पंजाब का चुनावी गणित

इधर भाजपा में आए दिन किसी न किसी महत्वपूर्ण सिख नेता का आगमन हो रहा है। पहले ही शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के महत्वपूर्ण पदाधिकारी मनजिंदर सिंह सिरसा भाजपा के हो चुके है। वही अब हरभजन और युवराज सिंह के आने की चर्चा फिजाओं मे तैर रही है किंतु पिछले चुनावों में कुल जमा दों सीट वाले भाजपा के लिए पंजाब अभी भी दूर की कौड़ी नजर आ रही है।

चुनावों की आहट सीमाई राज्य पंजाब में दिखने लगी है। जोर पकड़ते चुनावों के बीच राजनैतिक पार्टियों के बनते बिगड़ते समीकरण और गुणा गणित भी दिखने लगे हैं। अपनी घोषणाओं और अपने मुद्दे के साथ सभी चुनावी मैदान में हैं। इसको जरा तफसील से समझना हो तो हमें पंजाब के भौगोलिक और सामाजिक गणित को भी समझना होगा। आसन्न चुनावों में कौन दल कहां और किसके साथ है इसका भी विचार करना होगा।

117 सीटों वाले पंजाब में 30 सीटें आरक्षित श्रेणी वर्ग के लिए सुरक्षित हैं। अगर क्षेत्रवार विचार करें तो मालवा सबसे बड़ा और दोआबा सबसे छोटा हैं। वही सीमाई क्षेत्र माझा सीटों के मामले में दूसरे स्थान पर हैं। यहां विधानसभा की 22 सीटें हैं। बात 69 सीटों वाले मालवा की करे तो पंजाब की मौजूदा सरकार और मुख्य विपक्षी दल की तस्वीर यही से साफ हुई थी। पिछले चुनावों में कांग्रेस ने अपनी कुल सीटों के आधे से अधिक मालवा से जीती थी। वही 2017 के इन चुनावों में मालवा के अपने दमदार उपस्थित के बल पर आप पार्टी ने अपनी जबर्दस्त उपस्थित कायम की थी। तब आम आदमी पार्टी को यहां 18 सीटें मिली थी। इसी की बदौलत आप को पंजाब में मुख्य विपक्षी दल का ओहदा हासिल हुआ।

पंजाब के सामाजिक गणित को समझने का प्रयास करें तो यह एक ऐसा राज्य है जहां सदैव से धार्मिक मुद्दे हावी रहे हैं। पिछले चुनावों में अकाली दल के जाने और कांग्रेस के आने को हम इससे समझ सकते हैं। तब कोटकपुरा और बहबल में गुरुग्रंथ साहिब की बेअदबी के मामले ने जोर पकड़ा था। दोषियों की गिरफ्तारी को लेकर सिख युवा प्रदर्शन कर रहे थे। ऐसे में उग्र प्रदर्शन को समाप्त करने के लिए किसी और माध्यम का सहारा लेने की जगह बादल सरकार में पुलिसिया फायरिंग कराई थी, जिसकी परिणति अकाली दल के सफाये के रूप में सामने है।

अब जब प्रधानमंत्री मोदी की पहल से कृषि कानूनों की वापसी हुई है तब से पंजाब में इसके श्रेय लेने की होड़ मची है। इन चुनावों में कांग्रेस, आप, अकाली, बसपा गठबंधन और भाजपा सभी इसके लिए अपने पक्ष में दलील दे रहे है। वही भावनाओं के उबाल वाले इस प्रदेश में खेती और जान-माल की हानि पर ये खलनायक वो खलनायक की तू-तू, मैं-मैं भी शुरू है।

नई हवा के झोकों के लिए सदैव दरवाजा खोलने वाले पंजाब के स्थापित राजनैतिक दल इस चुनाव में इसे भाजपा के खिलाफ एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर भाजपा की भ्रूण हत्या के प्रयासों में है। वही भाजपा की मातृ संगठन आरएसएस के खिलाफ भी पंजाब की फिजाओं में जहर सा घोला गया है। यहां संघ सिखों को खालिस्तान बताने वाला संगठन है। वही अतीत के बुरे अनुभव और 84 दंगों के लिए इनकी दृष्टि में ये कांग्रेस जितने बड़े ही गुनाहगार है, जबकि सच्चाई इसके ठीक उलट है। ऐसे में हर नई हवा के स्वागत में खड़ी पंजाब की फिजाओं में भाजपा को लेकर उदासीनता तो नही पर विरोध के प्रबल स्वर है।

