उप चुनाव परिणामों का अतिवादी विश्लेषण

कांग्रेस ऐसी पार्टी है जो अपनी विजय से ज्यादा भाजपा की पराजय पर प्रसन्न होती है। वह भूल गई है कि बंगाल में तृणमूल कांग्रेस ने उसकी पार्टी को लगभग खत्म कर दिया है। भाजपा के पास तो अभी भी नेता, कार्यकर्ता चुनाव अभियान चलाने वाले बचे हुए हैं पर कांग्रेस के सामने अस्तित्व का संकट है।

पिछले महीने 30 अक्टूबर को तीन लोकसभा एवं 29 विधानसभा उपचुनाव परिणामों के आधार पर कई विश्लेषकों का निष्कर्ष है कि लोगों ने भाजपा को नकारना आरंभ कर दिया है। कुछ ने आने वाले समय में इसे कांग्रेस के उत्थान का संकेतक भी घोषित कर दिया है। स्वाभाविक ही चुनाव परिणामों पर इसके विपरीत मत रखने वाले भी हैं। तो इसे कैसे देखा जाए? तीन लोकसभा सीटों, दादरा और नगर हवेली, हिमाचल प्रदेश की मंडी और मध्य प्रदेश के खंडवा में उप चुनाव हुए तो 29 विधानसभा सीटों में असम की 5, बंगाल की 4, मध्य प्रदेश, मेघालय और हिमाचल की 3-3, राजस्थान, बिहार और कर्नाटक की 2-2, आंध्र प्रदेश, हरियाणा, महाराष्ट्र, मिज़ोरम और तेलंगाना की 1-1 सीट पर मतदान हुआ था। इन लोकसभा सीटों में भाजपा के पास मंडी और खंडवा की सीटें थीं जबकि दादरा और नगर हवेली में उसके समर्थन से निर्दलीय चुनाव जीते थे। 29 विधानसभा में उसके पास 12 तथा कांग्रेस की 9 सीटें थीं। भाजपा केवल खंडवा लोकसभा सीट जीत सकी तथा उसे 7 विधानसभा क्षेत्रों में ही जीत मिली, जबकि उसने 22 स्थानों पर उम्मीदवार उतारे थे।

जाहिर है, कुल आंकड़ों के अनुसार भाजपा का ग्राफ़ नीचे आया है। भाजपा के लिए सबसे बड़ा धक्का हिमाचल से आया है जहां वह न लोकसभा सीट  जीत सकी न विधानसभा। लोकसभा की जीती हुई मंडी सीट भी उसने गंवा दी। यह सीट भाजपा के सांसद रामस्वरूप शर्मा के निधन के बाद खाली हुई थी। कांग्रेस ने पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय वीरभद्र सिंह की पत्नी को उतारा था। तो इसे सहानुभूति की विजय कहा जा रहा है। हालांकि जीत का अंतर 8000 से कम रहा और इसका मतलब है कि टक्कर हुई, किंतु सीट गंवाना भाजपा के लिए निश्चित रूप से धक्का है। इसी तरह अपनी जीती हुई कोटखाई सीट भाजपा ने न केवल गंवा दी बल्कि उसके प्रत्याशी की जमानत तक जब्त हो गई। गोया हिमाचल से भाजपा के लिए निश्चित रूप से बुरे संकेत हैं। वैसे हिमाचल में हर पांच वर्ष पर सरकार बदलने की परंपरा रही है। चूंकि नरेंद्र मोदी और अमित शाह की भाजपा परंपरा को बदलने में विश्वास रखती है इसलिए यह उनकी उम्मीदों को लगने वाला झटका है। राजस्थान से भी भाजपा के लिए बुरी ख़बर है। धरियावाद भाजपा का गढ़ कहा जाता था जहां कांग्रेस प्रत्याशी को जीत मिली। इसके अलावा वल्लभनगर सीट से भी कांग्रेस जीत गई। हालांकि यह हमेशा से कांग्रेस का ही सीट रहा है। पश्चिम बंगाल की चारों सीट पर तृणमूल कांग्रेस को एकतरफा विजय मिली है। जीत और हार का अंतर इतना है मानो मुकाबले में कोई था ही नहीं। कर्नाटक में एक सीट भाजपा जीती तो एक कांग्रेस जीती है। हरियाणा का ऐलनाबाद सीट अभय चौटाला के कब्जे में जाना भी भाजपा के लिए चिंता का कारण होगा।

