उत्तर प्रदेश में  मोदी-योगी का जलवा

उत्तर प्रदेश में मतदाताओं के लिए विकास और सरकारी कामकाज सर्वोच्च प्राथमिकताओं में से थे, जबकि राम मंदिर और हिंदुत्व के मुद्दे पर खास जोर नहीं था। चुनाव के बाद एक अध्ययन में यह भी पाया गया कि केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के साथ संतुष्टि उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार की तुलना में तीन गुना अधिक थी।

मुख्यमंत्री और गोरक्षपीठाधीश्वर योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में उ.प्र. में लगातार दूसरी बार फिर से निर्वाचित होकर भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन ने 37 वर्ष पुराने रिकॉर्ड को तोड़ दिया। ’उ.प्र. में का बा’ बनाम ’उ.प्र. में बाबा’ की दिलचस्प लड़ाई में बुलडोजर बाबा के नाम का डंका धूम-धड़ाके से बजा। भारतीय जनता पार्टी के एम-वाई (मोदी-योगी) फैक्टर का जलवा कायम रहा तो समाजवादी पार्टी के एमवाई (मुस्लिम-यादव) फैक्टर का वाई कमजोर और ओवैसी का कहर भारी पड़ा। यही नहीं, किसानों-जाटों, ब्राह्मणों, लखीमपुर की कथित नाराजगी की हवा निकल गई और बुलडोजर विजय का प्रतीक चिह्न बन गया। पार्टी की विचारधारा से समझौता किए बिना विपक्ष के सारे सियासी दांव ध्वस्त करने के लिटमस टेस्ट में योगी खरे उतरे।

हिजाब विवाद के बाद मुसलमानों का सपा के पक्ष में ध्रुवीकृत होना भाजपा के लिए फायदेमंद सिद्ध हुआ। भाजपा फ्लोटिंग वोटरों के मन में यह बात बिठाने में सफल हुई कि यदि समाजवादी पार्टी की सत्ता में वापसी होती है तो वह मुस्लिम तुष्टिकरण की राह पर जाएगी। ऐसे में ध्रुवीकरण दूसरी तरफ भी हुआ और उसने मुसलमानों द्वारा सपा के समर्थन को बेअसर कर दिया। बोले तो, 2017 का विधानसभा चुनाव अकेले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे पर लड़ा गया था लेकिन इस बार का चुनाव सीएम योगी के चेहरे को आगे करके भाजपा लड़ी। इस जीत के साथ ही सीएम योगी ने न केवल कई सियासी इतिहास उत्तर प्रदेश में रच दिए बल्कि सिद्ध किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के बाद वही भाजपा का सबसे बड़ा चेहरा हैं। चुनाव में बुलडोजर भी चर्चा में रहा। चुनावी जुलूसों से लेकर सड़कों पर जश्न तक में बुलडोजर का इस्तेमाल हुआ।

मतदाताओं का मिला पूरा सहयोग

उत्तर प्रदेश में डबल इंजन को मिले प्रचंड बहुमत ने साल 2024 के रुझानों का संकेत भी दे दिया। इस बार भाजपा को महिला मतदाताओं का भरपूर सहयोग मिला, तो गरीब जनता ने एक बार फिर भाजपा में अपना विश्वास दर्शाया। साल 2017 के मुकाबले 2022 में भाजपा का वोट प्रतिशत 1.63 प्रतिशत बढ़ कर 41.30 हुआ, सीटें 57 कम होकर 255 ही मिलीं। सपा का वोट प्रतिशत 10.23 प्रतिशत उछल कर 32.05 पर पहुंच गया और 64 सीटों के इजाफे के साथ 111 सीटों पर जीत मिली। कांग्रेस का वोट 3.39 घटकर मात्र 2.35 प्रतिशत रह गया और सीटें सात से घटकर मात्र दो रह गईं। वहीं, बसपा के वोटबैंक में 9.35 प्रतिशत की कमी आई और 2017 में 19 सीटें जीतने वाली बसपा इस बार मात्र एक सीट से खाता खोल पाई।

उत्तर प्रदेश में मतदाताओं के लिए विकास और सरकारी कामकाज सर्वोच्च प्राथमिकताओं में से थे, जबकि राम मंदिर और हिंदुत्व के मुद्दे पर खास जोर नहीं था। चुनाव के बाद एक अध्ययन में यह भी पाया गया कि केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के साथ संतुष्टि उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार की तुलना में तीन गुना अधिक थी। यह दर्शाता है कि मोदी के जादू ने भाजपा को लगातार दूसरी बार सत्ता में लौटने में जोरदार तड़का लगाया। लोकनीति-सीएसडीएस सर्वेक्षण भी कल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थियों के एक नए समूह की ओर इशारा करता है जैसे कि किसान सम्मान निधि, उज्ज्वला योजना, पीएम आवास योजना और गरीबों के लिए मुफ्त राशन।