भाजपा पंजाब में नए गठबंधन और धमाकेदार ज्वाइनिंग के बल पर पंजाब का चुनावी मूड़ बदलने की सोच रही है। पहले कैप्टन अमरिंदर सिंह के साथ गठबंधन की बात हुई। वही अब अकाली दल में बादल परिवार के बाद सर्वाधिक रसूखदार नेता सुखदेव सिंह ढींढसा से बागी अकाली गुट को साथ लाने की बात चल रही है। इधर भाजपा में आए दिन किसी न किसी महत्वपूर्ण सिख नेता का आगमन हो रहा है। पहले ही शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के महत्वपूर्ण पदाधिकारी मनजिंदर सिंह सिरसा भाजपा के हो चुके है। वही अब हरभजन और युवराज सिंह के आने की चर्चा फिजाओं मे तैर रही है किंतु पिछले चुनावों में कुल जमा दों सीट वाले भाजपा के लिए पंजाब अभी भी दूर की कौड़ी नजर आ रही है।

मोदी शाह के दौर की भाजपा अपने जोरदार प्रचार और कुशल चुनावी रणनीति के लिए जानी जाती है। यह न केवल चुनाव के मुद्दे तय करती हैं अपितु एक मजबूत इकलौते विकल्प के तौर पर खुद को पेश भी करती है किंतु पंजाब चुनावों में ऐसा कुछ होता नही दिख रहा है। अंतर्कलह से जूझती कांग्रेस के आगे दूर-दूर तक भाजपा कही नजर नही आ रही है। वही वो फिलहाल सिकुड़ते अकाली दल के ज़मीन पर भी अपनी फसल बोते नही दिख रही है, जबकि भाजपा पंजाब में आप पार्टी के सफलता को ध्यान में रख कर शून्य से शिखर का सफर तय कर सकती है किंतु अब तक ऐसा कुछ दिख नही रहा है। पंजाब का चुनाव कभी भी केवल व्यक्ति केंद्रीय नही होता है। यहां व्यक्ति के साथ भावनाओं वाले विचार का सदैव बोलबाला रहा है। इसे ही पहले कांग्रेस ने और फिर आम आदमी पार्टी ने समझा।

बात अगर पंजाब के सामाजिक गणित की करे तो यहां 59% सिख और 40% हिन्दू है। वही तेज गति से ईसाई हो रहे इस राज्य में सरकारी तौर पर घोषित अन्य वर्ग करीब 1% है। पंजाब देश के बड़े राज्यों में इकलौता ऐसा है जहां दलित समुदाय की सर्वाधिक आबादी है। इनकी संख्या यहां करीब 32 % प्रतिशत है, जो अकेले किसी की भी सरकार बनाने को पर्याप्त है। वही यहां के ये रविदास और बाल्मीकि वंशज बेहद धार्मिक है। ये मंदिर और गुरुद्वारों से गहरे तौर पर जुड़े हैं। वही पंजाब भर में फैले छोटे बड़े डेरे वाले बाबाओं में इनकी गहरी आस्था है। कई बार ये अपने मत का प्रयोग भी डेरों के इशारों पर करते है। ऐसे में इन डेरों के समर्थन की दरकार हर दल को होती है।

अतीत के चुनावों में गुरुद्वारों के साथ ही डेरा सच्चा सौदा, दिव्य प्रेम सेवा मिशन, निरंकारी, नामधारी, राधास्वामी सत्संग और रामपाल प्रभाव डालते रहे है। भाजपा ने चुनाव की आहट से महीनों पूर्व पंजाब में पहली बार दलित चेहरे को राज्य के प्रधानी की बात छेड़ी थी। जिसके बाद अकाली और आम आदमी पार्टी को दलित उपमुख्यमंत्री की बात कहनी पड़ी। वही कांग्रेस ने उठापटक के बीच नए मुख्यमंत्री के तौर पर चरणजीत चन्नी को लाया है। पंजाब के इतिहास में पहली बार कोई दलित या तथाकथित दलित इस पद तक पहुंचा है। दरअसल चन्नी एक छद्म पहचानधारी ईसाई है।

