हिंदुत्व की दृष्टि से गोरखपुर का है महत्व

मीडिया एवं विपक्षी दलों के बीच उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गोरखपुर से उम्मीदवार बनने से ज्यादा चर्चा अयोध्या से उनके चुनाव नहीं लड़ने की है। पिछले कई दिनों से अलग-अलग तरीकों से अलग-अलग विशेषण दिया जा रहा है कि आखिर वे अयोध्या से क्यों नहीं लड़े? चुनाव के समय विरोधी स्वाभाविक ही अनेक विषयों को मुद्दा बनाते हैं। लंबे समय से मीडिया में योगी आदित्यनाथ के अयोध्या से लड़ने संबंधित खबरें आ रही थी, इसलिए इस पर चर्चा अस्वाभाविक नहीं है। 2014 में जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री पद के केवल उम्मीदवार थे तब वाराणसी से उनके लड़ने की इसी तरह चर्चा थी। अंततः वे वहीं से लड़े वही और सांसद बने। भाजपा प्रखर हिंदुत्व का संदेश उनको वाराणसी से लड़ा कर पूरे देश को देना चाहती थी और चुनाव परिणामों ने सिद्ध कर दिया कि उसमें वह सफल राही। इस पृष्ठभूमि में योगी आदित्यनाथ के अयोध्या से चुनाव मैदान में उतरने की खबरों को एकबारगी गलत और अस्वाभाविक नहीं माना जा सकता था।

ध्यान रखने की बात यह भी है कि 2014 के लोकसभा चुनाव के समय अमित शाह पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं उत्तर प्रदेश के चुनाव प्रभारी थे। उत्तर प्रदेश को उन्होंने गहराई से मथा था और उनका निष्कर्ष था कि अगर मोदी वाराणसी से लड़ते हैं तो प्रदेश में इसका व्यापक संदेश जाएगा ही पूरे देश में जाएगा। इस पर काफी मंथन हुआ। आरंभ में जब उनका सुझाव आया तो पार्टी में सहमति नहीं थी। लेकिन नरेंद्र मोदी अपनी सभाओं से इतनी लोकप्रियता प्राप्त कर चुके थे तथा उत्तर प्रदेश में जिस तरह की भीड़ उनकी सभाओं में आने लगी थी उससे माहौल बदल गया था। इस कारण अमित शाह का सुझाव पार्टी को स्वीकार करना पड़ा। हालांकि पार्टी नेतृत्व में तब भी देशव्यापी बड़ी विजय यानी बहुमत प्राप्त कर लेने का आत्मविश्वास नहीं था, इसलिए मोदी गुजरात से भी चुनाव मैदान में उतरे। यह बात अलग है कि बाद में उन्होंने वहां से त्यागपत्र दे दिया और आज भी वे वाराणसी से ही सांसद हैं।

इस समय भी अमित शाह भाजपा के मुख्य राजनीतिक- चुनावी रणनीतिकार हैं। पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा हैं और स्वाभाविक ही उनकी भूमिका है लेकिन अमित शाह का मंतव्य अंतिम होता है। संपूर्ण पार्टी में यह आम धारणा है कि अमित शाह जो बोलते हैं उसमें मोदी की संपूर्ण सहमति होती है और यही सच भी है। तो विचार करने वाली बात यही है कि आखिर अमित शाह ने अयोध्या से योगी आदित्यनाथ को चुनाव लड़ा कर 2014 की पुनरावृति कराने की कोशिश क्यों नहीं की? भाजपा का यह कहना सही है कि पार्टी ने कभी औपचारिक तौर पर उनकी उम्मीदवारी की घोषणा की नहीं तो यह प्रश्न ही बेमानी है। निस्संदेह, भाजपा के किसी नेता ने औपचारिक तौर पर कभी नहीं कहा कि योगी अयोध्या से उम्मीदवार होंगे।

जब तक पार्टी के अंदर निर्णय नहीं हो जाता तब तक किसी की उम्मीदवारी की घोषणा नहीं होती। इसका यह अर्थ नहीं कि पार्टी में योगी को अयोध्या से लड़ाने की चर्चा ही नहीं हुई। पूरी चर्चा हुई। कई नेताओं का मानना था कि वहां से लड़ने का संदेश अच्छा जाएगा और हिंदुत्व लहर में हम 2017 को दोहरा सकते हैं। मीडिया में उनके अयोध्या से लड़ने की खबर के बाद उत्तर प्रदेश में पार्टी कार्यकर्ताओं और आम जनता की प्रतिक्रिया भी उत्साहजनक थी। सच यह है कि अयोध्या के नेताओं ,कार्यकर्ताओं तथा उनसे संबंध रखने वाले साधु – संतो ने उसके अनुरूप वहां तैयारी भी शुरू कर दी थी। भाजपा 1986 से ही अयोध्या में विवादित स्थल पर श्री राम जन्मभूमि मंदिर निर्माण आंदोलन का नेतृत्व करने लगी थी। अब जब मंदिर बन रहा है तो स्वाभाविक ही लोगों के जेहन में उसे बनाए रखना ,उसका राजनीतिक लाभ लेना तथा चुनाव में उसे किसी न किसी रूप में जीवित रखना उसकी स्वाभाविक रणनीति होती।

