महाभ्रष्टाचारी महाविकास आघाडी

दाऊद के दाहिने हाथ कहे जानेवाले उसके एक गुर्गे सलीम खान के माध्यम से एक भूखंड कौड़ियों के भाव खरीदा गया। इस खरीद फरोख्त में झूठे कागजात तैयार किए गए थे। फडणवीस का आरोप है कि जमीन की इस खरीद-फरोख्त में मिला पैसा दाऊद की बहन हसीना पारकर के माध्यम से दाऊद तक पहुंचा। ये बातें जानते हुए भी राज्य सरकार कोई कार्रवाई नहीं कर रही है।

देश में ऐसी कितनी सरकारें होंगी, जिनके कैबिनेट मंत्री एक के बाद एक जेल जाते दिखाई दे रहे हों, फिर भी सरकार पर कोई फर्क न पड़ रहा हो? महाराष्ट्र को छोड़कर शायद एक भी नहीं।

हाल ही में निपटे विधानसभा चुनावों में चार राज्यों में भारतीय जनता पार्टी की सरकारों की वापसी हुई है। इन चारों राज्यों में चुनाव प्रचार के दौरान भ्रष्टाचार का मुद्दा कहीं भी दिखाई नहीं दिया। शायद इन सरकारों की वापसी की बड़ा कारण भी यही था। क्योंकि देश में लोकतंत्र मजबूत हो रहा है, और देश की जनता ने लंबे समय तक ऐसी सरकारें झेली हैं, जिनमें भ्रष्टाचार बड़ी सामान्य बात हो चला था। मनमोहन सरकार के दौर में तो भ्रष्टाचार की एक के बाद एक कई घटनाएं हुईं। जिसके परिणाम भी मनमोहन सरकार को ही भुगतने पड़े। यानी देश का मतदाता मूक बैठकर सबकुछ देखता भी है, और समय आने पर उचित सबक भी सिखाता है। महाराष्ट्र का मतदाता भी इस समय ‘राम झरोखे बैठ के, सबका मुजरा लेय’ की तर्ज पर सबकुछ देख रहा है, समझ रहा है।

हाल ही में महाराष्ट्र की महाविकास आघाड़ी सरकार के दूसरे कैबिनेट मंत्री नवाब मलिक को जेल जाना पड़ा है। इससे पहले अनिल देशमुख का बहुचर्चित मामला तो सबके संज्ञान में है ही। वास्तव में नवंबर 2019 में महाविकास आघाड़ी सरकार बनने के तुरंत बाद से ही राज्य में भ्रष्टाचार का खेल शुरू हो गया था। ट्रांसफर-पोस्टिंग में हो रहे इस खेल की भनक जब राज्य की खुफिया प्रमुख रश्मि शुक्ला को लगी तो उन्होंने ठोस कदम उठाने की गरज से ही तत्कालीन अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) सीताराम कुंटे से फोन टैपिंग की अनुमति मांगी। यह लिखित अनुमति उन्हें अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) ने दे भी दी। यह फोन टैपिंग की रिपोर्ट जब अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) के पास पहुंची, तो उसे देखकर वह भी हिल गए। रिपोर्ट की एक प्रति मुख्यमंत्री को भी दी गई थी। लेकिन आश्चर्य यह कि मुख्यमंत्री ने उस रिपोर्ट पर खुद कोई कार्रवाई करने के बजाय वह रिपोर्ट उन्हीं गृहमंत्री अनिल देशमुख को सौंप दी, जिनके नाम का उल्लेख इस रिपोर्ट में किया गया था।

यह रिपोर्ट देखने के बाद तो रश्मि शुक्ला की शामत आनी ही थी। अंजाम का आभास होते हुए रश्मि शुक्ला ने प्रतिनियुक्ति पर महाराष्ट्र के बाहर का रास्ता चुना। राज्य के नेताओं को लगा कि क्लेश कट गया। लेकिन दुर्योग से कुछ ही महीनों बाद अनिल देशमुख पर भ्रष्टाचार का दूसरा बम भी फूट गया। मुंबई पूर्व पुलिस आयुक्त परमबीर सिंह ने उन पर पुलिस अधिकारियों के जरिए हर महीने 100 करोड़ रुपयों की वसूली करवाने का आरोप लगा दिया। मुंबई उच्चन्यायालय में उन्होंने इस आरोप के साथ-साथ रश्मि शुक्ला की रिपोर्ट भी पेश कर दी। उच्चन्यायालय ने 100 करोड़ वसूली के अलावा ट्रांसफर-पोस्टिंग मामले की जांच भी सीबीआई को सौंप दी। सरकार के लिए यह बड़ा झटका था। क्योंकि 100 करोड़ की वसूली के मामले में तो सिर्फ देशमुख ही फंसते दिखाई दे रहे थे (और फंसे भी)। लेकिन ट्रांसफर-पोस्टिंग फोन टैपिंग मामले में तो आंच और भी नेताओं तक पहुंचने वाली थी। राज्य सरकार ने पूरी कोशिश की कि ट्रांसफर-पोस्टिंग मामले की जांच सीबीआई न कर पाए। इस बाबत सरकार के वकीलों ने उच्चन्यायालय में याचिका दायर की। अपनी शक भर तर्क भी दिए। लेकिन बात नहीं बनी। उच्चन्यायालय ने स्पष्ट कर दिया सीबीआई संपूर्ण प्रकरण की जांच करेगी।