भाजपा को मिला प्रोत्साहन

एक और महत्वपूर्ण तथ्य उभरा कि चुनाव पूर्व की सभी आशंकाओं को दूर करते हुए भाजपा को किसानों, ब्राह्मणों के बीच अधिक समर्थन मिला। यही नहीं, मायावती के कोर वोट बैंक जाटवों और अनुसूचित जातियों के बीच भी भाजपा की पहुंच बढ़ गई। सर्वेक्षण में 38 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने कहा कि विकास उनकी प्राथमिकता में सबसे ऊपर है, 12 प्रतिशत ने कहा कि सरकार बदलने या हटाने के लिए उन्होंने वोट किया जबकि 10 प्रतिशत ने सरकार के कामकाज को अपनी सोच के अनुरूप बताया।

आश्चर्यजनक रूप से राम मंदिर और हिंदुत्व के मुद्दे को केवल 2 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने समर्थन दिया और ऐसा ही कुछ छुट्टा पशुओं के मुद्दे पर विपक्षी हो-हल्ले को लेकर भी प्रतिक्रिया थी। स्वामी प्रसाद मौर्य, दारा सिंह चौहान और धर्म सिंह जैसे नेताओं के ऐन मौके पर दल बदल के बावजूद ओबीसी के सपा के पक्ष में एकजुट होने की खबरें सर्वेक्षण में गलत सिद्ध हुईं। सर्वेक्षण से पता चलता है कि भाजपा को ब्राह्मणों के 89 प्रतिशत वोट मिले, जो साल 2017 की तुलना में छह प्रतिशत अधिक है। जबकि, ब्राह्मणों के बीच सपा का समर्थन पिछली बार के 7 प्रतिशत से 1 प्रतिशत कम हो गया और मायावती की दलित-ब्राह्मण वाली सोशल इंजीनियरिंग भी धराशायी हो गई। मायावती के जाटव वोट बैंक में भी भाजपा का समर्थन साल 2017 की तुलना में 8 प्रतिशत से बढ़कर साल 2022 में 21 प्रतिशत हो गया, जबकि मायावती का समर्थन 87 प्रतिशत से घटकर 65 प्रतिशत हो गया। गैर-जाटव एससी में भी, भगवा पार्टी को पिछली बार के 32 प्रतिशत की तुलना में 41 प्रतिशत लोगों का वोट मिला। किसानों के आंदोलन और सपा-रालोद गठबंधन के बावजूद, भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन ने किसान परिवारों के मतदाताओं के बीच सपा पर 13 प्रतिशत अंक की बढ़त हासिल की।

सपा नेता और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की जनसभाओं और रैलियों में खूब भीड़ उमड़ी। सपा नेता यह देखकर लहालोट होते रहे कि सोशल इंजीनियरिंग का छोटे दलों से किया गया गठबंधन दांव चल गया। अखिलेश यादव की पिपराइच में जनसभा हो या बड़हलगंज, या फिर चौरीचौरा और शहर में, भीड़ देखकर सपा नेता और कार्यकर्ता अपनी जीत पक्की मान बैठे। उधर, भाजपा के कद्दावर नेताओं मसलन योगी, अमित शाह की रैलियों और सभाओं में जहां भीड़ जुटी वहीं पार्टी के स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं ने मतदाताओं के बीच पैठ बनाई। केंद्र और प्रदेश सरकार की कई योजनाओं से भाजपाइयों की मेहनत को बल मिला। गोरखपुर, देवरिया, लखीमपुर सहित अनेक जिलों में भाजपा क्लीन स्वीप कर गई। सपा अधिकतर मुस्लिम बहुल सीटों पर जीतने में सफल हुई या फिर अन्य सीटें एआईएमआईएम और बसपा के मुस्लिम प्रत्याशियों की सेंधमारी के चलते 500 से डेढ़ हजार तक के मामूली अंतर से गंवा बैठी।

