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***प्रशांत बाजपेयी***

         कहावत है – ’ माल ए मुफ्त, दिल ए बेरहम। ’ मोटा-मोटा     अर्थ हुआ कि इंसान मुफ्त की चीज़ की कीमत नहीं करता। उनकी कोई किताब प्रतिबंधित नहीं हुई है। किसी फिल्म पर बैन नहीं लगा ह|ै फिर भी उन्हें अभिव्यक्ति की आज़ादी ढूंढे से नहीं मिल रही है। वे रात दिन सरकार के खिलाफ अनाप-शनाप बातें बिना किसी प्रमाण के कहे जा रहे हैं; लेकिन उन्हें शिकायत है कि भारत में बोलने की आज़ादी अचानक समाप्त कर दी गई है। जब कोई तथाकथित सेकुलर बुद्धिजीवी या तथाकथित साहित्यकार भारत में बढ़ती हुई ’असहिष्णुता’ के विरोध में अपना कोई पुरस्कार लौटाता है, तो एक सामान्य नागरिक भी सोच कर देखता है कि अचानक पिछले १९-२० महीनों में भारतीय समाज में ऐसी कौन सी नई बात हो गई है? लोग कटाक्ष कर रहे हैं कि २६ मई २०१४ तक भारत में सतयुग था। लोग घरों में ताले नहीं लगाते थे। न मंहगाई थी, न दंगा फसाद। फिर मोदी सरकार ने शपथ ली और अगले ही क्षण घोर कलियुग शुरू हो गया।

          ज़ाहिर है कि अवार्ड और पुरस्कार लौटाने वाले इस गिरोह को भारत में कुछ मीडिया संस्थानों और इनके राजनैतिक आंकाओं के अलावा कोई गंभीरता से नहीं लेता। लेकिन देश के बाहर इनमें से अनेक को कुछ भाव मिलता है। कुछ विशेष समूहों द्वारा इन्हें मंच उपलब्ध करवाया जाता है। विशेष पहचान दिलाई जाती है। फिर ये लोग निरंतर भारत के समाज के खिलाफ यहां की संस्कृति के खिलाफ योजनाबद्ध तरीके से बोलते हैं। हाल ही में सम्मान लौटाने वाली इस ब्रिगेड में नया नाम जुड़ा है अरुंधति रॉय का। जब-जब केंद्र में भाजपा के नेतृत्व की सरकार बनती है तब अरुंधति रॉय को भारत में सब ओर आतंक और अत्याचार दिखाई देने लगता है। जब कांग्रेस की सरकार बनती है तब अरुंधति को नक्सलियों में संत दिखाई पड़ने लगते हैं। अलजजीरा चैनल को दिए अपने साक्षात्कार में अरूंधती रॉय ने कहा, ‘‘नब्बे के दशक में भारत में दो दरवाजों के ताले खुले। एक रामजन्मभूमि का और दूसरा भारतीय अर्थव्यवस्था का। इन तालों के खुलने से आज़ाद हुई दो ताकतों- हिंदुत्व और उद्योग जगत ने आपस में हाथ मिला लिए।’’ अपनी इन ‘षड्यंत्र सिद्धांत’ वाली परिभाषाओं के माध्यम से भारत का विकृत चित्रण करने वाली अरूंधती रॉय आगे बताती हैं, कि किस प्रकार भारत का उद्योग जगत ‘हिंदूवादियों’ से हाथ मिलाकर ‘असली भारत’ का क्रूर शोषण कर रहा है। अरूंधती रॉय की बौद्धिक फंतासियों में नक्सली आतंकवादी मुक्ति संघर्ष के नायक हैं, और कश्मीर के जिहादी महान क्रांतिकारी हैं। इसलिए आश्चर्य नहीं कि अरूंधती रॉय मार्का वामपंथी बुद्धिजीवी और स्वयं रॉय पाकिस्तान में खासे लोकप्रिय हैं।

