मैं एक साधारण स्वयंसेवक

स्वयंसेवक को बुद्धिवाद नहीं चाहिए : अब कोई यदि सोचता हो कि मैं बड़ा बुद्धिमान् हूँ और बुद्धि के बल पर दूसरे को संघ-कार्य की अच्छाई समझा दूंगा और वह हमारे साथ आयेगा, तो यह उसकी भूल है। माना कि अपने पास बुद्धि है, हम लोगों से वाद विवाद और तर्क करने में समर्थ भी हों, परन्तु यह सत्य नहीं है कि इस कारण हमारी बात लोगों को जँचेगी। कुछ लोग वाद विवाद में हमसे निरुत्तर हो सकते हैं, हो सकता है अपनी पराजय वे मान भी लेंगे। परन्तु कार्य स्वीकार करेंगे, ऐसा कतई नहीं होगा।

मुझे स्मरण है कि अपने एक अच्छे वकील स्वयंसेवक थे। मेरे एक मित्र ने मुझसे कहा कि उनके मन में संघ के विषय में अनेक प्रकार के स्न्देह, आशंकाएं हैं और उनकी मुझसे मिलने और बात करने की इच्छा है। वह मेरा पुराना परिचित और कुछ दिन शाखा में आया हुआ था। अत: मैं उसके घर गया और पूछा कि तुम्हारे मन में क्या है, बताओ। फिर उस दिन मेरी उससे लगभग डेढ़-दो घंटे बातचीत हुई। अब इतना बोलने के लिए अवसर नहीं मिलता, परन्तु उस समय संघ का कार्य इतना बढ़ा नहीं था और आजकल जो अनेक झंझटें उपस्थित हुई हैं, वे भी नहीं थीं। इसलिए मुझे समय मिल गया।

दो घण्टों में उनके जो भी संदेह और आशंकाएं थीं, उन सबका समाधान करने का मैंने प्रयास किया। प्रत्येक बार वह कहता, ‘यह ठीक है, पर गुरुजी…’, और पुन: वह वहीं बात पूछता। मैं उसे फिर वही समझाता और वह कहता, ‘यह आपका कहना ठीक है गुरुजी, पर…. ?’ मैंने उसे कहा – ‘‘अरे भाई, आपके कितने ‘पर’ हैं ? मैं एक-एक पर उखाड़ता जाता हूँ, एक-एक नया पर उगता जाता है, क्या बात है ?’’ अर्थात उसे समझाना संभव नहीं हुआ। बुद्धि से उसकी आशंकाओं का समाधान हो गया, परन्तु ‘संघकार्य हम कर सकेंगे’, ऐसा उसे जँचे, यह नहीं हुआ। इसका अर्थ अपने में बुद्धि नहीं, ऐसा प्रमाणित नहीं होता। किन्तु बुद्धि की अपनी सीमाएँ हैं, उनके आगे वह जा ही नहीं सकती। हम क्या करें ?

फिर लोग हमारी बात कैसे मानते और ग्रहण करते हैं ? उसके कुछ कारण हैं।

(1) कुछ लोग ऐसे हैं कि मानो परमात्मा ने उन्हें संघ कार्य के लिए ही नियोजित कर रखा है। यदि किसी ने उनके पास जाकर शाखा पर चलने अथवा संघ का कार्य करने की बात कही, तो कहीं उनके पूर्व-जन्म के संस्कार तुरन्त जाग्रत होते हैं और वे हमारे साथ सहयोगी बन खड़े हो जाते हैं। उन्हें कुछ समझाना नहीं पड़ता। ऐसे बहुत लोग हैं। यह एक कारण हो सकता है।

(2) कुछ लोग स्वयं सोच-विचार कर, देश की परिस्थिति आदि देखकर विवेकपूर्वक संघ कार्य के अतिरिक्त गत्यंतर नहीं – ऐसा सोचकर कर्तव्य-बुद्धि से कार्य करने हेतु आगे आते हैं।

(3) कुछ लोग स्नेह के, मित्रों के भूखे रहते हैं। संघ में यह भूख पूर्ण होती है। इसलिए वे आते हैं।

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