जानिए चुनाव में चला किसका सिक्का

इस चुनाव में अपना दल-एस की प्रमुख अनुप्रिया पटेल और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर का सिक्का भी चला। दोनों नेताओं ने पूर्वांचल में न सिर्फ अपने सहयोगी दलों की जीत सुनिश्चित कराने में मदद की बल्कि, विधानसभा में अपने विधायकों की संख्या कांग्रेस और बसपा जैसी बड़ी पार्टियों भी ज्यादा करने में सफल रहे। साल 2017 में भाजपा के साथ रहे ओम प्रकाश राजभर ने इस बार सपा के साथ हाथ मिला लिया। परिणाम, पूर्वांचल में आजमगढ़ और गाजीपुर में भाजपा का खाता ही नहीं खुला। मऊ जिले में मुश्किल से एक विधानसभा सीट पर कमल खिला और 3 सीटों पर सपा-सुभासपा गठबंधन को सफलता मिली। जौनपुर में सपा-सुभासपा गठबंधन पांच और बलिया जिले में तीन विधानसभा सीट जीतने में सफल रहा। इसके साथ ही पिछली बार की तुलना में इस बार सुभासपा के विधायकों की संख्या चार से बढ़कर छह हो गई।

केंद्रीय मंत्री अनुप्रिया पटेल पिछले विधानसभा चुनाव की तरह इस बार भी भाजपा के साथ थीं। फलस्वरूप, पूर्वांचल में वाराणसी, मिर्जापुर और सोनभद्र में भाजपा ने क्लीन स्वीप किया। इसके साथ ही भदोही में भाजपा को एक और जौनपुर में चार सीटें जीतने में सफलता मिली। इस तरह अपना दल-एस के विधायकों की संख्या 9 से बढ़ कर 12 हो गई।

दिलचस्प यह भी है कि ’नोटा’ (उपरोक्त में से कोई नहीं) विकल्प को उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में कुछ प्रमुख राजनीतिक दलों के समर्थन में दिए गए वोटों की तुलना में अधिक वोट मिले। भारत के निर्वाचन आयोग के अनुसार, चुनाव में नोटा का वोट शेयर 0.69 प्रतिशत था, जबकि ’आप’ का 0.35 प्रतिशत और जदयू का 0.11 प्रतिशत वोट शेयर था। ओवैसी की ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) को 0.47 प्रतिशत वोट मिले। भाकपा को 0.07, राकांपा को 0.05, शिवसेना को 0.03 प्रतिशत, सीपीआई (एम) , सीपीआई (एमएल) और एलजेपी (आरवी) को 0.01 प्रतिशत वोट मिले। आयोग की वेबसाइट के अनुसार, एआईएफबी, आईयूएमएल और एलजेपी को कोई वोट नहीं मिला और उनका वोट शेयर शून्य प्रतिशत था।

ऐसे गड़बड़ाया सपा का खेल

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अखिलेश यादव की पार्टी का मुसलमानों ने खुलकर समर्थन किया और 2017 के 25 की तुलना में इस बार गठबंधन के 34 मुस्लिम प्रत्याशी जीत गए। इनमें 32 विधायक सपा के और दो राष्ट्रीय लोकदल के हैं। बसपा, कांग्रेस और असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम ने 223 से भी ज्यादा मुसलमान प्रत्याशी चुनाव में उतारे थे, लेकिन सभी को हार का सामना करना पड़ा। भाजपा के सहयोगी अपना दल के एकमात्र मुस्लिम प्रत्याशी को फिर कहां जीत मिलती?

सीएसडीएस के अनुसार साल 2017 में करीब 55 फीसदी मुस्लिम वोट सपा, 14 फीसदी बसपा, 33 फीसदी कांग्रेस और करीब दो फीसदी बीजेपी के पक्ष में गया था। दिलचस्प है कि साल 2012 में महज 39 फीसदी मुस्लिम वोट पाने के बावजूद सपा ने सत्ता हासिल की थी, जबकि साल 2022 में करीब 80 फीसदी वोट सपा गठबंधन के पक्ष में गया लेकिन कुल 125 सीटें ही मिलीं।

कई सीटों पर मुकाबला बेहद कड़ा रहा जहां मामूली अंतर से जीत-हार मिली। धामपुर, कुर्सी, बिलासपुर, नकुर, कटरा, शाहगंज, मुरादाबाद में सपा को साल 1000 से कम वोटों के अंतर से हार मिली। वहीं 77 सीटों पर 13006 या इससे कम वोटों से सपा को हार मिली। प्रदेश की दर्जनभर सीटें ऐसी हैं, जहां असदुद्दीन ओवैसी के उम्मीदवार सपा की हार का कारण बने और बिजनौर, नकुड़, फिरोजाबाद, मुरादाबाद, कुर्सी, जौनपुर जैसी मुस्लिम बहुल सीटों पर भाजपा कमल खिलाने में कामयाब रही। बसपा ने कुल 91 सीटों पर मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया। इन सीटों पर कुल 44 सीटों पर सपा गठबंधन को जीत मिली जबकि 47 सीटों पर भाजपा ने जीत दर्ज की और बसपा वोटकटवा सिद्ध हुई।

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