          वामपंथी इतिहासकारों के इस वर्ग ने अपना एक गिरोह बनाकर गैर वामपंथी लेखकों को मान्यता नहीं मिलने देने का षड्यंत्र रचा। और केंद्र की कांग्रेस सरकारों के संरक्षण के चलते इसमें अत्याधिक सफल भी रहे। इन्होंने इतिहास को मनमाने ढंग से तोड़ा-मरोड़ा। अपनई सुविधा के हिसाब से इतिहास के कुछ अध्याय पाठ्य-पुस्तकों में से मिटाए और और अपनी विकृत कल्पनाओं के आधार पर नए अध्याय जोड़े। इन्हें शिवाजी में लुटेरा और भगत सिंह में आतंकवादी दिखे। लेकिन औरंगज़ेब ’ज़िंदा पीर’ और नृशंस हत्यारा सिकंदर महान विजेता दिखलाई पड़ा। अंग्रेज़ों द्वारा थोपा गया और दुनिया के वैज्ञानिकों द्वारा अमान्य कर दिया गया भारत पर ’आर्यों के आक्रमण’ का सिद्धांत इन्हें आज भी प्राणों से प्यारा है लेकिन टीपू सुलतान द्वारा हिन्दुओं के विरुद्ध छेड़े गए जिहाद का इतिहास ’अंग्रेज़ों द्वारा फैलाया गया झूठ’ है।  आज समय बदल गया है। अब इन्हें इस बात का भय है कि आज़ादी के बाद से ही बुद्धिजीविता, शिक्षा, साहित्य, कला, इतिहास आदि क्षेत्रों में जो वामपंथी/समाजवादी/मैकालेवादी प्रतिमान गढ़ दिए गए हैं, और इस वितंडावाद को आधार बनाकर इन क्षेत्रों में दूसरे विचारों और व्यक्तियों के प्रवेश के रास्ते में जो निषेध की दीवार खड़ी कर रखी है, ढह जाएगी। और एक बार ये दीवार ढह गई तो इनकी दुकानदारी हमेशा के लिए बंद हो जाएगी। सो ज़ाहिर है कि भारत में एक ’अत्यंत अत्याचारी सरकार’ तो काम कर ही रही है।

          एक बार लेनिन ने लेखकों को नारा दिया था, ‘‘गैर पार्टी लेखन मुर्दाबाद!’’ एक दूसरे मौके पर लेनिन ने कम्युनिस्ट पार्टी कायकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा था कि अपने विरोधियों पर जो चाहे वो नाम चिपका दो, फिर हम उनसे निपट लेंगे। इन नारों और वक्तव्यों की मूल भावना को भारत के वामपंथी लेखकों, बुद्धिजीवियों और झोला-छाप कॉकटेल पार्टियों की शोभा बढ़ाने वाले तथाकथित समाजिक कार्यकर्ताओं ने अपने व्यवहार और चरित्र में गहराई से उतार रखा है। भारत में पिछली सदी के पूर्वार्ध के बाद से ही अलग-अलग चोलों में अलग-अलग आधारों (प्लेटफार्म) पर भारत द्वेषी वामपंथी लेखक और विचारक पनपते आ रहे हैं। अब इनको टुकड़े फेंकने वाला निज़ाम चला गया है, तो सब के सब बिलबिलाते हुए अपनी मांदों से बाहर आ गए हैं।

          कुछ साहित्यकारों ने जो मोदी विरोधी मुहिम चलाई उसके निहितार्थ उनके साहित्य में ही ढूंढे जा सकते हैं। इन पंक्तियों को पढ़ें –

 अब ये तकदीर तो बदली भी नहीं जा सकती,

 मैं वो बेवा हूं जो इटली भी नहीं जा सकती।

      ये पंक्तियॉं कही गई हैं कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी के लिए। रचनाकार हैं, हाल ही में ’मोदी सरकार से नाखुश होकर ’ साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने वाले शायर मुनव्वर राणा। सोनिया जी की वंदना में लिखी गई इस कविता की कुछ और पंक्तियां इस प्रकार हैं –

  मैं तो भारत में मोहब्बत के लिए आयी थी,

 कौन कहता है कि हुकूमत के लिए आई थी।

 सब मेरे बाग़ के बुलबुल की तरह लगते हैं,

 सारे बच्चे मुझे राहुल की तरह लगते हैं।

 और,

 कोख में रखकर ये मिट्टी इसे धनवान किया,

 मैंने प्रियंका और राहुल को भी इंसान किया।

       किसी की आराधना करना न करना शायर का जातीय मामला है, लेकिन जिस प्रकार से राणा और उनके जैसे कुछ और कलमकारों ने केंद्र सरकार और देश का नाम दुनिया में उछालने की कोशिश की है, इन पंक्तियों की रोशनी में ये घटनाक्रम राजनैतिक अंदरखाने में पक रही किसी साज़िश का इशारा कर रहा है। आज तक कोई तेरह सौ लोगों को साहित्य अकादमी पुरस्कार मिले हैं। इनमें से विचारधारा विशेष अथवा परिवार विशेष की तरफ झुकाव रखने वाले तीन दर्जन ’साहित्यकारों’ ने मोदी सरकार के विरुद्ध लचर किस्म की बयानबाज़ी करते हुए जिहाद का ऐलान कर दिया है। इनमें वामपंथियों का भी अच्छा-खासा प्रतिशत है। साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने वाले उदय प्रकाश की एक कविता का नमूना देखिए-

