषा हिंदी लिखवाएंगे। इससे भाषा आधारित संघर्ष का वातावरण खड़ा हो रहा था। उसी समय संघ के सरसंघचालक परम पूजनीय माधव सदाशिव गोलवलकर जी ने पंजाब प्रवास पर आकर कहा कि मैं महाराष्ट्र का रहने वाला हूं और मेरी मातृभाषा मराठी है तो पंजाबियों की मातृभाषा तो पंजाबी ही हुई।गुरु जी के इस प्रकार के कथन के पश्चात पंजाब के सुप्रसिद्ध पंजाबी अखबार अजीत में इस संबंध में बहुत सकारात्मक समाचार छपे जिनका आशय था कि यदि गुरु जी ने ऐसा कह दिया है तो हिंदी पंजाबी का यह झगड़ा ही समाप्त है।
इसका पंजाब के वातावरण पर बहुत सकारात्मक असर पड़ा।संघ के दूसरे सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर जी के देहांत के पश्चात संसद में उनको श्रद्धांजलि दी गई। उस समय देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी थी। विशेष बात यह है कि गोलवलकर जी कोई सांसद नहीं थे। आज उसी पार्टी का एक मुख्यमंत्री किस मुंह से आरएसएस को पंजाब की दुश्मन जमात कहता है।पंजाब के मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी की पार्टी के ही पंडित जवाहरलाल नेहरू जी के प्रधानमंत्री रहते हुए 1963 की गणतंत्र दिवस की परेड में संघ के स्वयंसेवकों को आमंत्रित किया गया था उस समय 3000 स्वयंसेवक पूर्ण गणवेश में गणतंत्र दिवस की परेड में सम्मिलित हुए थे। 1980 के दशक में पंजाब में आतंकवाद चरम पर था। ऐसे में 1986 में पंजाब में समाज का मनोबल बनाए रखने के लिए तथा पलायन रोकने के लिए संघ ने देश के अलग-अलग प्रांतों से प्रचारकों को पंजाब में बुलाया ताकि पंजाबी समाज को यह संदेश जाए की पलायन की आवश्यकता नहीं है, देश का कोना कोना उनके साथ खड़ा है, आज भी उनमें से अनेक प्रचारक पंजाब तथा उत्तरी भारत में संघ के काम में लगे हुए हैं।
मोगा, लुधियाना तथा डबवाली में शाखाओं पर हमले कर आतंकवादियों ने स्वयंसेवकों की हत्या की। ऐसी उत्तेजना पूर्ण परिस्थिति में भी संघ संगठन की तरफ से कोई भी उत्तेजक शब्दावली इस्तेमाल नहीं की गई, जिसके कारण पंजाब में शांति स्थापना में बहुत योगदान मिला। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी जी की हत्या के बाद 1984 के दंगों में दिल्ली में पंजाबी समाज निशाने पर आ गया। इस संकट के समय में संघ के स्वयंसेवकों ने पंजाबी समाज की रक्षा की। इसका उल्लेख प्रसिद्ध पत्रकार खुशवंत सिंह जी ने भी किया है तथा हाल ही में प्रकाशित ‘इंसानियत जिंदा है’ नामक पुस्तक में उस घटना के प्रत्यक्षदर्शियों तथा भुक्तभोगियों के संस्मरण वर्णित हैं।
युद्ध काल में सीमांत क्षेत्रों में संघ के समर्पण युक्त कार्य को देख कर फील्ड मार्शल करिअप्पा बैंगलोर में संघ शाखा देखने गए थे।

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