हर पल खुशियों को तलाशने से बनेगा बेहतर जीवन

प्रसन्नता का अर्थ हर व्यक्ति के लिए अलग-अलग हो सकता है। बावजूद इसके लोक कल्याणकारी राज्य की परिकल्पना हमारे संविधान में की गई है। ऐसे में जब हम बात लोक- कल्याण की करते हैं। फ़िर स्वतः ही प्रसन्नता का सूचक शब्द प्रस्फुटित हो जाता है। वैसे प्रसन्नता के मायने भले हर व्यक्ति के लिए अलग-अलग हो, लेकिन हर वर्ष अंतरराष्ट्रीय प्रसन्नता दिवस मनाया जाता है और हमारे लोकतांत्रिक व्यवस्था का दुर्भाग्य यह है कि लगातार हम इस मामले में फ़िसलते जा रहें हैं।

राजनीति के सूरमा भले विकास के लाख दावे करें और तरक़्क़ी की नित नई तस्वीरें पेश की जाती हो, लेकिन स्याह पक्ष यही है कि प्रसन्नता के मामले में ये बातें बेईमानी ही साबित होती है। उल्लेखनीय बात यह है कि हम हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी 20 मार्च को अंतरराष्ट्रीय प्रसन्नता दिवस मनाएंगे। जिसे मनाने के मायने है कि लोग खुशहाल जिंदगी जिए, लेकिन न तो हमें आज प्रसन्नता का सही अर्थ पता है और न ही लोकतांत्रिक सरकारें इस दिशा में कुछ कर पा रही हैं। वैसे प्रसन्नता कोई क्षणिक या भौतिक वस्तु नहीं, जिसे उपलब्ध कराकर सियासतदां अपनी पीठ थपथपा लें, लेकिन फिर भी उनके प्रयास नाकाफी साबित हो रहें हैं। जिसका परिणामी यह हो रहा है कि इस मामले में हम लगातार लुढ़कते जा रहें हैं। इस वर्ष की थीम ‘बिल्ड बैक हैप्पीयर’ है, जो महामारी से वैश्विक स्वास्थ्य लाभ पर केंद्रित है। लेकिन आंकड़े बताते है कि भारत प्रसन्नता के मामले में लगातार अपने पड़ोसी देशों से भी निम्नतम प्रदर्शन कर रहा है।

यूं तो विश्व प्रसन्नता दिवस मनाने की शुरुआत साल 2013 में हुई थी और उस समय प्रसन्नता की रैंक में हम 111वें पायदान पर थे। तो वही 2021 में आते-आते हमारी स्थिति 149 देशों की सूची में 139 वें पायदान पर पहुंच गई। जिसका सीधा निहितार्थ यह हुआ कि इन आठ वर्षों में हम प्रसन्नता के मामले में 25 फीसदी नीचे चलें गए। इतना ही नहीं अचरज की बात यह है कि प्रसन्नता के स्तर में हम पाकिस्तान, चीन और बांग्लादेश जैसे देशों से भी निचले पायदान पर है। ऐसे में हमें कतई हक नहीं है विश्व की पांचवी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने पर गर्व करने की और आबादी के मामले पर हम शीर्ष पर पहुँचने वाले। यह विषय भी चिंता का कारण बनना चाहिए, क्योंकि कहीं न कहीं प्रसन्नता की राह में रोड़े यह विषय भी अटका रहा है। इसके अलावा गौरतलब हो कि जो व्यक्ति हर समय प्रसन्नचित्त रहता है उसके ऊपर परमात्मा की विशेष कृपा रहती है और एक प्रसन्नचित्त मुख भी दूसरी आत्माओं को प्रसन्नता की अनुभूति कराता है। इतना ही नहीं प्रसन्नता एक आध्यात्मिक वृत्ति है, एक दैवीय चेतना है। सत्य तो यह है कि प्रमुदित मन वाले व्यक्ति के पास लोग अपना दुख-दर्द भूल जाते हैं, लेकिन इसकी वास्तविक अनुभूति कैसे हो? यह बड़ा अहम सवाल है।