 एक था रंगा

 एक था बिल्ला

 दोनों भाई-भाई नहीं थे,

 लेकिन दोनों को फॉंसी हो गई।

 एक थे टाटा,

 एक है बिरला

 दोनों भाई-भाई हैं,

 लेकिन दोनों को फांसी नहीं हुई्।

      कविता के स्तर पर बाद में चर्चा की जा सकती है, फिलहाल कवि की सोच पर ध्यान दें। श्रीमान उदयप्रकाश दो देशभक्त महान उद्योगपतियों की तुलना दुर्दांत हत्यारों रंगा और बिल्ला से कर रहे हैं। उद्योगपतियों के प्रति परंपरागत कम्युनिस्ट घृणा की सड़ांध में लिपटी ये पंक्तियां इन साहित्य अकादमी पुरस्कार ’विजेता’ की राजनैतिक प्रतिबद्धता की पोल खोल रही हैं। १६ मई, २०१४ का चुनाव परिणाम तथाकथित सेक्युलर राजनीति के दरबारों और लाल गलियारों में भूचाल ले कर आया। दशकों से सत्ता की खुरचन पर पल रहा, ल्युटियन दिल्ली की बैठकों में फलने-फूलने वाला तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग भी बेचैन हो उठा। ये लोग आज भी जनता के निर्णय को स्वीकारने के लिए तैयार नहीं हैं। चूंकि जनमत को नकारा नहीं जा सकता इसलिए जनमत की आंखों में ही धूल झोंकने की नाकाम कोशिशें शुरू हो गईं, और लौटाना भी क्या था, कागज़ का टुकड़ा। सो, ये मुट्ठीभर ’सेक्युलर’ जंगजू उंगली कटा कर शहीद बनने के लिए तैयार हो गए। साहित्य अकादमी पुरस्कार के रूप में केवल प्रशस्ति पत्र नहीं देता, साथ में पुरस्कार राशि दी जाती है, और उससे भी बढ़ कर इन विजेताओं की रचनाओं का भारत की भाषाओं में अनुवाद किया जाता है। ७ अक्टूबर को अपने एक साक्षात्कार में साहित्य अकादमी के वर्तमान अध्यक्ष विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने पीटीआई से कहा, अकादमी विजेताओं की रचनाओं का भिन्न-भिन्न भाषाओं में अनुवाद करती है। इससे इन लेखकों को बड़ा नाम और रुतबा मिलता है। वे पुरस्कार लौटा रहे हैं, लेकिन इस लाभ के बारे में क्या कहेंगे? उन्होंने आगे कहा कि साहित्य अकादमी पूरी तरह गैर राजनीतिक संस्था है। इसके दिए प्रशस्ति पत्र लौटाने से क्या लाभ है? कुछ लोग सवाल पूछ रहे हैं कि साहित्य अकादमी को केंद्र सरकार का विरोध करना चाहिए्। क्या ये साहित्य अकादमी का काम है?

          इस मुट्ठीभर राजनैतिक विरोध को जब मुख्य धारा के मीडिया ने सिर पर चढ़ाकर भाव देना शुरू किया तो सोशल मीडिया का रोष उबल पड़ा। ट्विटर पर एक युवक ने लिखा, अकादमी पुरस्कार लौटने वाली नयनतारा सहगल ठीक कह रही हैं, असहिष्णुता बढ़ रही है। कुछ लोग शाही गांधी परिवार की जगह एक चाय बेचने वाले को सत्ता में सहन नहीं कर पा रहे हैं। कुछ और सवाल भी पूछे गए जैसे, नयनतारा सहगल ने उस सरकार से पुरस्कार क्यों लिया था जिसने ने १९८४ का सिख नरसंहार करवाया।  क्या नयनतारा सहगल ने कश्मीरी हिन्दुओं के नरसंहार के बारे में नहीं सुना था? तब पुरस्कार लौटाने की याद क्यों नहीं आई? जब एक राष्ट्रीय स्तर के पत्रकार ने नयनतारा की पैरवी करते हुए ट्वीट किया कि उन्होंने आपातकाल का विरोध किया था, तो तुरंत ही जवाबी ट्वीट भी आ गया कि हा नयनतारा ने आपातकाल का विरोध किया, लेकिन तब जब इटली की राजदूत बनने के उनके मंसूबों पर पानी फिर गया। वैसे भी इंदिरा गांधी अपनी फुफेरी बहन को जेल में तो डालने वाली थी नहीं।