किंतु दूसरी ओर अगर पूर्वोत्तर पर नजर डालें तो सभी 10 सीटों के उपचुनाव में भाजपा  व उसकी सहयोगी पार्टियों को जीत मिली है। इसका मतलब हुआ कि पूर्वोत्तर में अभी भाजपा का रुतबा कायम है। असम की 5 विधानसभा के उपचुनाव में तीन पर भाजपा उतरी थी और दो पर उसकी सहयोगी यूपीपीसीएल जिनमें सभी पर इनके प्रत्याशी विजित रहे। इसी तरह मध्य प्रदेश में भाजपा ने अपना वर्चस्व बनाए रखा है। सच कहा जाए तो ये परिणाम ऐसे हैं जिनका विश्लेषण कई तरीकों से किया जा सकता है। हिमाचल प्रदेश और राजस्थान भाजपा के लिए बड़े चिंता के कारण होंगे। जयराम ठाकुर मंडी से ही हैं। भाजपा का आंकलन है कि वहां के चुनाव में वीरभद्र सिंह की मृत्यु सबसे बड़ा मुद्दा हो गया था। तो उम्मीद की एक किरण बनती है कि अगर सहानुभूति लहर में भी भाजपा इतने कम अंतर से हारी तो 2024 में यह परिणाम पलट सकता है। किंतु परंपरा तोड़ कर फिर से 2022 में सत्ता बनाए रखने के सपने पर विधानसभा उप चुनाव परिणामों ने धक्का अवश्य पहुंचाया है। इससे कांग्रेस में उत्साह पैदा होना स्वाभाविक है। एक ऐसी पार्टी, जिसके लिए चारों ओर से केवल निराशा और हताशा की ही सूचनाएं हों वहां ये विजय, उम्मीद की किरण लेकर आएंगीं ही। यही बात राजस्थान पर भी लागू होती है। भाजपा यह मानकर चल रही थी कि वहां 2023 के चुनाव में उसकी पुनर्वापसी निश्चित रूप से होगी। लुंज पुंज और दुर्बल होती कांग्रेस वर्तमान भाजपा का मुकाबला नहीं कर सकती। इस विश्वास को उपचुनाव परिणाम ने झटका अवश्य दिया है। राजस्थान में वसुंधरा राजे बनाम कांग्रेस संघर्ष तथा केंद्र द्वारा अब तक नेतृत्व का फैसला न कर पाना भी शायद इसका एक बड़ा कारण हो सकता है। पार्टी अगर आंतरिक कलह से जूझ रही हो तो परिणाम पक्ष में लाना मुश्किल है वह भी जब आप विपक्ष में हैं और सत्तारूढ़ पार्टी के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने इसे करो और मरो का मुद्दा बना दिया था क्योंकि उनके सामने भी पार्टी के अंदर अपने नेतृत्व की धाक बनाए रखने की चुनौती सचिन पायलट ने पेश की हुई है। कर्नाटक में हंगल सीट पर हार हुई जो मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई का गृह जिला है। मुख्यमंत्री बनने के बाद यह उनकी पहली परीक्षा थी। हालांकि उन्होंने कहा है कि चुनाव में कई बार जीत-हार होती रहती हैं इसे बहुत ज्यादा तूल देने की आवश्यकता नहीं, लेकिन भाजपा निश्चित रूप से वहां की समीक्षा करेगी। वैसे कर्नाटक के उपचुनाव परिणाम से कांग्रेस चाहे जितना उत्साहित हो जाए उनके नेता भले ट्वीट दर ट्वीट कर दें, आगामी विधानसभा या फिर 2024 की लोकसभा चुनाव के बारे में कोई निष्कर्ष निकालना बचकाना व हास्यास्पद होगा।

मध्यप्रदेश के बारे में कांग्रेस क्या कहेगी? जोबट उसका परंपरागत गढ़ रहा है जिसे भाजपा ने छीन लिया। 70 वर्षों में ऐसे दो ही अवसर आए हैं जब यह सीट कांग्रेस के हाथों में नहीं रही। खंडवा लोकसभा सीट पर भी भाजपा ने अच्छे अंतर से जीत दर्ज की। हरियाणा में भी अभय चौटाला ने विधानसभा सीट से इस्तीफ़ा दिया था और वह दोबारा जीत कर आए। कांग्रेस को यहां सफलता मिलती तो उम्मीद की जा सकती थी। तेलंगाना और आंध्र से कांग्रेस साफ हो गई। तेलंगाना में भाजपा उम्मीदवार की विजय के मायने क्या होंगे? आंध्र में कांग्रेस की दुर्दशा कायम है क्योंकि जगन रेड्डी वाली वाईएस कांग्रेस ने अपना रुतबा बनाए रखा है। इसका मतलब यह हुआ कि वहां तेलुगू देशम के उभार की भी तत्काल संभावना नहीं मानी जा सकती। इसी तरह पूर्वोत्तर में कांग्रेस ही मुख्य मुकाबले में थी लेकिन उसका कोई उम्मीदवार नहीं जीत सका। असम में उसने विधानसभा चुनाव के विपरीत बदरुद्दीन अजमल से गठबंधन तोड़ कर नया गठबंधन किया। बावजूद मतदाताओं ने उसके उम्मीदवारों को स्वीकार नहीं किया।