इससे खीझी सरकार ने यह रिपोर्ट तैयार करनेवाली आईपीएस अधिकारी रश्मि शुक्ला पर शिकंजा कसना शुरू कर दिया। उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज की गईं। रश्मि शुक्ला पर गिरफ्तारी की तलवार लटकने लगी। लेकिन अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) से मुख्य सचिव होते हुए सेवानिवृत्त हो चुके सीताराम कुंटे ने प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) को दिए अपने बयान में साफ कर दिया कि तत्कालीन गृहमंत्री अनिल देशमुख अवैध तरीके से ट्रांसफर-पोस्टिंग करवाते थे। कुंटे ने पिछले साल सात दिसंबर को ईडी को पूछताछ में बताया है कि गृहमंत्री रहते हुए अनिल देशमुख उनके पास ट्रांस्फर-पोस्टिंग के लिए पुलिस अधिकारियों की सूची भिजवाया करते थे। यह सूची देशमुख के निजी सचिव संजीव पलांडे लेकर आते थे। तब अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) की जिम्मेदारी निभा रहे सीताराम कुंटे यह सूची पुलिस एस्टेबलिशमेंट बोर्ड (पीईबी) के सदस्यों को मौखिक रूप से पढ़कर सुना देते थे, और उसके अनुसार ही अधिकारियों की ट्रांस्फर-पोस्टिंग हो जाया करती थी। यानी पीईबी की बैठकें सिर्फ खानापूरी के लिए होती थी। कुंटे ने ईडी के सामने स्वीकार किया है कि देशमुख पद एवं हैसियत में उनसे बड़े थे। इसलिए उनका आदेश मानना उनकी बाध्यता होती थी। जाहिर है, ईडी के सामने सीताराम कुंटे की यह स्वीकारोक्ति पहले से जेल में चल रहे अनिल देशमुख की मुसीबत और बढ़ाएगी। फिलहाल वह 100 करोड़ की वसूली मामले में जेल में हैं। इस मामले में हवाला के जरिए पैसों के लेनदेन के सबूत ईडी के हाथ लग चुके हैं। ये सबूत इतने पुख्ता हैं कि अनिल देशमुख को जमानत मिलना भी मुश्किल हो रहा है।

अब ईडी के ही शिकंजे में महाविकास आघाड़ी सरकार के दूसरे कैबिनेट मंत्री नवाब मलिक भी फंस चुके हैं। उन्हें एक भूमि सौदे के मामले में ईडी ने गिरफ्तार किया है। जिस भूमि खरीद मामले में ईडी द्वारा नवाब मलिक की गिरफ्तारी हुई है, वह मामला सबसे पहले राज्य विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष देवेंद्र फडणवीस ने उठाया था। फिर कुछ ही सप्ताह बाद इस मामले में पहले एनआईए ने, और फिर ईडी ने प्राथमिकी दर्ज कर जांच शुरू की। जिसके परिणामस्वरूप नवाब मलिक की गिरफ्तारी की गई है। नवाब मलिक की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका उच्चन्यायालय से खारिज हो चुकी है। देवेंद्र फडणवीस ने उच्चन्यायालय द्वारा नवाब मलिक की अर्जी खारिज किए जाने के बाद अपने ही आरोपों की याद दिलाते हुए कहा कि मुंबई बम विस्फोट कांड के एक आरोपी शाह वली खान एवं दाऊद के दाहिने हाथ कहे जानेवाले उसके एक और गुर्गे सलीम खान के माध्यम से एक भूखंड कौड़ियों के भाव खरीदा गया। इस खरीद फरोख्त में झूठे कागजात तैयार किए गए थे, और जमीन के वास्तविक मालिक को एक पैसा भी नहीं दिया गया था।

फडणवीस का आरोप है जमीन की इस खरीद-फरोख्त में मिला पैसा दाऊद की बहन हसीना पारकर के माध्यम से दाऊद तक पहुंचा। इस प्रकार परोक्ष रूप से यह पैसा आतंकी फंडिंग में ही जाता है। ये बातें जानते हुए भी राज्य सरकार कोई कार्रवाई नहीं कर रही है। फडणवीस ने सरकार से सवाल किया है कि किस दबाव के कारण सरकार नवाब मलिक का इस्तीफा नहीं ले रही है? क्या यह दबाव दाऊद का है? फडणवीस ने मांग की है कि सरकार या तो नवाब मलिक का इस्तीफा तुरंत ले, या मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे उन्हें तुरंत बर्खास्त करें। जबकि सरकार नवाब मलिक का इस्तीफा लेने से इसलिए कतरा रही है, क्योंकि इससे सरकार पर दबाव बढ़ेगा। लेकिन विपक्ष की सूची अनिल देशमुख और नवाब मलिक तक ही सीमित नहीं है। यह सूची लंबी है। इसमें सरकार के कई और वरिष्ठ मंत्री शामिल हैं। यदि विपक्ष इन मंत्रियों से संबंधित भ्रष्टाचार के मामले एक-एक कर सामने लाता रहा, तो महाविकास आघाड़ी सरकार का भ्रष्टाचार के दलदल से निकल पाना मुश्किल होता जाएगा।

 – विमलेश तिवारी 

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