           इन राजनैतिक साहित्यकारों के दोहरे मापदंडों ने जनमानस को उद्वेलित कर दिया है। संघीय ढांचे की दुहाई देने वाले बुद्धिजीवी भी पश्चिम बंगाल में हुई नन बलात्कार घटना के लिए ममता बनर्जी की जगह प्रधान मंत्री पर उंगली उठाते हैं। एम एम कलबुर्गी की हत्या कर्नाटक में होती है, जहां कांग्रेस की सरकार है। दादरी हिंसा सपा सरकार की नाक के नीचे होती है। जिम्मेदार केंद्र सरकार और प्रधान मंत्री को ठहराया जाता है। ये वितंडावाद नहीं तो और क्या है? मापदंडों का दोहरापन और जुबान का दोगलापन यहीं ख़त्म नहीं होता। दादरी में अखलाक की मौत पर मीडिया का एक वर्ग और छद्म सेकुलरवादी तूफ़ान खड़ा कर देते हैं। दूसरे प्रदेश का मुख्यमंत्री, सरकारी अमला और मीडिया का हुजूम सब अख़लाक़ के दरवाजे पर जा पहुंचते हैं; लेकिन उसके चंद दिनों बाद ही कर्नाटक के एक गौरक्षा को समर्पित युवक प्रशांत पुजारी की मुस्लिम हमलावरों द्वारा दिनदहाड़े नृशंस ह्त्या कर दी जाती है, लेकिन सारे बुद्धिजीवी जगत और अधिकांश मीडिया हलके एक शब्द कहना उचित नहीं समझते? पुजारी की ह्त्या के चश्मदीद गवाह की भी रहस्यमय मौत हो गई। कहीं से एक सवाल भी नहीं उठा। किसी भी लेखक या सामान्य व्यक्ति की ह्त्या अनुचित है। करने वाले को क़ानून के अनुसार दंड मिलना चाहिए। लेकिन मृत कन्नड़ लेखक एमएम कलबुर्गी ने किस प्रकार हिन्दू भावनाओं का निरादर किया, उसका सिरे से चर्चा से गायब होना पत्रकारों और बुद्धिजीवियों की नीयत पर प्रश्न तो खड़े करेगा ही। जून २०१४ में बंगलुरु में ’अंधविश्वास विरोधी बिल’ पर आयोजित सेमीनार में कलबुर्गी ने स्वयं के द्वारा शिवलिंग पर पेशाब किए जाने का बखान किया था। क्या इससे समाज में तनाव और आक्रोश नहीं भड़का होगा? इसका ज़िम्मेदार कौन है? इन आपत्तिजनक बातों पर किसका इस्तीफा मांगा जाना चाहिए?

       अंत में बात ’वैज्ञानिक’ पी एम भार्गव की, जो विज्ञान का इतना सा तथ्य नहीं समझ पाए कि किसी बात को प्रमाणित करने लिए प्रमाणों की आवश्यकता होती है। वे टीवी पर दुहरा रहे थे कि वे सरकार से इसलिए नाराज़ हैं क्योंकि आरएसएस फासिस्ट है। कोई सबूत देंगे वैज्ञानिक महोदय? फिर यूपी-बंगाल और कर्नाटक जैसे गैर भाजपा शासित राज्यों के लॉ एंड आर्डर की घटनाओं के लिए केंद्र सरकार और पीएम पर क्यों बरस रहे हैं? मतलब, सोडियम से इसलिए नाराज है क्योंकि यूरेनियम से रेडिएशन फैलता है।

       खुद को ’सेकुलर’ कहने वाले बुद्धिजीवियों और साहित्य के नाम पर राजनैतिक निशाना साध रहे सिपहसालारों के पास इन बातों के कोई उत्तर नहीं है। उत्तर देने की उनकी मंशा भी नहीं है। फिर भी उनसे आखिरी सवाल। कागज़ का टुकड़ा तो लौटा दिया, और क्या लौटाएंगे? सरकारी योजनाओं के लाभ? देश की नागरिकता? क्या साहित्य अकादमी के कारण बाजारों और सरकारी पुस्तकालयों में मौजूद अपनी किताबों को भी वापिस लिए जाने की मांग उठाएंगे? लौटाने जैसा जो है, क्या वह लौटाएंगे?

 

 मो. ९८२६०२९८६९

 

 

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