निष्पक्ष पत्रकारिता या धंधे की पत्रकारिता

वर्किंग जर्नलिस्टस ऑफ इंडिया ने अपनी मांगों के समर्थन में दिल्ली के जंतर मंतर पर बहु चर्चित धरना- प्रदर्शन का आयोजन 30 मार्च को किया। इस आयोजन में बड़ी संख्या में पत्रकारों और मीडिया कर्मियों ने भाग लिया और एक ज्ञापन प्रधानमंत्री कार्यालय को दिया। उनकी बहुत सी मांगे बहुत व्यवहारिक हैं। पत्रकारिता के कई नए रूप नए समाज मे अवतरित हुए हैं। एक समय मे पत्रकार होना प्रतिष्ठा का विषय होता था। विचारवान, ज्ञानवान, भाषाविद और सामाजिक चेतना के लोग पत्रकार होते थे।

समाचार पत्र विज्ञप्तियों को लेने की बजाय अपना रिपोर्टर कवरेज के लिए भेजते थे। समाचार में थिंदी सी त्रुटि होने पर रिपोर्टर को संपादक का कोप भजन बनना पड़ता था। इस दौर में जिसे कुछ काम नही मिलता वह भी अपनी गाड़ी पर प्रेस या मीडिया का बोर्ड लगा कर दौड़ता रहता है। सोशल मीडिया में इधर की पोस्ट उधर भेजने वाला भी स्वयं को पत्रकार कहता है। कोई यू ट्यूबर है, कोई ट्वीटर पर चहक रहा है तो कोई इंस्टाग्राम पर महक रहा है। न्यूज़ पोर्टल भी पत्रकारिता का नया रूप है। और न जाने क्या क्या अवतरण सुनाई देते हैं। पत्रकारिता की पुनर्भाषित करने की  आवश्यकता है।

पत्रकारों को न मिलनेवाली सुविधाएं, अधिमान्यता, सी जी एच एस सुविधा, पुलिस सुरक्षा जैसी अनेक बातें हैं  जिन पर सरकार को मानवीय आधार पर विचार करना चाहिए। वर्किंग जर्नलिस्ट ऑफ इंडिया के अध्यक्ष अनूप चौधरी, महामंत्री नरेंद्र भंडारी और उपाध्यक्ष संजय उपाध्याय पिछले तीन वर्षों से पत्रकारों के हित के लिए अभियान चलाए हुए  हैं। बहुत सी सफलताएं उन्हें मिली,  कामना है शेष मांगे भी पूरी हों।

नई अर्थव्यवस्था से पूर्व (1991) भी इस देश में पत्रकारिता थी, लोग लिखे पर विश्वास करते थे। कहावत थी सौ बकी एक लिखी। “प्रेस” शब्द को लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में देखा जाता था। दलीय पत्रकारिता तब भी थी। “पांचजन्य” संघ विचारधारा का था तो “ब्लिट्ज” वामपंथी विचारधारा का, और “नेशनल हेराल्ड” कोंग्रेस की विचारधारा पर था। इसी प्रकार अन्य समाचार पत्र भी थे। संपादकीय से पता चलता था कि इस समाचार पत्र को रुख किस ओर है। समाचारों में मिलावट बहुत कम या नगण्य होती थी।

खुली अर्थव्यवस्था नें समाचारपत्र को उत्पाद (प्रोडक्ट) बना दिया। समाचार पत्र का पाठक अब पाठक नही रहा। उसका अवमूल्यन होकर ग्राहक हो गया। मुझे ग्राहक शब्द से कुछ गुरेज थी। धंधा करने वाले पहले अच्छे नही समझे जाते थे क्योंकि उनका काम ग्राहकों से ही चलता था। पहले किसी भी समाचार पत्र का संपादक विद्वान व्यक्ति  होता था उसके नाम से समाचारपत्र की पहचान होती थी। पत्रकार निष्पक्ष और निर्भीक होते थे। अखबार में छपी खबर का उल्लेख संसद में होता था।