दरअसल सिख अलगाव के चर्मोत्कर्ष की दुखांत परिणति ऑपरेशन ब्लू स्टार थी। जिसका परिणाम प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या और 84 के नृशंस दंगे थे। जिसके बाद पंजाब के हालात और भी अधिक खराब हुए। वही पंजाब के अंदर पिछले दशकों में 35 हजार हिन्दू इस सिख आतंक के शिकार हुए है। इसके शिकार हाल के दिनों में आरएसएस पंजाब के कई महत्वपूर्ण पदाधिकारी भी रहे है। ऐसे उत्पीड़न के शिकार पंजाब के हिंदुओं की अपेक्षा होती है कि भाजपा उनके हित में पक्षकार के तौर पर खड़ी नजर आए। किंतु हिन्दू सिख एकता की पैरोकार और पंजाब को लेकर सदैव से ही किंकर्तव्यविमूढ़ दिखती भाजपा यहां भी चुप है। फलतः अकाली भाजपा के पुराने गठबंधन की टूट के बाद यहां कांग्रेस और आप हिंदुओं की पार्टी है। वही अकाली सिख दल है जबकि पंजाब में दलित सिखों की पसंद सदैव से कांग्रेस है। ऐसे में भाजपा की राह मुश्किल है।

बात भाजपा की हो तो उसे पंजाब में हिन्दू और दलित हित की बातों के साथ खुद को पेश करना होगा। वही ऐसा उसे एक मजबूत सिख नेतृत्व के पहचान के साथ ही करना होगा। तभी भाजपा यहां भविष्य की कांग्रेस और आम आदमी पार्टी हो सकती है। इस चुनावी चुनौती के लिए उसे पंजाब के पांथिक समुदाय गुरु और डेरों पर भी डोरे डालने चाहिए। उसे छद्म सिख स्वांगधारी नेताओं की जगह स्थानीय सिख समुदाय के प्रतिनिधियों को पार्टी में लेना होगा। उसे जाट सिख के साथ ही मजहबी सिख और रामगढ़ियों में भी सशक्त नेतृत्व की दरकार है। वही आंतरिक जुड़ाव के लिए बाहरी सिखों की पगड़ी दिखाने गिनाने की जगह पंजाब के सिखों में अपनी पैठ बनानी होगी किंतु बदलते दौर में पंजाब के हिंदू व दलित हितों पर मौन साध कर संघ भाजपा यहां बहुत कुछ प्राप्त नही कर सकती है।

दरअसल पूरे पंजाब में इन दिनों छोटे-छोटे हिन्दू संगठन बेहद प्रभावकारी है जो हिन्दू हित व उत्पीड़न के प्रति बेहद मुख़र है। वही यहां का दलित समुदाय बाल्मीकि रविदास के साथ अपने जुड़ावों को लेकर सजग है। ऐसे में इनके मुद्दे और भावनाओं के प्रति ठोस जुड़ाव से ही संघ भाजपा यहां अपने पांव जमा सकती है। वही उसे इन चुनावों के आहट के साथ ही आहत पंजाबी मन को भी मलहम लगाने की जरूरत है। मृतक किसानों के घर परिवार से मिल उन्हें स्नेह सम्मान करने की जरूरत है। अब जबकि कृषि कानून निरस्त है तो पंजाब के लिए कुछ आकर्षक घोषणाओं की जरूरत है। वही मोदी सरकार द्वारा सिख और पंजाब हित के कामों को इन नवीन घोषणाओं के साथ पंजाब में चौराहे चौपालों तक ले जाने की जरूरत है। अन्यथा एक सीमाई सूबा पाकिस्तानी षडयंत्र, अलगाववाद और ड्रग्स की भेंट चढ़ देश के लिए परेशानी का सबब बन सकता है।

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