वास्तव में इन उप चुनाव परिणामों से कोई एक निष्कर्ष निकाल लेना उचित नहीं होगा। पश्चिम बंगाल के बारे में स्वयं भाजपा समर्थक ही सोशल मीडिया पर यह प्रश्न उठाते रहे हैं कि विधानसभा चुनाव के बाद पार्टी नेतृत्व में वहां कार्यकर्ताओं और समर्थकों को तृणमूल कांग्रेस के हिंसक तत्वों के हवाले छोड़ दिया। हालांकि यह अतिवादी प्रतिक्रिया है। पार्टी वहां हर संभव संघर्ष कर रही है। भाजपा को भी राजनीति में इस तरह के संघर्ष और स्थिति का अनुभव नहीं होगा जहां सत्ता के बल पर दूसरी पार्टियों के लिए आवाज़ उठाने तक की स्थिति खत्म हो जाएगी। केंद्र संवैधानिक सीमाओं के तहत जितना कर सकता था कर रहा है। वहां सांसदों, अधिकारियों के दल भेजे गए, उनकी रिपोर्ट केंद्र के पास है। सरकार से औपचारिक पत्र द्वारा प्रश्न भी किया गया। मानवाधिकार आयोग ने हिंसा की जांच कर अपनी रिपोर्ट दी। भाजपा समर्थक कोलकाता उच्च न्यायालय में भी तृणमूल की हिंसा के विरुद्ध संघर्ष कर रहे हैं और न्यायालय ने जांच के आदेश दिए हैं। मानवाधिकार आयोग और सीबीआई तक को न्यायालय ने वहां काम करने की छूट दी है तो सोशल मीडिया पर भाजपा समर्थकों का यह गुस्सा वाजिब नहीं है कि वहां सब कुछ तृणमूल के हवाले छोड़ दिया है। बंगाल में कोई एक पार्टी लड़ रही है तो वह भाजपा ही है। जितनी शक्ति है उसके अनुसार लड़ाई जारी है। भविष्य की लड़ाई के लिए ही वहां अध्यक्ष बदले गए। वहां तृणमूल जिस ढंग से विरोधियों के विरुद्ध हिंसा कर रही है प्रशासन भी उनके साथ है उसमें विपक्ष की किसी पार्टी के स्थानीय नेता, कार्यकर्ता के लिए टिके रहना मुश्किल है। भाजपा से जिस तरह सांसद और विधायकों ने तृणमूल कांग्रेस का दामन थामा उसका मतलब यही है कि आने वाले समय में अगर वहां भाजपा को विधानसभा पूर्व तक के प्रभाव को भी कायम रखना है तो रणभूमि मानकर कूदना होगा।

कांग्रेस ऐसी पार्टी है जो अपनी विजय से ज्यादा भाजपा की पराजय पर प्रसन्न होती है। वह भूल गई है कि बंगाल में तृणमूल कांग्रेस ने उसकी पार्टी को लगभग खत्म कर दिया है। भाजपा के पास तो अभी भी नेता, कार्यकर्ता चुनाव अभियान चलाने वाले बचे हुए हैं पर कांग्रेस के सामने अस्तित्व का संकट है। जरा सोचिए, मध्यप्रदेश, बंगाल, तेलंगाना, आंध्रप्रदेश इन सबमें कांग्रेस है ही नहीं तो उसके उत्थान का परिणाम यह कैसे हो गया? ज़ाहिर है, भाजपा के लिए उपचुनाव परिणाम का एक अंश चिंता का कारण ज़रूर हैं और उसे राजस्थान एवं हिमाचल में नए सिरे से रणनीति बनाकर व्यूहचना करने की आवश्यकता है, लेकिन परिणाम भविष्य की दृष्टि से एकदम निराशाजनक नहीं माना जा सकता। कांग्रेस के लिए इसे उत्थान का शुरुआत मान लेना अतिवादी विश्लेषण है।

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