अब समाचार पत्र में छपे समाचार पर विश्वास करना कठिन हो गया है। क्योंकि अखबार में अक्सर पेड न्यूज होती है। अब वह सब कुछ  छपने लगा है जो पत्रकारिता होती ही नही। उदाहरण देखिये-शिल्प सेठी ने अपनी छत में बैंगन उगाए हुए हैं, उनके फैंस में बैंगन बहुत चर्चा में हैं। उर्फी जावेद का बोल्ड लुक फेन्स को बहुत लुभा रहा है। प्रदीप मेहरा का सेना में भर्ती होने के लिए दौड़ का वीडियो वायरल हुआ। उसके पीछे प्रदीप की गरीबी को भुनाना था। प्रदीप के जैसे अनेक लड़के हैं जो जीवन का संघर्ष बचपन से झेल रहे हैं। उस कुव्यवस्था पर किसी ने कुठाराघात कोई नही करता।  उत्तराखंड में हर दो चार दिनों में कोई तेंदुआ, बाघ या भालू किसी बच्ची को निवाला बना देता है, या महिला को भालू ने मार देता है,  ऐसे समाचार मेनस्ट्रीम मीडिया में क्यों नही दिखाई देते।

सही बात तो यह है क्या नेता, क्या अफसर और क्या तथाकथित पत्रकार सब अपनी अपनी झोली भरने में लगे हैं। न्यूस्पोर्टल एक नई पत्रकारिता है। इसमें 90 प्रतिशत लोग वे हैं जो खबरों का विशुद्ध धंधा करते हैं। इलेक्ट्रॉनिक चैनल्स को देखिए रिपोर्टर गायब हो गया। स्टुडियो में एक इस पार्टी का  एक उस पार्टी का, एक पीएफआई का, एक कम्युनल, एक लिबरल बिठा दीजिए। मुद्दा ऐसा उठाइये जिसमें तू- तू, मैं – मैं हो। फिर न्यूज़ एंकर की स्थिति देखिये। आपने नवाबों के शौक के बारे में सुना हो तो उन्हें मुर्गा लड़ाने में बहुत आनंद आता था। वही आनंद न्यूज़ एंकर को मिलता है क्योंकि टी आर पी बढ़ेगी और नौकरी सुरक्षित रहेगी।

मीडिया पर बल का वर्चस्व है। द कश्मीर फाइल्स के प्रोमशन अमुक-अमुक कार्यक्रम या चैनल में न हो पाना अंडरवर्ल्ड की शक्तियां हैं। महाराष्ट्र के पालघर में दो सन्यासी बेरहमी से मारे गए। समाचार को दबाया गया। न्यूज़ चैनलों पर दिल्ली में शराब घर घर पंहुंचाने का मामला और पंजाब में मद्य निषेध एक ही पार्टी की दो नीतियों पर मीडिया कुछ क्यों नही बोलता? बाबू ये पब्लिक है सब जानती है….धंधा है साहब! न्यूज़ एंकर को यूं ही तो एक एक करोड़ का पैकेज नही मिलता!

एक वे पत्रकार हैं जो आज भी सुबह से शाम तक मेहनत करते हैं उन्हें बड़े शहरों में बमुश्किल 15-20 हज़ार रुपये मिल पाते हैं उनका जीना मुश्किल है। दूसरी ओर हर दिन एक नया नैरेटिव बेचनेवाले समाज का “बुद्धि हरण धंधा” खूब चला रहे हैं। मीडिया हाउसेज के मालिक को पैसा चाहिए उसके लिए कुछ भी करें। उन्हें बुद्धिजीवी पत्रकारों की आवश्यकता नही उन्हें धंधेबाज उन लोगों की आवश्यकता है जो मीडिया हाउस को भी दें और खुद भी कमाएं। न्यूज़ एंकर की यह विवशता है कि वे अगर ऐसा नही करेंगे तो उन्हें निकाल दिया जाएगा। ऐसे में श्रमजीवी पत्रकार कैसे जी सकता है। कुछ तो ऐसा हो कि पत्रकारों की आजीविका सुनिश्चित हो।

भारत मे 800 के करीब चैनल्स है।  लगभग सवा लाख पत्र पत्रिकाएं हैं। इनमें राष्ट्रीय हित और राष्ट्रीय संस्कृति को बढ़ावा देने वाले कितने हैं? विशुद्ध समाचार वाले कितने हैं? इसलिये प्रेस परिषद को चाहिए कि निष्पक्ष और वास्तविक पत्रकारों के हितों की रक्षा के लिए कारगर कदम उठाए वरना खबर देने वालों की खबर देने वाला भी नही मिलेगा।

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