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को लेकर पार्टी की रणनीति के कई अन्य पहलू है। 2014 में पार्टी को एक विशेष संदेश देना था। तब वह सत्ता में नहीं थी। आज केंद्र और उत्तर प्रदेश दोनों जगह भाजपा स्थापित है। उत्तर प्रदेश से वह 2014 के बाद तीन चुनाव जीत चुकी है। योगी आदित्यनाथ को भगवाधारी हिंदुत्व के प्रखर चेहरा के साथ-साथ सुशासन के प्रतीक के रूप में भी पेश किया गया है। उत्तर प्रदेश में उन्होंने कानून व्यवस्था के साथ कठिन समय में आर्थिक विकास की गति को संभाल कर अपनी दक्षता साबित भी की है। नरेंद्र मोदी अपनी सभाओं में हिंदुत्व का संदेश देने के साथ योगी की कानून -व्यवस्था, विकास और प्रशासनिक क्षमता की लगातार प्रशंसा कर रहे हैं। इसी संदर्भ में एक सभा में मोदी ने उन्हें योगी बहुत ही उपयोगी जैसा नारा भी दे दिया। ऐसा नहीं था कि अयोध्या से लड़ने के बाद उनकी कानून व्यवस्था और प्रशासनिक दक्षता वाली छवि सामने नहीं रहती। लेकिन वह थोड़ा कमजोर पड़ सकता था। फिर योगी चाहे कहीं से लड़े उनका भगवा वस्त्र और कार्यशैली में हिंदुत्व की प्रखरता अपने आप समाहित है। दूसरे , भाजपा उत्तर प्रदेश चुनाव में संदेश यही देना चाहती है कि वह हर तरह से अपनी भारी विजय को लेकर आश्वस्त है।

आप देखेंगे कि भाजपा चुनाव संबंधी निर्णयों और वक्तव्यों  में बिल्कुल संयत, शांत, सहज और स्वाभाविक दिख रही है। उम्मीदवारों की सूची में भी आपको ऐसा कुछ नहीं दिखेगा जिससे लगे कि भाजपा में किसी स्तर पर किंचित भी पराजय का भय है। अयोध्या से लड़ने के बाद विरोधी यह प्रचार करते कि योगी आदित्यनाथ को स्वयं तथा पार्टी के पराजित होने का भय है, इसलिए  ध्रुवीकरण के लिए वहां से उन्हें चुनाव मैदान में उतारा गया है। संभव था इसका कुछ असर मतदाताओं पर पड़ता। गोरखपुर सदर से चुनाव मैदान में उतरने के बाद विपक्ष जो कुछ भी कह रहा है वह केवल विरोध की औपचारिकता ही दिखती है। भाजपा ने अपने उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य को भी उनके मुख्य कार्य क्षेत्र प्रयागराज के सिराथू से ही उतारा है।

दोनों नेताओं को उनके क्षेत्र से उतारकर भाजपा संदेश दे रही है कि वह जनता से निर्वाचित कराकर उन्हें विधानसभा में लाना चाहती है इसलिए मैदान में उतारा है, अन्यथा विजय के लिए उनको किसी विशेष क्षेत्र से लड़ाने और उसका अलग संदेश देने की उसे आवश्यकता नहीं है। वैसे गोरखपुर का भी हिंदुत्व की दृष्टि से महत्व है। योगी आदित्यनाथ के गुरु स्वर्गीय महंत अवैद्यनाथ लंबे समय तक अयोध्या आंदोलन के अगुआ थे और गोरक्षपीठ मठ उसका केंद्र बिंदु था। योगी आदित्यनाथ स्वयं वहां हिंदुत्व के प्रखर चेहरा रहे हैं और एक समय उन्होंने तत्कालीन आवश्यकताओं के अनुरूप वही हिंदू युवा वाहिनी नाम से संगठन भी बनाई। दूसरे ,विकास और कानून व्यवस्था की दृष्टि से गोरखपुर में अनेक कदम उठाए गए हैं । इस तरह गोरखपुर भी केंद्र की मोदी तथा प्रदेश की आदित्यनाथ योगी सरकार की धर्म संस्कृति को पूरा महत्व देते हुए आर्थिक, सामाजिक, वैज्ञानिक, तकनीकी  विकास की दृष्टि से भी एक महत्वपूर्ण प्रतीक है। यहां से योगी की दोनों छवियां भाजपा की दृष्टि में परिपुष्ट होतीं हैं। परंपरागत क्षेत्र होने के कारण निवास चुनाव के लिए अतिरिक्त समय देने के लिए आवश्यकता नहीं होगी।

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