ऐसे में अतीत को देखें तो खुशी के अध्ययन का पहला इतिहास 2,500 साल पहले शुरू हुआ था। जो वर्तमान में भी तलाशा जा रहा है और तमाम दार्शनिक जैसे कन्फ्यूशियस, सुकरात, अरस्तू और बुद्ध ने तो इस विषय की खोज के लिए अपना जीवन तक समर्पित कर दिया, लेकिन वैश्विक स्तर की प्रसन्नता या पूरे देश-समाज में प्रसन्नता का माहौल आज भी कहीं नहीं देखने को मिलता। वर्तमान दौर में ज़िन्दगी के तौर तरीके जिस हिसाब से बदल रहे है। उनसे यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि भले आज हम तरक्की के नित नए आयाम गढ़ रहे है। लेकिन हमारे अंदर की इंसानियत कही पीछे छूटती जा रही है और आज छोटी छोटी बातों पर इंसान मरने मारने को तैयार हो जाता है। जो कहीं न कहीं प्रसन्नता के स्तर पर हमें पीछे ढकेलने का काम कर रही है। एक समय था जब हम “सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः, सर्वे भद्राणि पृश्यन्तु, मां कश्चित् दुख भाग भवः।” में विश्वास करते थे, लेकिन आज उसकी डोर भी डगमगा रही है।

बात खुशी या प्रसन्नता के ऐतिहासिक पृष्ठभूमि की करें तो हिन्दू शस्त्रों में भी खुशी को परम आनंद के रूप में परिभाषित किया है। इसके अलावा छठी सदी के भारतीय दार्शनिक और बुद्धिजीवी आदि शंकराचार्य ने कहा है कि अल्पकालिक वस्तुओं के प्रति उदासीनता और आंतरिक चेतना के साथ संबंध ही सच्ची प्रसन्नता देता है। वही 350 ईसा पूर्व में लिखे गए निकोमैचियन एथिक्स में, अरस्तू ने कहा कि धन, सम्मान, स्वास्थ्य या दोस्ती के विपरीत, खुशी ही एकमात्र ऐसी चीज है जो मनुष्य अपने लिए चाहते हैं। इसके अलावा अरस्तू ने तर्क दिया कि अच्छा जीवन उत्कृष्ट तर्कसंगत गतिविधि का जीवन है। वहीं भगवान श्री कृष्ण ने भी गीता में कहा है कि, “फल की आशा के बिना निरपेक्ष भाव से किया गया कर्म ही सर्वोत्तम है।” ऐसे में यह सच भी है कि जहां स्वार्थ होगा वहां छल कपट भी होगा। स्वार्थ से परे ही सच्चा सुख प्रसन्नता की राह सुगम बनाता है।

आज के जीवन में खुश रहना हर व्यक्ति का अधिकार है और कहीं न कहीं व्यक्तिगत स्वतंत्रता की पूर्ति प्रसन्नता के बाद ही पूरी हो सकती है और इस कड़ी में कोरोना ने तो अहम योगदान दिया है। कोरोना ने व्यक्ति को यह सीखा दिया है कि प्रसन्नता और अपनापन ही इस मानव जीवन का सार है और इस प्रसन्नता को सिर्फ़ पैसे के बल पर नहीं खरीदा और बेचा जा सकता। फिर भी अगर व्यक्ति यह समझने में असमर्थ रहता है। फ़िर बेजा की बाकी क़वायद व्यर्थ है, लेकिन यहां पर रहनुमाई व्यवस्था की मौजूदगी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, क्योंकि कहते हैं न कि भूखे पेट भजन न हो गोपाला। ऐसे में अगर देश की एक भी आवाम भूख से पीड़ित है तो उसकी भूख मिटाना समाज और सरकार का कर्तव्य बनना चाहिए। वैसे सामूहिक प्रसन्नता के लिए सिर्फ सरकार उत्तरदायी नहीं कही जा सकती। उसमें समाज का योगदान भी होना चाहिए और कहते हैं कि खुशी के सबसे महत्वपूर्ण लाभों में से एक लाभ यह है कि जो लोग खुश रहते हैं वे लंबे समय तक जीवित रहते हैं और उन्हें उच्च रक्तचाप और हृदय संबंधी समस्याएं कम होती हैं। ऐसे में प्रसन्नता सिर्फ़ व्यक्ति का विषय नहीं देश और समाज का विषय बनना चाहिए और इसके लिए सभी को प्रयास करना चाहिए। तभी इसका असली अर्थ निकलकर सामने आएगा और मानवीय धर्म भी कहीं न कहीं यही कहता है।

 – सोनम लववंशी

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